शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

अमर प्रेम है उपवन का

पुष्पों की गोद में कलियाँ खिलती
राजकुमारी सी इतराती है 
उसी उपवन का  भँवर 
उन कलियाँ में है यौवन लाता 

पहली सुबह जब भँवर ने 
कलियों की पंखुड़ी छुई
चढ़ा  इश्क अब कलियों में 
खिल गई थी; पुष्प भाँति 

अब; पराग निकलता कलियों से  
वह सुगंध बिखेरती उपवन में 
ये अमर प्रेम है उपवन का 
और कहानी पुष्प-भँवर की 

रस की थी जरुरत भँवर को 
पुष्पों की लाज है पंखुड़ी 
भँवर ने भी मान रखी पुष्पों  की
उस नन्ही सी पुष्प-कली की 
एक खरोच न पंखुड़ी पर 
और रस  ले जाता मधुशाला 
ये अमर प्रेम का है उपवन का
ये अमर प्रेम का है उपवन का ...

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