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मंगलवार, 11 मई 2021

महानायक विनायक दामोदर सावरकर

जितेश कुमार
जिला प्रचारक, बेगूसराय
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

विनायक दामोदर सावरकर एक महानायक थे। वह भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों में अग्रिम पंक्ति के सेनानी थे। उन्हें प्रायः वीर सावरकर से संबोधित किया जाता है। सावरकर क्रांतिकारी के साथ एक प्रखर वक्ता और राष्ट्रवादी लेखक भी थे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सावरकर की भूमिका भले ही राजनीतिक पूर्वाग्रह के कारण छुपाई जाती रही हो, लेकिन आज की पीढ़ी ने इतिहास में गुमनाम उन सभी पृष्ठों को खोजना शुरू कर दिया है और इसी गुमनाम पृष्ठों में दशकों तक दबे रहे, आजादी के महानायक प्रखर विचारक, दूरदर्शी प्रतिभा के धनी विनायक दामोदर सावरकर! वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 ई. को हुआ था। उनका जन्म महाराष्ट्र प्रांत में पुणे के समीप बसा एक छोटे-सेगांव भांगूर में हुआ था। उनके पिता दामोदर पंत आस-पास के गांव में लोकप्रिय थे। लोग उन्हें सम्मान की नजर से देखते थे। सावरकर जी की मां राधाबाई सुसंस्कृत और धार्मिक वृत्ति की थी। बाल्यावस्था से ही सावरकर और उनके दोनों भाई राधा मां से गीता रामायण के पाठ सुनते सुना करते थे। राधाबाई अपने तीनों पुत्रों को वीर शिवाजी की कहानियां सुनाती थी। सावरकर जब अपने दोस्तों को मां द्वारा बतलाई कहानी को सुनाते हैं, तो पूर्णतः कहानी के पात्र बन जाते हैं और उनके जैसा ही व्यवहार करते। लेकिन यह प्रक्रिया ज्यादा दिन नहीं चल पायी। गांव में आयी महामारी की बीमारी में राधाबाई चल बसी। उस वक्त सावरकर की आयु मात्र आठ या नौ वर्ष की थी। उनके पिता दामोदर पन्त सावरकर और बड़े भाई गणेशराव ने उनका और उनके छोटे भाई नारायण दामोदर का लालन-पालन किया।  वे चाहते थे कि सावरकर पढ़े और आगे चलकर बैरिस्टर बने। पढ़ाई-लिखाई में सावरकर चतुर थे। हमेशा वर्ग में प्रथम आते थे। इसके साथ ही उनके मन में स्वाधीनता और आजादी के संघर्ष भी पनपते गये। उन दिनों '1857 की स्वतंत्रता संग्राम' के किस्से गांवों में खूब प्रचलित थी। सावरकर भी 1857 की क्रांति के किस्से सुनकर आग बबूला हो उठते। सावरकर में बाल्यकाल से ही क्रांतिकारी गुण कूट-कूट कर भरे थे। सावरकर आठवीं कक्षा के दौरान ही अंग्रेजों के विरुद्ध कविता व भाषण देने लगे थे। उनके ओजस्वी भाषण से लोगों में तिलमिलाहट उत्पन्न होती थी। इसी समय सावरकर ने एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन 'मित्र मेला' का गठन किया। जो क्रांतिकारी की भाषा बोलती थी और तिलक जी द्वारा प्रकाशित स्वाधीनता के लेख की जगह-जगह चर्चा करती और जनमानस को स्वाधीनता के लिए प्रेरित करती थी। इसी समय से तिलक जी सावरकर को जानने लगे थे। सावरकर अपने गुप्त क्रांतिकारी संगठन में रोज नये-नये छात्रों को जोड़ते थे। हमेशा नए छात्रों से परिचय करते और उन्हें अपनी मित्र मंडली में जोड़ते थे। सन् 1899 ई. में जब भांगूर गांव में दूसरी बार महामारी फैली थी। जिसमें सावरकर के पिता के साथ गांव के सैकड़ों लोग चल बसे थे। हर घर से चीख-पुकार की आवाज आती थी।  उनके अंतिम संस्कार के लिए भी लोग नहीं जाते थे। उन्हें डर था कि उन्हें बीमारी न फैल जाये। ऐसे में सावरकर की मित्र मेला के सदस्य उन्हें उनके दुख में शामिल होते और परिवारजन के साथ शमशान तक जाते हैं। यह प्रसंग सावरकर को सिर्फ क्रांतिकारी नहीं तो अपितु एक सामाजिक संवेदनशील महामानव  की पुष्टि करता है। पिता की मृत्यु के बाद घर की स्थिति दयनीय थी। जो कुछ थोड़ा बहुत था, उसे चोरों ने चुरा लिया। गणेशराव ने घर की जिम्मेदारी अपने सर पर ली। वह सावरकर की पढ़ाई जारी रखें। सन् 1902 में शिवाजी हाई स्कूल से दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की और उच्च शिक्षा के लिए सावरकर पुणे गये।वहां फर्ग्यूसन कॉलेज से स्नातक कला की पढ़ाई पूरी की। शिवाजी हाई स्कूल में सावरकर पर कई बार प्रतिबंध लगे थे। क्योंकि वह ब्रिटिश शासन के खिलाफ कविता
और भाषण देते थे। ब्रिटिश शासन के प्रति सावरकर के विरोधाभास को सुनकर पुणे के गलियों में विरोध की लहर दौड़ दौड़ जाती थी। लोग सावरकर से जुड़ने लगे। उनकी लोकप्रियता इस कदर बढ़ रही थी कि जब महारानी विक्टोरिया के जन्म दिवस समारोह का उन्होंने विरोध किया तो सैकड़ों विद्यार्थियों ने सावरकर के स्वर को हवा दी। इसके कारण मुख्य आरोपी सावरकर को मानकर एक माह के लिए स्कूल से निकाल दिया गया और साथ ही ₹10 के जुर्माने भी लगाए गए थे। तब सैकड़ों लोगों ने सावरकर को पत्र लिखकर जुर्माना की राशि  देने की विनती की थी। तब बाल गंगाधर तिलक ने वहां के प्रिंसिपल को एक पत्र को लिखी गई थी तब जाकर प्रतिबंध हटाए गए थे। प्रतिबंध हटने के बाद जब सावरकर  फर्ग्यूसन कॉलेज पहुंचे तो सभी छात्र विनायक दामोदर से जुड़ना चाहते थे। देखते ही दखते वहां भी क्रांति की लहर दौड़ पड़ी। कॉलेज में दिन-प्रतिदिन सावरकर की सामूहिक भाषण व्याख्यान होने लगे। सावरकर पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता के लिए सन् 1904 में 'अभिनव भारत' नामक क्रांतिकारी संगठन की उद्घोषणा की। जिससे हजारों की संख्या में लोग जुड़े। 1905 में बंग-भंग के समय पूरे महाराष्ट्र में अभिनव भारत के कार्यकर्ताओं ने जनता को बंग-भंग के विरोध खड़ा किया। भारत में पहली बार ऐसा हुआ था, जब कोई क्रांतिकारी विदेशी कपड़ों को जलाकर विरोध प्रदर्शन किया हो। इसके बाद महाराष्ट्र में हर छोटे-बड़े चौराहे पर विदेशी कपड़ों की होलिका दहन शुरू हो गई। इसे भारतीय स्वाभिमान की पहली लड़ाई कहा जा सकता है, जब कोई क्रांतिकारी अंतः करण से स्वदेशी और भारतीयता की बात कर विदेशी कपड़ों की होली खेली हो। इस अभियान को आगे चलकर महात्मा गांधी  जैसे नेताओं ने अपनाया। सन् 1996 बैरिस्टर की पढ़ाई के लिए सावरकर लंदन चले गये। उन्होंने देखा वहां भारतीयों के साथ निम्न दर्जा का बर्ताव किया जाता है, उन्होंने होटल के कोने में या बाहर बैठने की अनुमति थी। यही नहीं पढ़ने वाले विद्यार्थियों को भी क्लास रूम में पीछे बैठना पड़ता था। भारतीयों को टेबल-कुर्सी को बैठने नहीं दिया जाता था। ऐसे में सावरकर ने भारतीय मूल के लोगों से संपर्क किया और 'स्वतंत्र भारतीय समाज' की स्थापना की। जिसके प्रमुख सदस्य मदन लाल ढींगरा, वापट, लाला हरदयाल, मैडम भीखाजी कामा, चतुर्भुज व चितरंजन दास थे। सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी थे। जिन्होंने भारतीय स्वाधीनता की लड़ाई को वैश्विक रूप दिया। लंदन में सावरकर ने आयरलैंड, रूस, फ्रांस, इटली व जर्मनी के युवाओं से संपर्क किया। जो अपने स्तर से ब्रिटिश शासन का विरोध कर रहे थे। वैसे लोगों को एकत्रित किया जिन्हें अंग्रेजों ने गुलाम बनाया था। जो अपने मातृभूमि की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे।
सावरकर ने  1857 की क्रांति का विस्तृत अध्ययन किया और एक खोज पुस्तक द फर्स्ट वार ऑफ इंडिपेंडेंस 1857 लिखी। यह पुस्तक ब्रिटिश शासन की पोल खोलने के साथ उन तमाम चाटूकारों, जिन्होंने ने 1857 की क्रांति को महज छोटा सा सैनिक विद्रोह बताया था के विपरीत इस  पुस्तक में  1857 की क्रांति की सटीक व्याख्या की गई थी। सावरकर ने अपनी खोजपूर्ण लेखिनी से सिद्ध कर दिया। 1857 की क्रांति केवल सैनिक विद्रोह नहीं बल्कि जन-
आंदोलन था। पुस्तक में 1857 की क्रांति की सत्यता से भयभीत होकर  शासन ने इसके प्रकाशन पर पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में रोक लगा दिया। फिर भी फ्रांस से उसका गुप्त प्रकाशन हुआ और इसकी गोपनीय वितरण भी भारत एवं अन्य ब्रिटिश साम्राज्य वाले  में देशों में हुआ। सावरकर ने गुरु गोविंद सिंह और सिखों का इतिहास लिखा। मैजिनी की जीवनी पर लिखी पुस्तक का मराठी भाषा में अनुवाद किया। इसकी प्रस्तावना से भयभीत होकर शासन इस पुस्तक पर भी बैन लगा दी। सावरकर एक क्रांतिकारी लेखक थे, इसका प्रमाण सावरकर के प्रत्येक पुस्तक को भारत में प्रकाशित नहीं होने देना था। पुस्तक के प्रकाशन से पहले ही उस पर बैन लगा देना। ब्रिटिश अधिकारी के अनुसार सावरकर के पुस्तक मेजनी में रासायनिक हथियार बनाने की तकनीक का भी उल्लेख किया गया था। इस प्रकार के आरोप लगाकर उनके पुस्तकों पर बैन लगा दिया गया। मदन लाल धींगरा सावरकर के मित्र और लंदन में स्वतंत्र भारतीय समाज के सदस्य भी थे ने सावरकर की जासूसी और सावरकर के पुस्तकों को बैन करने की मांग करने वाले ब्रिटिश अधिकारी विलियम हॉट कर्जन वायली की हत्या कर दी। इधर 'अभिनव भारत' के कार्यकर्ताओं ने पुणे के कलेक्टर जैक्सन की हत्या कर दी। दोनों के हत्याकांड के षडयंत्र में ब्रिटेन व भारत दोनों जगह सावरकर के  गिरफ्तारी की वारेंट निकाले गये। सावरकर की गिरफ्तारी हुई और उन्हें जहाज से समुद्र मार्ग के द्वारा भारत लाया गया। सावरकर जहाज से समुद्र में कूद पड़े और तैरकर फ्रांस बंदरगाह पहुंच गए, परंतु उनका पीछा करते हुए ब्रिटिश सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें पकड़ लिया। इस घटना ने सावरकर को रातों-रात विश्वविख्यात वीर सावरकर बना दिया।
सावरकर को भारत लाया गया उन्हें कालेपानी की सजा हुई। वीर सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा दी गई। सावरकर को 1910 में अंधेमान स्थित सैल्यूलर जेल भेजा गया। जहां क्रांतिकारियों से जानवरों की तरह काम लिए जाते थे। छोटी-छोटी गलतियां पर पिटाई की जाती थी। कई क्रांतिकारियों ने इसी क्रूर यातनाएँ से आत्महत्या करना आसान समझा। लेकिन सावरकर ने उन सभी यातनाएँ  के बावजूद वहां के क्रांतिकारियों को एकत्रित किया। कई बार उन्हें इसके लिए अधिक शारीरिक कष्ट झेलना पड़ा, परंतु सावरकर डटे रहे। जेल की दीवारों पर उन्होंने छः हजार से अधिक कविता की पंक्तियां अपने नाखून से लिखी

और कंठस्थ की। महाराष्ट्र में सावरकर के प्रति लोगों की सहानुभूति बढ़ती जा रही थी आये दिन लोग अंग्रेजों पर हमलावर हो रहे थे इससे भयभीत अंग्रेजों ने सावरकर को 11 वर्षों के बाद अंडमान से रत्नागिरी जेल भेज दिया इसके 3 वर्ष बार उन्हें 1937 तक गृहबंदी रत्नागिरी में ही रहना पड़ा। इसी बीच सावरकर सामाजिक क्रांति में कूद पड़े। छुआछूत, रोटीबंदी और बेटीबंदी के विरुद्ध क्रांति की।  सामूहिक भोज का आयोजन किये। जिसमें सर्व समाज को शामिल किया। पतित पावन मंदिर का निर्माण करवाया। जिसमें सभी वर्ग जाति के लोग एक साथ पूजा में शामिल हो सकते थे, पहली बार दलित पुजारी को मंदिर में स्थापित किया। इस प्रस्ताव को सभी ने बड़े आदर से स्वीकार किया। सावरकर रत्नागिरी में गृहबन्दी के दौरान सैकड़ों सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया। इसी बीच गई बड़े क्रांतिकारी व सामाजिक राजनीतिक नेताओं को टोली सवकरकर से परामर्श लेने आती रहती थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार भी कई बार सावरकर से मिली रत्नागिरी पहुंचे। महात्मा गांधी भी रत्नागिरी सावरकर से मिलने पहुंचे। 
जब 1937 में सावरकर पाबंदी से मुक्त हुए तो देश स्थिति की देखते हुए हिंदू महासभा से जुड़े और 6 वर्षों तक लगातार इसके अध्यक्ष बने रहें। जब भारत के बंटवारे के प्रस्ताव को मुस्लिम लीग ने लायी, तो सावरकर ने इसकी कड़ी आलोचना की। फिर भी बंटवारे की नींव पहले ही तैयार हो चुकी थी। अब तो किसके हिस्से में कितना आता है, महज बचा था। फिर भी सावरकर ने मुस्लिम लीग की साजिश का जोरदार विरोध किया था। उन्होंने एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की। जिसमें पंजाब व बंगाल को पाकिस्तान में मिलाने के लिए वहां बड़े पैमाने को मुसलमानों को बसाया जा रहा है। सीमावर्ती क्षेत्रों में जबरन धर्मांतरण का कार्य किया जा रहा है। सावरकर के इस रिपोर्ट के बाद देश में  मुस्लिम लीग का जबरदस्त विरोध शुरू हुआ।परिणाम भारत  खंडित हुआ तब बंगाल और पंजाब के बड़े हिस्से को सावरकर के कारण मुस्लिम भारत से अलग नहीं कर पाई थी। 
15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ तो सावरकर ने धर्म ध्वज भगवा व राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा को एक साथ फहराया। सावरकर ने कहा आजादी की खुशी है तो वही राष्ट्र के खंडित होने का दुख भी है!
  
मैं कल से नहीं,
कालेपानी का कालकूट पीकर काल के कराल स्तंभों को झकझोर कर,
मैं बार-बार लौट आया हूं 
और फिर भी जीवित हूं। 
हारी मृत्यु मैं नहीं
               -----वीर सावरकर

आप हिन्दू मुस्लिम राजनीति करते है?

जवाब मेरे सलाह से आपको कुरान शरीफ पढ़ना चाहिए क्यों कि हिन्दू-मुस्लिम विवाद BJP के जन्म से पहले से है। और अधिक भयावह भी, वीभत्स भी। 
इस्लाम जबतक अपने मूल ग्रंथ कुरान में परिवर्तन नहीं करता तब तक वह ऐसे ही दुनिया से लड़ता रहेगा, इसलिए इंसानी जिंदगी की कीमत है तो कुरान से वह सब आयतों को हटाया जाये, जो केवल ख़ुदा को मानने वाले को ही जन्नत नशीब होता है यह कहता है और सभी धर्म के भगवान को शैतान मानता है, उनके पुजक को काफ़िर कहता है और इन काफिरों की हत्या से जन्नत नशीब होता है यह मानता है। पहले ऐसे विचार को खत्म करना होगा  हमने धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता मानवता और  विज्ञानवाद के लिए भी। उन आयतों को बदलने की मांग को जोड़ शोर से बोलना होगा जिसे वसीम रिजवी ने कुछ दिन पहले कहा है? 
हम हिन्दूओं की सोच संकीर्ण है या हिन्दू हृदय ऐसा ही रहा अबोध अविवेकी, भविष्यहीन। जो सिर्फ लालच पैसा और मोह में फंसा है, क्या किसी मुस्लिम को देखे है, देश के तरक्की रोजगार शिक्षा के लिए वोट करते? नहीं! वो सिर्फ उनके साथ है, जो उनको अल तकिया जिहाद करने देते है, लव जिहाद करने देते है, लैंड जिहाद करने देते है

और शरिया कानून के नाम पर औरतों को तीन तलाक , चार विवियाँ और चौदह बच्चे पैदा करने देते है। 
हम हिन्दू वास्तविक जानकारी से परे अविवेकी कुतर्क से घेरे है और अपने आप का पीठ थपथपा रहा है कि हम हिन्दू मुस्लिम राजनीति में नहीं पड़ते है बुद्धिजीवी है। हमने देश की तरक्की रोजगार से मतलब है अरे भाई यह देश रहेगा तो मरेगा कौन! और यह देश मिटेगा तो बचेगा कौन! इतनी मामूली सी बात नहीं समझ आती है। आपकी शक्ति क्या है, जिसके बल पर हम वो सब पा सकते है जिसकी हमने जरूरत है, क्या वो केवल शिक्षा है? रोजगार है?  बहुत सारे पैसे है? नहीं! वो हमारा देश है। जब तक यह सुरक्षित है, वो सबकुछ हम अपने बलबूते खड़ा कर सकते है, जिसकी हमने कभी कल्पना की थी। इस देश के प्रत्येक हिन्दू को इस राष्ट्र की सुरक्षा किन हाथो में है ऐसे लोगों का पक्षघर बनाता चाहिए। इतिहास में की भूल से सीखकर वतर्मान और भविष्य ठीक करना चाहिए। 
लेकिन सिर्फ नौकरी और मंहगाई के नाम जब हम निर्णय लेते हैं? और वर्तमान समस्या को केवल हिन्दू मुस्लिम की राजनीति कहकर पल्ले झड़ते है और बडी बडी बाते छोड़ते है तो इस दशा को देखकर गुस्सा कम और उन हिंदुओं पर तरस अधिक आता है। उनकी भी यह मनोदशा तब तक है जब तक उनके यहाँ मुस्लिम 70 प्रतिशत नहीं होते है, होते ही मेरी बाते यथार्थ और परम् सत्य नजर आएगा। किंतु तब आप कश्मीरी हिन्दू की तरह बहन बेटियों को उनके हवाले छोड़कर भागने या बलिदान होने के अलावे कुछ नहीं कर सकते। यही बात पाकिस्तान के प्रथम कानून मंत्री योगेंद्र मंडल तब नहीं समझे थे और लाखों दलितों को पाकिस्तान में छोड़कर बंगाल में शरण लेकर रहे और गुमनाम मौत को स्वीकार किया। जिन्दगी भर नीम-भीम की, के कारण गुमनाम सजा काटी।  किन्तु उनके कारण जो लाखों दलित हिन्दू वहां फंस गए वो आज तक अपनी बहन बेटी को सुरक्षित नहीं कर पा रहे है। उन्ही दलित हिंदुओं में कुछ छिपते छिपाते भारत आये किन्तु यहां भी वह ऐसा ही जीवन व्यतीत कर रहे नागरिकता नहीं होने के कारण कोई सरकारी लाभ नहीं, नौकरी नहीं, उनके बच्चे अशिक्षित है। जब उनकी इस दुर्दशा को दूर करने से लिये किसी राष्ट्रपुरुष का स्वाभिमान जागृत हुआ तो उसने CAA लाया। जिससे किसी को कोई मतबल नहीं है क्यों कि जिसे हम नागरिकता दे रहे है वो पहले है यहां रह रहे है। फिर भी इन दानवी जिहादी प्रवृति के मुस्लिम और कुछ आधुनिकतावादी लोगों को यह बात अपच हो रहा है। ऐसे आधुनिकतावादी हिन्दू पर हमने तरस आता है।  हमें मोदी प्रधानमंत्री नहीं बल्कि एक अवसर मिला है इस अवसर को पहचानिए इतिहास केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं अपितु वर्तमान और भविष्य में वह गलती दोहराई न जाये इसके लिए भी पढ़ना चाहिए। मेरी इच्छा तो यही है और कोई योगेंद्र मंडल न बने...

शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

हिंदुत्व ही मेरा पक्ष है

राष्ट्रीय शक्ति का एकत्रितकरण होकर रहेंगा। आने वाले वर्षों में अपना देश, हमारी मातृ भूमि विश्व मानवता का, विश्व शांति का, विश्व समृद्धि का, विकास और प्रकृति संरक्षण का, मनुष्य ही नहीं, बल्की मोमिन और यीशु के बच्चे को भी मानवीय संभ्यता का पाठ पढ़ाने वाला है। वर्तमान का यह वर्ष 2020 एक युग सन्धि का दशक है। भारत समस्त आसुरी शक्तियों को नष्ट करके,
दुनिया में वैदिक धर्म, सनातन धर्म अर्थात हिन्दू धर्म की भगवा पताका लहराएगा। इससे पहले भाइयों कई प्रकार से ये आसुरी शक्तियां हमारे दैवीय कार्य में विध्न बाधा उतपन्न करने का प्रयास करेगी। हम जिन बिंदुओं पर कमजोर है वहां पर इन राक्षसी प्रवृति वाले प्रहार करेंगे। आज हम सब यही संदेश लेकर जाये हमनें जो भूले अब तक कि है। उसे कोसने का वक्त नहीं, उस पर भाषण देने का समय नहीं। यह समय है उन भूलों, उन दोषों का निराकरण करने का, उन पर विजय पाने का। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 1925 से यही कार्य में लगा है हिंदुओं का संगठन। और यही मूल मंत्र को गाते हुए आगे बढ़ रहा है -
                                हिन्दव सोधरा सर्वे, न हिन्दू पतितो भवे।
                               मम दीक्षा हिन्दू रक्षा, मम मंत्र समानता।।
अपने लक्ष्य के लिए सेतु के निर्माण में लगा है। हम सब  जानते है, जब त्रेता में भगवान राम का अवतार हुआ, तो उन्हें रावण जैसे वैश्विक आंतकी से युद्ध करना पड़ा। उससे पहले युद्ध की तैयारी होती है। भगवान राम जिस स्थान पर रुके थे जहां से रावण ने मां जानकी का अपहरण किया था, उससे कुछ दूरी पर ही उनके मामा का राज्य था, किन्तु भगवान ने उनकी सहायता नहीं ली, वो अयोध्या से चतुरंगी सेना मंगवा सकते थे। किंतु श्री राम ने यह भी किया। किया क्या वनवासियों, दलितों और वानरों की सेना का निर्माण किया। उन्हें प्रशिक्षण दिया और रावण जैसे अत्याचारी के वध के लिए तैयार किया। दोस्तों हमें भी ऐसे ही राम सेना का निर्माण करना है वह सेना कहाँ है वह सेना गांव में, तमान अभावग्रस्त पीड़ित वंचित समाज है खेतिहर किसान मजदूर है, जिसके पेट में अन्न नहीं शरीर पर वस्त्र नहीं। यही से भारत जागेगा हमें उनका संगठन करना है। इसलिए एक रणयुद्ध की तैयारी के लिए हमें बाजीराव पेशवा, मिहिर भोज, राणा सांगा, महाराणा प्रताप और शिवजी महाराज की भांति एक दिन में 16-16 घण्टे तक कठोरतम तप कर उनका संगठन  करता है। उनको प्रशिक्षित करना, उनको स्वावलंबी करना है, जिससे कोई यीशु का बच्चा पादरी, या कोई मोमिन मौलाना उसे पैसे, बल या छल किसी रूप में धर्म परिवर्तन न कर सके। आज हमने यह प्रतिज्ञा को दुहराना होगा हम हिन्दू है, सम्पूर्ण हिन्दू समाज तुलसी के पत्ते के भाँति पवित्र है। उसके आकर से उससे गुण नहीं बदलते है। सारा समाज अपना है हम सारे समाज के है। 

शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

ये भाजपा के कार्यकर्ता है, शाह के बंधुआ मजदूर नहीं जितेश कुमार

अमित शाह के बयान से बिहार भाजपा के कार्यकर्ता नाखुश है। नाराजगी, गुस्सा और कानाफूसी तो होना ही था। आज कार्यकर्ता अपने आप को छला हुआ महसूस कर रहे हैं। जिन वैचारिक अधिष्ठान पर वो भाजपा के कार्यकर्ता बने और तन मन धन से भाजपा
को सींचने में लगे हैं। जब उसी विचार पर कुठाराघात किया जा रहा है। सत्ता और कुर्सी के मोह जाल में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के द्वारा अपने ही पार्टी की रीती-नीति और विचार को ताक पर रखा जाता हो, यह भला किसे स्वीकार है? भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं गृह मंत्री अमित शाह ने एनडीए के नेता के रूप में नितीश कुमार का पक्ष लिया तो भाजपा के सामान्य कार्यकर्ता इस फैसले से नाखुश दिखे। कारण शाह का बयान बीजेपी के संविधान में फिट नहीं बैठता है। भाजपा के कद्दावर नेता अटल बिहारी वाजपेयी को लोगों ने अभी तक भूलाया नहीं है। अटल जी कहते थे जोड़-तोड़ कर सरकार बनती हो तो ऐसे सरकार को हम चिमटे से नहीं छूएंगे। अटल जी के सामने जब सत्ता और पार्टी के आदर्श विचार में किसी एक को चुनने की बाड़ी आयी तो उन्होंने ने पार्टी के विचार ,सिंद्धांत और रीति-नीति को चुना और प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया। किंतु आज उन्हीं के पार्टी के दूसरी पीढ़ी में यह वैचारिक गुण नहीं दिखता है। लगता है यह अपने ही सिद्धांतों से विमुख हो गए हैं। किसी तरह सत्ता की प्राप्ति ही भाजपा की अंतिम मंजिल मालूम पड़ती है। हाल में ही देखा जाए तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रत्येक मुद्दे पर भाजपा को घेरने का प्रयास किया और विरोध किया है चाहे वह तीन तलाक का मामला हो, धारा 370 का मामला हो या राम मंदिर का मामला। जेडीयू बीजेपी के साथ नहीं दिखता है। फिर किस आधार पर शाह एनडीए के लिए नितीश कुमार की प्रशंसा करते हैं। इधर हाल फिलहाल में सरकार के क्रियाकलापों पर नजर डाला जाए। माननीय नितेश बाबू ने केवल धार्मिक तुष्टीकरण का ही कार्य किया है। इनके कार्यकाल में हजारों एकड़ सरकारी जमीन को अवैध रूप से मस्जिद मदरसा और कब्रिस्तान बनाने के लिए छोड़ दिया गया। उल्टे मस्जिद, मदरसा और कब्रिस्तान के चारदीवारी के लिए सरकारी पैसे खूब का खर्च हुए है। इनके अधिकारियों के द्वारा हिंदू संगठनों के विरुद्ध मुहिम चलाया जा रहा है, और अल्पसंख्यक समुदाय खास करके मुस्लिम समुदाय को अपराध करने की खुली छूट है। जगह-जगह पर इनके नेता और प्रशासन के नापाक गठबंधन के कारण मुस्लिमों द्वारा उत्पाद की घटना बढ़ी है। चर्चित सामूहिक बलात्कार कांड, सुपौल के प्रतापगंज के हुसैनाबाद की है। विजयादशमी के रात मेला देख कर लौटते हुए दो महिला और एक छोटी बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार होता है। उसके बाद उसमें से एक महिला को गोली मार कर हत्या कर दी जाती है। यह कोई सामान्य घटना नहीं थी इसके बावजूद शासन की तरफ से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया नहीं किसी भ्रष्ट अधिकारियों को निलंबित और दंडित किया गया। क्योंकि अधिकतर आरोपी मुस्लिम समुदाय से थे, सुपौल में हारून रशीद उपसभापति और यहां के डीएम, एसडीओ उसी समुदाय से आते हैं। सुपौल में मोहर्रम में जगह-जगह तलवारबाजी हुई। मैं स्वयं सहरसा से आने समय ऑटो से उतरकर 5 किलोमीटर पैदल चलकर सुपौल पहुंचा क्योंकि मुस्लिम समुदाय गाड़ियों को घेर कर तलवारबाजी कर रहा था। इसके बावजूद कोई प्रतिक्रिया प्रशासन के द्वारा नहीं किया गया। बात जब दुर्गा पूजा की होती है प्रशासन आरती के समय और साउंड बॉक्स की संख्या गिनने लगता है। दुर्गा पूजा समिति, बरेल के सदस्यों पर धारा 107, 116 (ग) लगाया जाता है। किन्तु रात्रि में मुख्य मार्ग पर मोहर्रम में मुस्लिमों के द्वारा तलवारबाजी करने पर प्रशासन को कोई दिक्कत नहीं है। इस प्रकार के पक्षपाती निर्णय के पीछे क्या शासन का हाथ नहीं है? बिल्कुल है नीतीश कुमार के द्वारा हिंदुओं को प्रताड़ित व मुस्लिमों को खुलीछुट दिया जा रहा है मुस्लिम बलात्कारियों को बचाया जा रहा है और शांति पूर्वक धार्मिक आयोजन करने वाले लोगों पर प्रशासन कार्यवाही कर रहा हैं। और यह सब तब हो रहा है जब नीतीश कुमार के साथ भाजपा शासन में है। इसके बावजूद भी अगर एनडीए के नेता श्री नितीश बाबू है तो भाजपा किस मुंह से समाज के बीच वोट मांगने जाएगी? दुर्गा पूजा में हिन्दू समाज को झूठे और बेबुनियाद आरोप में कार्यवाही हो रही है इस आधार पर, या सुपौल में मुस्लिम समुदाय के बलात्कारियों को बचाया जा रहा है इस आधार पर। नीतीश कुमार के द्वारा  चलाया जा रहा कथित तौर पर मुस्लिम तुष्टीकरण से बिहार पुनः अराजकता के चपेट में है। शाह को अपने बयान पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। नीतीश सरकार और प्रशासन का कार्य मुस्लिम तुष्टीकरण और टोपा-टोपी के खेल में उलझा है। इसका बिहार के विकास से कोई मतलब नहीं है। ऐसे में अगर एनडीए से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार नीतीश कुमार बनते है तो भाजपा के कार्यकर्ता विद्रोह कर देंगे। क्यों कि वो शाह के बंधुआ मजदूर नहीं, पार्टी के वैचारिक समर्थक है। अधिकतर हिन्दू है।

सोमवार, 14 अक्टूबर 2019

गांधी मैदान में आरएसएस ने शरद पूर्णिमा उत्सव मनाया

जितेश कुमार 


संघ का कोई अपना उत्सव नहीं, हिंदू समाज का जो उत्सव है वही संघ का उत्सव है। संघ के स्वयंसेवक समाज के सज्जन व्यक्तियों के साथ सामाजिक, सांस्कृतिक उत्सव मनाते रहते हैं।  इसी निमित्त कल शरद पूर्णिमा के अवसर पर सुपौल के गांधी मैदान
  रात्रि 7:00 से 8:00 बजे तक आरएसएस के स्वयंसेवकों ने शरद पूर्णिमा का उत्सव मनाया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से आरएसएस के जिला सहसंचालक श्रीमान संतोष अग्रवाल और अन्य स्वयंसेवक उपस्थित रहे। 1 घंटे की शाखा में कबड्डी, गणेश छू, महापुरुषों की माला, रामायण और महाभारत के पात्र, राज्य-राजधानी, सांस्कृतिक स्थल के नाम आदि प्रकार के खेल हुए। तत्पश्चात नगर विस्तारक जितेश कुमार ने शरद पूर्णिमा के सांस्कृतिक और वैज्ञानिक महत्व के कुछ बिंदु सबों के बीच रखा। संघ का उद्देश्य भारत के सर्वांगीण विकास करके विश्व गुरु बनाना है। अतः सभी स्वयंसेवकों को अपने मूल्यवान समय का कुछ हिस्सा संघ कार्य के लिए लगाना चाहिए। इस आग्रह के साथ बैद्धिक समाप्त की। उसके बाद शाखा  विकिर और प्रसाद के रूप में खीर भोज के बाद सभी स्वयंसेवक अपने घर लौट गये। कार्यक्रम में जिला सहकार्यवाह रंजन, जिला व्यवस्था प्रमुख  विकास,जिला महाविद्यालयिन प्रमुख संजीव सोनू, नगर कार्यवाह श्रवण, नगर सहकार्यवाह सुमित, नगर शारीरिक प्रमुख मणिकांत श्रवण,अन्य स्वयंसेवक उपस्थित थे।

शनिवार, 28 सितंबर 2019

मौन प्रश्न और मौन उत्तर

जितेश 
आचानक राजदूत मिथिला पहुंचा और महाराज जनक को प्रणाम  किया। उसने भारी मन से अयोध्या में हुए सीता के अन्याय का वृतांत सुनाते हुए कहा "हे नरेश जानकी के साथ घोर अन्याय हुआ है। अयोध्यावासी ने उनके चरित्र पर प्रश्न करते हुए कहा है कि रावण के कैद में रहने के कारण सीता अपवित्र हो गई है। उसका पति अयोध्या का राजा राम ने भी आपकी दुलारी पुत्री का परित्याग कर दिया है। उसे गर्भावस्था में वनवास को भटकने के लिए छोड़ दिया है।"
महाराज जनक दूत की बात सुनकर शोक में डूब गये। इसी वृत्तांत को सुनकर उनकी महारानी बीमार पड़ गई। कुछ दिन बीतने के पश्चात हृदय में गुस्सा और धर्म, अधर्म न्याय, अन्याय के कई प्रश्न संयोजे जनक
अयोध्या पधारे। रात्रि के समय अचानक उनका रथ अयोध्यानगरी में प्रवेश करता है लक्ष्मण संदेश लेकर राम के पास पहुंचे। भैया महाराज जनक अयोध्या पधारे है। अविलंब आपसे मिलने की इच्छा प्रकट की है। राम उसी अवस्था में अपने अंत: पुरी से निकलकर महाराज जनक की ओर दौड़े। द्वार पर जनक खड़े थे। राम, जनक के समीप पहुंचते ही अपना राजमुकुट उनके चरणों में रख कर साष्टांग लेट गये। भगवान राम पूरी विनम्रता से बोले "महाराज जनक मैं आपका अपराधी हूं, आपकी पुत्री के साथ, स्वयं अपनी पत्नी सीता के साथ अन्याय किया हूं, एक अन्यायी और अधर्मी हूं, आप मुझे दंड दे।"
इसके बाद भी जनक का क्रोध उतरा नहीं था। वो राम से बोले "हे राजन मुझे अपने अंत:पूरी में ले चलो। क्योंकि जनक के मन में अभी भी शंका थी। राम अपने अंत:पूरी में राजसी वैभव,भोग-विलास, ठाठ-बाट से रहते हैं। जैसे ही जनक अंत:पूरी पहुंचते हैं, उनका गुस्सा खत्म हो गया, सारे ह्रदय के प्रश्न गौण हो गये। वो लज्जा से सिकुड़ गये।  उन्होंने देखा एक राजा अपने अंत:पूरी में कुश चटाई पर एक सन्यासी की तरह सोता है। उन्होंने देखा राम का व्यक्तिगत जीवन तपस्वी की भांति है, जिस राम ने वनवास काल में बड़े-बड़े राक्षसों का वध किया, रावण का वध किया हो। ऐसा प्रतापी राजा कुश के बिछावन पर भगवा ओढ़े सोता है। अपना भोजन भी स्वयं पकाता है। जनक अब सबकुछ समझ गये थे। तपस्वी राम के सामने मौन रह गये। उनके हृदय के सभी प्रश्न खत्म हुआ और रो पड़े। पश्चाताप के आंसू लिए जनक कहते हैं "आज शंका दूर हुई। हे राम तुम ही नारायण हो।" तुमने सदैव पुत्री सीता के मान-सम्मान के लिए अपने सुख, यश, वैभव को ठोकर मारा है। कल कोई सीता पर लांछन ना लगाएं। इसलिए स्वयं दोषी होना स्वीकार किया है। तुम धन्य हो। हे मर्यादा पुरुषोत्तम। जिस पथ पर तुमने जीवन भर चला है। सदियों तक लोग इसे भूलेंगे नहीं। आज तुम्हारे कारण, मैं भी अमर हो गया। 
इस तरह महाराज जनक को बिना प्रश्न किए ही सारे उत्तर मिल गये। राम का दोष भूल कर, उनका गुणगान करने लगे। स्थिति परिवेश, व्यक्ति का प्रभाव, चरित्र की शुद्धता से राम भी मौन रहे और जनक को भी बिना कुछ बोले ही सारे उत्तर मिल गये। हमें भी महाराज जनक की तरह राम के अंत:पुरी को देखना चाहिए।

रविवार, 21 जुलाई 2019

जबरदस्त है 'सुपर 30' की कहानी

जितेश कुमार 
आज सुपर 30 मूवी देखकर आया हूँ। अपने दोस्त के साथ मूवी देखने गया था। वैसे मैं इस मूवी से कही अधिक पहले से आंनद सर के बारे में जनता हूँ, क्यों कि मैं बिहारी हूँ। आज मूवी को देखकर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ। 
आनंद कुमार के द्वारा संचालित 'सुपर 30' किसी परिचय का मोहताज नही है। अब तक आनंद कुमार के प्रयास से 450 होनहार छात्रों ने IIT में दाखिला लिया है। सुपर 30 के माध्यम से ऐसे ऐसे  छात्र निकले है, जिनके लिए आगे की पढ़ाई करना नामुमकिन था।
आर्थिक तंगी से निराश हताश छात्रों को आनंद कुमार ने गले लगाया और फिर से उनके मन में पढ़ाई की ललक पैदा की। उन छात्रों को उस मुकाम तक पहुंचाया जो उनके लिए सपने जैसा था। जिस प्रकार के सामाजिक परिवेश में हम रहते हैं। ऐसे में आनंद कुमार जैसे व्यक्ति विरले ही मिलते हैं। बिहार के लाल ने जो कारनामा करके दिखाया है, अकल्पनीय है। बिहार इनके प्रयास को नमन करता है। सुपर 30 की सफलता को पहली बार फिल्म के माध्यम से दिखाया जा रहा है। कुछ दिन पहले ही सुपर 30 मूवी रिलीज हुई है।  आप जरूर देखें होंगे नहीं देखे तो दिखियेगा जरूर। इस फिल्म में ऋतिक रोशन ने आनंद कुमार का रोल निभाया है और अभिनेत्री मृणाल ठाकुर मूवी में आनंद कुमार की प्रेमिका है। फिल्म में जाने-माने अभिनेता पंकज त्रिपाठी भी हैं। पहली बार ऋतिक रोशन भले ही बिहारी रोल दिखे हो। पंकज त्रिपाठी तो बिहारी ही है। वो बिहार के गोपालगंज से है। 
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी ना जाने का दर्द क्या होता है, इससे भली-भांति आनंद कुमार परिचित थे! शायद यही मन की टीस उन्हें गरीब काबिल बच्चों के सपने पूरे करने को प्रेरित करता है। इसमें उनके पूरे परिवार का उनको सहयोग मिला। पिता के मृत्यु के पश्चात घर की दयनीय स्थिति थी आनंद कुमार और उनके भाई को वही पटना के गलियों में  पापड़ बेचना पड़ा था। जहां के वो आज स्टार हीरो है। सुपर 30 जैसे निशुल्क संस्थान चलाने के लिए आनंद कुमार के पास  हौसला और शिक्षा के अलावे कुछ नहीं था। परिस्थिति भी अनुकूल नहीं थी। हिंसक पशुओं की तरह शिक्षा को बिजनेस बना चुके शैक्षणिक संस्थान और कोचिंग सेंटर उनको नोच कर खा जाने को उतारू थी। कई बार उन पर हमला हुआ, लेकिन उन्होंने हौसला नहीं छोड़ो। आज वो करके दिखाया जिस पर किसी भी भरतीय को गर्व होता है। सुपर 30 फिल्म के जरिये उनके कृत्यों को आज देश ने देखा है। और उन बच्चों की स्थिति भी जिनके पास कॉपी किताब खरीदने के पैसे नहीं थे। आज देश के सबसे बड़े शैक्षिक संस्थानों में अध्ययन कर रहे है। 'सुपर 30' छात्र, शिक्षक, परिजन, सभी के लिए प्रेरक, उत्साहवर्धक और जोशीला स्टोरी के लबरेज मूवी है।
फ़िल्म में पंकज त्रिपाठी का रोल काफी मनोरंजन करता दिखेगा तो ऋतिक रोशन की आँखें और बोलचाल की शैली आपके मन को बांध लेगा। यह एक पारिवारिक फ़िल्म भी है। आप पिता, भाई, बहन, माँ, शिक्षक किसी के साथ बैठकर निःसंकोच देख सकते है। ऐसे मूवी के आभाव भी है आजकल। जिसे सबके साथ देखा आ सके। एक ऑफर भी परिवार के साथ बैठकर मूवी देखने का। मूवी का अनुसरण करने का। मूवी में लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कठिन से कठिन प्रतिकूल परिस्थिति में भी लक्ष्य की ओर बढ़ाना और उसे  हासिल करना सीखलाता गया है। एक बार जरूर सुपर 30 मूवी देखकर आये।

बुधवार, 19 जून 2019

अभी कंप्यूटर बाबा और मिर्ची बाबा की समाधि इंतजार

जितेश कुमार

भोपाल। लोकसभा चुनाव में दिग्गविजय सिंह को जितवाने के लिए कंप्यूटर बाबा और मिर्ची बाबा के साथ शंकराचार्य श्री स्वरूपानंद ऐड़ी-चोटी का जोड़ लगा दिये थे। तंत्र-मंत्र, साधना और शंकराचार्य का आशिर्वाद भी दिग्गी को चुनाव में विजयी नहीं बना
सकी। वही मिर्ची बाबा और कंप्यूटर बाबा की समाधि वाला हट आज हास्य का पात्र बना हुआ है। इतना तो साफ हो गया साधु संतों का प्रभाव अब राजनीति से उठने लगा है। यह भारतिय संस्कृति के लिए अच्छी बात है। दुनिया के लोग इन संतों के बर्ताव से हमारा मजाक बनाते थे। ऐसे संतों को बेदखल करना ही चाहिए। अभी कंप्यूटर बाबा और मिर्ची बाबा की समाधि का इंतजार कर रहा हूँ।
जान जाये पर वचन न जाये। भारत की यही रीति है। वचन निभाने के लिए कई मनीषियों ने अपनी निजी महत्वाकांक्षा की तिलांजलि दे दी। भारत में समाधि लेने वाले संतों की कमी नहीं है। कई पाखंडी भी साधु रूप में भारत की संत परंपरा को तीतर-वितर करने में लगे है। इससे स्वयं वो ही मजाक के पात्र बन कर रह गये है। एक छ्द्म सन्यासी का रूप धारण कर जितना धन इन वैराग्य संतों ने बटोरा। उतना तो सफेद कुर्ता पहन कर, लोगों को मूर्ख बनाने वाले नेता ने भी नहीं कमाया होगा। लग्जरी कार और सेवन स्टार आश्रम। मीडिया के माध्यम से ही राम रहीम का आश्रम जनता ने देखा था क्या किसी हाई-फाई होटल से कम है, बिलकुल नही। 
अब तो सन्यासी राजनीति प्रत्याशी को चुनाव में जितवाने के लिए मिर्ची यज्ञ कर रहे और असफल होने पर समाधि लेने की बात कर रहे। कहाँ है कंप्यूटर बाबा और मिर्ची बाबा सांप - छछूंदर की तरह बिल में धुस गये।  भोपाल ने भारी मतों से साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को जनता ने वोट देकर विजयी बनाया है। लोकसभा में भी सपत समारोह खत्म हुआ। बाबा कही दिखे नहीं, मीडिया को ऐसे बाबाओं का पर्दाफास करना चाहिए। बताईये कोई कंप्यूटर बाबा है, नाम से ही झूठा और पाखंडी लगता है। लोग ऐसे बाबाओं के नाम से प्रदेश की खिल्ली उड़ा रहे है।
किसी ने तो यहां तक कहा बाबा के पास कंप्यूटर की कोई डिग्री भी है, या युहीं हिम्मत सिंह नाम लिख कर घर ने दुबके रहने की आदत है। एक मित्र ने कहा "दिग्विजय सिंह जैसे राजनीतिक चतुर व्यक्ति इसके चंगुल में कैसे फंस गया।" फेसबुक पर किसी ने पोस्ट लिखा  "अब समाधि दिलवाकर इन संतों को दिग्विजय भविष्य की राजनीति बचा सकते है।" संत समाज और प्रदेश की भोली भाली जनता ऐसे संतों का तिरस्कार कर अपना धर्म बचाये। मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी है ऐसे संतो का पर्दाफास कर जनता को आगाह करे है।

गुरुवार, 25 अप्रैल 2019

सिन्धी घाटी और वामपंथी इतिहासकार

जितेश कुमार

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ज्ञात साक्ष्य से भारतीय इतिहास का प्रारंभ सिंधु घाटी की सभ्यता से होता है इसे हड़प्पा कालीन सभ्यता या सारस्वत सभ्यता भी कहा जाता है बताया जाता है कि वर्तमान सिंधु नदी के तटों पर 3500 ई.पू. में एक विशाल नगरीय सभ्यता विद्यमान थी. मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल, सभ्यता के नगर थे. पहले इस सभ्यता का विस्तार सिद्धू, पंजाब, राजस्थान और गुजरात आदि बताया जाता है किंतु अब इसका विस्तार समूचा भारत तमिलनाडु से वैशाली (बिहार) तक पूरा पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक ईरान का हिस्सा तक पाया जाता है अब इसका समय 7000 ईसा पूर्व से प्राचीन पाया गया है| इसी प्राचीन सभ्यता की सिलो, टेबलेट्स और बर्तनों पर जो लिखावट पाई जाती है| उसे सिंधु घाटी की लिपि कहा जाता है| इतिहासकारों का दावा है कि यह लिपि अभी तक अज्ञात है और पढ़ी नहीं जा सकती सिंधु घाटी की लिपि के समकक्ष तथाकथित प्रति प्राचीन सभी लिपियाँ जैसे इजिप्ट, चीनी, फ़ोनीशियाई, मेसोपोमियाई आदि सब पढ़ ली गयी है.

तिहासकार अर्नाल्ड जे.टायनयी ने कहा था - 'विश्व के इतिहास में अगर किसी देश के इतिहास के साथ सर्वाधिक छेड़छाड़ की गई है तो वह भारत की इतिहास ही है|' आजकल कंप्यूटरों की सहायता से अक्षरों की आवृत्ति का विश्लेषण कर माकोंव विधि से प्राचीन भाषा को पढ़ना सरल हो गया है सिंधु घाटी की लिपि जानबूझकर नहीं पढ़ा गया और ना ही इसको पढ़ने की सार्थक प्रयास किए गए भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, इस पर पहले अंग्रेजों और फिर कम्युनिस्टों का कबजा रहा है सिंधु घाटी की लिपि को पढ़ने की कोई भी विशेष योजना नहीं चलाई.आखिर ऐसा क्या था सिंधु घाटी की लिपि में? अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकार क्यों नहीं चाहते थे कि सिंधु घाटी के लिपि को पढ़ा जाए?
 1. उनको डर था कि सिंधु घाटी की लिपि को पढ़ने के बाद उस की प्राचीनता और अधिक पुरानी सिद्ध हो जाएगी. इजिप्ट, चीन, रोमन, ग्रीक, आर्मेनिक, सुमेरियन मेसोपोटामिया से भी पुरानी. जिससे पता चलेगा कि वह विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता है. इससे भारत का महत्व बढ़ेगा तो अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकारों को बर्दाश्त नहीं होगा2. अंग्रेज और कम्युनिस्टों इतिहासकारों द्वारा प्रचारित आर्य बाहर से आए हुए आक्रमणकारी जाती है और इन्होंने यहां के मूल निवासियों अर्थात सिंधु घाटी के लोगों को मार डाला व भगा दिया और उसकी महान सभ्यता नष्ट  कर दी. वे लोग ही जंगलों में छुपकर दक्षिण भारतीय द्रवित बन गए शूद्र व आदिवासी बन गये, आदि आदि गलत साबित हो जाएगा.कुछ फर्जी इतिहासकार सिंधु घाटी की लिपि को सुमेरियन भाषा से जोड़कर पढ़ने का प्रयास करते रहे तो कुछ एक इजिप्शियन भाषा से, कुछ चीनी भाषा से, कुछ तो मुंडा आदिवासी की भाषा और कुछ इनको ईस्टर दीप के आदिवासी की भाषा से जोड़कर पढ़ने का प्रयास करते रहे यह सारे प्रयास असफल साबित हुए.सिंधु घाटी की लिपि को पढ़ने में निम्नलिखित समस्याएं बताई जाती है सभी लिपियों में अक्षर कम होते है. जैसे अंग्रेजो में 26 देवनागरी में 52 आदि मगध घाटी की लिपि में लगभग 400 अक्षर  चिन्ह है. सिंधु घाटी की लिपि को पढ़ने में या कठिनाई आती है कि इसका काल 7000 ई.पूर्व.से 1500 ई.पूर्व. तक का है इतनी लंबी अवधि में अनेकों बड़े परिवर्तन हुए इतनी लंबी अवधि जिसमें लिपि में भी अनेक परिवर्तन हुए साथ ही लिपि में स्टाइलिस्ट वेरिएशन भी बहुत पाया जाता है. लेखक ने लोथल और कालीबंगा में सिंधु घाटी व हड़प्पा कालीन अनेक पुरातात्विक साक्ष्य का अवलोकन किया.
 भारत की प्राचीनतम लिपिओं में से एक लिपि है जिसे ब्रह्म लिपि कहा जाता है इस लिपि से ही भारत की अन्य भाषाओं की लिपि बनी है लिपि वैदिक काल से गुप्त काल तक उत्तर पश्चिम भारत में उपयोग की जाती थी संस्कृत, पाली, प्राकृत के अनेक ग्रंथ ब्रह्म लिपि से प्राप्त होते हैं सम्राट अशोक ने अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिए ब्रह्म लिपि को अपनाया. सम्राट अशोक के स्तंभ शिलालेख ब्राह्मी लिपि में लिखे गए और संपूर्ण भारत में लगाए गए सिंधु घाटी के लिए भी और ब्राह्मी लिपि में अनेक आश्चर्यजनक समानताएं हैं साथी ब्राह्मी और तमिल लिपि का भी प्रारंरिक संबंध है इस आधार पर सिंधु घाटी की लिपि को पढ़ने  का सार्थक प्रयास सिद्धांत काक  और इरवाथम महादेवन ने किया.
 सिंधु घाटी की लिपि के लगभग 400 अक्षरों के बारे में यह माना जाता है कि इसमें कुछ वर्णमाला (स्वर,व्यंजन, मात्रा संख्या), कुछ योगिक अक्षर और शेष चित्र लिपि है अर्थात या भाषा अक्षर और चित्र लिपि का संकलन समूह है विश्व में कोई भी भाषा इतनी सशक्त और समृद्ध नहीं जितनी सिंधु घाटी की भाषा. जिस प्रकार सिंधु घाटी के लिए भी पशु के मुख्य की ओर से अथवा दाएं से बाएं लिखी जाती है उसी प्रकार ब्राह्मी लिपि की दाएं से बाएं लिखी जाती है सिंधु घाटी की लिपि के लगभग 3000 टेक्स्ट प्राप्त है इसमें वैसे ही 400 अक्षर चीन है लेकिन 39 अक्षरों का प्रयोग 80% बार है और ब्राह्मी लिपि में 45 अक्षर अब हम उन 39 अक्षरों को ब्राह्मी लिपि के 45 अक्षरों के साथ समानता के आधार पर मैपिंग कर सकते हैं और उसकी ध्वनि का पता लगा सकते हैं.
 ब्राह्मी लिपि के आधार पर सिंधु घाटी की लिपि  पड़ने पर सभी संस्कृत के शब्द आते हैं जैसे श्री अगस्त या मृत, हस्ती, वरुण, क्षमा, कामदेव, महादेव, कामधेनु मूषिका, पग, पञ्च, मशक, पितृ,  अग्नि, इंद्र, मित्र आदिनिष्कर्ष या है कि - सिंधु घाटी की लिपि ब्राह्मी लिपि के पूर्वज लिपि है सिंधु घाटी के लिपि को ब्राह्मणी के आधार पर पढ़ा जा सकता है उस काल में संस्कृत भाषा थी जिसे सिंधु घाटी के लिपि में लिखा गया था सिंधु घाटी के लोग वैदिक धर्म और संस्कृति मानते थे वैदिक धर्म अत्यंत प्राचीन 7000 ईसा पूर्व से भी अधिक पुरानी, हिंदू विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता है हिंदू का मूल निवास सप्त देश यानी (सिंधु सरस्वती क्षेत्र) था जिसके विस्तार में संपूर्ण भारत देश था वैदिक धर्म को मानने वाले कहीं भारत से नहीं आए थे और ना ही यह आक्रमणकारी थे आर्य और द्रविड़ जैसी कोई भी पृथक जाति नहीं थी जिसमें परस्पर पर युद्ध हुआ हो.        
सन्दर्भ: पुस्तक सिन्धु घाटी की सभ्यता



साध्वी नहीं, कटघरे में कांग्रेस और मानवाधिकार की रिपोर्ट

जितेश कुमार
साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर लगे आरोप का खंडन भी होगा| पहले मानवाधिकार की रिपोर्ट कितना सच है और कितना झूठ? कुछ पत्रकारों ने मानवाधिकार की रिपोर्ट के सहारे यह सवाल उठाये है कि साध्वी प्रज्ञा के साथ कोई मारपीट नहीं की गई| ऐसे प्रश्न पूछने वाले
पत्रकारों को ईश्वर ने आँख दिया है तो भोपाल आकर आखों देखा साक्षात्कार करों| क्यों की पेपर पर चोट के निशान नहीं, शारीर पर होते है| फिर कांग्रेस की सरकार और देश की न्यायपालिका के पूछो किस आरोप और कौन से साबुत के आधार पर साध्वी प्रज्ञा को 9 वर्ष तक जेल ही नहीं बल्कि अमानवीयता के सभी हद टूट जाये ऐसा कुकृत किया गया| क्यों? मीडिया को पता है फिर भी मौन है| यह स्थति ऐसी है, जैसे माँ दुश्मनों के बीच घिरी हो और बेटा दुश्मन की ताकत के घबराकर दुबक गया हो| 
सनातन (हिन्दू धर्म) का 5000 वर्ष के ज्ञात इतिहास में पहली बार साल 2008  में कांगेस की सरकार में हुए मालेगांव विस्फोट के पीछे हिंदू आतंकवाद है, शब्द बोलने का दुस्साहस किया| इससे पहले देश-दुनिया में हुए आतंकी हमला में जब एक विशेष धर्म संप्रदाय के लोग पकड़े जाते रहे थे और अभी भी पकड़े जाते  है| भारत में ही कई मुस्लिम धर्म के आरोपियों को हमले करने के जुर्म में फंसी तक की सजा मिली है कसाब, अफजल और याकूब मेमन जैसे मुस्लिम आतंकी| किन्तु सरकार मीडिया या किसी जाँच एजेंसी ने इसे मुस्लिम आतंकवाद का नाम दिया| उलटे आतंकी को भटके हुए और इसप्रकार के घटना को हमारे बीच ऐसा परोसा की जैसे दोषी जनता ही है| 
गौर करने की बात यह है कि जिस मालेगांव विस्फोट में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को दोषी ठहराया जा रहा है, वह पहली घटना नहीं है| इससे पहले भी 2006 में माले गांव की मस्जिद के बाहर विस्फोट हुआ था| जिसमें कई लोग मारे गए थे| इस विस्फोट की जांच भी महाराष्ट्र पुलिस ने ही की थी| लेकिन उनकी जांच पर जब सवालिया निशान लगाए गए तो सीबीआई को सौंप दी गई| यह वही स्पेशल टास्क फोर्स है, जिसने 1993 के मुंबई बम धमाकों की जांच की थी और इसी जांच के आधार पर इसके लिए लगभग 117 आरोपियों की मुंबई की विशेष अदालत ने सजा सुनाई थी| तमाम छानबीन के बाबजूद ना तो साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ कोई साबुत मिले; ना ही हिन्दू आतंकवाद के खिलाफ| लेकिन सीबीआई कहना था कि जांच से यह जरूर पता चला है कि इस विस्फोट के पीछे भी उन्हीं लोगों का हाथ है जिन्होंने हैदराबाद की मक्का मस्जिद समेत देश के विभिन्न शहरों में विस्फोट को अंजाम दिया है| एक बात और जिस समय मालेगांव में विस्फोट हुआ उसी समय गुजरात के मोडासा में भी विस्फोट हुआ था| खुफिया एजेंसी का तब कहना था कि इन दोनों विस्फोट के पीछे एक ही आतंकवादी संगठन का हाथ है| ऐसा इसलिए कि दोनों हमले एक दिन के अंतर पर हुए थे| दोनों धमाके रात में लगभग 9:30 के आप-पास हुए थे| और दोनों धमाके में विस्फोटक मोटरसाईकिल में छुपाया गया था| लेकिन एनआईए की टीम ने प्रज्ञा सिंह ठाकुर और अन्य आरोपियों से पूछताछ के बाद साफ कर दिया कि मोडासा विस्फोट में प्रज्ञा ठाकुर और अभिनव भारत संगठन का कोई हाथ नहीं है| एनआईए के रिपोर्ट के अनुसार कुछ तथ्य जरुर सामने आये जो इस जाँच की दिशा मोड़ दी| रिपोर्ट में एनआईए ने कहा है कि उनके पास किसी को आरोपी बनाने लायक सबूत नहीं हैं। ब्लास्ट के लिए जिस हीरो होंडा बाइक का उपयोग किया गया था, उसके चेसिस नंबर के सिर्फ दो ही अंक मिले। अधिकारियों ने हीरो होंडा के गुड़गांव वाले प्लांट में संपर्क किया तो पता चला कि 71 बाइक्स में ये दो अंक मिलते हैं। अधिकारियों ने 70 बाइक मालिकों से पूछताछ की, लेकिन 71वां नहीं मिला और ना नहीं कभी एनआईए ने उस बाईक मालिक के नाम साझा किये। एनआईए ने 117 गवाहों की जांच की, लेकिन कोई सुराग हिन्दू आतंकवाद का नहीं मिला। पुलिस के मुताबिक मोडासा ब्लास्ट में यूज हुई बाइक पर '786' नंबर का स्टिकर लगा था। अब मामला साफ था कि हैदराबाद की मक्का मस्जिद समेत देश के विभिन्न शहरों में विस्फोट करने वाले हिन्दू नहीं इस्लामिक आतंकी है| कांग्रेस की सरकार के इशारे पर गुजरात में हुए बम धमाके में इस्तेमाल बाईक के मालिक का नाम तो एएनआई ने छुपा ली| किन्तु देश की नज़रों उस बाईक पर लगा 786  नंबर का स्टिकर छुपा नहीं पायी और वह वायरल हो गया| फिर भी किसी प्रकार से कांग्रेस की सरकार जिसमें दिग्विजय सिंह की भूमिका रही है ने हिन्दू को आतंकी घोषित करने के लिए साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को शारीरिक और मानशिक रूप से प्रताड़ित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा| हाथ पैर और रीढ़ की हड्डी तक पिटते-पिटते तोड़ गए और देश मीडिया मुंह बंद किये इस घोर अपराध की दोषी बनी रही| द्रोपदी को तो नुयुद्ध सभा में केवल बाल पकडे के घसीटा गया था| लेकिन साध्वी को उससे भी अधिक प्रताड़ित किया गया| इस प्रकार के कुकृत का ना तो इतिहास में कोई पन्ना दर्ज है ना ही वर्तमान में| किसी को आतंकी जबरन बनाने के लिए मानवता की सारी सीमा लाँघ दी गई| इतना ही नहीं मानवाधिकार की टीम भी इस षड्यंत्र में सामिल थी और उसने अपने रिपोर्ट न्यायालय को सौपी जो मीडिया में भी प्रकाशित की गई और आज-कल वायरल हो रही है| जिसमे यह साफ तौर पर लिखा गया था| साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के साथ कोई मार-पिट नहीं की गई है| तब साध्वी प्रज्ञा जनता के के नज़रों से ओछल जेल में थी, किन्तु अब नहीं; उनके साथ की गई प्रताड़ना और उनकी स्थिति आज सब के बीच है| आपको यह मालूम हो कि साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के दो-दो बार ब्रेन मैपिंग और नार्को टेस्ट किये गए पर साध्वी सभी वैज्ञानिक जांचों में बेदाग निकल गई थी| और एएनआई ने उन्हें क्लीन चिट सौफ दी है| 
साध्वी प्रज्ञा ने ‘आप की आदालत’ रजत शर्मा की टीवी शो में यह खुलासा किया कि उनसे एक दिन जेल में मिलाने स्वामी अग्निवेश आये थे| और उन्हें जुर्म अपने माथे पर लेने की बात कही और दिलासा दिलाया कि जेल में कोई आपको परेशानी नहीं होगी| हमारी लड़ाई आरएसएस से है| एक बार ऐसा पिटाई अग्निवेश की जाये तो मीडिया की स्थिति क्या होगी? सोच कर ही तरस आती है| मीडिया हमेशा से पैसा और बुकाऊ रही है इसका प्रमाण भी है, कुछ दिन पहले साध्वी प्रज्ञा ठाकुर एक टीवी डिबेट में थी और उनसे सवाल किया गया मानवाधिकार की रिपोर्ट के अनुसार आपके साथ कोई मारपीट नहीं की गई| सवाल सुनते ही प्रज्ञा ठाकुर ने वही किया जो कोई भी प्रताड़ित व्यक्ति करता| डिबेट छोड़ कर उठा गई| मैं उस टीवी एंकर को बुलाता हूँ स्वयं भोपाल आये साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की शारीरिक स्थति देखे| क्युकि पेपर पर चोट नहीं दिखते है, घाव और प्रताड़ना की गवाही तो स्वयं उनका शारीर चीख चीख दे रहा है| 

शनिवार, 20 अप्रैल 2019

अगर तुम बदलना चाहते हो, तो मैं नया कुरान लिख दूँ

जितेश कुमार 

आतंकी तो अफजल गुरु और याकूब मेमन था. जिसे मृत्यु अवश्य मिली. किन्तु जेल में भी फाइव स्टार होटल जैसी व्यवस्था का सुख प्राप्त हुआ. करोड़ों की सरकारी खजाने लुटाये गए. राज कांग्रेस का था और आतंकवादियों की मेहमान नवाजी करने की इनकी परंपरा है.
आज के आतंकी+ रक्त समूह के कोंग्रेसी उसी परम्परा से है जो किसी आतंकी के सामने सर झुकाती है, साष्टांग उसके चरणों में लेट जाती है. देश के आतंकियों की मेहमान नवाजी का क्या उद्देश्य हो सकता है?
केवल और केवल मुस्लिम तुष्टिकरण. अब तो बहुत हद तक मुस्लिम समुदाय भी समझने लगे हैं कि कांग्रेस ने केवल राजनीतिक लाभ के लिए उनका उपयोग किया है. कदाचित आतंकियों को विशेष सुविधा देकर उनको देशद्रोही साबित भी की है. हे अशफाक उल्ला खान के वंशजों, हे मौलाना आजाद के वंशजों, हे कलाम के वंशजों, अपने राष्ट्रभक्ति का प्रमाण दो. और अपनी धार्मिक पुस्तक कुरान को निष्कलंक करो. हे कुरान प्रेमियों, फर्जी और मुल्लाह-मौलवियों के मुख से उत्पन्न आतंकित रक्तजनित विनाशक विवेकहीन और अत्याचारी अपराधिक असमानता वाली कुरान का दहन करो. वास्तविक कुरान की आयतें पढ़ो देशभक्त बनो और देश से प्रेम करो तुम सीमा पर अब्दुल हमीद बनो. देश के लिए कलाम बनो. विदेशियों से लोहा लेने के लिए अशफाक उल्ला खान बनो. भारत की संस्कृति को पढ़ो, इस देश की इतिहास को पढ़ो, इस देश की विराट परम्परा को आत्मसात करो. इस देश के स्वाभिमान को समझो. यही तुम्हारा वास्तविक कुरान है, जरा इस कुरान को समझो. 
 यह आसमानी किताब नहीं राष्ट्रभक्ति की ज्वाला से उत्पन्न कुरान है, यहां अल्लाह हू अकबर नहीं, कोई नमाज नहीं, महिलाओं पर अत्याचार नहीं, बेजुबान जानवरों को मारना कोई पर्व त्यौहार नहीं, ना हड़पने की ख्वाहिश न बांटने की इच्छा. यह कुरान मारने-मरने की भक्ति नहीं देता है. यह कुरान भाईचारा, प्रेम और देशभक्ति की शपथ देता है

शनिवार, 13 अप्रैल 2019

भारतीय संस्कृति एवं पर्यावरण

आज के परिदृश्य में पर्यावरण के प्रति लोगों की सोच
ज पर्यावरण एक जरूरी सवाल ही नहीं बल्कि ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है लेकिन लोगों में इसे लेकर कोई जागरूकता नहीं है। ग्रामीण समाज को छोड़ दें तो महानगरीय जीवन में इसके प्रति कोई उत्सुकता नहीं। किन्तु शहर में इसके दुष्परिणाम बताने वाले बुद्धिजीवियों की कमी नहीं|  परिणामस्वरूप पर्यावरण सुरक्षा महज एक सरकारी एजेण्डा ही बन कर रह गया है। तात्पर्य सरकारी कार्य की तरह पेपरों पर; धरातल जीरो है| यह विषय पूरे समाज से बहुत ही घनिष्ठ सम्बन्ध रखने वाला है। जब तक इसके प्रति लोगों में एक स्वाभाविक लगाव पैदा नहीं होता, पर्यावरण संरक्षण एक दूर का सपना ही बना रहेगा। ठीक वैसे ही जैसे हिंदी फिल्म में हीरो अपने हीरोइन के लिए वादा करता है "चाँद तारे तोड़ कर लाऊंगा, तेरे लिए|"
पर्यावरण का सीधा सम्बन्ध प्रकृति से है। अपने परिवेश में हम तरह-तरह के जीव-जन्तु, पेड़-पौधे तथा अन्य सजीव-निर्जीव वस्तुएँ पाते हैं। ये सब मिलकर पर्यावरण की रचना करते हैं। विज्ञान की विभिन्न शाखाओं जैसे-भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान तथा जीव विज्ञान, आदि में विषय के मौलिक सिद्धान्तों तथा उनसे सम्बन्ध प्रायोगिक विषयों का अध्ययन किया जाता है। परन्तु आज की आवश्यकता यह है कि पर्यावरण के विस्तृत अध्ययन के साथ-साथ इससे सम्बन्धित व्यावहारिक ज्ञान पर बल दिया जाए। आधुनिक समाज को पर्यावरण से सम्बन्धित समस्याओं की शिक्षा व्यापक स्तर पर दी जानी चाहिए। साथ ही इससे निपटने के बचावकारी उपायों की जानकारी भी आवश्यक है। आज के मशीनी युग में हम ऐसी स्थिति से गुजर रहे हैं। प्रदूषण एक अभिशाप के रूप में सम्पूर्ण पर्यावरण को नष्ट करने के लिए हमारे सामने खड़ा है। सम्पूर्ण विश्व एक गम्भीर चुनौती के दौर से गुजर रहा है। यद्यपि हमारे पास पर्यावरण सम्बन्धी पाठ्य-सामग्री की कमी है तथापि सन्दर्भ सामग्री की कमी नहीं है। वास्तव में आज पर्यावरण से सम्बद्ध उपलब्ध ज्ञान को व्यावहारिक बनाने की आवश्यकता है ताकि समस्या को जनमानस सहज रूप से समझ सके। ऐसी विषम परिस्थिति में समाज को उसके कर्त्तव्य तथा दायित्व का एहसास होना आवश्यक है। इस प्रकार समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा की जा सकती है। वास्तव में सजीव तथा निर्जीव दो संघटक मिलकर प्रकृति का निर्माण करते हैं। वायु, जल तथा भूमि निर्जीव घटकों में आते हैं जबकि जन्तु-जगत तथा पादप-जगत से मिलकर सजीवों का निर्माण होता है। इन संघटकों के मध्य एक महत्वपूर्ण रिश्ता यह है कि अपने जीवन-निर्वाह के लिए परस्पर निर्भर रहते हैं। जीव-जगत में यद्यपि मानव सबसे अधिक सचेतन एवं संवेदनशील प्राणी है तथापि अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वह अन्य जीव-जन्तुओं, पादप, वायु, जल तथा भूमि पर निर्भर रहता है। मानव के परिवेश में पाए जाने वाले जीव-जन्तु पादप, वायु, जल तथा भूमि पर्यावरण की संरचना करते है।
शिक्षा के माध्यम से पर्यावरण का ज्ञान शिक्षा मानव-जीवन के बहुमुखी विकास का एक प्रबल साधन है। इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्ति के अन्दर शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संस्कृतिक तथा आध्यात्मिक बुद्धी एवं परिपक्वता लाना है। शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु प्राकृतिक वातावरण का ज्ञान अति आवश्यक है। प्राकृतिक वातावरण के बारे में ज्ञानार्जन की परम्परा भारतीय संस्कृति में आरम्भ से ही रही है। परन्तु आज के भौतिकवादी युग में परिस्थितियाँ भिन्न होती जा रही हैं। एक ओर जहां विज्ञान एवं तकनीकी के विभिन्न क्षेत्रों में नए-नए अविष्कार हो रहे हैं। तो दूसरी ओर मानव परिवेश भी उसी गति से प्रभावित हो रहा है। आने वाली पीढ़ी को पर्यावरण में हो रहे परिवर्तनों का ज्ञान शिक्षा के माध्यम से होना आवश्यक है। पर्यावरण तथा शिक्षा के अन्तर्सम्बन्धों का ज्ञान हासिल करके कोई भी व्यक्ति इस दिशा में अनेक महत्वपूर्ण कार्य कर सकता है। पर्यावरण का विज्ञान से गहरा सम्बन्ध है, किन्तु उसकी शिक्षा में किसी प्रकार की वैज्ञानिक पेचीदगियाँ नहीं हैं। शिक्षार्थियों को प्रकृति तथा पारिस्थितिक ज्ञान सीधी तथा सरल भाषा में समझायी जानी चाहिए। शुरू-शुरू में यह ज्ञान सतही तौर पर मात्र परिचयात्मक ढंग से होना चाहिए। आगे चलकर इसके तकनीकी पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र में पर्यावरण का ज्ञान मानवीय सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
भारतीय संस्कृति में पर्यावरण को विशेष महत्त्व दिया गया है। प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में पर्यावरण के अनेक घटकों जैसे वृक्षों को पूज्य मानकर उन्हें पूजा जाता है। पीपल के वृक्ष को पवित्र माना जाता है। वट के वृक्ष की भी पूजा होती है। जल, वायु, अग्नि को भी देव मानकर उनकी पूजा की जाती है। समुद्र, नदी को भी पूजन करने योग्य माना गया है। गंगा, सिंधु, सरस्वती, यमुना, गोदावरी, नर्मदा जैसी नदीयों को पवित्र मानकर पूजा की जाती है। धरती को भी माता का दर्जा दिया गया है। प्राचीन काल से ही भारत में पर्यावरण के विविध स्वरुपों की पूजा होती है|
परिभाषा: पर्यावरण अपनी सम्पूर्णता में एक इकाई है जिसमें अजैविक और जैविक संघटक आपस में विभिन्न अन्तर्क्रियाओं द्वारा संबद्ध और अंतर्गुम्फित होते हैं। इसकी यह विशेषता इसे एक परितंत्र का रूप प्रदान करती है क्योंकि पारिस्थितिक तंत्र या पारितंत्र पृथ्वी के किसी क्षेत्र में समस्त जैविक और अजैविक तत्वों के अंतर्सम्बंधित समुच्चय को कहते हैं। अतः पर्यावरण भी एक पारितंत्र है।
पृथ्वी पर पैमाने (scale) के हिसाब से सबसे वृहत्तम पारितंत्र जैवमंडल को माना जाता है। जैवमंडल पृथ्वी का वह भाग है जिसमें जीवधारी पाए जाते हैं और यह स्थलमंडल, जलमण्डल तथा वायुमण्डल में व्याप्त है। पूरे पार्थिव पर्यावरण की रचना भी इन्हीं इकाइयों से हुई है, अतः इन अर्थों में वैश्विक पर्यावरण, जैवमण्डल और पार्थिव पारितंत्र एक दूसरे के समानार्थी हो जाते हैं।
माना जाता है कि पृथ्वी के वायुमण्डल का वर्तमान संघटन और इसमें ऑक्सीजन की वर्तमान मात्रा पृथ्वी पर जीवन होने का कारण ही नहीं अपितु परिणाम भी है। प्रकाश-संश्लेषण, जो एक जैविक (या पारिस्थितिकीय अथवा जैवमण्डलीय) प्रक्रिया है, पृथ्वी के वायुमण्डल के गठन को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण प्रक्रिया रही है। इस प्रकार के चिंतन से जुड़ी विचारधारा पूरी पृथ्वी को एक इकाई गया या सजीव पृथ्वी (living earth) के रूप में देखती है। इसी प्रकार मनुष्य के ऊपर पर्यवारण के प्रभाव और मनुष्य द्वारा पर्यावरण पर डाले गये प्रभावों का अध्ययन मानव पारिस्थितिकी और मानव भूगोल का प्रमुख अध्ययन बिंदु है।
हिन्दी शब्द पर्यावरण का परितथा आवरणशब्दों का युग्म है। परिका अर्थ हैं - चारों तरफतथा आवरणका अर्थ हैं - घेराअर्थात प्रकृति में जो भी चारों ओर परिलक्षित है यथा- वायु, जल, मृदा, पेड़-पौधे तथा प्राणी आदि सभी पर्यावरण के अंग हैं। आक्सफोर्ड एडवान्स्ड लर्नर्स डिक्शनरी आफ करेंट इंग्लिश के अनुसार इनवायरमेंट का अर्थ है - आसपास की वस्तु स्थिति, परिस्थितियां अथवा प्रभाव। चेम्बर्स ट्वैन्टीएथ सेन्यचुरी डिक्शनरी में इनवायरमेंट अर्थात् पर्यावरण का अर्थ विकास या वृद्धि को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों से है। देश के पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 2 (क) के अनुसार पर्यावरण में वायु, जल, भूमि, मानवीय प्राणी, अन्य जीव-जन्तु, पौधे, सूक्ष्म जीवाणु और उनके मध्य विद्यमान अन्तर्सम्बन्ध सम्मिलित हैं।

पर्यावरण के महत्व:- जल, वायु, भूमि, पशु, वनस्पति और मनुष्य सभी मिलकर पर्यावरण का निर्माण करते हैं। इनमें से प्रत्येक तत्व के अनुपात को इस प्रकार लिया जाता है कि वे पृथ्वी पर एकरूपता बनाए।

पर्यावरण शब्द फ्रांसीसी शब्द इन्वीरोनरसे लिया गया है जिसका अर्थ है पूरा परिवेश।
परिभाषा:- पर्यावरण वास्तव में बाह्य परिस्थितियों का परिवेश है जो मनुष्य, पशु या पौधे के विकास, उसके रहन-सहन एवं कार्य करने की स्थिति आदि को प्रभावित करता है।
पर्यावरण के कुछ महत्वपूर्ण परिभाषायें हैं:
1.  रॉस:-पर्यावरण को किसी बाह्य बल के रूप में परिभाषित कर सकते हैं जो हमें प्रभावित करता है।
2.  डगलस एवं होलैंड:पर्यावरण शब्द सभी बाह्य ताकतों, प्रभावों एवं अवस्थाओं का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल होता है जो सजीवों की जीवन प्रकृति, व्यवहार एवं वृद्धि, विकास एवं परिपक्वता को प्रभावित करता है ।
पर्यावरण के प्रकार:—-
सामान्यतः पर्यावरण तीन प्रकर के होते हैं जो मनुष्य के व्यक्तित्व को प्रभावित करता है।
1. प्राकृतिक या भौतिक यह मूलतः भौगोलिक, जलवायु एवं मौसम या भौतिक अवस्थाओं को दर्शाता है जिसमें जीव-जन्तु वास करते हैं। मानव जाति जलवायु परिस्थितियों से बहुत प्रभावित हुआ है। इसके अंतर्गत आकाश, जल, वायु, वनस्पति, पृथ्वी की सतह के नीचे तत्व एवं जीव-जन्तु आते हैं।
यूरोपीय देशों के लोग सफेद रंग के होते हैं जबकि अफ्रीकी लोग काले रंग के होते हैं। भौतिक पर्यावरण लोगों के शारीरिक बनावट को भी प्रभावित करता है। मानव की कार्य दक्षता भी जलवायु की परिस्थिति पर निर्भर करता है।
2. सामाजिक- किसी व्यक्ति की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अवस्था उसके सामाजिक वातावरण के तहत् आता है। इसमें समूह, समुदाय, समाज, समिति एवं मानवीय संबंधों द्वारा निर्मित सभी प्रकार की संस्थायें आती हैं।
3. सांस्कृतिक या मनोवैज्ञानिक मनोवैज्ञानिक वातावरण हमें व्यक्ति के व्यक्तित्व को समझने में मदद करता है। सभी प्रकार की रस्में, रीति-रिवाज, नैतिक, कानून एवं किसी के व्यवहारीय प्रतिमान इस श्रेणी के अंतर्गत आते हैं।
पर्यावरण संरचना:
पर्यावरण में सजीव एवं निर्जीव दोनों वस्तुएँ आती हैं। अतः इसकी संरचना भौतिक एवं जैविक दोनों होती हैं।
1. भौतिक पर्यावरण:-
 यह तीन श्रेणियों में वर्गीकृत है-
ठोस जो स्थलमंडल का प्रतिनिधित्व करता है। (पृथ्वी)
द्रव जो जलमंडल का प्रतिनिधित्व करता है।
गैस या वातावरण। (जलीय घटक)
उन्हें पुनः छोटे-छोटे इकाइयों में विभाजित किया जा सकता है जैसे कि पठार, तटीय, पहाड़, ग्लेशियर इत्यादि।
2. जैविक पर्यावरण:-                       
इसके अंतर्गत आते हैं-
वनस्पति (पादप)
जंतु समूह (जानवर)
इस प्रकार, इस जैविक वातावरण में सभी जीव-जंतु विभिन्न स्तरों पर मिलकर कार्य करके अपने सामाजिक समूहों एवं संगठन का निर्माण करते हैं। यह प्रक्रिया आर्थिक वातावरण को जन्म देता है।
 पर्यावरण अध्ययन का क्षेत्र:-
पर्यावरण के प्रति सोच का आरम्भ कुछ प्रमुख घटनाओं के घटित होने के कारण हुई है। आज पर्यावरण के अध्ययन का क्षेत्र सिफर् इसलिये हुआ है कि पर्यावरण खतरे ने मनुष्य को गंभीर परेशानियों में डाल दिया है। इसके क्षेत्रों का निम्न तरह से सार प्रस्तुत किया जाता है-
प्राकृतिक संपदा एवं उनकी समस्याओं का संरक्षण एवं सुरक्षा-इसमें जल, मृदा, वन, खनिज, बिजली एवं परिवहन शामिल है।
इसका अध्ययन लोगों में क्षेत्र के विभिन्न अक्षय एवं गैर-अक्षय संपदा के बारे में जागरूकता उत्पन्न करता है।
यह पर्यावरण में जैव विविधता की समृद्धि एवं पौधे, जंतु एवं सूक्ष्मजीवों की प्रजाति के खतरे के प्रति जरूरी जानकारी भी प्रदान करता है।
यह वनस्पति एवं जंतु के प्रकारों एवं उनकी सुरक्षा के बारे में अध्ययन करता है।
अध्ययन हमें प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, भूकंप, भूस्खलन, चक्रवात, आदि) के कारण एवं परिणाम को समझने एवं प्रदूषण एवं प्रभावों जैसे कि रेडियोधर्मी प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, मृदा, जल एवं सामाजिक प्रदूषण को कम करने के उपायों में मदद करता है।
मानव-पर्यावरण संबंध।
पर्यावरण से संबंधित सामाजिक मुद्दे।
पर्यावरण मुद्दों से संबंधित नीति एवं कानून।
पर्यावरण संरक्षण सुरक्षा एवं सुधार।
अतः उपलब्ध संसाधनों के उपयोग द्वारा आनेवाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित भविष्य प्रदान करने के लिए हमारे पर्यावरण को सुरक्षित रखना अति आवश्यक है।
पर्यावरण प्रदूषण:-  प्रदूषक पदार्थों के प्रवेश के कारण प्राकृतिक संतुलन में पैदा होने वाले दोष को कहते हैं। प्रदूषक पर्यावरण को और जीव-जन्तुओं को नुकसान पहुंचाते हैं। प्रदूषण का अर्थ है - 'हवा, पानी, मिट्टी आदि का अवांछित द्रव्यों से दूषित होना', जिसका सजीवों पर प्रत्यक्ष रूप से विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा पारिस्थितकी तंत्र को नुकसान द्वारा अन्य अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ते हैं। वर्तमान समय में पर्यवरनिय अवनयन का यह एक प्रमुख कारण है। प्रकृती द्वारा निर्मित वस्तुओं के अवशेष को जब मानव निर्मित वस्तुओं के अवशेष के साथ मिला दिया जाता है तब दूषक पदार्थों का निर्माण होता है। दूषक पदार्थों का पुनर्चक्रण नही किया जा सकता है। किसी भी कार्य को पूर्ण करने के पश्चात् अवशेषों को पृथक रखने से इनका पुनःचक्रण वस्तु का वस्तु एवं उर्जा में किया जाता है। पृथ्वी का वातावरण स्तरीय है। पृथ्वी के नजदीक लगभग 50 km ऊँचाई पर स्ट्रेटोस्फीयर है जिसमें ओजोन स्तर होता है। यह स्तर सूर्यप्रकाश की पराबैंगनी (UV) किरणों को शोषित कर उसे पृथ्वी तक पहुंचने से रोकता है। आज ओजोन स्तर का तेजी से विघटन हो रहा है, वातावरण में स्थित क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFC) गैस के कारण ओजोन स्तर का विघटन हो रहा है। यह सर्वप्रथम 1980 के वर्ष में नोट किया गया की ओजोन स्तर का विघटन संपूर्ण पृथ्वी के चारों ओर हो रहा है। दक्षिण ध्रुव विस्तारों में ओजोन स्तर का विघटन 40%-50% हुआ है। इस विशाल घटना को ओजोन छिद्र (ओजोन होल) कहतें है। मानव आवास वाले विस्तारों में भी ओजोन छिद्रों के फैलने की संभावना हो सकता‌ है
ओजोन स्तर के घटने के कारण ध्रुवीय प्रदेशों पर जमा बर्फ पिघलने लगी है तथा मानव को अनेक प्रकार के चर्म रोगों का सामना करना पड़ रहा है। ये रेफ्रिजरेटर और एयरकंडिशनर में से उपयोग में होने वाले फ़्रियोन और क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFC) गैस के कारण उत्पन्न हो रही समस्या है। आज हमारा वातावरण दूषित हो गया है। वाहनों तथा फैक्ट्रियों से निकलने वाले गैसों के कारण हवा (वायु) प्रदूषित होती है। मानव कृतियों से निकलने वाले कचरे को नदियों में छोड़ा जाता है, जिससे जल प्रदूषण होता है। लोंगों द्वारा बनाये गये अवशेष को पृथक न करने के कारण बने कचरे को फेंके जाने से भूमि (जमीन) प्रदूषण होता है।

पर्यावरण और सामाजिक समस्या:- सामाजिक मुद्दे एवं पर्यावरण: अपोषणीय से पोषणीय या संघृत विकास की ओर  पृथ्वी तथा इसके निवासियों का भविष्य हमारी क्षमताओं से संबंद्ध पर्यावरणीय अनुरक्षण (Maintainance) तथा परिरक्षण (Prservation) पर निर्भर करता है। इसी संदर्भ में पर्यावरण के दीर्घावधिक उपयोग एवं अभिवृद्धि के लिये संघृत विकास की संकल्पना का विकास हुआ है। 1990 के दशक में यह माना जाने लगा कि पर्यावरणीय संसाधनों के अतिदोहन या अविवेकपूर्ण तरीकों से उपयोग करने पर पर्यावरणीय ह्रास तथा अस्थिरता उत्पन्न हो रही है। यह सर्वाधिक विकासशील देशों में देखा गया है।


पोषणीयता या संघृतता (Sustainability) सभी प्राकृतिक पर्यावरणीय तंत्रों का एक अन्तर्निमित लक्षण है, जो मानवीय हस्तक्षेप को न्यूनतम स्तर पर स्वीकार करता है। यह किसी तंत्र की क्षमता तथा उसके सतत प्रवाह को अनुरक्षित (Maintain) रखने के लिये संबंद्ध करता है, जिसके फलस्वरूप वह तंत्र अपना स्वस्थ अस्तित्व रख पाता है। पर्यावरणीय संसाधनों के मानवीय उपयोग तथा पर्यावरणीय तंत्रों में हस्तक्षेप के कारण यह अन्तः निर्मित क्षमता विकृत हो जाती है, जो इसे असंघृत (Unsustainable) बना देती है।

इसके विपरीत अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि संसाधनों के दोहन तथा अवनयन से शोध एवं विकास को बढ़ावा मिलता है तथा संसाधनों के नए विकल्पों के बारे में खोज की ओर अग्रसर होते हैं, लेकिन हर सम्भावना की भी एक सीमा होती है। संरक्षणवादी एवं पारिस्थितिकीविद एक लम्बे समय से प्राकृतिक पर्यावरणीय तंत्रों में विद्यमान पोषणीयता से अवगत थे, लेकिन संघृत विकास की संकल्पना का विकास दो दशक पूर्व ही हुआ। संघृत विकास (sustainable Development) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग विश्व संरक्षण रणनीति में 1980 में किया गया, लेकिन यह विस्तार से 1987 में पर्यावरण एवं विकास पर विश्व आयोग द्वारा प्रचारित किया गया।

भावी पीढ़ी की अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता में ह्रास किए बिना वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करना ही संघृत विकास है।

संघृत विकास की संकल्पना में निम्नांकित दो संकल्पनाएँ निहित हैं-

(i) आवश्यकताओं की संकल्पना पर विचार किया जाना चाहिए जिसमें विशेष रूप से विश्व के गरीब लोगों की आवश्यकताओं पर बल दिया जाए।

(ii) वर्तमान एवं भविष्य की आवश्यकताओं को पूर्ण करने वाली पर्यावरणीय क्षमता पर प्रौद्योगिकी और सामाजिक संगठन द्वारा निर्धारित सीमाओं पर विचार किया जाए। लम्बे समय से यह मान्यता रही है कि पृथ्वी तथा इसके निवासियों का भविष्य प्रकृति के अनुरक्षण एवं संचयन की हमारी क्षमताओं पर आधारित रहा है। प्रकृति प्रदत्त जीवन निर्वाहन व्यवस्था को बचाने में हमारी क्षमताओं में कमी आते ही पर्यावरण असंतुलित हो जाता है। इसी संदर्भ में संघृत विकास से संबंधित निम्न प्रसंग महत्त्वपूर्ण हैं-

(i) सभी नव्यकरणीय संसाधनों का पूर्ण उपयोग संघृत है।
(ii) पृथ्वी पर जीवन की विविधता संरक्षित है।
(iii) प्राकृतिक पर्यावरणीय तंत्रों का ह्रास कम हो गया है।

संघृत विकास के सिद्धांत 
संघृत विकास की मान्यता है कि उपयुक्त प्रविधि एवं सामाजिक व्यवस्था द्वारा पारिस्थितिकी तंत्र से पर्याप्त मात्रा में संसाधनों की प्राप्ति हो सकती है, जो मानव समाज की वर्तमान एवं भावी जरूरतों की पूर्ति कर सकते हैं, स्पष्ट यह ऐसा विकास नहीं जो पर्यावरण में विद्यमान संसाधनों के उपयोग पर नियंत्रण रखे जैसा कि पर्यावरण संरक्षण की मान्यता है। लेकिन यह पर्यावरण संरक्षण से हटकर संसाधनों के दोहन पर अंकुश नहीं लगाकर उनकी अभिवृद्धि पर बल देता है जिसके परिणामस्वरूप मानव एवं पर्यावरण के मध्य एक ऐसी परिवर्तनशील व्यवस्था का उद्भव होता है, जो संसाधनों के विदोहन, प्रौद्योगिकी विकास तथा संस्थागत परिवर्तनों के द्वारा मानव समाज की वर्तमान एवं भाव आवश्यकताओं के मध्य सामंजस्य स्थापित करने को महत्त्व देता है। इस प्रकार संघृत विकास निम्नलिखित सिद्धांतों पर आधारित है।

1. सामुदायिक जीवन की देखभाल एवं सम्मान करना।
2. मानव जीवन की गुणवत्ता में सुधार।
3. पृथ्वी की सहन क्षमता एवं विविधता का संरक्षण करना।
4. अनव्यकरणीय संसाधनों की गुणवत्ता का ह्रास को कम करना।
5. पृथ्वी की निर्वाहन क्षमता को बनाए रखना।
6. व्यक्तिगत दृष्टिकोण तथा नियमों में परिवर्तन।
7. सक्षम समुदायों द्वारा अपने पर्यावरण की देखभाल करना
8. समग्र विकास तथा संरक्षण के लिये एक राष्ट्रीय आधार तैयार करना
9. विश्वव्यापी गठबंधन का निर्माण करना।

इस प्रकार संघृत विकास पर्यावरण के ऐसे सकारात्मक संरक्षण पर बल देता है, जिसमें पर्यावरण के जैविक तथा अजैविक घटकों के रक्षण, अनुरक्षण, पुनर्स्थापना, दीर्घकालिक दोहन एवं अभिवृद्धि को समग्र रूप में महत्त्व प्रदान किया गया है। इस प्रकार संघृत विकास में निम्नांकित मुद्दे समाहित हैं-

(i) संसाधनों के उपयोग के प्रतिरूपों की अन्तर्पीढीय उलझन 
इसमें इस तथ्य पर बल दिया जाता है कि पर्यावरणीय धरोहर को संरक्षित करने के लिये प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के बारे में कितनी प्रभावकारी निर्णयन प्रक्रिया अपनाई जाए ताकि भावी पीढ़ियों को लाभ मिल सके।

(ii) निष्पक्षता पूर्ण संबंध
इसमें संसाधनों पर किसी की पहुँच अधिक है? प्रतियोगी दावेदारों में उपलब्ध संसाधनों का आवंटन कितनी ईमानदारी या पूर्णता के साथ है? आदि तथ्यों पर बल दिया जाता है।

(iii) समय संस्तर 
लघु अवधि के आर्थिक लाभ या दीर्घ अवधि की पर्यावरणीय स्थिरता की दिशा में संसाधनों का आवंटन कितना निर्णय उन्मुखी है।

संघृत विकास पर्यावरण ह्रास को न्यूनतम हानि पहुँचाने वाली प्रौद्योगिकी को विकास, जनसंख्या नियंत्रण, संसाधन संरक्षण, भावी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए वर्तमान संसाधन उपयोग की रणनीति बनाने आदि पर निर्भर है। यद्यपि यह पारिस्थितिकी तंत्र के उपयोग की कोई निरपेक्ष सीमा स्वीकार नहीं करता वरन इसमें उपयुक्त प्रौद्योगिकी विकास द्वारा संसाधनों की अभिवृद्धि कर आवश्यकताओं की पूर्ति पर बल देता है।

जल संरक्षण 
विश्व में जल संकट निरंतर बढ़ता जा रहा है। 21वीं शताब्दी के इस प्रथम दशक में विश्व की 50 प्रतिशत जनसंख्या प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में जल संकट को महसूस कर रही है जिसके अंतर्गत दुनिया की 40 प्रतिशत आबादी का नेतृत्व करने वाले 80 देश आते हैं जो जल संकट की भयंकर चपेट में है। जल के मुख्य स्रोत नदियाँ हैं तथा विश्व की 50 प्रतिशत जनसंख्या 250 नदी बेसिनों में निवास करती हैं। इनमें अनेक नदियाँ पूर्णरूपेण किसी एक देश में ही स्थित है। लेकिन कुछ नदियाँ अन्तर्देशीय हैं जिनका जल विभिन्न अनुपात में समझौतों के तहत उपयोग में लिया जाता है। प्रादेशिक तथा विश्व स्तर पर सभी देशों को स्वच्छ जल की मात्रा को संरक्षित करने की आवश्यकता है जिसके लिये विभिन्न भौगोलिक अवस्थितियों तथा परिस्थितियों में उपयुक्त विधि अपनाकर जल को संरक्षण प्रदान करना चाहिए। समय के साथ बढ़ती माँग एवं आर्थिक गतिविधियों की विविधता के संदर्भ में जल का उपयोग प्रतिरूप भी परिवर्तित हुआ है जिसे यद्यपि मूल रूप में पुनर्स्थापित नहीं किया जा सकता, वरन समय के साथ बदलते परिवेश में संरक्षित किया जा सकता है। इसके लिये निम्नांकित विधियाँ कारगर सिद्ध होंगी-

(i) जल की प्रदूषण से सुरक्षा 
पृथ्वी पर उपलब्ध कुल स्वच्छ जल यदि प्रदूषण मुक्त रहे तो दुनिया की वर्तमान जनसंख्या की जलापूर्ति संबंधी सम्पूर्ण कार्यों के लिये पर्याप्त लेकिन शुद्ध जल का बड़ा भाग बढ़ती आर्थिक क्रियाओं तथा नगरीयकरण आदि के कारण जगत के उपयोग के योग्य नहीं रहा है। महासागरीय जल सागरीय पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में पृथ्वी की एक प्रमुख पर्यावरणीय व्यवस्था है। लेकिन विगत शताब्दी में भारी मात्रा में प्रदूषण फैला है। सतही जल मुख्यतः नदियों व झीलों तथा भूमिगत जल भूपृष्ठ में विभिन्न गहराईयों में मिलता है जिसे प्रदूषित कर दिया गया है। नदियों के किनारे स्थित बड़े शहरों से विभिन्न अपशिष्टों का बिना उपचार के नदियों में प्रत्यक्ष विसर्जन किया जा रहा है। इसी प्रकार प्रसिद्ध झीलों तथा सागर तटों पर पर्यटन व्यवसाय ने युद्ध स्तर पर जल प्रदूषण फैलाया है। मानव अपनी जल संबंधी आवश्यकताओं के लिये भूजल पर सर्वाधिक निर्भर रहता है लेकिन कुछ विशिष्ट औद्योगिक इकाइयों ने भूमि के सुरक्षा कवच में स्थित इस जल राशि को भी प्रदूषित कर दिया है।

(ii) जल का पुनर्वितरण 
भू-सतह पर पाया जाना वाला जल समान रूप से वितरित नहीं है। वितरण का वर्तमान प्रतिरूप भी संकट का कारण बन जाता है। अफ्रीका महाद्वीप में संसार की सर्वाधिक जल विदयुत सम्भाव्यता पायी जाती है क्योंकि यहाँ भूमध्यरेखीय प्रदेशों में जल की प्राप्ति अधिक है जबकि अफ्रीका के उत्तर में स्थित संसार का सबसे बड़े मरुस्थल सहारा वर्षभर जल संकट से ग्रस्त रहता है। सहारा के उत्तर में स्थित सहेलप्रदेश में आने वाले सूखे विश्व प्रसिद्ध है। इसी प्रकार भारत के पूर्वोत्तर भाग में संसार की सर्वाधिक वर्षा (मोसिनराम 1187 सेमी.) प्राप्त होती है जबकि पश्चिम में 50 सेमी. वर्षा होती है, परिणामस्वरूप पूर्वोत्तर भारत में ब्रह्मपुत्र तथा इसकी सहायक नदियों में प्रतिवर्ष आने वाले जल का 60 प्रतिशत से अधिक भाग बिना उपयोग के ही लवणीय सागर में मिल जाता है। जबकि पश्चिमी राजस्थान में नदियाँ वर्ष के अधिकांश समय में शुष्क रहती है। अतः कम आवश्यकता वाले क्षेत्रों से अधिक आवश्यकता वाले क्षेत्रों को जलापूर्ति करके जल संकट को कम किया जा सकता है।

इसके लिये सतह जल संग्रह स्थलों का निर्माण करके अतिरिक्त जल को अभावग्रस्त क्षेत्रों में एकत्रित करके आपूर्ति की जा सकती है। यह कार्य जलाशयों तथा नहरी जाल विकसित करके ही सम्पन्न हो सकता है। इस दृष्टि से भारत में चल रही नदियों को जोड़ने की योजना कारगर सिद्ध होगी। वर्षा से प्राप्त वह जल जो नदियों द्वारा बिना उपयोग में लिये ही बह जाता है, जलाशयों का निर्माण करके ऐसे जल को संग्रहीत किया जाता है, जिससे कृषि, उद्योगों, नगरों आदि को जल की पूर्ति की जाती है। जलाशयों में एकत्रित जल में परिवहन तथा मत्स्यन की सुविधाएँ भी रहती हैं। नदियों में बाढ़ों के प्रकोप से बचने के उद्देश्य से भी ये जलाशय बनाए जाते हैं जिनके द्वारा बाढ़ से बचाव के साथ ही उस जल का विविध रूपों में उपयोग करते हैं।

(iii) भूमिगत जल का विवेकपूर्ण उपयोग 
विशव स्तर पर भूजल कुल जल आपूर्ति का 25 प्रतिशत पूरा करता है। शेष 75 प्रतिशत नदियों, झीलों आदि सतही जलस्रोतों से होती है। भूजल की उपलब्ध मात्रा के अनुपात में इसकी माँग निरंतर बढ़ती जा रही है जिस कारण भूजल की मात्रा कम होती जा रही है। भूजल का दोहन एक बार होने के उपरांत पुनः पूर्ति काफी लम्बे समय में पूर्ण हो पाती है, अतः भूजल की पुनः पूर्ति के अनुपात में ही दोहन किया जाना चाहिए। भारत में भूजल का सर्वाधिक उपयोग कृषि कार्यों में किया जाता है। कृषि जलवायु दशाओं के अनुसार जल की माँग वाली फसलें न बोकर व्यापारिक महत्त्व की फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है जिस कारण भूजल का अतिदोहन किया गया है। राजस्थान के 1984 में कुल 237 विकास खंडों में से 203 भूजल दोहन की दृष्टि से सुरक्षित वर्ग में थे लेकिन विगत दो दशकों में भूजल के युद्धस्तर पर किए गए दोहन के कारण सुरक्षित विकास खंडों की संख्या घटकर वर्ष 2001 में केवल 49 रह गई तथा शेष खंड भूजल दोहन की दृष्टि से अंधकारमय वर्ग में चले गए जहाँ भविष्य में विविध कार्यों हेतु आवश्यक मात्रा में भूजल उपलब्ध नहीं रहा है।

(iv) जनसंख्या नियंत्रण 
जनसंख्या में तीव्र वृद्धि तथा जल संसाधन में प्रादेशिक रूप में मात्रात्मक एवं गुणात्मक कमी आने से जल संकट ने उग्र रूप ले लिया है। निरंतर जल की माँग बढ़ती जा रही है। जनसंख्या वृद्धि के साथ ही कृषि एवं उद्योगों का विस्तार तथा नगरीयकरण बढ़ा है जिससे स्वच्छ जल की माँग भी बढ़ी है। सन 1700 से लेकर 2000 के दशक तक जल की माँग में वृद्धि विकासशील देशों में अधिक रही है। सन 2001 तक सम्पूर्ण दुनिया के लिये प्रतिवर्ष आवश्यक मात्रा 4350 क्यूबिक किलोमीटर आकलित की गई है। इसका 60 प्रतिशत कृषि में, 30 प्रतिशत उद्योगों में तथा 10 प्रतिशत रसोई, स्नान व पेयजल में आवश्यक है। अतः जनसंख्या नियंत्रण के द्वारा भी जल की माँग को नियंत्रित किया जा सकता है तथा साथ ही बढ़ती जनसंख्या द्वारा किए जा रहे जल के गुणात्मक ह्रास को रोका जा सकता है।

सन 2025 तक विश्व की जनसंख्या 8 करोड़ हो जाएगी जिसे मद्देनजर रखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्पष्ट किया है कि समय रहते जनसंख्या नियंत्रण नहीं किया गया तो सम्पूर्ण विश्व को गम्भीर जल संकट का सामना करना पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र एवं केन्द्र सरकार ने वर्ष 2003 को स्वच्छ जल वर्षघोषित किया है।

(v) सिंचाई की उन्नत विधियों का उपयोग 
विश्व स्तर पर वार्षिक जल के उपयोग में से 69 प्रतिशत कृषि क्षेत्र में उपयोग होता है। कृषि क्षेत्र में आवश्यक जल की पूर्ति सतही जलस्रोत तथा भूमिगत जल से होती है। सिंचाई की उन्नत विधि अपनाकर जल के बड़े भाग को संरक्षित किया जा सकता है। सिंचाई में अन्य सभी आवश्यकताओं की तुलना में दोगुने जल की आवश्यकता होती है। फव्वारा तथा बूँद-बूँद सिंचाई विधियों में जल की 50 प्रतिशत बचत होती है। बूँद-बूँद या टपक सिंचाई पद्धति में सतह पर छिद्रदार पाइप का जल फैलाया जाता है जिसे फसल को प्रत्यक्ष रूप में पानी मिल जाता है। इस पद्धति में वाष्पीकरण से हानि नहीं होती है तथा लगभग 95 प्रतिशत जल का उपयोग हो जाता है। इस प्रकार सिंचाई में जहाँ जल का सर्वाधिक उपयोग होता है। संरक्षण के लिये फसल के प्रतिरूप के अनुसार उन्नत सिंचाई पद्धतियाँ अपनाई जानी चाहिए।

(vi) वनावरण में वृद्धि 
जलीय परिसंचरण के अंतर्गत प्रतिवर्ष भू-सतह पर वर्षा के रूप में विभिन्न मात्रा में जल प्राप्त होता है। यह जल सतही जलस्रोतों द्वारा प्रवाहित होता हुआ सागरों तक पहुँचता है। इसका कुछ भाग स्थिर जलस्रोतों (झील एवं तालाब) में संग्रहित हो जाता है तथा कुछ मात्रा में भू-सतह के अंदर रिसकर भूजल का रूप ले लेता है। विगत शताब्दी में तीव्र गति से किए गए वनोन्मूलन के कारण वर्षाजल का अधिकांश भाग बिना भूमिगत हुए लवणीय सागरों में मिल रहा है। विश्व में सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाले क्षेत्र चेरापूँजी में विगत दशक में जल संकट उत्पन्न हो गया है क्योंकि यहाँ चूना पत्थर खनन हेतु वनावरण को नष्ट कर दिया गया। फलस्वरूप वर्षाजल तीव्रता से प्रवाहित होकर नदियों में मिल जाता है। ऐसा ही उत्तरांचल के देहरादून क्षेत्र में हो रहा है।

(vii) कृषि प्रतिरूप में परिवर्तन 
कृषि जलवायु दशाओं के अनुसार फसल बोने पर अतिरिक्त जल की आवश्यकता नहीं होती है लेकिन विकास के वर्तमान दौर में तीव्रता से बदलते फसल प्रतिरूप के अंतर्गत लाभकारी फसलों ने स्थान पाया है। इन व्यापारिक फसलों को अधिक जल की आवश्यकता होती है। राजस्थान के उत्तरी-पूर्वी भाग में जल उपलब्धता के अनुपात में फसलें नहीं बोई गई तथा विगत तीन दशकों में सघन कृषि अपना ली गई। जल की उपलब्धता कम होने तथा फसलों में जल की अधिक माँग के कारण भूजल का अतिदोहन किया गया। फलस्वरूप भयंकर जल संकट उत्पन्न हो गया। अतः कृषि जलवायु दशाओं के अनुकूल फसल प्रतिरूप अपनाया जाए। जल की कम उपलब्धता वाले क्षेत्रों में कृषिवानिकी तथा बागानी कृषि को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

(viii) बाढ़ प्रबंधन 
विश्व में बाढ़ के रूप में स्वच्छ जल का बड़ा भाग उपयोग में न आकर विनाशक बन जाता है। भारत के कुल क्षेत्रफल 328 करोड़ हेक्टेयर में से 4 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ प्रभावित है जिसमें से 32 करोड़ हेक्टेयर भूमि को बाढ़ से बचाया जा सकता है। तटबंधों व नहरों का निर्माण करके बाढ़ के नुकसान से बचाव के साथ-साथ जल के बड़े भाग को संरक्षित किया जा सकता है। सघन वृक्षारोपण भी बाढ़ से सुरक्षा प्रदान करके जल को मृदा में शोषित करने में सहायक है। भारत में इस दृष्टि से गंगा, यमुना, महानदी, दामोदर, कोसी आदि के अपवाह तंत्रों को बाढ़ प्रबंधन के अंतर्गत लेकर कुल 1.44 रु. करोड़ हेक्टेयर भूमि को सीमा तक बाढ़ से सुरक्षा प्रदान की गई है।

(ix) उद्योगों में जल की बचत 
विश्व स्तर पर वार्षिक जल के उपयोग का 23 प्रतिशत औद्योगिक क्षेत्र में उपयोग होता है। कुछ विशेष उद्योगों में जल की खपत अधिक मात्रा में होती है तथा कुछ में जल के बड़े भाग को प्रदूषित कर दिया जाता है। रंगाई उद्योग तथा चमड़ा उद्योग इसी प्रकार के उद्योग हैं। एक टन इस्पात के निर्माण में 300 टन तक जल की आवश्यकता होती है। उद्योगों में जल की खपत जल की मात्रात्मक एवं गुणात्मक दोनों रूपों में होती है। विकसित देशों में उद्योगों में जल के उपयोग का अनुपात अधिक (50 प्रतिशत) होता है जिसकी आपूर्ति 75 प्रतिशत सतही जलस्रोतों तथा 25 प्रतिशत भूमिगत जल द्वारा होती है। उद्योगों में जल को प्रदूषण से बचाने के साथ ही शुद्ध करके पुनः उपयोग का चक्र विकसित किया जाना चाहिए। क्योंकि सामान्यतः किसी औद्योगिक इकाई द्वारा एक बार उपयोग में लिया गया जल भू-सतह पर छोड़ दिया जाता है जो पुनः शोधन कर उपयोग में न लाने पर अन्य जलस्रोतों को भी प्रदूषित करता है। अतः उद्योगों में जल की मात्रा में कमी लाते हुए पुनः उपयोग किया जाना चाहिए।

(x) शहरी अपशिष्ट जल का पुनः उपयोग 
बढ़ते नगरीयकरण से शहरों में जल की माँग में वृद्धि हुई है। विश्व के अनेक देशों में शहरों एवं कस्बों में अपशिष्ट जल के उपचार की व्यवस्था नहीं है जिससे बड़ी मात्रा में जल पुनः उपयोग में आने के स्थान पर दूसरे जल स्रोतों को भी प्रदूषित करता है। यमुना के किनारे स्थित दिल्ली, आगरा, मथुरा आदि शहरों में यह स्थिति दृष्टिगत होती है जबकि अनके देशों में शहरी जल को उपचारित करके शहर के निकटवर्ती खेतों में सब्जियों तथा फल उगाने में किया जाता है। शहरों में उपयोग में आने के उपरांत विसर्जित अपशिष्ट जल को उपचार के उपरांत नगरीय परिधि में कृषि उपयोग में लाने से जल संरक्षण के साथ ही विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति भी हो सकती है। नियोजित नगर विकास की नीतियों में इन नियमों का समावेश होना चाहिए।

(xi) नगर निकायों द्वारा जल संरक्षण 
नगर निकायों द्वारा व्यक्तिगत आवश्यकता वाले जल के संरक्षण के लिये जल माँग एवं आपूर्ति दोनों पक्षों का प्रबंधन किया जाना चाहिए। शहरों में वर्षाजल को मकानों की छतों पर एकत्रित करने की व्यवस्था को नियमबद्ध लागू करना आवश्यक है।

वर्षाजल का संचयन (Rain Water Harvesting) 
भारत में पारम्परिक जल संग्रह स्थल जनसंख्या के एक बड़े भाग की जलापूर्ति करने में सक्षम रहे हैं लेकिन समय के साथ इनका अवनयन हुआ है। पारम्परिक जलस्रोतों में संग्रहीत जल का उपयोग कृषि एवं पेयजल दोनों रूपों में किया जाता रहा है। सिंचाई के लिये उपयोग में लायी गई पारम्परिक जल संरक्षण की पद्धतियों में पहाड़ी कुद्दल, जिंग (लद्दाख) कूल, अरुणाचल की जल कुंडियाँ जिन्हें खूप कहते हैं, नागालैंड की जाबो पद्धति, हरियाणा के आबी तालाब, असम के डाले पोखर, महाराष्ट्र के बंधरगारे, कर्नाटक के केरे, तमिलनाडु के इरी (तालाब), अंडमान निकोबार के जैकवेल तथा राजस्थान के नाडी, टांका, कुंड, खडीन कुंई, बेरी, बावड़ी, झालरा टोबा आदि महत्त्वपूर्ण है।

पारम्परिक जल संग्रह प्रणालियों की शुरुआत जावा में सर्वप्रथम 3000 ई. पू विशाल जलागार के निर्माण से हुई। भारत में हड़प्पा युगीन धौलावीरा की बस्तियों (3000-1500 ई.पू) में उन्नत जल संचय और नालियों की व्यवस्था का पता चलता है। भारत में वर्षा की प्रकृति के अनुसार ही ये जल संरक्षण की विधियाँ विकसित की गई थी लेकिन बढ़ती जनसंख्या के भरण-पोषण हेतु कृषि विस्तार किया गया जिसके कारण इनका अवनयन हुआ है। किसी भी पारम्परिक जलस्रोतों का संरक्षण उसके जलीय भाग तक ही सीमित न होकर संपूर्ण अपवाह तंत्र तक विस्तृत होता है जहाँ से वर्षाजल प्रवाहित होकर उसमें संग्रहीत होता है। निरंतर बढ़ते कृषि क्षेत्र के कारण इनका अपवाह क्षेत्र नष्ट हो गया, जिसके फलस्वरूप इनमें जल की प्राप्ति कम हो गई तथा इनका अस्तित्व संकट में आ गया है।

इन जल संग्रह स्थलों को संरक्षित करके ही जल संकट से निजात पा सकते हैं। किसी भी भौगोलिक क्षेत्र में जब तक वर्षाजल को पूर्णरूपेण संरक्षित नहीं किया जाएगा तब तक जल संरक्षण की संकल्पना पूर्ण नहीं होगी। अतः मृत हो रहे पारंपरिक जल संग्रह स्थलों को पुनर्जीवित करने के लिये इनकी निगरानी रखनी होगी। आज संपूर्ण दुनिया इस तथ्य से अवगत हो गई है कि विशाल मात्रा में पाया जाने वाला जल भी बिना संरक्षण के हमारी पकड़ से दूर हो जाएगा। इस दृष्टि से गाँव स्तर पर पारंपरिक जल स्रोतों का स्वामित्व निजी होना चाहिए जिसका समर्थन विश्व बैंक ने किया है।

प्रकृति में उपलब्ध कुल जल संसाधन का एक बड़ा भाग महासागरों में पड़ा है जो लवणीय होने के कारण जैविक समुदाय के लिये उपयोग के योग्य नहीं है। जलमंडल का केवल 26 प्रतिशत भाग ही शुद्ध जल के रूप में हैं जिसका 77.23 प्रतिशत भाग हिमटोपियों, हिमखंडों तथा हिमनदों के रूप में जमा हुआ है। अतः उपयोग योग्य शुद्ध जल का केवल 20.77 प्रतिशत ही है जो भूजल, मृदा, नदी, स्वच्छ जलीय झीलों तथा नदियों में वितरित है। हिम के रूप में जमा जल मानवीय उपयोग से काफी दूर है जो आर्कटिक क्षेत्र, अण्टार्कटिक महाद्वीप तथा उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित है। पृथ्वी के जलीय परिदृश्य का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि यहाँ बड़ी मात्रा में जल पाए जाने पर भी उसका आंशिक भाग ही जैविक समुदाय के उपयोग योग्य है जबकि बढ़ती जनसंख्या के साथ जल की मांग भी सतत रूप में बढ़ रही है।

जीवमंडल में पाया जाने वाला जैविक समुदाय मुख्यतः धरातलीय एवं भूजल का ही उपयोग करता है जो सीमित मात्रा में उपलब्ध है तथा जिसका मुख्य स्रोत वर्षाजल है। भू-सतह को प्राप्त होने वाले वर्षाजल का एक बड़ा भाग प्रतिवर्ष बिना उपयोग में लिये प्रवाहित होकर लवणीय सागरों में मिल जाता है, परिणामस्वरूप जल की कमी पूर्ववत बनी रहती है। अतः वर्षाजल के दक्षतम उपयोग (Optimum Use) द्वारा संतुलित रूप में जलापूर्ति सम्भव है। वर्षाजल का संग्रहण विभिन्न उद्देश्यों के लिये किया जाता है जिनमें घरेलू उपयोग, कृषि के लिये, अकृषि भूमि में प्रवाह नियंत्रण के लिये वर्षाजल का संचयन मुख्य है।

वर्षाजल के संचयन के लिये भारत में विभिन्न पारिस्थितिकीय क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न पद्धतियाँ विकसित की गई हैं जिनमें प्राचीन काल से वर्षाजल का संचयन किया जाता रहा है। इनमें संचित जल को घरेलू तथा सिंचाई कार्यों में उपयोग में लिया जाता कश्मीर में 12वीं सदी में सिंचाई व्यवस्था पूर्ण विकसित थी। पूर्वोत्तर राज्यों में 200 वर्ष पूर्व पथरीली भूमि से बांस की नलियों द्वारा जल संरक्षण की पद्धतियाँ अपना ली गई थी जो वर्तमान समय में भी विद्यमान है।

पश्चिमी भारत में कुंड, कुंई, टांके, तालाब, बावड़ियाँ आदि 500 वर्ष पूर्व विद्यमान थी जिनमें वर्षा के पानी को संरक्षित करके उपयोग में लाया जाता रहा है। पूर्वी घाट को पहाड़ियों में लोगों ने मध्य पूर्व की तकनीकी के अनुसार पहाड़ियों में नीचे कुओं तक सुरंगे बनाई जिनसे जल अंतःस्पंदित होकर कुओं को पूरित करता है। इसी प्रकार पूर्वी पहाड़ियों में वर्तमान बूँद-बूँद सिंचाई प्रणाली की तरह, ही पान के बागानों में सिंचाई हेतु बांस की नालियों द्वारा विकसित की हैं जहाँ पर कोई विकल्प नहीं है वहाँ वर्षा के पानी को तालाबों में एकत्रित करके सिंचाई करते हैं जिसे मध्य प्रदेश में हवेली कहते हैं।

वर्षाजल को संग्रहित करने के लिये विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों में परंपरागत जल स्रोतों में सुधार के लिये सिफ़ारिशें


राजस्थान में वर्षाजल का संचयन 

पानी के उचित प्रबंध हेतु पश्चिमी राजस्थान में आज भी पराती (लोहे का बड़ा बर्तन) में चौकी रखकर उस पर बैठकर स्नान करते हैं, ताकि शेष बचा पानी अन्यत्र घरेलू उपयोग में आ सके। राज्य में निम्नलिखित जल संरक्षण की संरचनाएँ महत्त्वपूर्ण हैं-

1. तालाब: 
बरसाती पानी को संचित करने का तालाब प्रमुख स्रोत है। प्राचीन समय में बने इन तालाबों में अनेक प्रकार की कलाकृतियां बनी हुई हैं। इन्हें हर प्रकार से रमणीक एवं दर्शनीय स्थल के रूप में विकसित किया जाता है। इनमें अनेक प्रकार के भित्ति चित्र इनके बरामदों, तिबारों आदि में बनाए जाते हैं। कुछ तालाबों की तलहटी, के समीप कुआँ बनाते थे जिन्हें बेरी कहते हैं।

2. झीलें
राजस्थान में जल का परम्परागत ढंग से सर्वाधिक संचय झीलों में होता है। यहाँ पर विश्व प्रसिद्ध झीलें स्थित हैं। जिनके निर्माण में राजा-महाराजाओं, बनजारों एवं आम जनता का सम्मिलित योगदान रहा है। विश्व प्रसिद्ध पुष्कर झील का अस्तित्व धार्मिक भावना से ओत-प्रोत है। इन तालाबों से सिंचाई के लिये भी जल का उपयोग होता है। इसके अतिरिक्त इनका पानी रिसकर बावड़ियों में पहुँचता है जहाँ से इसका उपयोग पेयजल के रूप में करते हैं।

3. नाडीः 
नाडी एक प्रकार का पोखर होता है, जिसमें वर्षाजल संचित होता है। इसका आगोर विशिष्ट प्रकार का नहीं होता है। राजस्थान में सर्वप्रथम पक्की नाडी निर्माण का विवरण सन 1520 में मिला है, जब राव जोधाजी ने जोधपुर के निकट एक नाडी बनवाई थी। पश्चिमी राजस्थान में लगभग प्रत्येक गाँव में एक नाडी अवश्य मिलती है। नाडी बनाते समय बरसाती पानी की मात्रा एवं जल ग्रहण क्षेत्र को ध्यान में रखकर ही जगह का चुनाव करते हैं। इनमें संचित पानी इनकी क्षमता के अनुसार चलता है। नाडी निर्माण करने वाले स्थान से ही उसका आगोर एवं जल निकास तय होता है। रेतीले मैदानी क्षेत्रों में नाडियाँ 3 से 12 मीटर गहरी होती हैं। इनका जल ग्रहण क्षेत्र (आगोर) भी बड़ा होता है।

4. बावड़ीः 
राजस्थान में कुआँ व सरोवर की तरह ही वापी (बावड़ी) निर्माण की परंपरा अति प्राचीन है। राजस्थान में बावड़ी निर्माण का मुख्य उद्देश्य वर्षाजल का संचय रहा है। आरम्भ में ऐसी बावड़ियाँ हुआ करती थी जिनमें आवासीय व्यवस्था हुआ करती थी। कालिदास ने रघुवंश में शातकर्णि ऋषि के एक कीड़ा सरोवर का उल्लेख किया है।

5. झालरा: 
झालराओं का कोई जलस्रोत नहीं होता है। ये अपने से ऊँचाई पर स्थित तालाबों या झीलों के रिसाव से पानी प्राप्त करते हैं। इनका स्वयं का कोई आगोर नहीं होता है। झालराओं का पानी पीने के लिये उपयोग में नहीं आता था। उनका जल धार्मिक रीति-रिवाजों को पूर्ण करने, सामूहिक स्नान व अन्य कार्यों हेतु उपयोग में आता था।

6. टोबा: 
नाडी के समान आकृति वाला जल संग्रह केन्द्र टोबा कहलाता है। टोबा का आगोर नाडी से अधिक गहरा होता है। इस प्रकार थार के रेगिस्तान में टोबा एक महत्त्वपूर्ण पारम्परिक जल स्रोत हैं। सघन संरचना वाली भूमि जिसमें पानी का रिसाव कम होता है। टोबा निर्माण हेतु उपयुक्त स्थान माना जाता है। इसका ढलान नीचे की ओर होना चाहिए। इसके जल का उपयोग मानव व पशुओं द्वारा किया जाता है। टोबा के आस-पास नमी होने के कारण प्राकृतिक घास उग जाती है, जिसे जानवर चरते हैं।



जलग्रहण प्रबंधन 

जलग्रहण वह भौगोलिक इकाई क्षेत्र है, जिसमें गिरने वाला जल एक नदी या एक-दूसरे से जुड़ती हुई कई छोटी नदियों के माध्यम से एकत्रित होकर एक स्थान से (Single Outlet) होकर बहता है।

ढालू एवं पर्वतीय क्षेत्रों में केवल देखने से ही जलग्रहण क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है। नदी के संगम स्थल से ऊपर की ओर का क्षेत्र जिसमें पड़ने वाला जल इस स्थान से होकर बह रहा है, उस नदी के जलग्रहण क्षेत्र की सीमा निर्धारित करेगा। जैसे विकासखंड, गाँव व जिला आदि की अपनी एक भौगोलिक सीमा होती है, परंतु उक्त सीमा प्रकृति द्वारा निर्धारित होती है और इसमें प्रशासकीय आवश्यकताओं हेतु परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।

सामान्यतः कुछ लक्षण छोटे अथवा बड़े हर जलग्रहण में विद्यमान रहते हैं, जैसे-

1. हर जलग्रहण क्षेत्र का सम्पूर्ण पानी सिर्फ एक निकास से जलग्रहण की सीमा पार करता है।
2. कोई भी क्षेत्र एक ही श्रेणी के दो जलग्रहण क्षेत्रों में नहीं आता है।

विकास से संबंधित पूर्व के अनुभवों पर आधारित विशेषकर सूखा सम्भावित व पर्वतीय क्षेत्रों में यह महसूस किया गया कि विभिन्न विकास कार्यक्रमों का परस्पर समन्वय अधिकतम सर्वांगीण विकास के लिये आवश्यक है। विकास के नाम पर पिछले कुछ दशकों में विकास संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया गया है। फलतः अधिकांश क्षेत्रों में संसाधनों की उपलब्धता में अत्यधिक कमी का अनुभव किया जा रहा है, जो कि ढाँचागत विकास पर भी विपरीत प्रभाव डाल रही हैं।

अब समय की मांग है कि तेजी से कम होते संसाधनों को संरक्षित एवं पुनर्जीवित किया जाए। उपलब्ध संसाधनों को पुनर्जीवित करना उनको संरक्षित किए बिना कठिन है। भूमि एवं जल संरक्षण परस्पर जुड़े हुए हैं व इनका यह संबंध जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। इनको संरक्षित करने के लिये सर्वाधिक उपयुक्त तरीका यह होगा कि हम अपने प्रयासों को एक सीमित क्षेत्र के अंदर केन्द्रित करें। प्राथमिक संसाधनों के परस्पर सुधार संबंध में लाने तथा इसके उचित प्रबंधन हेतु भूमि एवं जल के द्वारा निर्धारित क्षेत्र जलग्रहण में कार्य करना ही सर्वाधिक उपयुक्त है।

जलग्रहण क्षेत्र की सीमा के अंतर्गत होने वाली विभिन्न प्रक्रियाएँ उपलब्ध संसाधनों के ऊपर प्रभाव डालती है। किसी भी विकास प्रक्रिया का टिकाऊ (पोषणीय) होना संसाधनों के परस्पर संबंधों को गहराई से समझने व परिस्थितियों के अनुरूप कार्य करने पर निर्भर है। जलग्रहण विकास कार्यक्रम जहाँ प्राथमिक संसाधनों के बेहतर उपयोग द्वारा पैदावार बढ़ाने का एक समन्वित प्रयास है, वहीं इसमें इस बात का ध्यान रखा गया है कि प्राकृतिक संतुलन पर किसी प्रकार का प्रतिकूल असर न पड़े।

जलग्रहण विकास कार्यक्रम की तकनीक स्थानीय समस्याओं पर अपना ध्यान केन्द्रित करती है और स्थानीय लोह के सहयोग से परंपरागत ज्ञान का लाभ उठाते हुए इनका समाधान तलाशने का प्रयास करती है। स्थानीय लोगों के सहयोग से तलाशे गए ये समाधान समाज में आसानी से प्रचलित किए जा सकते हैं वैसे ही सदियों से संसाधनों का उपयोग परोक्ष रूप से जलग्रहण की सीमाओं द्वारा ही निर्धारित किया जाता रहा है। उदाहरण के तौर पर शुष्क एवं पहाड़ी क्षेत्रों में आज हम जो भूमि उपयोग देखते हैं, वह प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग पर ही आधारित है और यह जलग्रहण की सीमाओं द्वारा संचालित है।

जलग्रहण की सीमा निर्धारण 
हर जलग्रहण क्षेत्र किसी न किसी जलधारा से जुड़ा होता है और इसे प्रायः उसी जलधारा के नाम से जाना जाता है। वह पूरा का पूरा क्षेत्र जो इस जलधारा को पोषित करता है जलग्रहण की सीमा में आता है। जलधारा के चारों ओर के क्षेत्र में ऊँचे स्थानों व पहाड़ियों को मिलाने वाली रेखा साधारणतः जलग्रहण की सीमा का निर्धारण करती है। निश्चित श्रेणी का हर जलग्रहण क्षेत्र एक विशिष्ट स्थान घेरता है, अतः कोई भी स्थान एक ही श्रेणी के दो या अधिक जलग्रहण की सीमा में नहीं आ सकता। जलग्रहण विकास कार्यक्रमों को आरम्भ करने से पहले जलग्रहण क्षेत्र की समस्याओं का निर्धारण अत्यंत आवश्यक है। यह काम बहुत ही सरल है व निम्नलिखित बातें इस कार्य में सहायक होंगी-

i. सर्वप्रथम भारतीय सर्वेक्षण विभाग के भू-आकृति मानचित्र में संबंधित जलग्रहण क्षेत्र को ढूंढिए
ii. इस क्षेत्र की जलधाराओं का अध्ययन कीजिए और ऐसा स्थान ढूंढ़िए जिससे होकर संबंधित जलग्रहण क्षेत्र का समस्त जल बाहर जाता है एवं उच्च श्रेणी की जलधारा को पोषित करता है।
iii. चुने हुए स्थान के चारों ओर ऐसे ऊँचे बिन्दुओं की पहचान कीजिए जिनके दूसरी ओर का पानी बहकर संबंधित जलधारा में न आए
iv. इन बिंदुओं को मिलाने पर हमें उस जलग्रहण क्षेत्र की सीमाएँ मिलेंगी जिसमें कार्य करना चाहते हैं
v. अगर इच्छित क्षेत्र पूरी तरह से संबंधित जलग्रहण क्षेत्र में नहीं आता, तो इससे उच्च श्रेणी का जलग्रहण बनाएँ
vi. किसी मुख्य नदी के दोनों ओर कई छोटे जलग्रहण क्षेत्र बनाने के बाद भी कुछ क्षेत्र किसी भी जलग्रहण क्षेत्र की सीमाओं में नहीं आते हैं और ये क्षेत्र इस नदी के वृहद जलग्रहण क्षेत्र में आएँगे।

बदलते समय की चुनौतियों का सामना करने के लिये यह सुनिश्चित किया जाए कि विकास नीतियों में आया परिवर्तन जो कि मरुस्थलीय व पर्वतीय क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों के पूर्णतः अनुरूप है, वास्तविक अर्थों में निरूपित हो सके। गाँव स्तर पर यह अनुभव किया जा रहा है कि कार्यक्रम क्रियान्वयन से संबंधित कार्यकर्ता विकास गतिविधियों को करने में सक्षम है परंतु प्रभावी योजना निर्धारण व जलग्रहण प्रबंध से संबंधित तकनीकी सहायता का अभाव है।

जलग्रहण विकास कार्यक्रम के उद्देश्य 
i. प्राथमिक संसाधनों के विकास की एक ऐसी रणनीति तैयार करना जिसके द्वारा हम अपने अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन उद्देश्यों की पूर्ति सहजता से कर सकें।
ii. बेहतर भू-उपयोग एवं उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि करना
iii. पानी के बहाव को नियंत्रित कर भूमि कटाव रोकना
iv. जल संरक्षण एवं भूगर्भिक जल में वृद्धि करना
v. बाढ़ नियंत्रण, जलाशयों एवं नदियों में गाद का जमाव रोकना
vi. वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से उपयुक्त कृषि, बागवानी एवं चारागाह पद्धतियों का विकास करना संक्षेप में, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जलग्रहण विकास कार्यक्रमों का उद्देश्य संसाधनों के बेहतर प्रबंधन द्वारा पोषणीय उत्पादकता प्राप्त कर स्थानीय लोगों के जीवन स्तर को सुधारना है।

जलग्रहण विकास कार्यक्रम में बाधाएँ 
वर्तमान परिस्थितियों में कई प्राकृतिक एवं मानव जनित स्थितियाँ हैं, जो कि विकास की सामान्य गति को प्रभावित करती हैं, जिनमें प्रमुख निम्न हैं-

- अशिक्षा के कारण जागरूकता का अभाव
- सहभागिता का अभाव एवं स्थानीय राजनीति
- कठिन पहुँच कठिन भौगोलिक परिवेश
- संवेदनशील पर्यावरण
- तकनीकी जानकारी व उपयुक्त मानव क्षमता का अभाव
- सही आकड़ों एवं सूचना तकनीकी का अभाव
- अनुपयोगी व अकुशल विकासात्मक ढाँचा?
- धन का अभाव
- क्रियान्वयन एजेंसी एवं ग्रामीणों में परस्पर संशय का भाव

इनके अतिरिक्त स्थान विशेष की अपनी भी कुछ व्यावहारिक कठिनाइयाँ हो सकती है।

पर्यावरण नैतिकता 
प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह पर्यावरणीय शुद्धता तथा संरक्षण पर सर्वाधिक ध्यान दे। पर्यावरणीय समस्याओं को समझने के लिये शिक्षित होना भी आवश्यक है। वर्तमान समय में सूचना तथा संचार साधनों के विकास के कारण संसार के किसी भी कोने में घटित होने वाली घटना चारों ओर तीव्र गति से पहुँच जाती है।

इसी प्रकार विद्यालय में अध्ययनरत छोटे-छोटे विद्यार्थियों को जब शिक्षकों द्वारा गलत काम के लिये मना किया जाता है तो वे उनके प्रति सचेत हो जाते है तथा अपने गुरूजनों की आज्ञा का पालन करते हैं।

इसी प्रकार सामान्यतया जनसाधारण में भी पर्यावरणीय नैतिक मूल्यों का होना आवश्यक है। जनसाधारण के द्वारा ऐसा कोई कार्य नहीं किया जाना चाहिए जिससे पर्यावरण को क्षति पहुँचे जैसे पाॅलिथीन थैलियों को उपयोग में नहीं लेना, जल को अनायास नहीं बहाना वृक्ष लगाना तथा बाग-बगीचों एवं वनों का संरक्षण करना, अपशिष्ट पदार्थों को ऐसी जगह डालना जिससे कोई नुकसान न हो तथा उनको परिवर्तित कर अहानिकारक बनाना आदि पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इसी के साथ-साथ कृत्रिम वस्तुओं के अति उपयोग से भी बचना चाहिए। अकेले द्वारा कार्य का न होना आदि विचार मन में नहीं लाने चाहिए। इन सभी बातों पर ध्यान देने पर पर्यावरण का संरक्षण अपने आप हो सकता है। बड़े लोग स्वयं अपने ज्ञान तथा बुद्धि द्वारा एवं छोटे बड़ों के ज्ञान से पर्यावरण संरक्षण के प्रति सजग रहना ही पर्यावरण नैतिकता है।

पर्यावरणीय समस्याएँ 
स्वच्छ वातावरण किसी भी समुदाय के समुचित विकास के लिये अत्यंत जरूरी है। पश्चिमी दुनिया में औद्योगीकरण के पश्चात आई तीव्र समृद्धि के बाद से पर्यावरणीय समस्याओं का श्रीगणेश हुआ। सम्पन्नता की होड़ में प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया गया और उसका परिणाम आज हमारे सामने पर्यावरणीय समस्याओं के रूप में प्रकट हो रहा है। बढ़ते शहरीकरण से कस्बों में बेतहाशा भीड़ है, अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण और अस्वास्थ्यकर स्थितियाँ हैं जो मानव जीवन के लिये हानिकारक हैं। वन विनाश से मौसमी चक्र में परिवर्तन हुआ है और भूजल सतह नीची हो गई। मनुष्य ने अपने निजी स्वार्थ के लिये समुद्रों, नदियों तथा अन्य जलस्रोतों को प्रदूषित कर दिया है, जिससे जल की पर्याप्त मात्रा होते हुए भी उसके गुणात्मक ह्रास से जल संकट उत्पन्न हुआ। तीव्र औद्योगिक क्रियाओं के कारण ओजोन परत के विनाश से वातावरण को गंभीर खतरा बन गया। विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों के अविवेकपूर्ण तथा अतिदोहन से पर्यावरण विभिन्न रूप से असंतुलित हो गया।

वर्तमान में मानवीय गतिविधियों के पर्यावरण के प्रति अविवेकपूर्ण दोहन की प्रवृत्ति अपनाने के कारण पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं, जिनका पृथ्वी पर विभिन्न रूपों में कमोबेश प्रभाव परिलक्षित हो रहा है। प्रमुख पर्यावरणीय समस्याएँ निम्नलिखित हैं-

जलवायु में परिवर्तन 
प्रकृति के साथ मनमानी छेड़छाड़ से सदियों से संतुलित जलवायु के कदम लड़खड़ा गए हैं। तीव्र औद्योगीकरण एवं वाहनों के कारण धरती दिन-प्रतिदिन गरमाती जा रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण ध्रुवों की बर्फ पिघल रही है। पिछली सदी के दौरान औसत तापमान 03 से 06 डिग्री सैल्सियस की वृद्धि होने मात्र से ही जलवायु डगमगा गई है और खतरनाक नतीजे सामने आने लगे है। इस दौरान महासागरों का जल स्तर 10.25 सेंटीमीटर ऊँचा हो गया है, जिसमें 27 सेमी की बढ़ोतरी बढ़े हुए तापमान के कारण पानी के फैलाव से हुई है। जलवायु एक जटिल प्रणाली है, इसमें परिवर्तन आने से वायुमंडल के साथ ही महासागर, बर्फ, भूमि, नदियाँ, झीलें तथा पर्वत और भूजल भी प्रभावित होते हैं। इन कारकों के परिवर्तन से पृथ्वी पर पायी जाने वाली वनस्पति और जीव जंतुओं पर भी प्रभाव परिलक्षित होता है। सागर के वर्षा वन कहलाए जाने वाले मूंगा की चट्टानों पर पाए जाने वाली रंग-बिरंगी वनस्पतियाँ प्रभावित हो रही हैं। जलवायु परिवर्तन से सूखा पड़ेगा जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ेगा। जल की उपलब्धता भी घटेगी, क्योंकि वर्तमान समय में कुल स्वच्छ पानी का 50 प्रतिशत मानवीय उपयोग में लाया जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन से कृषि के साथ ही वनों की प्राकृतिक संरचना भी बदल सकती है। सूक्ष्म वनस्पतियों से लेकर विशाल वृक्षों तक का तापमान और नमी का एक विशेष सीमा में अनुकूलन रहता है। इसमें परिवर्तन होने से ये वनस्पतियाँ या तो अपना स्थान परिवर्तित कर लेंगी या सदा के लिये विलुप्त हो जाएगी। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि बढ़ती जनसंख्या एवं शहरीकरण के कारण इन्हें दूसरा रास्ता ही अपनाना होगा। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन से विश्व के एक-तिहाई वनों को खतरा है। कुछ तापमान से वनाग्नि की घटनाएँ भी बढ़ रही है। वनाग्नि से वायुमंडल की कार्बनडाइ ऑक्साइड की मात्रा बढ़ सकती है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से अनिश्चितता की स्थिति में आने वाले मुख्य क्षेत्र?

- नदियों एवं झीलों में जल की अनुक्रिया
- उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की बारम्बारता
- स्थायी हिम के पिघलने का प्रतिरूप हिमनदों
- हिमटोपियों की अनुक्रिया
- सागर तल में उत्थान की सीमा
- सागर तल के उत्थान से पुलिन क्षेत्रों की अनुक्रिया
- प्रवाल भित्तियों, डेल्टा तथा आर्द्र भूमि की स्थिति

पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन होने से कई संक्रामक रोगों का प्रकोप भी तीव्र गति से बढ़ रहा है। ठंडे देशों में लू जैसी हवाएँ चलने लगी है। 1995 के जुलाई माह में सिकागो में एक सप्ताह तक गर्म हवाएँ (लू) चली। जिससे 50 लोग मारे गए। जलवायु परिवर्तन एवं मलेरिया में अनुकूल संबंध है, क्योंकि मलेरिया फैलाने वाले मच्छर और मलेरिया परजीवि दोनों को ही ठंडी जलवायु रास नहीं आती है, बढ़ते तापमान में ये स्वतंत्र कार्य करते हुए अनेक संक्रामक रोग फैलाते हैं। रवाण्डा में सन 1960 में एक डिग्री सैल्सियस तापमान बढ़ने से मलेरिया में दोगुनी वृद्धि हो गई। कुख्यात डेंगू बुखार भी तापमान वृद्धि से ही होता है। वैज्ञानिक का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण पुनः उत्पन्न होने वाले संक्रामक रोगों का सर्वाधिक कहर विकासशील देशों को झेलना पड़ेगा। अतः प्रकृति की ओर वापसी का मूल मंत्र अपनाना होगा।

विश्व तापमान में वृद्धि 
औद्योगिकरण की बढ़ती प्रक्रिया के कारण वायुमंडल में कार्बनडाइ आॅक्साइड की मात्रा बढ़ी है, जिसमें हरित ग्रह प्रभाव को जन्म दिया है। पृथ्वी पर पाई जाने वाली कार्बनडाइ आॅक्साइड की मात्रा बढ़ने से धरती की सहत से परावर्तित किरणों द्वारा उत्सर्जित होने वाली तापीय ऊर्जा को वायुमंडल से बाहर जाने से रोकती है। इस प्रकार तापीय ऊर्जा के वायुमण्डल में सान्द्रण से धरती के औसत तापमान में वृद्धि होती है जिसे विश्व व्यापी तापन (Global Warming) कहते हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि विश्व तापमान में वृद्धि के कहर से पृथ्वी की जलवायु परिवर्तित होगी जिसके तहत वर्षा में कमी आएगी। वर्षा की कमी का प्रत्यक्ष प्रभाव कृषि पर पड़ेगा तथा सूखे की स्थिति उत्पन्न होगी। तापमान वृद्धि एवं वर्षा की कमी के कारण वन क्षेत्र तेजी से घटेगा जिससे जैव विविधता का भी ह्रास होगा। तापमान वृद्धि के लिये कार्बन डाइआॅक्साइड के अतिरिक्त मिथेन, क्लोरोफ्लोरोकार्बन यौगिक तथा नाइट्रस आॅक्साइड भी उत्तरदायी है। भू-मंडल के गरमाने से नजदीकी और दूरगामी दोनों प्रभाव मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिये घात हों। नजदीकी प्रभावों में तापीय वृद्धि के कारण मृत्यु सूखा, तूफान, बाढ़ एवं पर्यावरण अवनयन प्रमुख है। दूरगामी प्रभावों में संक्रमण एवं संबंधित रोग, खाद्य समस्या, अकाल तथा जैव विविधता को खतरा पैदा होगा। इनके अतिरिक्त ताप वृद्धि से ध्रुवीय एवं कुछ पर्वतीय बर्फ पिघलने से समुद्री किनारे पर स्थित कई शहर डूब सकते हैं।

अम्ल वर्षा 
मानव के लिये जल विभिन्न उपयोगों हेतु महत्त्वपूर्ण है। यह जल मुख्य रूप से वर्षा से प्राप्त होता है। वर्तमान समय में मानव जनित स्रोतों से निःसृत सल्फर डाइ आॅक्साइड वायुमंडल में पहुँचकर जल से मिश्रित होकर सल्फेट तथा सल्फ्यूरिक अम्ल का निर्माण करती है। जब यह अम्ल वर्षा के साथ धरातल पर पहुँचता है तो इसे अम्ल वर्षा कहते हैं। जल की अम्लता को मापते हैं, जब जल का PH-7 हो तो उसे तटस्थ जल कहते हैं। सामान्य वर्षा का PH5 होती है, लेकिन ये मानक 4 से कम होता है तो यह जल जैविक समुदाय के लिये हानिकारक होता है। जितनी अधिक मात्रा में सल्फर डाइ आक्साइड और नाइट्रोजन आॅक्साइड का सान्द्रण वातावरण में होगा उतना ही वर्षाजल का PH घटेगा।

वैज्ञानिकों का मानना है कि अम्ल वर्षा सल्फर डाइ आॅक्साइड और नाइट्रोजन आॅक्साइड उगलने वाले औद्योगिक एवं परिवहन स्रोतों के क्षेत्रों तक सीमित नहीं होती वरन वह स्रोत क्षेत्रों से दूर अत्यधिक विस्तृत क्षेत्रों को प्रभावित करती है, क्योंकि अस्त वर्षा के उत्तरदायी कारक प्रदूषक (जैसे- सल्फर डाइ आॅक्साइड) गैसीय रूप में होते हैं, जो हवा एवं बादलों द्वारा दूर तक फैल जाते हैं। कभी-कभी अम्ल वर्षा को झील कातिल भी कहते हैं, क्योंकि यहाँ के विभिन्न जल स्रोतों, झीलों, तालाबों एवं छोटे बड़े जल भण्डारों आदि के जल जीवों की मृत्यु का उत्तरदायी कारक अश्व वर्षा को माना गया है।

अम्ल वृष्टि के कारण मृदा उत्पादकता प्रभावित होती है। अम्लता के कारण मृदाओं के खनिज तथा अन्य पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। अम्ल वर्षा वनों को भी प्रभावित करती है। अनेक ऐतिहासिक इमारतें तथा स्मारक जो संगमरमर तथा लाल पत्थर से निर्मित है उन पर अम्ल वृष्टि से संक्षारण के कारण क्षति हो रही है। भारत में ताजमहल, मोती मस्जिद, लाल किला आदि को अम्ल वृष्टि से क्षति हो रही है। भारत में वर्तमान समय में अम्ल वृष्टि की समस्या अमरिकी एवं पश्चिमी देशों की तुलना में इतनी विकराल नहीं है।

 ओजोन परत का क्षयीकरण 
धरती के लिये रक्षा कवच की तरह काम करने वाली ओजोन गैस की परत हानिकारक पराबैंगनी किरणों को धरती पर आने से रोकती है। ओजोन के ह्रास के लिये क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस उत्तरदायी है।

ओजोन गैस 
वायुमंडल में 30-60 किमी की ऊँचाई पर ओजोन गैस की परत पाई जाती है, जिसका निर्माण आॅक्सीजन के अणुओं के टूटकर मिलने से होता है। इस ऊँचाई पर तीव्र पराबैंगनी किरणों के कारण पर्याप्त तापमान मिलता है जिसके कारण O2 के अणु टूटकर O+O हो जात है तथा दूसरे O2 से मिलकर ओजोन (O3=O2+O) का निर्माण करते हैं। इसका निर्माण 30-60 किमी की ऊँचाई पर होता है तथा न ही इससे नीचे हो पाता है क्योंकि 60 किमी. की ऊँचाई पर पर्याप्त दबाव नहीं मिल पाता है जो इनके संलयन के लिये आवश्यक है। इसी प्रकार 30 किमी से नीचे दबाव तो पर्याप्त मिलता है लेकिन यहाँ आॅक्सीजन अणुओं के संलयन के लिये आवश्यक तापमान पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता है अतः इसी कारण 30 किमी. से नीचे तथा 60 किमी. से ऊपर ओजोन गैस नहीं मिलती है। इसकी सर्वाधिक सघनता भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में मिलती है। ध्रुवीय क्षेत्रों में इसकी सघनता कम ऊँचाई पर मिलती है। प्रकृति का प्रत्येक तत्व मानव कल्याण के लिये होता है, लेकिन जब मानव उससे अनावश्यक छेड़-छाड़ करने लगता है तो उसके दुष्परिणाम परिलक्षित होने लगते हैं। ओजोन भी इससे अछूती नहीं है।

वायुमंडल में पाई जाने वाली ओजान की परत सूर्य की पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर उसके दुष्प्रभाव से हमारी रक्षा करती है। सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणें मानव त्वचा पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है जिस कारण त्वचा कैंसर होने की संभावना रहती है। पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी के एक प्रतिवेदन के अनुसार ओजोन की मात्रा में 1 प्रतिशत की कमी होने पर त्वचा कैंसर से पीड़ित मनुष्यों की संख्या में 2 प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है।

हरित गृह प्रभाव
मानव की प्रकृति विरोधी नीतियों एवं कार्यों के कारण संतुलित जलवायु के कदम लड़खड़ा गए हैं, इसी संदर्भ में पृथ्वी के वायुमंडल में कुछ विशेष गैसों की मात्रा इस सीमा तक बढ़ गई की धरती की ऊष्मा या गर्मी बाहर नहीं निकल पा रही है, इससे उत्पन्न प्रभाव को हरित गृह प्रभाव कहते हैं।

ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोष के अनुसार- वायुमंडल में मानव जनित कार्बनडाइ आॅक्साइड के आवरण प्रभाव के कारण पृथ्वी की सतह की प्रगामी तापन को हरित गृह प्रभाव कहते हैं। हरित गृह प्रभाव उत्पन्न करने वाले देशों में कार्बनडाइ आॅक्साइड, जलवाष्प, मिथेन और नाइट्रसआक्साइड प्रमुख से बाहर जाने वाली दीर्घ तरंगों को अवशोषित करने के कारण हैलोजनिक गैसें तथा क्लोरोफ्लोरोकार्बन भी हरित गृह गैसों की श्रेणी में आती है। इनमें सबसे अधिक योगदान कार्बनडाइ आक्साइड का रहता है।

हिम का पिघलना 
जलवायु परिवर्तन के तहत तापमान बढ़ने के कारण संसार के सबसे बड़े स्वच्छ जलीय भाग, जो बर्फ के रूप में पाए जाते हैं, पिघल रहे हैं। नूतन वर्षों में किए गए शोध के उपरांत वैज्ञानिकों ने बताया है कि ग्रीनलैंड एवं अण्टार्कटिका में हिमावरण में ह्रास हो रहा है। यह भी आश्चर्यजनक तथ्य है कि अण्टार्कटिका के ही अन्य हिस्सों में तापमान घटा है, जबकि प्रायद्वीप भाग का तापमान तीव्रता से बढ़ रहा है, जिस पर शोध कार्य जारी है। भारत की प्रमुख नदी गंगा का मुख्य जलस्रोत गंगोत्री हिमनदी भी तीव्रता से पीछे हट रहा है। इस प्रकार यदि विश्व की हिम पिघलती रही तो सागर तल में भी उत्थान होगा।

आण्विक दुर्घटनाएँ एवं विध्वंस 
आधुनिक विकसित औद्योगिक युग में रेडियोधर्मी पदार्थों का उपयोग शांतिपूर्ण कार्यों स्वस्थ उपचार, आण्विक विद्युत ग्रहों एवं विभिन्न सैनिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये किया जाता है। धीरे-धीरे आण्विक पदार्थों के उपयोग में वृद्धि के लिये तकनीकी विकास किया जा रहा है। आण्विक पदार्थों के उपयोग से विभिन्न प्रकार के हानिकारक तत्व पर्यावरण में प्रविष्ट होकर संपूर्ण जैवमंडल को प्रभावित करते हैं। अणु-बम विस्फोट आण्विक शक्ति ग्रहों से दुर्घटना में आकस्मिक रूप से एवं प्राप्त विकिरण आइसोटोप के द्वारा वायुमंडल में अल्फा, बीटा, गामा किरणों से विभिन्न घातक प्रदूषण फैल रहे हैं। वैज्ञानिकों ने बताया है कि रेडियोधर्मी धूल से निःसृत रेडियोधर्मी पदार्थ चूने की तरह मृदा एवं जल द्वारा सोख लिये जाते हैं जिससे वे भोजन शृंखला में आसानी से मिल जाते हैं।

बंजर भूमि को सुधारना 
मानवीय एवं प्राकृतिक क्रियाओं की त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया के द्वारा मिट्टी की ऊपरी परत उड़कर या बहकर चली जाती है तो उसे बंजर भूमि कहते हैं। इसके अतिरिक्त वह चट्टानी क्षेत्र जिसके ऊपर मिट्टी का आवरण नहीं पाया जाता है, उसे भी बंजर भूमि कहते हैं। यहाँ फसल उत्पादन नहीं होता है।

बंजर भूमि को सुधारने के लिये सर्वप्रथम कृत्रिम रूप से मिट्टी का आवरण बनाया जाए तथा कृत्रिम खादों का उपयोग करके ऐसी फसलों का उत्पादन किया जाए जो भूमि सुधार से संबंधित हो तथा फसल के अतिरिक्त विभिन्न पेड़ पौधे तथा झाड़ियाँ उगाई जाएँ। खनन कार्य से बनी बंजर भूमि में खेत मैदान, बाग-बगीचे, स्विमिंगपुल, नई कॉलोनियाँ बांध, स्टेडियम तथा मनोरंजन स्थलों के रूप में विकसित किया जाए।

बंजर भूमि के विकास के लिये ही राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड की स्थापना की गई है जो निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष ध्यान देता है-

1. ईंधन लकड़ी तथा चारा उत्पादन पर विशेष ध्यान देना
2. वृक्षारोपण क्रिया पर विशेष बल
3. किसानों को वृक्षारोपण के लिये प्रेरित करना तथा महिलाओं को भी वृक्षारोपण कार्य में भागीदार बनाना
4. बंजर भूमि विकास में सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थाओं का सहयोग प्राप्त करना
5. सामाजिक संस्थाओं का सहयोग बंजर भूमि विकास कार्यों में अधिकतम लेना भारत सरकार भी इस योजना में पूर्ण सहयोग प्रदान करती है। केन्द्र सरकार द्वारा ही 1992 में इस बोर्ड की स्थापना की थी। राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड का मुख्य उद्देश्य बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाना तथा वृक्षारोपण कार्य में जनता का सहयोग प्राप्त कर विस्तृत कार्यक्रम का संचालन करना है। इसके अतिरिक्त पशु प्रबंधन, जलावन लकड़ियों का विकास, वानिकी आदि कार्यक्रमों के संचालन पर भी विशेष ध्यान देता है।


आधार पाठ्यक्रम
भारतीय संस्कृति एवं पर्यावरण
 कक्षा- स्नातक पत्रकारिता (चतुर्थ सेमेस्टर)
छात्र: जितेश कुमार















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भविष्य में क्या होंगी, मैं नहीं जनता हूँ |  इस दौर में बहुत लोग अभिव्यक्ति की आजादी का अलाप जप रहे है |  तो मुझे भी संविधान के धारा  19  क...