शुक्रवार, 16 मार्च 2018

तुम्हारे ही रूपों में तुमसे ईश्वर साक्षात्कार करते! - संत कवीर

संत कबीर जी पेड़ों की झुरमट तले बैठे थे| उनके पास की एक शाखा पर एक पिंजरा टंगा था, जिस में एक मैना पुदक रही थी| बड़ी अनूठी थी, वह मैना| खूब गिटरपिटर मनुष्यों की सी बोली बोल रही थी| कबीर जी भी उससे बातें लड़ा रहे थे| दोनों हँस मैना से कुछ ऊपर पत्तों में छिपकर बैठ गए|
बालगोविंद जी
इतने में, नगर सेठ अपनी पत्नी के साथ कबीर जी के क़दमों में हाज़िर हुआ| मन की भावना रखी - 'महाराज, मेरे सिर के बाल पक चले हैं| घर-गृहस्थी के दायित्व भी पूरे हो गए हैं| सोच रहा हूँ, हमारी सनातन परम्परा के चार आश्रमों में से तीसरी पौड़ी 'वानप्रस्थ' की और बढ चलूँ| एकांत में सुमिरन-भजन करूँ|'कबीर, बिना किसी लाग-लपेट के, एकदम खरा बोले- 'सेठ जी,यूँ वन में इत-उत डोलने से हरि नहीं मिलता!'
सेठ फिर कैसे मिलता है,हरि ? आप बता दें महाराज|
        कबीर फिर मैना से बतियाने लगे - 'मैना रानी, बोल - राम...राम... !' मैना ने दोहराया - 'राम...राम'! कबीर उससे ढेरों बातें करने लगे| सेठ-सेठानी को इतना साफ बोलते देखकर खुश हो रहे थे... कि तभी कबीर उनकी और मुड़े और बोले'जानते हो सेठ जी, मैना को मनुष्यी बोली कैसे सिखाई जाती है? आप उसके सामने खड़े होकर उसे कुछ बोलना सिखाओगे, तो वह कभी नहीं सीखेगी| इसलिए मैंने एक दर्पण लिया और उसकी आड़ में छिपकर बैठ गया| दर्पण के सामने पिंजरा था| मैं दर्पण के पीछे से बोला - 'राम!राम!' मैना ने दर्पण के में अपनी छवि देखी| उसे लगा उसका कोई भाई-बंधु कह रहा है- 'राम!राम!' इसलिए वह भी झट सीख़ और समझ गई| इसी तरह दर्पण की आड़ में मैंने उसे पूरी मनुष्यी बोली सिखाई| और अब देखो, यह कितना फटाफट बोलती है!
         इतना कहकर कबीर ताली बजाकर हँस दिए| फिर इसी मौज मैं, सेठ-सेठानी से सहजता से बोल गए - 'ऐसे ही सेठ जी भगवान कैसे मिलता है, यह तो खुद भगवान ही बता सकता है| लेकिन अगर वह यूँ ही सीधा बताएगा, तो तुम्हारी बुद्धि को समझ नहीं पड़ेगी| इस लिए वह मानव चोले की आड़ में आता है और ब्रह्मज्ञान का सबक सिखाता है -


                  ब्रह्म बोले काया के ओले| 
                 काया बिन ब्रह्म कैसे बोले || 

वह मानव बनकर आता है, मानव को अपनी बात समझाने | उस महामानव को, मनुष्य देह में अवतरित ब्रह्म को ही हम      'सतगुरू' सच्चा गुरु या साधू' कहते हैं |

               निराकार की आरसी,साधों ही की देहि |
              लखा जो चाहै अलख को, इनही में लखि लेहि ||
  
 अर्थात सदगुरू की साकार देह निराकार ब्रह्म का दर्पण है | वो अलख (न दिखाई देने वाला ) प्रभु सच्चे गुरू की देह में प्रत्यक्ष हो आता है |
इस लिए सेठ जी, अगर भगवान को पाना है, तो 'वानप्रस्थ' नहीं! 


          'गुरूप्रस्थ' बनो | सदगुरू के देस चलो चलो -
          चलु कबीर वा देस में, जहँ बैदा सतगुरू होय ||

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