शनिवार, 4 मई 2019

गाँव की ओर चले

संवेदनाओं  की कद्र जहाँ होती है वही गाँव है| आपके साथ हजारों लोग जहाँ खड़े हो वही गाँव है| अंगिनत वृक्षों की कतार जहाँ लगी हो वही गाँव है| धरती पर सुकून की उन्माद जहाँ मिलाती हो वही गाँव है| स्वर्ग ही गाँव है गाँव ही स्वर्ग है| 
संस्कृति और देश की अस्मिता को समेटे भारत को भारत की तरह बढ़ाता 'गाँव' अनथक है| गंगा गाय और गाँव भारत की पहचान है| जरा सोचो दुनिया बदलने वाले तुम्हारे विनाशकारी तकनीक के विस्फोट से हम भागेंगे कहाँ ?  देखा मैंने तेरे विकास को और कई कहानियां भी सुनी है तेरी समृद्धि की| कोई पर्वत है तेरे शहर में तो किसी को फुटपाथ नसीब है| मानव-मानव में इतना अंतर है, रहन-सहन में इतना अंतर है, बोलचाल में अतंर है|  फर्क है तुझे अपने शहर में कुछ लोगों को गुलाम बनाकर रखने का पर तेरा शहर ही गुलाम है विदेशियों की| खान-पान, पहनावा, भाषा और अब संस्कृति विदेशी, तुम कितना भारतीय बचे हो, जरा विचार करों|  यू आर नॉट भारतीय 
गाँव में है भारत जिन्दा, तुम तो भटक गए, अब भी है वक्त अपने कलियाँ को पुष्प बनना सिखाओं सभ्यता, संस्कृति, संस्कार और चरित्र निर्माण करों| तभी वह भविष्य का इंजीनियर बनेगा| नहीं तो विदेशी मशीनों की तरह, व्यवहार करेगा जिसे प्रेम संबंध की नहीं, चलने के लिए ईधन की जरुरी होगी| पैसा ही भगवान है ऐसा मत बोलो| चलो ले चलो गाँव वही तुम्हारा भगवान है और उसका भी|  इंडिया छोडो गाँव की ओर चले|        

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