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शनिवार, 18 मई 2019

जल बचाव जरूर पर फेसबुक नहीं

जितेश कुमार

बाहर निकलना मुश्किल है
लू चल रही है
लोग बेहाल है गर्मी से
शहरों में पानी की कमी है
और तुम आधे घंटे से नहा रही हैं

एक पक्षी छत पर गिरा है प्यासा
पाथिक प्यासा भटक रहा हैं
एक बूंद पानी आसमान से गिरे
इस आस में धरती जी रही..
और तुम आधे घंटे से नहा....

झरना खोले पानी बहा रही है
धरती की प्यास समझ नहीं पा रही
अनमोल जल व्यर्थ बहा रही
 फेसबुक पर जल बचाओ
अभियान चला रही हैं
 खुद आधे घंटे से नहा नहीं..

 लगता है चुनाव लड़ने जा रहे हैं
 वादे के विपरीत हैं इरादे
 तभी तो सेव वाटर चिल्ला रही
 और आधे घंटे से नहा रही..

सोमवार, 13 मई 2019

राजनीति समझाता हूं 
साजिश भी जनता हूं 
शांत हूं कोई कमजोर है 
संस्कार ही कुछ ऐसा है 
अभी मैं छुट्टी पर हूं... 

जल्द कुछ नया करूँगा 
सबसे अलग चलूँगा 
मंत्र है, वही 
अखंड भारत 
एक वही साधना में व्यस्थ 
और अभी मैं छुट्टी पर हूं 

महान ध्येय के लिए 
त्याग बड़ा करूँगा 
मरता छोटी बात है 
मैं पूरा जीवन लगा दूंगा 
आज आत्म निरक्षण के लिए 
अभी मैं छुट्टी पर हूं 

ज्ञान को स्वतंत्र 
मन को बांधना है 
मार्ग दुर्गम है 
कटरिले है
नग्न पैर चलाने के लिए 
हौंसला जुटाऊंगा 
अभी मैं छुट्टी पर है

यह कोई आम छुट्टी नहीं 
जहां मनोरंजन हो 
जल्द बंधन का मोह त्याग 
मैं आता हूं, एक दर्शन सिखने..
अभी मैं छुट्टी पर हूं

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

अमर प्रेम है उपवन का

पुष्पों की गोद में कलियाँ खिलती
राजकुमारी सी इतराती है 
उसी उपवन का  भँवर 
उन कलियाँ में है यौवन लाता 

पहली सुबह जब भँवर ने 
कलियों की पंखुड़ी छुई
चढ़ा  इश्क अब कलियों में 
खिल गई थी; पुष्प भाँति 

अब; पराग निकलता कलियों से  
वह सुगंध बिखेरती उपवन में 
ये अमर प्रेम है उपवन का 
और कहानी पुष्प-भँवर की 

रस की थी जरुरत भँवर को 
पुष्पों की लाज है पंखुड़ी 
भँवर ने भी मान रखी पुष्पों  की
उस नन्ही सी पुष्प-कली की 
एक खरोच न पंखुड़ी पर 
और रस  ले जाता मधुशाला 
ये अमर प्रेम का है उपवन का
ये अमर प्रेम का है उपवन का ...

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

अधिकार लिखूँ या विचार लिखूँ

रंजू सिंह 
दिल्ली
बस कलम उठा अधिकार लिखूँ
लुटती इज्जत पर वार लिखूँ
या लुटी कलम का सार लिखूँ
बाली पर भारी राम लिखूँ
या कुन्ती का व्यभचार लिखूँ
हठ लिख डालूँ , दुर्योधन का
या पाँचाली के विचार लिखूँ
इतिहास लिखूँ , भूगोल लिखूँ
या दर्शन मे श्रंगार लिखूँ
उन कश्मीरो पर तंज लिखूँ
या जम्मू का विस्तार लिखूँ
लज्जत लिख डालूँ , बिस्मिल की
या गांधी के आधार लिखूँ
इस लोकतंत्र के उत्तर मे
दक्षिण लिख दूँ ,फरमान लिखूँ
कुछ गणित लिखूँ, कुछ शून्य लिखूँ
या मौन हृदय का प्यार लिखूँ
विपरीत ही हो मै जो भी लिखूँ
सो जीत के खातिर हार लिखूँ
मै हार लिखूँ या राह लिखूँ
सच से सच्चा अखबार लिखूँ।।
ए मेरे वतन मै, जब भी लिखूँ
अधिकृत दिल से सत्कार लिखूँ।

शनिवार, 30 मार्च 2019

# हाँ, मैं भी चौकीदार हूं

कार्यकर्त्ता हूं
समाज का पहरेदार हूं 
हाँ, मैं भी चौकीदार हूं
सेना हूं,
सरहद का पहरेदार हूं 
हाँ, मैं भी चौकीदार हूं 
शिक्षक हूं, 
ज्ञान का पहरेदार हूं 
हाँ, मैं चौकीदार हूं 
पिता हूं 
घर का पालनहार हूं 
हाँ, मैं भी चौकीदार हूं 
माँ हूं 
बच्चों की मैं ढाल हूं 
हाँ, मैं भी चौकीदार हूं
बहन हूं 
भाई को रक्षा सूत बाँधा  
मैं एक किरदार हूं 
हाँ, मैं भी चौकीदार हूं
भाई हूं,
बहनों का शौर्य हूं 
हाँ, मैं भी चौकीदार हूं
पुत्र हूं 
भविष्य का किरदार हूं 
हाँ, मैं भी चौकीदार हूं 
पुत्री हूं
माँ-पिता का अभिमान हूं 
हाँ, मैं भी चौकीदार हूं 
साधु हूं 
संस्कृति का मैं रक्षक हूं 
हाँ, मैं भी चौकीदार हूं 
भारतीय हूं 
भारत का मैं धन, बल, तप 
और सेवक हूं 
मैं भी चौकीदार हूं.

मंगलवार, 29 जनवरी 2019

मेरी क्या ख़ता है - रंजू सिंह

किसी के जख्म का मरहम
किसी के गम का इलाज 
लोगों ने बाँट रखा है 
मुझे दवा की तरह

कुछ तन्हाईयां 
वेबजह नही होतीं,
कुछ दर्द आवाज़ 
छीन लिया करतें है

ऐ बेवफा थाम ले मुझको 
मजबूर हूँ कितना,
मुझको सजा न दे 
मैं बेकसूर हूँ कितना,

इस जमीन से तो हम 
रिश्ता तोड़ जाएंगे,
बस यादों का 
एक शहर छोड़ जाएंगे

अरमानों के रंग 
बदले कई अर्से हो गए,
ऐसा लगता है तेरे लिए 
हम पुराने हो गए।

मेरी क्या ख़ता है 
तू मुझे सजा देदे,
क्यों तेरे अंदर इतना 
दर्द है इसकी तू वजह देदे,

रविवार, 13 जनवरी 2019

मैं मासूम छोरी, वो स्मार्ट छोरा -रश्मि मलिक

-रश्मि मलिक

मैं उ.प. वाली जाटणी,
वो हरियाणा का जाट।
मैं मज़ाक करी थी 
वो सीरियस ले बैठा बात 

मैं मासूम छोरी
वो थोड़ा ज्यादा स्मार्ट ।
मैं रिस्ता लाने की कह दी ,
वो घर ले आया बारात ।।

मैं थोड़ा ज्यादा स्मार्ट ,
वो पागलो का महाराज ।
मेरे शब्दों में खटास ,
वो बनाता प्यार वाली बात ।।

मैं क्यूटनेस की दुकान 
उसे हैंडसम कहते उसके यार ।
मैं सुनी एक कोनी ,
वो दिल की कह गया हर बात ।।

मैं उ.प. वाली जाटणी,
वो हरियाणा का जाट ।
बनरा था स्मार्ट ,
मै ना आई उसके हाथ ।।

-रश्मि मलिक

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

न्यू प्रेम मैं करता - जितेश सिंह


नया खेल हैं     
नई शाखा की
नया मेल है
दो नयनों के
प्यार अमर है
और अमर रहेगा...

यह तो नया खेल है
चिर-हरण का
चिर यहाँ कोई खींचता नहीं
यह चिर प्रदर्शन है
न्यू प्रेम का...

इतिहास का अमृत प्रेम
विषैला हो चला है
अब कोई प्रेम करता नहीं
मन में किसी के झांकता नहीं
बदन के सुंदरता पे
लो अब मैं नाम लिखता हूँ
क्यों की न्यू प्रेम मैं  करता हूँ ....





रविवार, 9 दिसंबर 2018

"मैं साहित्य का नन्हा कुकुरमुत्ता हूँ" - कुमारी अर्चना

कुमारी अर्चना कटिहार,बिहार

मैं साहित्य का नन्हा सा 
कुकुरमुत्ता कवयित्री हूँ
मुझे पेड़ बनते देर ना लगेगी
पर शेष बचूँगी तक ना!

चाटुकारता करूँगी कभी कागज पे
फोटो बन चिपकने के लिए
कभी मंच पर मुँह दिखाने के लिए
तो रचनाओं को छपवाने के लिए!

बिक जाऊँगी इन्हें संभालने में
नाम होना तो दूर रहा
नाम सामने लाने के लिए भी
धन खर्च करना होगा
तो कभी तन
मन की यहाँ आवश्यक नहीं
वो केवल साहित्य लेखन के लिए  ...

मैं निराला का कुकुरमुत्ता नहीं हूँ
जो विदेशी सत्ता से 
भारत की आजादी के लिए संधर्ष करें
तो कभी गुलाब से लड़ मरे!
मैं यहाँ खुद के अस्तित्व के लिए
संधर्ष कर रही हूँ!

मैं साहित्य की बिसाद पे
नन्हीं सी प्यादी हूँ
संर्धष कर भी तब तक ना जीतूँगी
जब तब वजीर के इशारे पे ना चलूँगी
पर ये वजीर कौन है
साहित्य सिखाने वाले गुरू
बाजार व्यवस्था
मिडिया नियंत्रक
राजनीति के सर्वेशर्वा या
साहित्य समाज के कर्ताधर्ता !


"हाँ मैं प्रसिद्ध होना चाहती हूँ" - कुमारी अर्चना

कुमारी अर्चना कटिहार,बिहार

क्या करना होगा
अपना चेहरा रोज रोज
गमकऊँआ साबुन से चमकाना होगा
फेरनलवली खूब पोतना होगा
सात धंटे की पूरी नींद लेनी होगा
फिर फेसबुक,इन्ट्राग्राम पर
हॉट,सेक्सी व भड़काऊं 
फोटो अपलॉड करनी होगी!

लाइक पे लाइक 
कौमेंन्ट पे कौमेन्ट से
मेरे पोस्ट पे भरे होगें
मेरी खुबसूरती के 
दिवाने इनबॉक्स में 
लाइन में खड़े होगें!

मुझे अपने छोटे से कारनामों को 
बड़ा चढ़ा कर शोखी बघारनी होगी
अखबार व टी.वी पर प्रचार करना होगा
सखी सहेली को बार बार फोन करके
अपना झूठा कच्चा सब चिट्ठा बतियाना होगा
लोग तारिफ के पुल पे पुल बाँधेगें
मैं प्रसिद्धी के पुलंदे पर चढ़ जाऊंगी!

मैं कभी हिरोइन 
तो कभी मॉडल 
तो कभी अधिकारी
तो कभी नेताईन
तो कभी डॉक्टर
तो कभी इजीनियर बनने का
ख्वाब  बनाऊंगी!

महानगर के सबसे पोश इलाके में प्लेट खरीदूंगी
नोटो के बिस्तर पर सोऊंगी
लाइम लाइट की जगमगाती
दुनिया में जीऊंगी
महँगी गाड़ीयों के लाइने लगी होगी
डिजायनर कपड़ों से अलमारी भरी होगी
घर में समान से ज्यादा नौकर होगें
हीरे जवाहरात से मैं लदी होऊंगी
धीरे धीरे सोचे सोचे उम्र निकल जाएगी
और मैं सिजोफ्रेनिया को मरीज हो जाऊंगी
फिर बढ़ापे में भूलने की बिमारी हो जाएगी
मैं प्रसिद्ध हो जाऊंगी
मैं कौन थी?



"समाज का मेहतर हूँ मैं" - कुमारी अर्चना

कुमारी अर्चना कटिहार,बिहार

ब्राह्मा के पादुका में
समाज के निचले स्तर पर
मेहतर कहलाता हूँ मैं
उतर वैदिक काल से
कलयुग तक का सफर
बहुत से उतार चढ़ाव आए
पर मैं एक सा रहा है!

तुम्हारे अंदर और बाहर की
गंदगी झाड़ता,फूंकता हूँ
मन को साफ नहीं कर पाता
वक्त दर वक्त परते पड़ती गई
और मैं मेहतर का मेहतर रहा!

काश् कोई मुझे भी 
झाड़ फूंक कर साफ कर पाता
जैसे कपड़े,बरतन और कागज
सर्फ,साबुन और वाइटनर से हो जाते 
पर मैं कितना भी साबुन मलूँ 
चाहे तो गंगा ही क्यों ना नहा लूँ
मेहत्तर का मेहतर रहता!

फर्क बत इतना है कि
पहले अपने ही पदचिन्हों
झांडू से मिटाता चलता था
अब दूसरे के परचिन्हों को!

अनुसूची जाति का दर्जा व
आरक्षण का लाभ पाकर भी
समाजिक स्तर पर खूदको
मैं कभी ना उठा पाया
आर्थिक स्थिति में भी
अन्य जातियों से तुलना में
पीछे का पीछे ही हूँ
जैसे पहले मेरी थी!

क्या मैं मेहतर ही रहूँगा
क्या मेरी मुक्ति संभव नहीं
जैसे बुद्घ और जैन की हुई
मेरी गंदगी के सफाई से!

ये काम तो हर इन्सान 
स्वं के लिए करता है
पर समाज की गंदगी ढोना
मेरा ही कर्तव्य और कर्म
क्यों बन कर रह गया
और मेरा सम्मान भी शेष!


बुधवार, 5 दिसंबर 2018

"मेरा घर एक चिड़ियाँखाना" - कुमारी अर्चना

कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार

कुकरू कुकरू कर जगाता मुर्गा
चूँ चूँ बड़बड़ाती तब गौरैया 
पंख फैला कर नाचती तितली 
गुटर गूँ,गुटर गूँ कर बोलता कबूतर
मेय मेय कर चिलाता बकरा
मिठ्ठू मिठ्ठू कर पुकारता तोता
माँ माँ कर बुलाती गईया
जोर जोर से दम लगाती बछिया
भौ भौ कर भौकता कुत्ता
तब भाई बहन की आँख खुलती
हम सब रहते एक ही घर में
मिल जुल कर एक परिवार की तरह
इस चिड़ियाखाना में रहते!

भाई बहन के द्वंद में 
मुर्गे का काम तमाम हुआ
माँ की मन्नत में बकरा(खस्सी)
देवी को बलि चढ़ी
मिठ्ठू बारिश के पानी में 
नहाते नहाते ठंड से मरा
फूल सारे खत्म हूए 
तितली परदेश चली गई
गईया के साथ बछिया 
बधिया(कसाई )के हाथों बिक गई
पेड़ पौधे भी कटने से गौरया रानी
रूठ किसी ओर के घर चली गई
खोप खुले रहने से कबूतरों
बाहर दाना चुनने फुर्र हो गए
भौ भौ करता जाॅनी को
जहर देने से मौत हो गई
घर के सारे बासिंदे बिछड़ गए
हमारा कुनबा टूट कर बिखर गया!

ऊँची ऊँजी जेल जैसी दिवारे थी
खिड़की थी पर खुलती ना थी
बाहर सड़क थी अंदर घर
सुरक्षा कारणों से स्कूल भी नहीं जाते थे
पिता पुलिस में थे थानेदार थे
आए दिन चौर और बदमाशों के
धमकियों भरे खत आते थे
गब्बर आएगा सबको मार देगा
भय के साये में बच्पन बीता
घर पर ही दोनों टाइम ट्यूशन चलता
धीरे धीरे हम सब चिड़ियाखाना के
कैद के बंदी बनकर रह गए
जो दो टांगे रहकर भी भाग नहीं सकते!





:

"पलाश के फूल" - कुमारी अर्चना

कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार

पेड़ की डाली से जब
सारे के सारे पत्ते 
झड़ नीचे आते
पेड़ की एक एक डाली के
ऊपर फूल लद जाते!

बसंत के मौसम में ही 
पलाश फूल खिलते
जंगल में आग लगाते
और तुम मेरे मन में!

वैसे जब ही तुम आते
मुझ पर फागुन का फाग
पलाश के फूलों से बने
लाल रंग को लगाने
कभी खुशब़ू तो ना देते पर
मेरे मन में सदा तेरे
यादों की बगिया को महकाते
जब भी तुम चले जाते!

अद्धचँद्राकार पंखुडियाँ
वैसे चाँद सा तुम्हारा मुँख
छटा लालवर्ण के फूलों की
सूरज के किरणों से
कनक सी आभा आती!

गहरे लाल फूलों को टेसू कहते
वैसे तुम भी  मेरे टेसू हो
जब गुस्से से तुम्हारा
चेहरा लाल लाल हो जाता!

पलाश को तलाश फूलों की रहती
और मुझे तुम्हारी!
वो भी ठूठा पेड़ सा
मुक बना रहता
और मैं पत्थर सी
बेज़ान मुरत!

फूलों से यौवना हरा रहता
गर्मी कहीं उड़न छू हो जाती
वैसे ही तुम्हारे होने से मेरी
प्राणवायु दीर्धायु हो जाती!



ढह जाए न हिन्दू के सीने का त्याग - अभिनेष कटेहादुबे"दीप"

उन्हें तनिक न भय होता है

अभिनेष कटेहादुबे"दीप"

तूफानों के आने का,
हुनर मिला है जिन पेड़ों को
आंधी में झुक जाने का  ।
उन्हें बसंत भरमा न पाया
जड़ में जिसने पैर जमाया
इस जग में वो ही बड़े हुए है
जो जड़ को जकड़े अड़े हुए है
प्रतिमाओं में वो मढ़े हुए है
जो झुक कर फिर से खड़े हुए है,
हर  हिन्दू  के  सीने  का त्याग
 कहीं  ढह जाए न
भरत  भूमि  की  माटी  पर
दाग कहीं रह जाए न
जिसने हमको सत्ता दी है
और दिया सारा शासन
उसी राम को दे न पाए एक
दिव्य ऊँचा आसन .....
                              

मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

“फुटपाथ" - लेखिका कुमारी अर्चना

कुमारी अर्चना

 पूर्णियां, बिहार 

मोर्या होटल का
आलिशान बिलडिंग
राजशी ठाठ बाट

नेता,अभिनेता बड़े लोगों से
यहाँ की महफिल सजती है
कई हजारों के एक कमरे
मंजिलों पे कई मंजिले
आगे पीछे नौकर चाकर
सुरक्षा के लिए तैनात दरवान
जैसे बाॅडर पर जवान!

देख कर तो लगता है
किसी बड़े अधिकारी
या नेता का घर हो
बत्तीयों की सजावट से
नई दुल्हन सी लगती है!

रात के काले अंधेरे में
जब कुकूर केवल भौंकता है
शहर सोता है उजाले में
होटल के आगे नंगी फर्श पर
कई भिखारी सोए रहते है
या यूँ कहे बस एक जिंदा लाश
पड़ी रहती है जब तक कि

होटल का दरबान गेट नहीं खोलता
फिर लाशे चलने लगती है
एक घर से दूसरे घर
एक दुकान से दूसरे दुकान
एक सड़क से दूसरे सड़क पर
हाथ फैलाए कटोरा लिए
दर दर भटकते हुए
संवेदना का लावा जैसे
आँखों से फूट पड़ेगा
और कलेजा मुँह को!

इतने आलिशान होटल में
क्या एक कमरा खाली नहीं
या बरामदे का कोई कोणा
जहाँ पर अपनी गरीबी छूपा सके
तन को किसी वस्त्र से ढक
ठंड़ को मात दे सके!

शायदा नहीं!
ये कैसे हो सकता है,
यहाँ सभ्य और प्रतिष्ठित लोग रहते
भिखारी अस्भय और नंगे लोंगो
के स्पर्श भर से महामारी फैल जाएगी
स्वास्थ पर दुष्प्रभाव पड़ेगा
हजारों की फीस भरनी होगी
कपड़े अलग खराब होंगे
ड्रायक्लीनर को देने पडेंगे!

होटल का प्रतिष्ठता
जाती रहेगी सो अलग
कमरों के रेट कम होंगे
लोग इस होटल के बजाय
दूसरे होटलों में जाएगे
एक भिखारी मरता है तो मरने दो!
ये उसके कर्मों का फल है
कि वो गरीब पैदा हुआ!

हाँ गरीब,भिखारी पैदा होना
मेरे ही कर्मफल है
कोई इसे क्यों बाँटे या कम करें!

फुटपाथ पर पैदा होना और मरना
जन्मसिद्ध अधिकार है
आजादी पाने का सौभाग्य है!
इससे तो अच्छा होता कि हम
गुलाम रहते सब बराबर तो रहते!

बुधवार, 31 अक्टूबर 2018

गंगा


  युगो-युगो से वेदों ने जिसका गान किया,                          

  मुनियों ने जिसको सुमिरन बारंबार किया।

  पुराणों ने जिसकी गाथा का गुण गान किया,
  शिव जटा समाई देवताओं ने गंगा नाम दिया।।

  भारत के इतिहास ने जिसको मां कह कर पुकारा है ,
  पुत्र भीष्म ने  महाभारत में भगवान को ललकारा है।
  जिसकी धारा को सहस्त्रबाहु ना रोक पाया है,
  उस गंगा को कलयुग में प्रदूषण युक्त बनाया है।।

  गंगा ने विदेशों में भारत का मान बढ़ाया है ,
  गंगा की गाथा को आद्य शंकराचार्य ने गाया है।
  भारत माता के बेटों की प्यास बुझाई है,
  गंगा किनारे बैठ ऋषियो ने सिद्धि पाई है।।

  मृतको की मुक्ति का मार्ग भी गंगा है,
  जिसका मन चंगा तो कठौती में गंगा है।
  दुनिया में भटकर मनुष्य ने क्या पाया है,
  दुनिया की ठोकर खा  चरणों में अाया है।।

  भगीरथ की तपस्या का मान हो तुम,
  विष्णु के चरणों का सम्मान हो तुम।
  कवियो की गाथाओं का गान हो तुम,
  भारतीय की आन-बान-शान हो तुम।।

  भारतीयों ने कलियुग का असर दिखाया है,
  चमडा,नाली गंदा पानी तुझमे बहाया हैं।
  इस कृत्य पर कोई नेता न शर्माया है,
  तेरे नाम पर उसने करोड़ों रूपये कमाया है।।

  उद्योग नाम पर तुझको बार-बार गंदा किया,
  सफाई के नाम पर नेताओं ने धंधा किया ।
  तुम्हारे ही नाम पर जनता से चंदा लिया,
   20हजार करोड़ का मंत्रालय बना दिया।।

  घर-घर जाकर हम एक अलख जगाए,
  माँ गंगा की सफाई का संकल्प दिलाए।
  जाति-धर्म का चोला छोड़कर उपर आए,
  जल ही जीवन है,इस मंत्र का भान कराए।।

  सबकुछ लिखना बोलना बंद करे,
  गुंगे-बहरो से आस लगाना बंद करे।
  त्वदीय पाद पंकजम्,नमामी देवी गंगे का गान करे,
  हाथों में झाडू लेकर सवा अरब आगाज करे।।

 
  पंडित दीपक द्विवेदी
  दूरभाष नं-9111127531
  माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता
  एवं संचार विश्वविद्यालय
  एम.ए(एम़ सी) तृतीय सेमेस्टर
  भोपाल(मध्यप्रदेश)

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2018

दशरथ माँझी : एक कर्मयोगी ! - गणिनाथ सहनी

गणिनाथ  सहनी  

मुजफ्फरपुर, बिहार



 लाई कर्म की ज्योति
गगन तक फैल गया आलोक
गर्वित थे सभी उसपर
धरातल और देवतालोक।

कर दिया पर्वत का गरूर
चूर चूर।
श्रम के सुरूर में गदगद
आत्मसंतोष से भरपूर।

न चेहरे पर असमंजस की थकान
दृढ़ इच्छा देखकर प्रकृति हैरान।
हथौड़े की हर चोट पर सुकून भरी मुस्कान।
अनवरत, अडिग, कर्मरत इनसान!

न प्रसिद्धि की चाह।
न दुःख की परवाह।
निरंतर छेनी पर हथौड़े का अविचल प्रवाह।
हृदय में गज़ब का उत्साह!

कभी-कभी कर्मनिष्ठा देखकर
पाषाण भी घबराता,
द्रवीभूत होने की चेष्टा करता,
पर धर्मभ्रष्ट होने का डर
उसे ऐसा करने से रोकता।

काट-काट कर पर्वत
घटा दी दूरी,
बना दी नई राह।
बाईस वर्षो का अथक श्रम तप
और आज वाह-वाह!

वो इनसानियत के दुख-दर्द में
भागीदार था;
सुख-दुख में साझी था।
वह गहलौर की मिट्टी में पला-बढ़ा
कर्मयोगी दशरथ माँझी था।

गणिनाथ सहनी, रेवा, 
मुजफ्फरपुर, बिहार।
मो.- 9939329611
       9431049733

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

रुको जिंदगी! गणिनाथ सहनी

रुको जिंदगी!
      ***

रुको जिंदगी!
जी भर के आलिंगन कर लूं
पता नही
कब मौत गले का हार बने।

अपने सखा-मित्रो संग खेल लूं
आनंद ले लूं।
सुख-दुख के साथी का
दीदार कर लूं।
बचपन के चित्र में फिर से
नया रंग टहकार कर लूं।
पता नही
कब मौत गले का हार बने।

जिन-जिन ने मेरी ख़ातिर
अपने सुखो का त्याग किया
उन महामानव की चरण वंदना कर लूं।
हमें सुलाने में जो जगा करते थे
उनका हृदय से सत्कार कर लूं।
पता नही
कब मौत गले का हार बने।

गुरु की बातों का अक्षरश:
ध्यान कर लूं।
सच्ची श्रद्धा-निष्ठा से सम्मान कर लूं।
काल की गति पर एक छंद
कविता का लिख लूं।
पता नही
कब मौत गले का हार बने।

           - गणिनाथ सहनी
           मुजफ्फरपुर बिहार

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

ऐसे ही भारत बंद करे! - जितेश सिंह

चमक नयनों में बरस रही है
भूजाये यूंही फड़क रही है 
लोग सड़को पर है
सरकार के विरूद्ध| 
सर्वदल के सहमती,
बिल हो गया पास 
सड़क पर प्रर्दशन है
तुम आओ देश जलाये! 
कुछ तोड़ फोड़ करके
मन की व्यथा शांत हो
और गाड़ियों को जलाये
भारत बंद है, तुम दुकान का
सटर गिराओ| 

चलो सड़क पर पत्थरबाजी करे
आओ इसे काश्मीर बनाये
आओ बम फेके
अपराध करे
हमें क्यू कि इंसाफ 
चाहिए
देश बचाने के लिए 
आओ हमसब देश जलाये
सुप्रिम कोर्ट के खिलाफ 
जाकर मोदी ने बिल पास 
करायी है, 
आओ बाजार बदं करे 
मोदी का पुतला जलाये
चार मवालियों को 
जिसने पुतला दहन किया
हम नेता बना दे, 
या पप्पु को वोट दे
छद्म राष्ट्रवाद की जीत..
सवर्णो का सड़क पर आना
नीची-उंची का अंतर तुम करो
समाज में विष कब से है, घुला? 
हम थोड़ा थोड़ा गटक रहे
आओ इस विष का घड़ा
मोदी के सर पर फोड़े
आओ भारत के लिए 
भारत को जलाये 
आरक्षण को मिटाये... 
                    जितेश सिंह

मंगलवार, 28 अगस्त 2018

तुझमें मैं हूं! - जितेश सिंह

तुझमें मैं हूं! 

जितेश राजपूत 

.बि.वा.हि.वि.वि.

,भोपाल 


मेरी सांसो में 

जिन्दा तू आज भी! 

तुझमें मैं हूं

तेरी आँखों में मैं 

जिन्दा आज भी 

लम्हा प्यार वाला

बीत गया, 

फिर भी प्यार का, 

ऐहसास आज भी 

तुझमें मैं हूँ... 

थिरकते ओठो के बीच

मैं आज भी, 

वो गीत और मस्ती 

आज भी 

तेरे साथ मेरी फिल्मी दुनिया

वो आज भी

तुम आज भी 

मेरे सपनो में आती हो 

क्यू आँखे बंद रहती है 

जब तुम पास आती हो

नींद के गहराई में जिन्दा 

तू आज भी 

दिन के ऊजाला में 

एक तू ख्वाब है 

न ख्वीबों में 

जिन्दा हम दोनों आज भी ...

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