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गुरुवार, 5 दिसंबर 2019

शिवसंहिता योग की पुस्तक

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शिवसंहिता योग से सम्बन्धित संस्कृत ग्रन्थ है। इसके रचनाकार के नाम के बारे में पता नहीं है। इस ग्रन्थ में शिव जी ने  पार्वती को सम्बोधित करते हुए योग की व्याख्या कर रहे हैं। योग से सम्बन्धित वर्तमान समय में उपलब्ध तीन मुख्य ग्रन्थों में से यह एक है। दो अन्य ग्रन्थ हैं - हठयोग प्रदीपिका तथा घेरण्ड संहिता है। शिव संहिता में पांच अध्याय है इसमें ज्ञान का वर्णन है भगवान शिव दूसरे अध्याय में नाड़ी संस्थान का वर्णन करते हैं तीसरे अध्याय में पांच प्राण उप प्राण का वर्णन करते हैं व प्राणयाम का वर्णन करते हैं चौथा अध्याय मुद्रा प्रधान है व साधक की घट परिचय निष्पत्ति आदि अवस्था का वर्णन करते हैं पांचवे में 200 से अधिकश्लोक हैं इसमें साधक प्रकार व सप्त चक्रों विस्तृत वर्णन है। प्रथम अध्याय अद्वैत वेदान्त को सार रूप में प्रस्तुत करता है। दूसरे अध्याय में नाड़ी जाल का वर्णन है उसमें अन्यसे अलग साढ़े तीन लाख नाडीयों का वर्णन है। व 15 अन्य मुख्य नाड़ियां बताई गई हैं तीसरे अध्याय में प्राण अपान व्यान आदि पांच प्राण नाग कूर्म आदि पांच उपप्राण वर्णित हैं फिर कुम्भक सहित अनुलोम विलोम प्राणयाम के 4 प्रहर के अभ्यास के लिये कहा गया है फिर पदम् आसन आदि पांच आसन बताएं हैं में दस मुद्रामहा मुद्रा महाबंध उड्डियान आदि बंध विपरीत करनी खेचरी आदि को विस्तार से वर्णन किया पांचवे अध्याय में साधक के प्रकार अनुसार प्राप्ति में लगने समय विधि बताया है विशेष कर पांचवे में सात चक्रों का वर्णन हैं फिर कुछ साधारण व चमत्कारी विधियां हैं  शिवसंहिता क्रिया योग व श्रद्धा व विश्वास का समन्वय है व योग का महत्वपूर्ण ग्रंथ जो आजकल अध्ययन किया जा रहा है।

शनिवार, 28 सितंबर 2019

मौन प्रश्न और मौन उत्तर

जितेश 
आचानक राजदूत मिथिला पहुंचा और महाराज जनक को प्रणाम  किया। उसने भारी मन से अयोध्या में हुए सीता के अन्याय का वृतांत सुनाते हुए कहा "हे नरेश जानकी के साथ घोर अन्याय हुआ है। अयोध्यावासी ने उनके चरित्र पर प्रश्न करते हुए कहा है कि रावण के कैद में रहने के कारण सीता अपवित्र हो गई है। उसका पति अयोध्या का राजा राम ने भी आपकी दुलारी पुत्री का परित्याग कर दिया है। उसे गर्भावस्था में वनवास को भटकने के लिए छोड़ दिया है।"
महाराज जनक दूत की बात सुनकर शोक में डूब गये। इसी वृत्तांत को सुनकर उनकी महारानी बीमार पड़ गई। कुछ दिन बीतने के पश्चात हृदय में गुस्सा और धर्म, अधर्म न्याय, अन्याय के कई प्रश्न संयोजे जनक
अयोध्या पधारे। रात्रि के समय अचानक उनका रथ अयोध्यानगरी में प्रवेश करता है लक्ष्मण संदेश लेकर राम के पास पहुंचे। भैया महाराज जनक अयोध्या पधारे है। अविलंब आपसे मिलने की इच्छा प्रकट की है। राम उसी अवस्था में अपने अंत: पुरी से निकलकर महाराज जनक की ओर दौड़े। द्वार पर जनक खड़े थे। राम, जनक के समीप पहुंचते ही अपना राजमुकुट उनके चरणों में रख कर साष्टांग लेट गये। भगवान राम पूरी विनम्रता से बोले "महाराज जनक मैं आपका अपराधी हूं, आपकी पुत्री के साथ, स्वयं अपनी पत्नी सीता के साथ अन्याय किया हूं, एक अन्यायी और अधर्मी हूं, आप मुझे दंड दे।"
इसके बाद भी जनक का क्रोध उतरा नहीं था। वो राम से बोले "हे राजन मुझे अपने अंत:पूरी में ले चलो। क्योंकि जनक के मन में अभी भी शंका थी। राम अपने अंत:पूरी में राजसी वैभव,भोग-विलास, ठाठ-बाट से रहते हैं। जैसे ही जनक अंत:पूरी पहुंचते हैं, उनका गुस्सा खत्म हो गया, सारे ह्रदय के प्रश्न गौण हो गये। वो लज्जा से सिकुड़ गये।  उन्होंने देखा एक राजा अपने अंत:पूरी में कुश चटाई पर एक सन्यासी की तरह सोता है। उन्होंने देखा राम का व्यक्तिगत जीवन तपस्वी की भांति है, जिस राम ने वनवास काल में बड़े-बड़े राक्षसों का वध किया, रावण का वध किया हो। ऐसा प्रतापी राजा कुश के बिछावन पर भगवा ओढ़े सोता है। अपना भोजन भी स्वयं पकाता है। जनक अब सबकुछ समझ गये थे। तपस्वी राम के सामने मौन रह गये। उनके हृदय के सभी प्रश्न खत्म हुआ और रो पड़े। पश्चाताप के आंसू लिए जनक कहते हैं "आज शंका दूर हुई। हे राम तुम ही नारायण हो।" तुमने सदैव पुत्री सीता के मान-सम्मान के लिए अपने सुख, यश, वैभव को ठोकर मारा है। कल कोई सीता पर लांछन ना लगाएं। इसलिए स्वयं दोषी होना स्वीकार किया है। तुम धन्य हो। हे मर्यादा पुरुषोत्तम। जिस पथ पर तुमने जीवन भर चला है। सदियों तक लोग इसे भूलेंगे नहीं। आज तुम्हारे कारण, मैं भी अमर हो गया। 
इस तरह महाराज जनक को बिना प्रश्न किए ही सारे उत्तर मिल गये। राम का दोष भूल कर, उनका गुणगान करने लगे। स्थिति परिवेश, व्यक्ति का प्रभाव, चरित्र की शुद्धता से राम भी मौन रहे और जनक को भी बिना कुछ बोले ही सारे उत्तर मिल गये। हमें भी महाराज जनक की तरह राम के अंत:पुरी को देखना चाहिए।

रविवार, 21 जुलाई 2019

जबरदस्त है 'सुपर 30' की कहानी

जितेश कुमार 
आज सुपर 30 मूवी देखकर आया हूँ। अपने दोस्त के साथ मूवी देखने गया था। वैसे मैं इस मूवी से कही अधिक पहले से आंनद सर के बारे में जनता हूँ, क्यों कि मैं बिहारी हूँ। आज मूवी को देखकर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ। 
आनंद कुमार के द्वारा संचालित 'सुपर 30' किसी परिचय का मोहताज नही है। अब तक आनंद कुमार के प्रयास से 450 होनहार छात्रों ने IIT में दाखिला लिया है। सुपर 30 के माध्यम से ऐसे ऐसे  छात्र निकले है, जिनके लिए आगे की पढ़ाई करना नामुमकिन था।
आर्थिक तंगी से निराश हताश छात्रों को आनंद कुमार ने गले लगाया और फिर से उनके मन में पढ़ाई की ललक पैदा की। उन छात्रों को उस मुकाम तक पहुंचाया जो उनके लिए सपने जैसा था। जिस प्रकार के सामाजिक परिवेश में हम रहते हैं। ऐसे में आनंद कुमार जैसे व्यक्ति विरले ही मिलते हैं। बिहार के लाल ने जो कारनामा करके दिखाया है, अकल्पनीय है। बिहार इनके प्रयास को नमन करता है। सुपर 30 की सफलता को पहली बार फिल्म के माध्यम से दिखाया जा रहा है। कुछ दिन पहले ही सुपर 30 मूवी रिलीज हुई है।  आप जरूर देखें होंगे नहीं देखे तो दिखियेगा जरूर। इस फिल्म में ऋतिक रोशन ने आनंद कुमार का रोल निभाया है और अभिनेत्री मृणाल ठाकुर मूवी में आनंद कुमार की प्रेमिका है। फिल्म में जाने-माने अभिनेता पंकज त्रिपाठी भी हैं। पहली बार ऋतिक रोशन भले ही बिहारी रोल दिखे हो। पंकज त्रिपाठी तो बिहारी ही है। वो बिहार के गोपालगंज से है। 
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी ना जाने का दर्द क्या होता है, इससे भली-भांति आनंद कुमार परिचित थे! शायद यही मन की टीस उन्हें गरीब काबिल बच्चों के सपने पूरे करने को प्रेरित करता है। इसमें उनके पूरे परिवार का उनको सहयोग मिला। पिता के मृत्यु के पश्चात घर की दयनीय स्थिति थी आनंद कुमार और उनके भाई को वही पटना के गलियों में  पापड़ बेचना पड़ा था। जहां के वो आज स्टार हीरो है। सुपर 30 जैसे निशुल्क संस्थान चलाने के लिए आनंद कुमार के पास  हौसला और शिक्षा के अलावे कुछ नहीं था। परिस्थिति भी अनुकूल नहीं थी। हिंसक पशुओं की तरह शिक्षा को बिजनेस बना चुके शैक्षणिक संस्थान और कोचिंग सेंटर उनको नोच कर खा जाने को उतारू थी। कई बार उन पर हमला हुआ, लेकिन उन्होंने हौसला नहीं छोड़ो। आज वो करके दिखाया जिस पर किसी भी भरतीय को गर्व होता है। सुपर 30 फिल्म के जरिये उनके कृत्यों को आज देश ने देखा है। और उन बच्चों की स्थिति भी जिनके पास कॉपी किताब खरीदने के पैसे नहीं थे। आज देश के सबसे बड़े शैक्षिक संस्थानों में अध्ययन कर रहे है। 'सुपर 30' छात्र, शिक्षक, परिजन, सभी के लिए प्रेरक, उत्साहवर्धक और जोशीला स्टोरी के लबरेज मूवी है।
फ़िल्म में पंकज त्रिपाठी का रोल काफी मनोरंजन करता दिखेगा तो ऋतिक रोशन की आँखें और बोलचाल की शैली आपके मन को बांध लेगा। यह एक पारिवारिक फ़िल्म भी है। आप पिता, भाई, बहन, माँ, शिक्षक किसी के साथ बैठकर निःसंकोच देख सकते है। ऐसे मूवी के आभाव भी है आजकल। जिसे सबके साथ देखा आ सके। एक ऑफर भी परिवार के साथ बैठकर मूवी देखने का। मूवी का अनुसरण करने का। मूवी में लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कठिन से कठिन प्रतिकूल परिस्थिति में भी लक्ष्य की ओर बढ़ाना और उसे  हासिल करना सीखलाता गया है। एक बार जरूर सुपर 30 मूवी देखकर आये।

सोमवार, 13 मई 2019

तब और अब के परिवर्तन


गाँव के लिए इमेज परिणामशाम को पकड़ी के पेड़ के नीचे कुश्ती होती थी| गाँव के सभी बच्चे आपस में कुश्ती लड़ते थे| कुछ बड़े लोग हमें आपस में लड़वाने के लिए प्रेरित करते थे| उस समय नोकझोक के क्रम में हाथ-पाँव का छिल जाना और रक्त निकलना तो आम बात थी| ये सब वीरता और बहादुरी के प्रतिक थे| चोट नहीं लगना, खून नहीं बहना डरपोक और बुजदिली समझा जाता था| मारपीट के क्रम में पैर में चोट आना हाथ की केहुनी से रक्त निकलना मानों ऐसा था जैसे सीमा पर वीर सैनिकों का जख्मी होना| बड़ा गर्व होता था ऐसे गाँव की कोख से पैदा हुआ हूँ मैं| जहाँ रक्त को बहाना बचपन के खेल से सीखे थे और खेल-खेल में जख्मी होने का एहसास सीमा पर तैनात शौर्यवान जवानों की याद दिलाती थी| बचपन से ही एक योद्धा, एक सैनिक बनाने की ललक सभी दोस्तों में थी| आज कुछ लोग देश के सीमा पर तैनात है और कुछ प्रयत्नशील है| मेरे जैसे निकम्मे बीती बातों को लिखने में लगे है| लगभग 12 वर्ष बीत गये होंगे गाँव में कुश्ती बंद हुये ऐसा नहीं है कि गावं में बच्चे नहीं है| है, लेकिन स्मार्टफ़ोन पर ही सभी खेल मौजूद है तो क्रिकेट, गाना, वीडियो, पबजी में व्यस्त रहते है| झूठी बहादुरी और शान में जिये जा रहे है, कोई डाट कर बहार खेल के मौदान में भेजने वाला नहीं है| घरवालें तर्क देते है कि अच्छा ही तो है, बगल के पिंटूवाँ के संघत से तो अच्छा है घर में मोबाईल ही देखे| कितना बेलगाम है दिन भर पैतरा काटते रहता है दंतनिकला के घर से लेकर चवर पार कुईसा के घर तक धूमते रहता है| पढ़ता है कि नहीं, रोज देखते है सरकारी स्कूल ही जाता है|

शनिवार, 4 मई 2019

गाँव की ओर चले

संवेदनाओं  की कद्र जहाँ होती है वही गाँव है| आपके साथ हजारों लोग जहाँ खड़े हो वही गाँव है| अंगिनत वृक्षों की कतार जहाँ लगी हो वही गाँव है| धरती पर सुकून की उन्माद जहाँ मिलाती हो वही गाँव है| स्वर्ग ही गाँव है गाँव ही स्वर्ग है| 
संस्कृति और देश की अस्मिता को समेटे भारत को भारत की तरह बढ़ाता 'गाँव' अनथक है| गंगा गाय और गाँव भारत की पहचान है| जरा सोचो दुनिया बदलने वाले तुम्हारे विनाशकारी तकनीक के विस्फोट से हम भागेंगे कहाँ ?  देखा मैंने तेरे विकास को और कई कहानियां भी सुनी है तेरी समृद्धि की| कोई पर्वत है तेरे शहर में तो किसी को फुटपाथ नसीब है| मानव-मानव में इतना अंतर है, रहन-सहन में इतना अंतर है, बोलचाल में अतंर है|  फर्क है तुझे अपने शहर में कुछ लोगों को गुलाम बनाकर रखने का पर तेरा शहर ही गुलाम है विदेशियों की| खान-पान, पहनावा, भाषा और अब संस्कृति विदेशी, तुम कितना भारतीय बचे हो, जरा विचार करों|  यू आर नॉट भारतीय 
गाँव में है भारत जिन्दा, तुम तो भटक गए, अब भी है वक्त अपने कलियाँ को पुष्प बनना सिखाओं सभ्यता, संस्कृति, संस्कार और चरित्र निर्माण करों| तभी वह भविष्य का इंजीनियर बनेगा| नहीं तो विदेशी मशीनों की तरह, व्यवहार करेगा जिसे प्रेम संबंध की नहीं, चलने के लिए ईधन की जरुरी होगी| पैसा ही भगवान है ऐसा मत बोलो| चलो ले चलो गाँव वही तुम्हारा भगवान है और उसका भी|  इंडिया छोडो गाँव की ओर चले|        

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

लव स्टोरी: हम फिरसे स्कूल में पढ़ सकते है? - जितेश कुमार

आज बहुत दिन बाद जब तुमको देखा, तो तुमसें बाते करने का दिल कर रहा था| कितना कुछ बोलने का मन था| लेकिन अब मेरे लिए तेरे पास वक्त ही नहीं होगा यह सोच कर मौन हो गई| एक समय वो था जब तुम मेरे आगे-पीछे धूमते थे| हर बार ऐसा कुछ करते थे जिससे मेरा ध्यान तुम्हारे ऊपर जाये| आज जब आखों के सामने से गुजरते हो तो कुछ बोलने और सोचने का सवाल ही नहीं था| लेकिन जो मेरे मन में सवाल का बवंडर उठ रहा था| उसकी क्या कहानी होगी? हम तो तुमको इसलिए सताते थे ना, तुम मुझे परेशान करते थे| शायद नोंक-झोक हमारे बीच बहुत बार हुआ, बार-बार हुआ पर कभी तुमने ऐसा कुछ नहीं किया होगा जिससे मुझे ख़ुशी मिले| हर बार मुझे चिढ़ाते रहते थे| दोस्तों के बीच मेरी हंसी उड़ाते थे| कभी-कभी तो मन करता था तुम्हारा मुंहनोच लू| पर ऐसा भी कभी मौका नहीं मिला| एक बार तुम मेरे बेंच पर चप्पल से गन्दा लगा दिए थे याद है तुमको| उस समय मन किया तुम्हारा गला दबा दे| कितना मुझे तंग करते थे? 
आज ऐसे कोई तंग नहीं करता है, तुम आओगे तंग करने बोलो| छोड़ों क्या आओगे? तुमने तो हमेशा मुझे तड़पाने का ही काम किया है चाहे तब हो या अब| 
शायद मैं इतना कुछ ना तब बोल पायी, ना अब| इसलिए यह पत्र लिख रही हूँ क्या हम फिरसे स्कूल में पढ़ सकते है?
भाषा तो तुम्हारी थी पर लिखा मैंने इसे| तुम सच में मुझे सोचती हो, एक संकेत तो दो| क्या मैं आज भी                                                   जिन्दा हूँ तेरे दिल में|

                                        "तुम आओ ना, फिरसे स्कूल में|
                                             तुम बैठना अपनी जगह 
                                               मैं बैठूंगा अपनी जगह|"     

बुधवार, 23 जनवरी 2019

दोस्त; तेरी निगाहों में शहर अच्छा था या बुरा - जितेश कुमार

बहुत दिन बाद मिले हो| एक दम से विदेशिए बन गए हो का| अरे गाँव है कभी-कभार आते जाते रहिये| गठबंधन बना रहता है तो अच्छा है| आज-कल का प्यार और शहर की दोस्ती कछु काम ना आवत है| दोनों के दोनों पइसा के पीछे भागत है| गाँव में खेत है, खलिहान है, जन्म-जन्म के रिस्ता है| तुम्हरा बचपनवा बिता है तो कबो-कबो तो आवत-जावत रहो भिइवा| शहर में कब दिन और रात पता ही नहीं चलता है| मशीन की तरह आदमी चलता रहता है| अरे शहर का भी जिंदगी कौनों जिंदगी है ना तो सुख- चैन है| हम तो कहते है, भईया यही गाँव में ही रहो; खेती-बाड़ी करो, दुई-चार गाये-भईसी पालो और सादी बिआह करो मजा में रहो| अब तो गाँव में अंग्रेजी स्कूलवा भी है बच्चन के पढाई-लिखाई के बारे में सोचना भी नहीं है| तुम कुछ भी कहो हमको तो शहर तनिको अच्छा नहीं लगता है| 
तुम कैसे हो? शहर में तो खूब मन लगता होगा| सुने है शहर में लड़कियां हंस-हंस के बतियाती और तईको नहीं शर्माती है| तब क्लास में कितनी लड़कियां है? तुमसे तो सब बातचीत करती होगी क्यूँ? चलो अच्छा है; हम तो घर-बाड़ और झूठो के खेती-बाड़ी के चक्कर में पर गए| सोच रहे है हम अब शहर में जाकर ही आगे की पढ़ाई करे| कम्पटीशन का एक-दो परीक्षा दे भगवान भरोसे निकल गया तो जय-जय है| नहीं तो शहर में ही कोनों रोजगार के साधन पकड़ लेंगे| एक बात बोल देते है शहर का तो बात ही अजब है, बिजली,सड़क, पानी, नौकरी, स्कूल, डॉक्टर सब के सब मिल जाते है| हम तो कहते है कि शहर की बात ही निराली है| हर प्रकार के सुख-सुविधा है| क्यूँ कछु गलत कहा है? चालो ठीक है; अभी रहना है ना घर पर फिर मिलते है... 
बहुत याद आती है ये बाते जब मै शहर के श्मशान में गाँव के मंदिर को याद करता हूँ| फिर तुमको; अय मेरे दोस्त| उससे ज्यादा वो बाते याद करता हूँ| सच में आज तक पता नहीं चला की तेरी निगाहों में शहर अच्छा था या बुरा?              

शनिवार, 5 जनवरी 2019

इश्क में हर बाजी में इक्का है, फिर भी हर कोई हार जाता है; इस घोटाले की जाँच हो - जितेश सिंह

आज बहुत दिन बाद उसे देखा और देखते रहा|  बहुत से पुराने ख्याल का
बवंडर सुनामी की तरह शरीर में हलचल मचा रही थी| फिर भी मेरी सहिष्णुता ही थी जो मुझे अडिग शांत की हुई थी| शायद उसके मिलाने की खिलखिल्लाहट से ज्यादा प्रबल मेरी शांति थी| शायद अब बड़े हो गए है; नहीं तो अंदर जो तूफान है उसके बारे में क्या बताऊ? इतना ही बताऊँगा 'दिल तो अभी बच्चा है', मैं तो सायना हूँ ना| 18-19 साल की उम्र में दिल की सब बात मान लिया जाये ये जरुरी तो नहीं है लेकिन मैं दिल की सब बात सुनाता जरूर हूँ| कोई व्यावसायिक की तरह जब कैरियर और तुझमे प्रॉफिट-लॉस की दूरगामी परिणाम को खोजता हूँ तो ऐसा प्रतीत होता है, मैं आज सच्चा खरीदा हूँ तेरी मुहब्बत का| लोग तो ऐसा ही समझते है पर मैं जनता हूँ; इश्क के मार्केट में मैं इक्लौता व्यापारी
जो मुफ़त में दिल और दिमाग दोनों को बेंचते  है| बाहर की हंसी, तेरे बिना जीना, कुछ ऐसा ही है; जैसे कृत्रिम फूलों के गमले, दिखते फूल की तरह पर फूल नहींं होते हैै| कोई नई बात तो मैंने नहीं की ना, सभी की आवश्यकता ही आज-कल वही है 'कपड़ा, गाड़ी और बंगला'। शायद हंसी, प्रेम और जिंदगी होती तो मैं भीं यह गाना गुनगुनाता 'मैं तुझको उठा लाऊंगा, तेरे घर से|' बेमतलब के इश्क में हर बाजी में इक्का है फिर भी हर कोई हार जाता है| इस घोटाले की जाँच हो!
हाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहा   
         

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

एक प्रेम कहानी - जितेश सिंह

दो लब्ज ही बया करती हूँ| तुम समझ जाते हो, मेरी कहानी क्या है, कैसे? सासों से भी पहले याद एक बार तू आता है| मेरी आँखें देखते ही तुझको दिल में उतर लेती है| मैं हमेशा डरती हूँ, जो मैंने  महसूस किया वो तूने किया, किया तो बताया क्यों नहीं और नहीं किया तो मैं क्यों दीवानी होते जा रही हूँ| एक-एक प्रश्न मुझे अंदर ही
अंदर मीठा दर्द  दे रही थी| एक बात बोलू , मैं इस दर्द से निकलना भी चाहती थी अगर तू हाथ थामे तो; नहीं तो
हमेशा के लिए इसी दर्द में जीना चाहती थी तेरी दीवानी बन कर| सब्र की नैइआ पर मैं बैठी सोचती रहती थी कि तू आये और हाथ थम ले| सारे आस-पास के लोगों को खबर मिल चुकी थी मैं तेरी दीवानी हूँ; फिर भी तेरा अनजान बना रहना मुझे तरपा रहा था| देखते ही देखते दो साल बीत गए| तू वैसा ही रहा जैसा था, बस अपने हंसी में जिया जा रहा था मेरी प्रवाह तो दूर; तुम तो पास आकर भी इतने दूर थे जैसे गगन के टिमटिमाते तारे को पसंद किया हूँ मैं| मेरी दर्द, तकलीफ, तरप, मायूसी से कही दूर तू टिमटिमाते रहा और मैं टूट कर तुमको प्यार करती रही| देखते देखते हम दोनों उस पाठशाला से उत्तीर्ण हो गये और तुम रेत की तरह मेरे हाथों से निकल गए| जब आखरी बार भीगी आँखों के तुमको देखा और चली गयी| शिकायत तुझसे तो था ही नहीं; कभी तुमको मैंने बताया नहीं की मैं तुमसे प्यार करता हूँ और मन ही मन सोच लिया एक दिन खुद तू ही आकर हाथ थम लेगा| सच बोलू तो मैं आज भी तुझे देखकर जीना चाहती हूँ| कमबख्त समय और नियति ने हमें जुदा कर दिया|
आज तुमसे बिछड़े हुए लगभग चार साल बीत गए| बहुत दिनों बाद मेरी एक सहेली मिली थी| वो बड़ी दुखी थी| जब मेरे साथ पढ़ती थी तो बहुत ही तेज-तरार थी| कई बार तो मैंने उसकी कॉपी से नक़ल की| वो और अपने कक्षा के दूसरे बेंच पर तीसरे नंबर पर जो लड़का बैठता था ना, क्या नाम है उसका याद नहीं आ रहा है| उसी को पसंद करती थी| तब वो भी उसे चाहता था| दोनों की जोड़ी बहुत प्यारी लगाती थी| लगता था एक दूसरे के लिए ही बने हो| मुझे तनिक संदेह नहीं था कभी उसके साथ ऐसा होगा और वो कभी ऐसा करेगा| जिसका सुबह और शाम उसी को हंसाने और लुभाने के लगता था| लेकिन जब मैंने अपनी सहेली जो कल तक एक फूल जैसी दिखती थी| उसका मुरझाया चेहरा और मायूस आठों ने सब बया कर दिया| क्या हुआ होगा उसके साथ 'साले ये लड़के' ऐसे ही होते है| अच्छा हुआ कि हम कभी इसके चक्कर में नहीं पड़े| नहीं तो मेरी भी स्थिति ऐसी ही होती| मैंने उसे बहुत समझाया-बुझाया वो चला गया तो गया| उसके चक्कर में मत पड़ उसे छोड़ कर जो तुमसे प्यार करते है उसके लिए हंसो| बहुत प्रयास के बाद उसके चहरे पर चार साल पहली वाली मुस्कान ने मेरे अंदर की तरप को ठंडा कर दिया| 

जितेश सिंह

कुछ भी मैं बोलू; मैं जिसे पसंद करती थी वो लड़का बहुत अच्छा था| मैंने कई बार उससे बात करने की कोशिश की| आँखों ही आँखों से कई प्रेम-पत्र सामने से उसको दिया पर उसने एक बार पलट कर जवाब नहीं दिया| जैसे ही मेरे मन ये सवाल आया फिर से मैंने उसकी दीवानी होने लगी|  
एक समय के लिए उससे पूरी कहानी सुन कर मैं चकित रहा गया| कोई इतना प्यार मुझे करता था| फिर भी पास आने पर तनिक एहसास भी नहीं होने दिया| सच मानों उसने मुझे जीता लिया था आज| हाँ ये बताना तो भूल ही गया जब मैं उसके अलग हो गया तो फिर मिला कब? आज हम एक दूसरे के साथ है और मैं उस पगली से बेहद प्यार करता हूँ| आज 5 साल बाद जब हम एक साथ आये तो उसका मेरे लिए जो 'अमर प्रेम' था| वो सब कुछ आज बया कर दी| हाँ लेकिन आज भी सालों  बाद मैंने ही उसका हाथ थाम लिया और जो कुछ जैसा उसने पिछले 7 साल में महसूस की थी| उसे उसी भाषा में कागज पर उतार दिया|
(एक काल्पनिक प्रेम कथा- JITESH SINGH )     

रविवार, 9 दिसंबर 2018

"राधा केवल प्रेयसी या और कुछ" - कुमारी अर्चना

कुमारी अर्चना पूर्णियाँ,बिहार

राधा कृष्ण के बिन
हमेशा आधी ही रही
पूर्णता के लिए
वैवाहिक बंध चाहिए
जो उसे न मिल सका
पर क्यों?
क्या द्वापर युग में
राजा महराजा और उनकी प्रजा
एक पत्नीधारी थे
कोई उपपत्नियाँ नहीं रखते थे
क्या सवाल का कोई जबाब है?

प्रेयसी केवल प्रेम करने व
कामपूर्ती के लिए होती है
विवाह के लिए नहीं
परन्तु क्यों ?
कृष्ण ने रासलिला तो वृदावन में 
राधा और गोपी संग रचाओ
पर मथुरा की पटरानी क्यों न बनाओ!

विष्णुजी को नारद मुनि का श्राप था
रामराज्य में सीता का परित्याग
कृष्ण अवतार में राधा से वियोग!

अपराधी तो कृष्ण था
पर अपराधन क्यों राधा बनी
जो उसे वैराग जीवन मिला
विवाहिता का सुख ना मिला!

सदियों से पुरूषों द्वारा छलने
की एक प्रथा चली आई
आज भी चल रही
प्रेयसी प्रेम व कामपूर्ति की
वस्तु में तबदिल हो गई
जो मान प्रेयसी राधा को
बिन पत्नी बने मिला
कृष्ण से पहले राधा का नाम जुड़ा
वही आज पुरूष के बाद नाम 
जब किसी स्त्री का नाम जुड़ता तो
पिता,परिवार,कुल और गोत्र
की नाम व  इज्जत चली जाती
कभी गर्लफ्रेंड तो रखनी बन जाती
कहीं ऑनर किलिंग तो 
कहीं हत्या कर दी जाती तो
कहीं आत्महत्या को विवश!

समाज ने तो कभी भी प्रेयसी को 
धर्मपत्नी का दर्जा न दिया
लोकतांत्रिक देशों की न्यायपालिका ने
प्रेयसी को कानूनी हक़ दिया
विवाहिता समझी जाएगी
बिन पारम्परिक रीति रिवाजों के भी
यदि पत्नी कर्म निभाती हो!
काश् राधा के युग में 
न्याय की सर्वोच्च व पारदर्शी व्यवस्था होती तो
रूक्मनी की जगह राधा होती!



शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

मेरे युगपुरूष अनंत में विलीन हो गये! - जितेश सिंह

चिठ्ठी ना कोइ सन्देश, जाने वो कोन सा देश, कहा तुम चले गये....

15 अगस्त से ही अटल जी की स्वास्थ्य बिगड़ने की खबर आ रही थी| उस दिन देर रात तक न्यूज देखता रहा, मोबाईल से अपडेट लेता रहा| कल 16 अगस्त को



हौसले और सिद्धांत हिमालय जैसे अडिग थे| जिस लोकतंत्र की निष्पक्षरूप उन्होने सेवा की| राष्ट्र सेवा को ईश्वरीय सेवा मानकर उसमें पुरी जिन्दगी झोक डाली हो| वैसे मनुष्य के निर्धन पर राष्ट्र ही नहीं, प्राकृति भी भाव-विभोर हो जाती है| मौसम ऐसी संदेश को प्रचारित कर रही जैसे कोई बड़ा दुःख का पहाड़ टुट पड़ा है| अनजान और अबोध बालक भी अनुभव कर रहा, आज उसकी खुशी और खिलखिलाहट क्यू उसका साथ छोड़ रही है? 


सुबह से न्यूज देख रहा था| पल-पल की खबर पर नजर बनायें हुये था| सुबह से मेरे आंखों को भरोसा था, सब्र की घड़ी में हर पल अटल जी की कविताएं गुंजती रही, उनके भाषण गुंजते रहे| साथ-साथ एक विश्वास भी बना रहा, इतना
विकसित मेडिकल साइंस हो गया है, उन्हें बचा लेगा| भले ही बेड पर ICU में जीवित थे, यही बहुत बड़ी बात थी| 15 अगस्त शाम को अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने लगी| उनके बाद 16 अगस्त सुबह से ही प्रधानमंत्री के अलावे कई अन्य दल के नेताओं का आना-जाना लगा रहा| शाम करीब 5:05 मिनट पर डॉक्टर ने उन्हे मृत घोषित कर दिया| देश पर मानो दुःख का पहाड टूट पड़ा हो| पुरा राष्ट्र स्तब्ध है,  गहरे सदमें में है, क्यकि अटल जी गहरे नींद में चले ग़ये,  जहां से लौट कर कोई नहीं आया| उनसे मेरा कभी किसी उद्धबोधन या कही साक्षात दर्शन नहीं हुआ| टीवी, न्यूज इटरनेट से कही अधिक बड़े-बुजुर्ग,  शिक्षक, समाज से सबसे उस राष्ट्रपुरूष की कहानी सुनते आया हूं| उनकी कविताएं सुनी है|

भारतीय राजनीति में क्षितिज़ के समान विशाल और उदार चरित्र वाले अटल जी एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे| उन्होंने जीवन में जिस पथ को चुना, एक काली कोठरी थी, फिर भी बेदाग निकल गये। अटल जी सिद्धांतों और कर्तव्य की अग्निपरीक्षा को तो पार गये, मगर ज़िन्दगी और नियती से बीच शांत रह गये| आज हम सब को महानायक,  हमारा यूगपुरुष छोड़ कर अनंत में विलीन हो गया| 
यह केवल राजनीति के लिए झटका नहीं, पत्रकारिता,  साहित्यकार, कवि, राष्ट्रभक्त, जन-नायक, मार्गदर्शक, सामाजिक कार्यकर्ता, स्वमंसेवक हर रूप में महानता के शीर्ष पर रहे, एक विराट व्यक्तित्व का निधन है| उनकी रिक्त स्थान की भरपाई करना कई दशकों तक संभंव नहीं है| इस मृत्यु लोक में लोखों जन्मे, लोखों की मृत्यु से आलिंगन हुआ और होता रहेगा, मगर अटल जी जैसा व्यक्तित्व कई दशकों में जन्मते है| 
जिस पथ पर उन्होंने चला, उनके विचार और सिद्धांतों की आवश्यकता है, खासकर आज की राजनीति में| वह परम्परा जिसकी शुरूआत उन्होंने की थी आज उसको गति देने की आवश्यकता है| 
अटल जी की भाषा, शब्दावली ही उनका हथियार और तलवार था,
किन्तु उन्होंने इससे किसी का गला नहीं कटा और ना ही कभी अपना हाथ कटा| अटल जी का मन कोमल जरूर था मगर उनकेआजादी के बाद 16 अगस्त, 2018 की रात सबसे काली रातों में से एक है, जिसने आंधी में दीपक जलाने वाले को अपने अंधकार में समा लिया| अटल यूग का समाप्त हो गये, विचार अमर रहेंगे| जय अटल! जय भारत! जय हिन्दी!

सोमवार, 23 जुलाई 2018

गाँव की शिक्षा से मैं हूँ!

जुलाई का महीना हैं| भोपाल में लगातार तीन दिनों से वर्षा हो रही हैं| मौसम भी थोड़ी ठंडक हो गई हैं, इसलिए धुमना-फिरना दुर्लभ हो गया है| 10 दिन पहले मेरी बी.ए. फर्स्ट ईयर की परीक्षा समाप्त हुई| आप तो जानते ही हैं, कि शहर में रहकर पढ़ने वाले हम जैसे लड़कों को छुट्टियों में घर जाने की कितनी ख़ुशी होती हैं! जब मैं गाँव में पढ़ता था तब परीक्षा के दिन जैसे-जैसे नजदीक आते थे| सामान्य आदते छूटते चले जाते थे| बस स्कूल से घर, घर से स्कूल दिन-रात पढ़ते रहते थे| इतनी भी क्या जल्दी हैं, 1 महीने बाद परीक्षा नहीं हो सकती थे? अभी तो ठीक से तैयारी भी नहीं हुई हैं| आज जब गाँव से इतना दूर हूँ तो सच में परीक्षा से भय नहीं लगता| मैं तो अब चाहता हूँ कि सभी विषय की परीक्षाएं जल्दी हो जाये और एक बार फिर पहुँच जाऊ वही टूटी स्कूल, उखाड़े सडकों, बारिस से टपकता घरों में, बिछड़े दोस्तों के साथ कुछ पल बिताऊ| खासबात यह हैं, कि वो भी इसी पल का इंतजार करते हैं| मेरी तरह मेरे दोस्त भी शहरी जो हो गये है!

जितेश सिंह 

अ.बि.वा.हि.वि.वि., भोपाल

बारिस का तो पहले ही जिर्क किया था तो, आज एकदम से निक्कामों की तरह सोच रहा था! कैसे इतनी दूर पहुँच गया? क्या वो झोपड़पट्टी स्कूल के बुद्धू में इतना हौसला था? फिर पुरानी आपबीती से दिमाग घिर गया और मुझे अपने 'झोपड़पट्टी स्कूल' की यादे आने लगी| कुछ था वहाँ की स्कूल में खास जिसे अब तक भुला नहीं पाया| यह वही पवित्र स्थल था, जहाँ मैंने बोलना सिखा, जहाँ मैंने पढ़ना और लिखना सिखा| यहाँ कुछ तो पागलपन करता था, जिसे भुलना बईमानी होगी| जब तब तन्हाई में दोस्तों की योदों में, हताश, निराश, परेशान माहोल में होता हूँ, तो यही यादे मुझे जीने की शक्ति देती हैं| जो अय्यारी कल तक कमीनापन लगता था| आज मेरे लिए उर्जा स्रोत है और मेरा मार्गदर्शन कर रहा हैं| प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में अपने स्कूल के दिनों की बेकार और बेवजह लगाने वाली धटनाएं जुडी हैं| प्रत्येक स्मरण में एक नई घटना जुडी हैं| एक दशक बाद वही यादे पुनर्जीवित हो जाती हैं| हर पल सहारा देती है, कभी भी तन्हाई, अकेलापन उस यादों में जीने पर महसूस नहीं होता है|
अच्छा ये तो सब को याद होगा ही बचपन के दिन स्कूल से ठीक पहले 9:30 से 11:00 तक पेट दर्द हो जाता था, फिर बिना दवा के आराम कैसे होता था? गाँव के पास एक कान्वेंट स्कूल में मेरा नामांकन हुआ था| मैंने यही गिनती, पहाड़े, बारहखड़ी के साथ ही होमवोर्क के पन्ने फाड़कर कचड़ा फैलाना भी सिखा था| जितनी थप्पर मुझे उस समय दोनों गालों पर पड़ी फिर कभी नहीं| आज जिस 'स्वच्छता आभियान' की मोदी चर्चा करते फिरते हैं| मेरे जीवन में 13 वर्ष पहले ही यह घटना घट चुकी हैं, उसके बाद से, मैंने कॉपी फाड़ना या किसी तरह का कचड़ा फैलना एकदम भूल ही गया| सर क्लास में कुर्सी पर बैठकर बारी-बारी से होमवर्क देख रहे थे| एकदम से उनकी नजर मेरे हरकतों पड़ी या किसी ने गद्दरी की पता नहीं! मैं अपना होमवर्क फाड़कर कागज का टुकड़ा बेंच नीचे फेका ही था, जैसे की जोर से दो बार ताली बजी मैं आवाज सुनकर रोने लगा| अनुमान आप लगाये ताली कहाँ बजी होगी? उसके बाद जो हुआ हास्य लगेगा लेकिन कष्ट इतना ज्यादा था कि पूछिये मत, क्लास रूम में कागज के जितने टुकड़ा गिरे थे, सभी मेरे मुंह में रखकर बिना हाथ की सहायता से कूड़ेदान में फेकना था| कूड़ेदान तक तो मैं पहुँच गया, मेरे मुंह में कागज का टुकड़ा इतना भरा था कि बिना हाथ लगाये कागज से टुकड़ों को मुंह से निकलना नामुमकिन था| करीब आधें घंटे धुप में कूड़ेदान के पास खड़ा रहा होगा| फिर मास्टर साहब का गुस्सा थोडा शांत हुआ तो हाथ लागाकर उन कागज के टुकड़ों को कूड़ेदान में फेक कर वापस आया| फिर से ताली बजी, आगे से होमवर्क नहीं फाड़ना और होमवर्क बनाकर लाना, जाओं बैठों!
नर्सरी में जो सजा मुझे मिली उसके बाद मैंने ना ही होमवर्क का पेज फाड़कर फेका और नहीं कभी किसी तरह की कचडा फैलायी| नर्सरी की यह सजा मुझे आज तक मार्गदर्शन करती रही- "जहाँ रहूंगा, स्वच्छ रखूंगा!"
होमवर्क, कविता और पाठ यादें नहीं रहने पर पिटाना तो रोज दूध पीने जैसे था| इसके साथ ही दोस्तों से झगड़ा, हो हल्ला, पोस्ट ऑफिस वाला खेल, एक दिन तो च्विंगम खाकर आगे वाली बेंच पर लगा दी, जिस पर लड़कियाँ बैठती थी| इन सभी बातों पर भी कुछ कम थप्पड़ या छड़ी नहीं खायी होगी! एक बार तो छुट्टी के समय इतनी पिटाई सभी दोस्तों की हुई, आज भी याद करके हंसी नहीं रूकती| उस समय मैं यु.के.जी. में था| घड़ी मेरे पास नहीं थी और ना ही किसी को टाईम देखने आती थी| अच्छा जरा ये सोचों कोई भी ऐसा लड़का-लड़की होगा, जिसे छुट्टी की बेचैनी ना हो शायद नहीं! सभी तो छुट्टी नाम मात्र से ही ख़ुशी मिलती है| उस वक्त छुट्टी सुनकर जो उत्साह मिलता था भला आज कहाँ? मेरी स्कूल की छुट्टी मुझे आज भी याद हैं, 'प्रियंका बस' के जाने के बाद होती थी| जैसे बस सड़क पर नजर आती सभी अपने बैग पैक करने लगते थे| कुछ लडके हमारी तरह उत्सास में चिल्लाने लगते थे 'छुट्टी'! दिन-प्रतिदिन हमारा चिल्लाने की आवाजों में वृद्धि होती गई| एक दिन मेरे साथ आशीष, बिक्कू, राहुल और सोनू की गणेश सर ने जमकर पिटाई की| जो फुलपैंट पहने थे उन्हें भी और जो हाफपैंट पहने थे उन्हें भी, मगर दोनों की पिटाई अलग थी| उसके बाद हमने 'प्रियंका बस' से रिश्ता ही तोड़ लिया| इसी प्रकार शैने: शैने: पढाई के साथ शरारते भी बढ़ी और पिटाईयों के ग्राफ भी बढ़ता गया| इस तरह से शुरूआत के 5 बरस तक यही मेरी शिक्षा-दीक्षा हुई|
जहाँ मैंने पढ़ना, लिखना, हँसना और सभी नैतिक क्रियाओं को सीखा| इसकी शिक्षा इतनी उच्चकोटि की थी कि दूर-दराज के गांवों में इसकी प्रसिद्धि थी| आर्थिक तौरपर यह स्कूल की मासिक शुल्क बहुत कम था| शिशु ज्ञान मंदिर, रेवाडीह आज भी आवेदन लिखते समय इसका शोर्ट फॉर्म नहीं भूल पाया हूँ| आस-पास बसे गांवों के बड़े-बुजुर्ग इसे यज्ञशाळा कहा करते थे| सच में यह यज्ञशाळा ही था| इसकी तप ने आस-पास के कितने गाँवो को शिक्षित किया| हजारों बच्चों के जीवन में शिक्षा की अलख जगी! इसके संचालक और प्रध्यानाचार्य श्री गणेश प्रसाद सिंह थे| शिक्षा को ग्रामीण स्तर पर जितना इन्होने बढ़ावा दिया हैं| उनके शिक्षारूपी ऋण को आज भी मैं क्या मेरे जैसे हजारों छात्र-छात्रा और उनके परिवार वाले नहीं चुका सकते हैं! मैं तो हमेसा मुफ्त में पढ़ता रहा| खासबात यह थी कि एक ही घर से तीन बच्चे एक साथ पढ़ें तो सबसे छोटे वाला की फ़ीस माफ़ थी| तो मेरा फीस नहीं लगता था| तभी तो मैंने पहले ही कहा "मैं तो मुफ्त में पढ़ने वाला विद्यार्थी था|" 1990 से 2008 तक यह विद्यालय अपनी सेवा से शिक्षा की ज्योति जलाते रहा| मुझे इस स्कूल से आखरी छात्र होने का गौरव प्राप्त है| गणेश सर के साथ ही कई अन्य शिक्षकों का भी सराहनीय योग्यदान था, सभी शिक्षकों तो नाम बताना मुस्किल है, यादे उबाऊ हो जायेगी| हाहाहा! लेकिन दो-चार शिक्षकों को स्मरण करना जिम्मेदारी बनती है, वो शिक्षक जो अंत तक स्कूल से जुड़े रहे, भारती जी थे| इनका भी योगदान महत्वपूर्ण हैं| 2008 में गणेश सर की सरकारी नौकरी हो गई| उसके बाद व्यवस्था और शिक्षकों की कमी से इसे बंद करना पड़ा| लेकिन तब तक कई कान्वेंट स्कूल और कोचिंग सेंटर आस-पास के गांवों में खुल चुके थे| लेकिन यज्ञशाळा तो यज्ञशाळा ही होता था! और मुर्गीफार्म मुर्गिफार्म ही! गांवों में 2008 से बाद नई स्कूल अधिकतर मुर्गीफ़ार्म में ही खुली जो शिक्षा क्रेंद से ज्यादा व्यावसायिक थी| 
मुज़फ्फरपुर से 35 किलोमीटर दूरी पर ही मेरा गाँव 'रेवा' हैं| मुजफ्फरपुर से पश्चिम की ओर छपड़ा-मुजफ्फरपुर जाने वाली NH 102, रेवा रोड के नाम से विख्यात हैं| सड़क के किनारे-किनारे ही बसा यह 22 टोला का गाँव सुप्रसिद्धि के साथ ही कूप्रसिद्धि भी हैं| यहाँ से गंडक नदी बहती हैं| नदीं के किनारे सुखे हुए भूभाग यहाँ के आय का मुख्य स्रोत हैं| वहां लोग तरबूजा, खरबुजा, लालमी, लौकी, खीरा, करेला उगाये हैं और इसी को बेच कर जीवन-यापन करते है| कुछ लोग मछली भी पकड़ते हैं| नदीं के पास ही एक प्राचीन शिवमंदिर भी हैं, जहाँ हमेशा भक्तों की आवा-जाही रहती हैं| मंदिर के आस-पास काफी चहल-पहल रहती हैं| सावन के पूरे महीने शिवमंदिर में रुद्राभिषेक, हवन, पूजा, भंडारा चलता रहता हैं| कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहाँ दूर-दराज से श्रद्धालु गंगा स्नान करने आते हैं| यहाँ पूर्णिमा के 10 पहले से ही मेला लगना शुरू हो जाता हैं| झुला, मिठाइयाँ, तरह-तरह के खिलौनों और समानों से मेला बड़ा ही भव्य लगता है| कार्तिक पूर्णिमा को शुरू होने वाली यह भव्य मेला करीब 1 महीनों तक चलता हैं|     
रेवा की चर्चा पुरानों में भी हैं| भगवान श्री राम जनकपुरी जाते वक्त इसी गाँव में संध्या होने पर विश्राम किये थे| संध्या के ही पर्याय शब्द से इसे 'रेवा' कहा जाने लगा| पूर्व समय में अपने पुरखों के शिक्षा और सूझ-बुझ से गाँव ने खुबी प्रसिद्धि अर्जित की| आज भी हमें दूर-दराज के लोग उन्हीं पूर्वजों के नामों से जानते है| जब शिक्षा के प्रति समाज चेतनाशून्य था तब से हमारे गाँव में माध्यमिक स्कूल और बाद में एक हाईस्कूल भी बना था| मैं भी गाँव के ही माध्यमिक स्कूल से पढ़ाई की थी| मैंने यहाँ चौथा से आठवां तक की पढाई की| 9वीं और 10वीं भी गाँव के ही हाईस्कूल से की| यहाँ की शिक्षा बहुत ही अच्छी थी मगर बाद के दिनों में सरकारी स्कूल के व्यवस्था से सभी परिचित हैं ही| जब मैंने 4वीं में नामांकन लिया तो, शिक्षा प्रणाली बहुत ही बिगड़ चुकी थी| फिर भी इक्का-दूक्का शिक्षकों के मार्गदर्शन में रहे| ज्यादातर मेरा समय शुरुआत के ही दिनों से पेड़ के नीचे, स्कूल के पीछे ही बितता रहा| यहाँ भी काफी अच्छा अनुभव रहा| मैंने राजकीय मध्यविद्यालय, रेवा से तीन कलाबाजी सीखी| खिड़की से बस्ता (स्कूल बैग) लेकर फरार होना| लड़कियों के बेंच पर कलम से घसना, चप्पल पहन कर उनके बेंच को गन्दा करना| खैर बैंच गन्दा करने का तरीका हमने लड़कियों से ही कॉपीपेस्ट किया था| आखिरी किसी के भी मामले में टांग करना (हस्तक्षेप करना)| मेरी अनुमति के बिना कोई लंच के समय फ़रार हो जाये असंभव और मैं लंच के बाद स्कूल में रूक जाऊ असंभव| मेरी आदत थी लंच के समय किसी को भागने नहीं देने की और जैसे ही लंच समाप्त होता खुद भाग जाता था| इसके कारण लड़कों से तो झगडा होती ही थी, लेकिन लड़कियाँ भी जितनी गलियां दी होगी, उसका कोई हिसाब नहीं| मैं बाकी के नियमित छात्रों से पढ़ने थोड़ा तेज था| मेरे कई साथी को तो 8वीं में भी हिंदी पढ़ने नहीं आती थी| मेरे साथ इक्का-दूक्का लडके-लड़कियों ही पढने में ठीक थे| लेकिन सभी किसी दुसरे कान्वेंट स्कूल में पढ़ते थे, नहीं तो घर पर ट्युशन या कोचिंन जाते थे, मगर स्कूल परीक्षा के समय या छात्रवृति के पैसे लेने आते थे| मेरी तरह एक-दो ही थे जो रोज स्कूल आते थे| मेरी एक क्लासमेट थी, वो भी नियमित स्कूल आती थी और पढ़ने में भी काफी तेज थी| कभी कभार बाते भी उससे हो जाती थी| असल में मुझे वो अच्छी लगती थी| हमेसा से मेरे, उसके बीच प्रतिस्पर्धा और झगड़ा ही रहा| गाँव के स्कूल में बातों बतंगर बनने में देर नहीं लगती है| दोस्तों ने भी खूब हवा में मेरी अफवाहें उडाये| किसी के तो बैंच पर कुछ गलत भी लिख दिया था| जिसके हमारी बातें बंद हो गई, कभी कभार जो नोटबुक और होमवर्क शेयर करता था वो भी बंद कर दिया| उसके बाद मेरे साथ 6 साल (10वीं तक) पढ़ी, लेकिन मैंने कभी उससे बात करने की प्रयास नहीं की| 8वीं पास होने में 2 या 3 महीने बचे थे तो मैंने उसी स्कूल में रामजीलाल सर की कोचिंग पढ़ने लगे| वो काफी अनुभवी शिक्षक के साथ अपने जीवन के लगभग आधी उम्र मेरे ही गाँव के स्कूल में बिता दिये थे| स्कूल में पढ़ने के साथ ही वो 9वीं और 10वीं से विद्यार्थियों को कोचिंग भी पढ़ते थे| उनका कोचिंग भी 15-16 वर्षो तक लगातार शिक्षा का केंद्र बना रहा| गणेश सर के कान्वेंट स्कूल की तरह ही मैं रामजीलाल सर के कोचिंन का भी आखरी विद्यार्थी रहा| उन्होंने (रामजीलाल सर) ने गांव की लड़कियों को उच्च शिक्षा से जोड़ने का जो प्रयास किया| अगर वो नहीं पढाते, तो बहुत सारे लडके-लड़कियां मेरे गाँव के 8वीं के बाद नहीं पढ़ पाते|
वर्ष 2012 में 8वीं उत्तीर्ण हुआ और गाँव के ही हाईस्कूल से 9वीं में नामांकन लिया| यहाँ मैं 2 वर्षों तक पढाई की यानि 9वीं और 10वीं| आज स्कूल में शिक्षकों की संख्या अपेक्षाकृत ठीक हैं, लेकिन जब मैं वहां से विद्यार्थी जीवन व्यतीत कर रहा तब शिक्षकों की कमी थी| करीब 1400 विद्यार्थियों संख्या थी और शिक्षक मात्र 2 ही थे| मेरे 10वीं उत्तीर्ण होने से 2 महीने पहले एक शिक्षक की बहाली हुई 'अमित जी' मेरे बड़े भाई जैसे थे| आज भी वहां के छात्रों में काफी प्रिय और नैतिष्ठ हैं| मैं अपने समय का नियमित छात्र था| वहां के सभी शिक्षक और छात्र मुझे अच्छे से पहचानते थे| जब मैंने 9वीं में नामांकन लिया तो मेरे बड़े भाई रितेश उस समय वही से 10वीं की पढाई कर रहे थे| वो मेरे थे, तो बड़े भाई! लेकिन सबसे अच्छे दोस्ती उन्होंने ही निभाई| वो पहले से ही हाईस्कूल में पढ़ते थे| जिसके कारण मुझे वहाँ शुरुआत में कोई परेशानी नहीं हुई| उनके दोस्त लोग भी मुझे अपने छोटे भाई जैसा ही प्यार दिये| खासकर बंटी, नितीश, निशांत, महराणा और विश्वजीत भाई| मुझे नितीश भाई से क्रिकेट खेलने की सूझ-बुझ के साथ डाट भी पड़ती थी| हाईस्कूल में मेरी दोस्तों की भी लिस्ट काफी लम्बी थी| उस समय अंकित, अमरेश, विश्वजीत, चन्दन, उत्तम, मुन्ना, पंकज, आदर्श मेरे दोस्तों की सूची में शीर्ष स्थान पर थे| यहाँ मुझे क्रिकेट की लत लग गयी| खूब क्रिकेट खेली, पहले भी खेलता था मगर हाईस्कूल में आने के बाद क्रिकेट मानों मेरी गर्लफ्रेंड हो| मैं तो क्रिकेट ही खेलने स्कूल आता था| हाईस्कूल में भी मैंने दो और नये उदंडता सीखी| प्रार्थना के समय बातें करना और लड़कियों की साईकिल के हवा निकलना| वैसे हम सभी लड़कियों से नहीं उलछाते थे मगर जो व्यवस्था में नहीं रहती क्लास में ओवर बनती थी| उसी  लड़की की साईकिल की हवा कोई ना कोई निकाल देता था| एक मेरा जिगरी दोस्त था, हवा निकालने का काम उसका ही था| लेकिन मुझे इस बात की ज्यादा ख़ुशी हैं कि हमलोगों में कोई भी लड़का शहरों की तरह दूषित विचार का नहीं था| साईकिल की हवा भी निकलने के पीछे बस छोटी-छोटी खुशियाँ जुडी थी| आज भी ऐसे पल मुझे अपनो के बीच खुद को ले जाता है, एक ऐसी यादो में डुबो देता है; जहाँ से निकालने का मन नही करता है और ऐसी यादे सभी के पास होती है, वैसे भी ये हमारी यादे हैं!
                                                       
                                                 - जितेश कुमार                                  
    

                          

कांग्रेस की निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में भारी गिरावट के पूर्वानुमान

भविष्य में क्या होंगी, मैं नहीं जनता हूँ |  इस दौर में बहुत लोग अभिव्यक्ति की आजादी का अलाप जप रहे है |  तो मुझे भी संविधान के धारा  19  क...