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मंगलवार, 11 मई 2021

महानायक विनायक दामोदर सावरकर

जितेश कुमार
जिला प्रचारक, बेगूसराय
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

विनायक दामोदर सावरकर एक महानायक थे। वह भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों में अग्रिम पंक्ति के सेनानी थे। उन्हें प्रायः वीर सावरकर से संबोधित किया जाता है। सावरकर क्रांतिकारी के साथ एक प्रखर वक्ता और राष्ट्रवादी लेखक भी थे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सावरकर की भूमिका भले ही राजनीतिक पूर्वाग्रह के कारण छुपाई जाती रही हो, लेकिन आज की पीढ़ी ने इतिहास में गुमनाम उन सभी पृष्ठों को खोजना शुरू कर दिया है और इसी गुमनाम पृष्ठों में दशकों तक दबे रहे, आजादी के महानायक प्रखर विचारक, दूरदर्शी प्रतिभा के धनी विनायक दामोदर सावरकर! वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 ई. को हुआ था। उनका जन्म महाराष्ट्र प्रांत में पुणे के समीप बसा एक छोटे-सेगांव भांगूर में हुआ था। उनके पिता दामोदर पंत आस-पास के गांव में लोकप्रिय थे। लोग उन्हें सम्मान की नजर से देखते थे। सावरकर जी की मां राधाबाई सुसंस्कृत और धार्मिक वृत्ति की थी। बाल्यावस्था से ही सावरकर और उनके दोनों भाई राधा मां से गीता रामायण के पाठ सुनते सुना करते थे। राधाबाई अपने तीनों पुत्रों को वीर शिवाजी की कहानियां सुनाती थी। सावरकर जब अपने दोस्तों को मां द्वारा बतलाई कहानी को सुनाते हैं, तो पूर्णतः कहानी के पात्र बन जाते हैं और उनके जैसा ही व्यवहार करते। लेकिन यह प्रक्रिया ज्यादा दिन नहीं चल पायी। गांव में आयी महामारी की बीमारी में राधाबाई चल बसी। उस वक्त सावरकर की आयु मात्र आठ या नौ वर्ष की थी। उनके पिता दामोदर पन्त सावरकर और बड़े भाई गणेशराव ने उनका और उनके छोटे भाई नारायण दामोदर का लालन-पालन किया।  वे चाहते थे कि सावरकर पढ़े और आगे चलकर बैरिस्टर बने। पढ़ाई-लिखाई में सावरकर चतुर थे। हमेशा वर्ग में प्रथम आते थे। इसके साथ ही उनके मन में स्वाधीनता और आजादी के संघर्ष भी पनपते गये। उन दिनों '1857 की स्वतंत्रता संग्राम' के किस्से गांवों में खूब प्रचलित थी। सावरकर भी 1857 की क्रांति के किस्से सुनकर आग बबूला हो उठते। सावरकर में बाल्यकाल से ही क्रांतिकारी गुण कूट-कूट कर भरे थे। सावरकर आठवीं कक्षा के दौरान ही अंग्रेजों के विरुद्ध कविता व भाषण देने लगे थे। उनके ओजस्वी भाषण से लोगों में तिलमिलाहट उत्पन्न होती थी। इसी समय सावरकर ने एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन 'मित्र मेला' का गठन किया। जो क्रांतिकारी की भाषा बोलती थी और तिलक जी द्वारा प्रकाशित स्वाधीनता के लेख की जगह-जगह चर्चा करती और जनमानस को स्वाधीनता के लिए प्रेरित करती थी। इसी समय से तिलक जी सावरकर को जानने लगे थे। सावरकर अपने गुप्त क्रांतिकारी संगठन में रोज नये-नये छात्रों को जोड़ते थे। हमेशा नए छात्रों से परिचय करते और उन्हें अपनी मित्र मंडली में जोड़ते थे। सन् 1899 ई. में जब भांगूर गांव में दूसरी बार महामारी फैली थी। जिसमें सावरकर के पिता के साथ गांव के सैकड़ों लोग चल बसे थे। हर घर से चीख-पुकार की आवाज आती थी।  उनके अंतिम संस्कार के लिए भी लोग नहीं जाते थे। उन्हें डर था कि उन्हें बीमारी न फैल जाये। ऐसे में सावरकर की मित्र मेला के सदस्य उन्हें उनके दुख में शामिल होते और परिवारजन के साथ शमशान तक जाते हैं। यह प्रसंग सावरकर को सिर्फ क्रांतिकारी नहीं तो अपितु एक सामाजिक संवेदनशील महामानव  की पुष्टि करता है। पिता की मृत्यु के बाद घर की स्थिति दयनीय थी। जो कुछ थोड़ा बहुत था, उसे चोरों ने चुरा लिया। गणेशराव ने घर की जिम्मेदारी अपने सर पर ली। वह सावरकर की पढ़ाई जारी रखें। सन् 1902 में शिवाजी हाई स्कूल से दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की और उच्च शिक्षा के लिए सावरकर पुणे गये।वहां फर्ग्यूसन कॉलेज से स्नातक कला की पढ़ाई पूरी की। शिवाजी हाई स्कूल में सावरकर पर कई बार प्रतिबंध लगे थे। क्योंकि वह ब्रिटिश शासन के खिलाफ कविता
और भाषण देते थे। ब्रिटिश शासन के प्रति सावरकर के विरोधाभास को सुनकर पुणे के गलियों में विरोध की लहर दौड़ दौड़ जाती थी। लोग सावरकर से जुड़ने लगे। उनकी लोकप्रियता इस कदर बढ़ रही थी कि जब महारानी विक्टोरिया के जन्म दिवस समारोह का उन्होंने विरोध किया तो सैकड़ों विद्यार्थियों ने सावरकर के स्वर को हवा दी। इसके कारण मुख्य आरोपी सावरकर को मानकर एक माह के लिए स्कूल से निकाल दिया गया और साथ ही ₹10 के जुर्माने भी लगाए गए थे। तब सैकड़ों लोगों ने सावरकर को पत्र लिखकर जुर्माना की राशि  देने की विनती की थी। तब बाल गंगाधर तिलक ने वहां के प्रिंसिपल को एक पत्र को लिखी गई थी तब जाकर प्रतिबंध हटाए गए थे। प्रतिबंध हटने के बाद जब सावरकर  फर्ग्यूसन कॉलेज पहुंचे तो सभी छात्र विनायक दामोदर से जुड़ना चाहते थे। देखते ही दखते वहां भी क्रांति की लहर दौड़ पड़ी। कॉलेज में दिन-प्रतिदिन सावरकर की सामूहिक भाषण व्याख्यान होने लगे। सावरकर पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता के लिए सन् 1904 में 'अभिनव भारत' नामक क्रांतिकारी संगठन की उद्घोषणा की। जिससे हजारों की संख्या में लोग जुड़े। 1905 में बंग-भंग के समय पूरे महाराष्ट्र में अभिनव भारत के कार्यकर्ताओं ने जनता को बंग-भंग के विरोध खड़ा किया। भारत में पहली बार ऐसा हुआ था, जब कोई क्रांतिकारी विदेशी कपड़ों को जलाकर विरोध प्रदर्शन किया हो। इसके बाद महाराष्ट्र में हर छोटे-बड़े चौराहे पर विदेशी कपड़ों की होलिका दहन शुरू हो गई। इसे भारतीय स्वाभिमान की पहली लड़ाई कहा जा सकता है, जब कोई क्रांतिकारी अंतः करण से स्वदेशी और भारतीयता की बात कर विदेशी कपड़ों की होली खेली हो। इस अभियान को आगे चलकर महात्मा गांधी  जैसे नेताओं ने अपनाया। सन् 1996 बैरिस्टर की पढ़ाई के लिए सावरकर लंदन चले गये। उन्होंने देखा वहां भारतीयों के साथ निम्न दर्जा का बर्ताव किया जाता है, उन्होंने होटल के कोने में या बाहर बैठने की अनुमति थी। यही नहीं पढ़ने वाले विद्यार्थियों को भी क्लास रूम में पीछे बैठना पड़ता था। भारतीयों को टेबल-कुर्सी को बैठने नहीं दिया जाता था। ऐसे में सावरकर ने भारतीय मूल के लोगों से संपर्क किया और 'स्वतंत्र भारतीय समाज' की स्थापना की। जिसके प्रमुख सदस्य मदन लाल ढींगरा, वापट, लाला हरदयाल, मैडम भीखाजी कामा, चतुर्भुज व चितरंजन दास थे। सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी थे। जिन्होंने भारतीय स्वाधीनता की लड़ाई को वैश्विक रूप दिया। लंदन में सावरकर ने आयरलैंड, रूस, फ्रांस, इटली व जर्मनी के युवाओं से संपर्क किया। जो अपने स्तर से ब्रिटिश शासन का विरोध कर रहे थे। वैसे लोगों को एकत्रित किया जिन्हें अंग्रेजों ने गुलाम बनाया था। जो अपने मातृभूमि की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे।
सावरकर ने  1857 की क्रांति का विस्तृत अध्ययन किया और एक खोज पुस्तक द फर्स्ट वार ऑफ इंडिपेंडेंस 1857 लिखी। यह पुस्तक ब्रिटिश शासन की पोल खोलने के साथ उन तमाम चाटूकारों, जिन्होंने ने 1857 की क्रांति को महज छोटा सा सैनिक विद्रोह बताया था के विपरीत इस  पुस्तक में  1857 की क्रांति की सटीक व्याख्या की गई थी। सावरकर ने अपनी खोजपूर्ण लेखिनी से सिद्ध कर दिया। 1857 की क्रांति केवल सैनिक विद्रोह नहीं बल्कि जन-
आंदोलन था। पुस्तक में 1857 की क्रांति की सत्यता से भयभीत होकर  शासन ने इसके प्रकाशन पर पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में रोक लगा दिया। फिर भी फ्रांस से उसका गुप्त प्रकाशन हुआ और इसकी गोपनीय वितरण भी भारत एवं अन्य ब्रिटिश साम्राज्य वाले  में देशों में हुआ। सावरकर ने गुरु गोविंद सिंह और सिखों का इतिहास लिखा। मैजिनी की जीवनी पर लिखी पुस्तक का मराठी भाषा में अनुवाद किया। इसकी प्रस्तावना से भयभीत होकर शासन इस पुस्तक पर भी बैन लगा दी। सावरकर एक क्रांतिकारी लेखक थे, इसका प्रमाण सावरकर के प्रत्येक पुस्तक को भारत में प्रकाशित नहीं होने देना था। पुस्तक के प्रकाशन से पहले ही उस पर बैन लगा देना। ब्रिटिश अधिकारी के अनुसार सावरकर के पुस्तक मेजनी में रासायनिक हथियार बनाने की तकनीक का भी उल्लेख किया गया था। इस प्रकार के आरोप लगाकर उनके पुस्तकों पर बैन लगा दिया गया। मदन लाल धींगरा सावरकर के मित्र और लंदन में स्वतंत्र भारतीय समाज के सदस्य भी थे ने सावरकर की जासूसी और सावरकर के पुस्तकों को बैन करने की मांग करने वाले ब्रिटिश अधिकारी विलियम हॉट कर्जन वायली की हत्या कर दी। इधर 'अभिनव भारत' के कार्यकर्ताओं ने पुणे के कलेक्टर जैक्सन की हत्या कर दी। दोनों के हत्याकांड के षडयंत्र में ब्रिटेन व भारत दोनों जगह सावरकर के  गिरफ्तारी की वारेंट निकाले गये। सावरकर की गिरफ्तारी हुई और उन्हें जहाज से समुद्र मार्ग के द्वारा भारत लाया गया। सावरकर जहाज से समुद्र में कूद पड़े और तैरकर फ्रांस बंदरगाह पहुंच गए, परंतु उनका पीछा करते हुए ब्रिटिश सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें पकड़ लिया। इस घटना ने सावरकर को रातों-रात विश्वविख्यात वीर सावरकर बना दिया।
सावरकर को भारत लाया गया उन्हें कालेपानी की सजा हुई। वीर सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा दी गई। सावरकर को 1910 में अंधेमान स्थित सैल्यूलर जेल भेजा गया। जहां क्रांतिकारियों से जानवरों की तरह काम लिए जाते थे। छोटी-छोटी गलतियां पर पिटाई की जाती थी। कई क्रांतिकारियों ने इसी क्रूर यातनाएँ से आत्महत्या करना आसान समझा। लेकिन सावरकर ने उन सभी यातनाएँ  के बावजूद वहां के क्रांतिकारियों को एकत्रित किया। कई बार उन्हें इसके लिए अधिक शारीरिक कष्ट झेलना पड़ा, परंतु सावरकर डटे रहे। जेल की दीवारों पर उन्होंने छः हजार से अधिक कविता की पंक्तियां अपने नाखून से लिखी

और कंठस्थ की। महाराष्ट्र में सावरकर के प्रति लोगों की सहानुभूति बढ़ती जा रही थी आये दिन लोग अंग्रेजों पर हमलावर हो रहे थे इससे भयभीत अंग्रेजों ने सावरकर को 11 वर्षों के बाद अंडमान से रत्नागिरी जेल भेज दिया इसके 3 वर्ष बार उन्हें 1937 तक गृहबंदी रत्नागिरी में ही रहना पड़ा। इसी बीच सावरकर सामाजिक क्रांति में कूद पड़े। छुआछूत, रोटीबंदी और बेटीबंदी के विरुद्ध क्रांति की।  सामूहिक भोज का आयोजन किये। जिसमें सर्व समाज को शामिल किया। पतित पावन मंदिर का निर्माण करवाया। जिसमें सभी वर्ग जाति के लोग एक साथ पूजा में शामिल हो सकते थे, पहली बार दलित पुजारी को मंदिर में स्थापित किया। इस प्रस्ताव को सभी ने बड़े आदर से स्वीकार किया। सावरकर रत्नागिरी में गृहबन्दी के दौरान सैकड़ों सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया। इसी बीच गई बड़े क्रांतिकारी व सामाजिक राजनीतिक नेताओं को टोली सवकरकर से परामर्श लेने आती रहती थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार भी कई बार सावरकर से मिली रत्नागिरी पहुंचे। महात्मा गांधी भी रत्नागिरी सावरकर से मिलने पहुंचे। 
जब 1937 में सावरकर पाबंदी से मुक्त हुए तो देश स्थिति की देखते हुए हिंदू महासभा से जुड़े और 6 वर्षों तक लगातार इसके अध्यक्ष बने रहें। जब भारत के बंटवारे के प्रस्ताव को मुस्लिम लीग ने लायी, तो सावरकर ने इसकी कड़ी आलोचना की। फिर भी बंटवारे की नींव पहले ही तैयार हो चुकी थी। अब तो किसके हिस्से में कितना आता है, महज बचा था। फिर भी सावरकर ने मुस्लिम लीग की साजिश का जोरदार विरोध किया था। उन्होंने एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की। जिसमें पंजाब व बंगाल को पाकिस्तान में मिलाने के लिए वहां बड़े पैमाने को मुसलमानों को बसाया जा रहा है। सीमावर्ती क्षेत्रों में जबरन धर्मांतरण का कार्य किया जा रहा है। सावरकर के इस रिपोर्ट के बाद देश में  मुस्लिम लीग का जबरदस्त विरोध शुरू हुआ।परिणाम भारत  खंडित हुआ तब बंगाल और पंजाब के बड़े हिस्से को सावरकर के कारण मुस्लिम भारत से अलग नहीं कर पाई थी। 
15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ तो सावरकर ने धर्म ध्वज भगवा व राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा को एक साथ फहराया। सावरकर ने कहा आजादी की खुशी है तो वही राष्ट्र के खंडित होने का दुख भी है!
  
मैं कल से नहीं,
कालेपानी का कालकूट पीकर काल के कराल स्तंभों को झकझोर कर,
मैं बार-बार लौट आया हूं 
और फिर भी जीवित हूं। 
हारी मृत्यु मैं नहीं
               -----वीर सावरकर

आप हिन्दू मुस्लिम राजनीति करते है?

जवाब मेरे सलाह से आपको कुरान शरीफ पढ़ना चाहिए क्यों कि हिन्दू-मुस्लिम विवाद BJP के जन्म से पहले से है। और अधिक भयावह भी, वीभत्स भी। 
इस्लाम जबतक अपने मूल ग्रंथ कुरान में परिवर्तन नहीं करता तब तक वह ऐसे ही दुनिया से लड़ता रहेगा, इसलिए इंसानी जिंदगी की कीमत है तो कुरान से वह सब आयतों को हटाया जाये, जो केवल ख़ुदा को मानने वाले को ही जन्नत नशीब होता है यह कहता है और सभी धर्म के भगवान को शैतान मानता है, उनके पुजक को काफ़िर कहता है और इन काफिरों की हत्या से जन्नत नशीब होता है यह मानता है। पहले ऐसे विचार को खत्म करना होगा  हमने धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता मानवता और  विज्ञानवाद के लिए भी। उन आयतों को बदलने की मांग को जोड़ शोर से बोलना होगा जिसे वसीम रिजवी ने कुछ दिन पहले कहा है? 
हम हिन्दूओं की सोच संकीर्ण है या हिन्दू हृदय ऐसा ही रहा अबोध अविवेकी, भविष्यहीन। जो सिर्फ लालच पैसा और मोह में फंसा है, क्या किसी मुस्लिम को देखे है, देश के तरक्की रोजगार शिक्षा के लिए वोट करते? नहीं! वो सिर्फ उनके साथ है, जो उनको अल तकिया जिहाद करने देते है, लव जिहाद करने देते है, लैंड जिहाद करने देते है

और शरिया कानून के नाम पर औरतों को तीन तलाक , चार विवियाँ और चौदह बच्चे पैदा करने देते है। 
हम हिन्दू वास्तविक जानकारी से परे अविवेकी कुतर्क से घेरे है और अपने आप का पीठ थपथपा रहा है कि हम हिन्दू मुस्लिम राजनीति में नहीं पड़ते है बुद्धिजीवी है। हमने देश की तरक्की रोजगार से मतलब है अरे भाई यह देश रहेगा तो मरेगा कौन! और यह देश मिटेगा तो बचेगा कौन! इतनी मामूली सी बात नहीं समझ आती है। आपकी शक्ति क्या है, जिसके बल पर हम वो सब पा सकते है जिसकी हमने जरूरत है, क्या वो केवल शिक्षा है? रोजगार है?  बहुत सारे पैसे है? नहीं! वो हमारा देश है। जब तक यह सुरक्षित है, वो सबकुछ हम अपने बलबूते खड़ा कर सकते है, जिसकी हमने कभी कल्पना की थी। इस देश के प्रत्येक हिन्दू को इस राष्ट्र की सुरक्षा किन हाथो में है ऐसे लोगों का पक्षघर बनाता चाहिए। इतिहास में की भूल से सीखकर वतर्मान और भविष्य ठीक करना चाहिए। 
लेकिन सिर्फ नौकरी और मंहगाई के नाम जब हम निर्णय लेते हैं? और वर्तमान समस्या को केवल हिन्दू मुस्लिम की राजनीति कहकर पल्ले झड़ते है और बडी बडी बाते छोड़ते है तो इस दशा को देखकर गुस्सा कम और उन हिंदुओं पर तरस अधिक आता है। उनकी भी यह मनोदशा तब तक है जब तक उनके यहाँ मुस्लिम 70 प्रतिशत नहीं होते है, होते ही मेरी बाते यथार्थ और परम् सत्य नजर आएगा। किंतु तब आप कश्मीरी हिन्दू की तरह बहन बेटियों को उनके हवाले छोड़कर भागने या बलिदान होने के अलावे कुछ नहीं कर सकते। यही बात पाकिस्तान के प्रथम कानून मंत्री योगेंद्र मंडल तब नहीं समझे थे और लाखों दलितों को पाकिस्तान में छोड़कर बंगाल में शरण लेकर रहे और गुमनाम मौत को स्वीकार किया। जिन्दगी भर नीम-भीम की, के कारण गुमनाम सजा काटी।  किन्तु उनके कारण जो लाखों दलित हिन्दू वहां फंस गए वो आज तक अपनी बहन बेटी को सुरक्षित नहीं कर पा रहे है। उन्ही दलित हिंदुओं में कुछ छिपते छिपाते भारत आये किन्तु यहां भी वह ऐसा ही जीवन व्यतीत कर रहे नागरिकता नहीं होने के कारण कोई सरकारी लाभ नहीं, नौकरी नहीं, उनके बच्चे अशिक्षित है। जब उनकी इस दुर्दशा को दूर करने से लिये किसी राष्ट्रपुरुष का स्वाभिमान जागृत हुआ तो उसने CAA लाया। जिससे किसी को कोई मतबल नहीं है क्यों कि जिसे हम नागरिकता दे रहे है वो पहले है यहां रह रहे है। फिर भी इन दानवी जिहादी प्रवृति के मुस्लिम और कुछ आधुनिकतावादी लोगों को यह बात अपच हो रहा है। ऐसे आधुनिकतावादी हिन्दू पर हमने तरस आता है।  हमें मोदी प्रधानमंत्री नहीं बल्कि एक अवसर मिला है इस अवसर को पहचानिए इतिहास केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं अपितु वर्तमान और भविष्य में वह गलती दोहराई न जाये इसके लिए भी पढ़ना चाहिए। मेरी इच्छा तो यही है और कोई योगेंद्र मंडल न बने...

रविवार, 7 जुलाई 2019

हिन्दु राजा अनंगपाल तॊमर ने 1060 AD में लाल किला बनवाया था

भारत में मुगल शासकों द्वारा संशोधित  इतिहास को सच मानने के लिए हमें मजबूर किया गया है। हमें बताया गया है कि शाहजहां ने 1639 से 1648 के बीच वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी द्वारा लाल किले को बनवाया था। लेकिन हमें यह नहीं बताया गया है कि मुगलों के भारत आने से पूर्व से ही लाल किला दिल्ली में स्थित था। मुगलों ने उसी किले को क्षत विक्षत कर अपना
नाम किले के साथ मंढ दिया। वास्तव में 1060 ईस्वी में राजा अनंगपाल द्वारा लाल किले का निर्माण किया गया था। किले के अंदर बहुत सी वास्तुकला हैं जो चीख चीख कर कहती है कि लाल किला हिन्दू राजा द्वारा बनवाया गया था। पहला साक्ष्य तो यह है कि ऒक्सपर्ड के Bodleian Library में एक चित्र है जिसमें 1628 में शाहजाहन लाल किले के दिवान -ए -आम में एक पर्शियन राजदूत का स्वागत कर रहा है। उसी साल शाहजहान ने तख्त पर कब्ज़ा कर लिया था। इसका अर्थ है कि लाल किला शाहजहान के तख्त पर बैठने से पहले ही मौजूद था। अगर लाल किले को 1639 में बनवाया था तो 1628 में वह लाल किले में कैसे मौजूद था लाल किले के अंदर “खास महल” में राजा अनंगपाल के शाही प्रतीक को देखा जा सकता है। इस प्रतीक में एक हिन्दू कलश के बीच में दो तलवारॊं को ऊपर की ऒर घुमाकर चित्रित किया गया है। कलश पर एक कमल की कली है और उसके ऊपर न्याय का तराज़ू है। दोनों तलवारों की नॊख पर दो शंख चित्रत हैं जो की हिन्दू प्रतीक है। कलश, शंख और कमल इन सभी चीज़ों की सनातन धर्म में महत्वपूर्ण मान्यता है। यही नहीं इस शाही प्रतीक में सूर्य देवता का भी चिन्ह है जो राज परिवार के सूर्य वंश से संबंध को दर्शाता है। महल के दरवाज़े के कमान पर दुपहर के सूर्य का चिन्ह है जो कि सूर्य वंश का प्रतीक है। इस कमान पर हिन्दुओं का पवित्र शब्द “ऒम” भी खुदा गया है। उसके नीचे शाही परिवार के प्रतीक चिन्ह है जो सनातन धर्म का प्रतीक है। इन प्रतीकों के बीच की जगहों पर उर्दू के शिलालेखों को जबरन घुसाया गया है। लाल किले के दिल्ली दरवाज़े पर बनी दो हाथियों की भव्य मूर्तियां किले के हिंदू मूल के एक अचूक संकेत हैं। केवल हिन्दु महलों और मंदिरॊं में ही हाथी के मूर्तियां और कलाकृतियां बनाई जाती है। हिन्दुओं के लिए हाथी शक्ति, महिमा और धन का प्रतीक होता है। ग्वालियर, उदयपुर और कॊटा के महलों में भी इसी प्रकार की कलाकृतियां देखने को मिलती है। “मोती मस्जिद” के प्रवेश द्वार को देखने से यह पता चलता है कि वहां की वास्तुकला किसी मंदिर की प्रवेश द्वार की कला के जैसे प्रतीत होती है। द्वार के गुंबदों के बीच के कवच में हिंदू पूजा में उपयोग किए जाने वाले केले के चिन्ह हैं और बीच में भगवान को अर्पित करने वाले पांच फल है। ध्यान रहे मुस्लिम मस्जिदों में फल ले जाना निषिद्ध है। केवल हिन्दू मंदिरों में भगवान को फल फूल अर्पण करने की प्रथा है। महलों को हीरे जवाहरातों का नाम देना भी हिन्दू प्रथा है। केले के अंदर “रंग महल” के दीवारों पर मंदिर की नक्काशी इस बात का प्रतीक है कि इस किले को शाहजहान ने नहीं बल्कि राजा अनंगपाल नामक हिन्दू राजा ने बनवाया था। रंग महल नाम भी हिन्दू मूल का है। मंदिर के मंडप के ऊपर बनी छॊटी छत्री की हिन्दू धरम में बड़ी मान्यता है। आज भी उत्सवों में ऐसी छत्रियों का उपयॊग सनातन परंपरा में किया जाता है। खास महल और रंग महल के अंदर छिद्रित संगमरमर की जेलियों का उल्लेख “रामायण” में भी किया गया है तॊमर राजवंश ने सन 736 में “लाल कॊट” साम्राज्य की स्थापना की थी। महान नायक पृथ्वी राज चौहान का जन्म इसी वंश में हुआ था। तॊमर अनंगपाल ने लाल कोट की स्थापना की थी जिनका नाम दिल्ली के कुतुब परिसर के लोहे के स्तंभ में खुदा गया है। दिल्ली के मेहरौली में लाल कोट (लाल किला) तॊमर वंश द्वारा बनाया गया था और इसके अवशेष लाल रंग के पत्थरों के साथ अभी भी देखने को मिलते हैं। मुगलों ने भारत के हिन्दू मंदिरों और स्मारकों को क्षत विक्षत किया और भारत के स्वांग रचने वाले बुद्दिजीवियों और पाखंडी धर्मनिरपॆक्ष लोगों ने भारत के इतिहास को क्षत विक्षत किया है। आज सभी साक्ष्य हमारे सामने हैं, कम से कम अब तो हमें सच बॊलना चाहिए।



गुरुवार, 25 अप्रैल 2019

सिन्धी घाटी और वामपंथी इतिहासकार

जितेश कुमार

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ज्ञात साक्ष्य से भारतीय इतिहास का प्रारंभ सिंधु घाटी की सभ्यता से होता है इसे हड़प्पा कालीन सभ्यता या सारस्वत सभ्यता भी कहा जाता है बताया जाता है कि वर्तमान सिंधु नदी के तटों पर 3500 ई.पू. में एक विशाल नगरीय सभ्यता विद्यमान थी. मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल, सभ्यता के नगर थे. पहले इस सभ्यता का विस्तार सिद्धू, पंजाब, राजस्थान और गुजरात आदि बताया जाता है किंतु अब इसका विस्तार समूचा भारत तमिलनाडु से वैशाली (बिहार) तक पूरा पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक ईरान का हिस्सा तक पाया जाता है अब इसका समय 7000 ईसा पूर्व से प्राचीन पाया गया है| इसी प्राचीन सभ्यता की सिलो, टेबलेट्स और बर्तनों पर जो लिखावट पाई जाती है| उसे सिंधु घाटी की लिपि कहा जाता है| इतिहासकारों का दावा है कि यह लिपि अभी तक अज्ञात है और पढ़ी नहीं जा सकती सिंधु घाटी की लिपि के समकक्ष तथाकथित प्रति प्राचीन सभी लिपियाँ जैसे इजिप्ट, चीनी, फ़ोनीशियाई, मेसोपोमियाई आदि सब पढ़ ली गयी है.

तिहासकार अर्नाल्ड जे.टायनयी ने कहा था - 'विश्व के इतिहास में अगर किसी देश के इतिहास के साथ सर्वाधिक छेड़छाड़ की गई है तो वह भारत की इतिहास ही है|' आजकल कंप्यूटरों की सहायता से अक्षरों की आवृत्ति का विश्लेषण कर माकोंव विधि से प्राचीन भाषा को पढ़ना सरल हो गया है सिंधु घाटी की लिपि जानबूझकर नहीं पढ़ा गया और ना ही इसको पढ़ने की सार्थक प्रयास किए गए भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, इस पर पहले अंग्रेजों और फिर कम्युनिस्टों का कबजा रहा है सिंधु घाटी की लिपि को पढ़ने की कोई भी विशेष योजना नहीं चलाई.आखिर ऐसा क्या था सिंधु घाटी की लिपि में? अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकार क्यों नहीं चाहते थे कि सिंधु घाटी के लिपि को पढ़ा जाए?
 1. उनको डर था कि सिंधु घाटी की लिपि को पढ़ने के बाद उस की प्राचीनता और अधिक पुरानी सिद्ध हो जाएगी. इजिप्ट, चीन, रोमन, ग्रीक, आर्मेनिक, सुमेरियन मेसोपोटामिया से भी पुरानी. जिससे पता चलेगा कि वह विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता है. इससे भारत का महत्व बढ़ेगा तो अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकारों को बर्दाश्त नहीं होगा2. अंग्रेज और कम्युनिस्टों इतिहासकारों द्वारा प्रचारित आर्य बाहर से आए हुए आक्रमणकारी जाती है और इन्होंने यहां के मूल निवासियों अर्थात सिंधु घाटी के लोगों को मार डाला व भगा दिया और उसकी महान सभ्यता नष्ट  कर दी. वे लोग ही जंगलों में छुपकर दक्षिण भारतीय द्रवित बन गए शूद्र व आदिवासी बन गये, आदि आदि गलत साबित हो जाएगा.कुछ फर्जी इतिहासकार सिंधु घाटी की लिपि को सुमेरियन भाषा से जोड़कर पढ़ने का प्रयास करते रहे तो कुछ एक इजिप्शियन भाषा से, कुछ चीनी भाषा से, कुछ तो मुंडा आदिवासी की भाषा और कुछ इनको ईस्टर दीप के आदिवासी की भाषा से जोड़कर पढ़ने का प्रयास करते रहे यह सारे प्रयास असफल साबित हुए.सिंधु घाटी की लिपि को पढ़ने में निम्नलिखित समस्याएं बताई जाती है सभी लिपियों में अक्षर कम होते है. जैसे अंग्रेजो में 26 देवनागरी में 52 आदि मगध घाटी की लिपि में लगभग 400 अक्षर  चिन्ह है. सिंधु घाटी की लिपि को पढ़ने में या कठिनाई आती है कि इसका काल 7000 ई.पूर्व.से 1500 ई.पूर्व. तक का है इतनी लंबी अवधि में अनेकों बड़े परिवर्तन हुए इतनी लंबी अवधि जिसमें लिपि में भी अनेक परिवर्तन हुए साथ ही लिपि में स्टाइलिस्ट वेरिएशन भी बहुत पाया जाता है. लेखक ने लोथल और कालीबंगा में सिंधु घाटी व हड़प्पा कालीन अनेक पुरातात्विक साक्ष्य का अवलोकन किया.
 भारत की प्राचीनतम लिपिओं में से एक लिपि है जिसे ब्रह्म लिपि कहा जाता है इस लिपि से ही भारत की अन्य भाषाओं की लिपि बनी है लिपि वैदिक काल से गुप्त काल तक उत्तर पश्चिम भारत में उपयोग की जाती थी संस्कृत, पाली, प्राकृत के अनेक ग्रंथ ब्रह्म लिपि से प्राप्त होते हैं सम्राट अशोक ने अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिए ब्रह्म लिपि को अपनाया. सम्राट अशोक के स्तंभ शिलालेख ब्राह्मी लिपि में लिखे गए और संपूर्ण भारत में लगाए गए सिंधु घाटी के लिए भी और ब्राह्मी लिपि में अनेक आश्चर्यजनक समानताएं हैं साथी ब्राह्मी और तमिल लिपि का भी प्रारंरिक संबंध है इस आधार पर सिंधु घाटी की लिपि को पढ़ने  का सार्थक प्रयास सिद्धांत काक  और इरवाथम महादेवन ने किया.
 सिंधु घाटी की लिपि के लगभग 400 अक्षरों के बारे में यह माना जाता है कि इसमें कुछ वर्णमाला (स्वर,व्यंजन, मात्रा संख्या), कुछ योगिक अक्षर और शेष चित्र लिपि है अर्थात या भाषा अक्षर और चित्र लिपि का संकलन समूह है विश्व में कोई भी भाषा इतनी सशक्त और समृद्ध नहीं जितनी सिंधु घाटी की भाषा. जिस प्रकार सिंधु घाटी के लिए भी पशु के मुख्य की ओर से अथवा दाएं से बाएं लिखी जाती है उसी प्रकार ब्राह्मी लिपि की दाएं से बाएं लिखी जाती है सिंधु घाटी की लिपि के लगभग 3000 टेक्स्ट प्राप्त है इसमें वैसे ही 400 अक्षर चीन है लेकिन 39 अक्षरों का प्रयोग 80% बार है और ब्राह्मी लिपि में 45 अक्षर अब हम उन 39 अक्षरों को ब्राह्मी लिपि के 45 अक्षरों के साथ समानता के आधार पर मैपिंग कर सकते हैं और उसकी ध्वनि का पता लगा सकते हैं.
 ब्राह्मी लिपि के आधार पर सिंधु घाटी की लिपि  पड़ने पर सभी संस्कृत के शब्द आते हैं जैसे श्री अगस्त या मृत, हस्ती, वरुण, क्षमा, कामदेव, महादेव, कामधेनु मूषिका, पग, पञ्च, मशक, पितृ,  अग्नि, इंद्र, मित्र आदिनिष्कर्ष या है कि - सिंधु घाटी की लिपि ब्राह्मी लिपि के पूर्वज लिपि है सिंधु घाटी के लिपि को ब्राह्मणी के आधार पर पढ़ा जा सकता है उस काल में संस्कृत भाषा थी जिसे सिंधु घाटी के लिपि में लिखा गया था सिंधु घाटी के लोग वैदिक धर्म और संस्कृति मानते थे वैदिक धर्म अत्यंत प्राचीन 7000 ईसा पूर्व से भी अधिक पुरानी, हिंदू विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता है हिंदू का मूल निवास सप्त देश यानी (सिंधु सरस्वती क्षेत्र) था जिसके विस्तार में संपूर्ण भारत देश था वैदिक धर्म को मानने वाले कहीं भारत से नहीं आए थे और ना ही यह आक्रमणकारी थे आर्य और द्रविड़ जैसी कोई भी पृथक जाति नहीं थी जिसमें परस्पर पर युद्ध हुआ हो.        
सन्दर्भ: पुस्तक सिन्धु घाटी की सभ्यता



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