पुष्पों की गोद में कलियाँ खिलती
राजकुमारी सी इतराती है
उसी उपवन का भँवर
उन कलियाँ में है यौवन लाता
पहली सुबह जब भँवर ने
कलियों की पंखुड़ी छुई
चढ़ा इश्क अब कलियों में
चढ़ा इश्क अब कलियों में
खिल गई थी; पुष्प भाँति
अब; पराग निकलता कलियों से
वह सुगंध बिखेरती उपवन में
ये अमर प्रेम है उपवन का
और कहानी पुष्प-भँवर की
रस की थी जरुरत भँवर को
पुष्पों की लाज है पंखुड़ी
भँवर ने भी मान रखी पुष्पों की
उस नन्ही सी पुष्प-कली की
एक खरोच न पंखुड़ी पर
और रस ले जाता मधुशाला
ये अमर प्रेम का है उपवन का
ये अमर प्रेम का है उपवन का ...
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