राजनीति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजनीति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 11 मई 2021

आप हिन्दू मुस्लिम राजनीति करते है?

जवाब मेरे सलाह से आपको कुरान शरीफ पढ़ना चाहिए क्यों कि हिन्दू-मुस्लिम विवाद BJP के जन्म से पहले से है। और अधिक भयावह भी, वीभत्स भी। 
इस्लाम जबतक अपने मूल ग्रंथ कुरान में परिवर्तन नहीं करता तब तक वह ऐसे ही दुनिया से लड़ता रहेगा, इसलिए इंसानी जिंदगी की कीमत है तो कुरान से वह सब आयतों को हटाया जाये, जो केवल ख़ुदा को मानने वाले को ही जन्नत नशीब होता है यह कहता है और सभी धर्म के भगवान को शैतान मानता है, उनके पुजक को काफ़िर कहता है और इन काफिरों की हत्या से जन्नत नशीब होता है यह मानता है। पहले ऐसे विचार को खत्म करना होगा  हमने धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता मानवता और  विज्ञानवाद के लिए भी। उन आयतों को बदलने की मांग को जोड़ शोर से बोलना होगा जिसे वसीम रिजवी ने कुछ दिन पहले कहा है? 
हम हिन्दूओं की सोच संकीर्ण है या हिन्दू हृदय ऐसा ही रहा अबोध अविवेकी, भविष्यहीन। जो सिर्फ लालच पैसा और मोह में फंसा है, क्या किसी मुस्लिम को देखे है, देश के तरक्की रोजगार शिक्षा के लिए वोट करते? नहीं! वो सिर्फ उनके साथ है, जो उनको अल तकिया जिहाद करने देते है, लव जिहाद करने देते है, लैंड जिहाद करने देते है

और शरिया कानून के नाम पर औरतों को तीन तलाक , चार विवियाँ और चौदह बच्चे पैदा करने देते है। 
हम हिन्दू वास्तविक जानकारी से परे अविवेकी कुतर्क से घेरे है और अपने आप का पीठ थपथपा रहा है कि हम हिन्दू मुस्लिम राजनीति में नहीं पड़ते है बुद्धिजीवी है। हमने देश की तरक्की रोजगार से मतलब है अरे भाई यह देश रहेगा तो मरेगा कौन! और यह देश मिटेगा तो बचेगा कौन! इतनी मामूली सी बात नहीं समझ आती है। आपकी शक्ति क्या है, जिसके बल पर हम वो सब पा सकते है जिसकी हमने जरूरत है, क्या वो केवल शिक्षा है? रोजगार है?  बहुत सारे पैसे है? नहीं! वो हमारा देश है। जब तक यह सुरक्षित है, वो सबकुछ हम अपने बलबूते खड़ा कर सकते है, जिसकी हमने कभी कल्पना की थी। इस देश के प्रत्येक हिन्दू को इस राष्ट्र की सुरक्षा किन हाथो में है ऐसे लोगों का पक्षघर बनाता चाहिए। इतिहास में की भूल से सीखकर वतर्मान और भविष्य ठीक करना चाहिए। 
लेकिन सिर्फ नौकरी और मंहगाई के नाम जब हम निर्णय लेते हैं? और वर्तमान समस्या को केवल हिन्दू मुस्लिम की राजनीति कहकर पल्ले झड़ते है और बडी बडी बाते छोड़ते है तो इस दशा को देखकर गुस्सा कम और उन हिंदुओं पर तरस अधिक आता है। उनकी भी यह मनोदशा तब तक है जब तक उनके यहाँ मुस्लिम 70 प्रतिशत नहीं होते है, होते ही मेरी बाते यथार्थ और परम् सत्य नजर आएगा। किंतु तब आप कश्मीरी हिन्दू की तरह बहन बेटियों को उनके हवाले छोड़कर भागने या बलिदान होने के अलावे कुछ नहीं कर सकते। यही बात पाकिस्तान के प्रथम कानून मंत्री योगेंद्र मंडल तब नहीं समझे थे और लाखों दलितों को पाकिस्तान में छोड़कर बंगाल में शरण लेकर रहे और गुमनाम मौत को स्वीकार किया। जिन्दगी भर नीम-भीम की, के कारण गुमनाम सजा काटी।  किन्तु उनके कारण जो लाखों दलित हिन्दू वहां फंस गए वो आज तक अपनी बहन बेटी को सुरक्षित नहीं कर पा रहे है। उन्ही दलित हिंदुओं में कुछ छिपते छिपाते भारत आये किन्तु यहां भी वह ऐसा ही जीवन व्यतीत कर रहे नागरिकता नहीं होने के कारण कोई सरकारी लाभ नहीं, नौकरी नहीं, उनके बच्चे अशिक्षित है। जब उनकी इस दुर्दशा को दूर करने से लिये किसी राष्ट्रपुरुष का स्वाभिमान जागृत हुआ तो उसने CAA लाया। जिससे किसी को कोई मतबल नहीं है क्यों कि जिसे हम नागरिकता दे रहे है वो पहले है यहां रह रहे है। फिर भी इन दानवी जिहादी प्रवृति के मुस्लिम और कुछ आधुनिकतावादी लोगों को यह बात अपच हो रहा है। ऐसे आधुनिकतावादी हिन्दू पर हमने तरस आता है।  हमें मोदी प्रधानमंत्री नहीं बल्कि एक अवसर मिला है इस अवसर को पहचानिए इतिहास केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं अपितु वर्तमान और भविष्य में वह गलती दोहराई न जाये इसके लिए भी पढ़ना चाहिए। मेरी इच्छा तो यही है और कोई योगेंद्र मंडल न बने...

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

अंधा गांव में कनहा राजा है नीतीश कुमार।

जितेश कुमार
पत्रकारिता छात्र
हमर बिहार में बहुत लोकप्रिय लोकोक्तियां बा अंधा गांव में कनहा राजा। आज से लगभग 15 साल पहले बिहार के राजनीति पर विचार करते है तो यह उपयुक्त लोकोक्तियां सटीक साबित होती है। 
हम बात कर रहें है, भजपा-जदयू गठबंधन 2005 की। जब पहली बार बिहार में भजपा-जदयू गठबंधन की जीत हुई थी और NDA के नेता श्री नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया गया था। राजद गठबंधन की सरकार से जनता का मोह भंग होने के कारण, जनता ने अपना मत राजद के विरुद्ध में दिया था और NDA की जीत हुई और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने। बिहार के लोगों
को अपने भावी मुख्यमंत्री के बहुत आशा थी, बिहार की गणना बीमारू राज्य में होती थी। नीतीश कुमार ने प्रथम कार्यकाल मैं कुछ करणीय कार्य किये जैसे राज्य मार्ग को दुरूस्त किया और बिजली के खंभे गांव-गांव तक पहुंचाये। पक्के स्कूलों तथा आंगनबाड़ी केंद्रों (समुदाय भवनों) का प्रत्येक पंचायत में निर्माण करवाया। किन्तु शिक्षा और रोजगार का कोई कार्य बिहार में इन्होंने नहीं किया। केवल आश्वासन ही बिहार के युवा पीढ़ी के हाथों में लगा। फिर भी जनता ने राजद से बेहतर कार्य करने का पुरस्कार दिया। दूसरे कार्यकाल में भी नीतीश कुमार बहुमत साबित करने में सफल रहें और लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। कहते है ना जब गोकुल को श्री भगवान कृष्ण ने इन्द्र के प्रकोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाया तो कुछ लोग ऐसे थे जो लाठी पर्वत से अड़ा कर खड़ा कर दिये और अपनी महिमा मंडन करने लगे कि यह करिश्मा को वो अपने बलबूते किये है। ठीक ऐसा ही धमण्ड नीतीश बाबू में आया (दूसरा कार्यकाल) वो राजद के विरुद्ध मिलेने वाले वोट को अपनी प्रसंशा और लोकप्रियता समझने लगे और सत्ता के मदहोशी को संभाल नहीं सके। अपने आप को प्रधानमंत्री के भावी उमीदवार समझने लगे। किन्तु उसी समय गुजरात के कदावर और लोकप्रिय मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी प्रधानमंत्री बनने के लिए देशभर में जगह-जगह सभाएँ की और काँग्रेस के विरुद्ध उठ रहे आवाज को व्यापी बनाने में सफल रहें और प्रखर नायक ईमानदार छवि और कट्टर हिन्दू समर्थक राष्ट्रवादी नेता के रूप में अपनी छाप छोड़ने में सफल हुए, मोदी ने नीतीश कुमार के प्रधानमंत्री बनने के सपने पर पानी फेर दिये और मोदी के इसी सफलता को देखते हुए भजपा को अपने कदावर नेता लालकृष्ण आडवाणी को साइड कर उनको प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करना पड़ा। और अंततः 2014 में पूर्ण बहुमत के NDA की जीत हुई और मोदी  प्रधानमंत्री बने। लेकिन नीतीश बाबू खुद को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नहीं बनाये जाने के कारण गठबंधन से अलग हो गये थे और अपना मुख्यमंत्री पद भी इस आन पर त्याग दिया अगर मोदी प्रधानमंत्री बन गये तो वो मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे देंगे और नीतीश कुमार ने ऐसा ही किया जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाये। कुछ ही महीनों में जीतन राम मांझी जब रिमोड कंट्रोल की तरह कार्य करने को तैयार नहीं हुये तो फिर से मुख्यमंत्री पद पर नीतीश कुमार ने कब्ज़ा कर लिया। इस घटना से जदयू में फूट पड़ गई जीतन राम मांझी जदयू से इस्तीफा देकर अलग पार्टी बना लिये यह बात सर्व विदित है। दूसरे कार्यकाल के अंतिम 2 साल को देखे तो इसमें व्यक्तिगत धमण्ड के कारण नीतीश कुमार का इस्तीफा देने का ड्रामा करना और जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाना और फिर अपना नुकसान देखते हुए पुनः षडयंत्र कर मांझी को हटाना, खुद मुख्यमंत्री बनना। यह बात साफ साफ दर्शता है कि जिस मुख्यमंत्री को बिहार के लोगों ने नायक फ़िल्म के हीरो अनिल कपूर के रूप में देखा था। वही अपने अहंकार में 2 साल तक संवैधानिक पद का दुरप्रयोग करता रहा। और फिर 2015 के विधानसभा चुनाव में जिस पार्टी के विरुद्ध जनता  उनको अपना विश्वास मत दिया करती थी और जिस राजद पार्टी के विरुद्ध में नीतीश कुमार दो-दो बार पूर्ण बहुमत से मुख्यमंत्री बने। उसी राजद पार्टी के साथ गठबंधन करके लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बने। किंतु कहते है ना भ्रष्टाचार के महासागर में छोटे छोटे भ्रष्टाचारी का प्रभाव कम होता है तेजस्वी-तेजप्रताप का साथ नीतीश कुमार को नहीं भया। राजद के कार्यकर्ताओं की दादागिरी और गुंडागर्दी से अपना नुकसान देखते हुये। फिर से NDA में शामिल हुये। ऐसे में देखे तो 2013 से 2018 तक केवल अपना कद ऊंचा करने लिए असफल प्रयोग करके बिहार के राजस्व को तहस नहस कर दिया। बिहार में शराब बन्दी हुई, मानव श्रृंखला बना। इसके बावजूद आज बिहार की जनता कहती है, शराब की
दुकान भले नीतीश कुमार ने बंद करवाये किन्तु होम डिलीवरी शुरू करवा दिये।
दूसरा परियोजना नल जल योजना भी फेल साबित हुआ। देखा जाये तो नीतीश कुमार अपने दूसरे और तीसरे कार्यकाल में केवल अपनी छवि चमकने में व्यस्त रहे ऐसे में बिहार की शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार में कोई सुधार नहीं हुई। जो आंगनबाड़ी केंद्र (समुदायिक भवन) इनके प्रथम कार्यकाल में बना था वो भूतिया खण्डर जैसा प्रतीत होता है सच तो यह है कि गांव के बच्चे उधर से गुजरने पर डर जाते है। बिहार में स्कूल की बड़ी-बड़ी दो मंजिला भवन तो बना किन्तु शिक्षा रसातल में पहुंच गई। फिर भी नीतीश कुमार डिंग बड़ी-बड़ी हाकते है। जनता करें भी तो क्या करें एक ओर लालू यादव का जंगलराज याद आता है तो देह सीहर जाता है, शाम होते ही लोग घर के बाहर नहीं निकलते थे, रोज हत्या, लुटपाट, बलात्कार और गुंडागर्दी से जनता को अब तक नीतीश कुमार ही सही लगते थे। कारण साफ है बिहार में  विकल्प नहीं। 
देखा जाये नीतीश कुमार 3.0 भी उसी जंगलराज के पैटर्न पर ही चल रही है। नीतीश कुमार अब हिन्दू-मुस्लिम तुष्टिकरण और जातपात की राजनीति पर उतर गये है। इनके कार्यालय में शिक्षा चिकित्सा बेरोजगारी गुंडागर्दी लुटपाट बढ़ते जा रहा है जैसा की राजद सरकार के समय था। आज भी बिहार में मुख्यमंत्री के लिए कोई  उम्मीदवार नहीं होने कारण नीतीश कुमार ही है, भजपा में गिरिराज सिंह ने थोड़ी हिम्मत दिखाई थी किन्तु वो भी अभी गठबंधन धर्म के कारण मौन और अलग-थलग पड़ गए है। ऐसे में नीतीश कुमार वैसे ही सत्ता का सुख भोग रहे है जैसे कि उपयुक्त लोकोक्तियां में कही गई है अँधे गांव में कनहा राजा

रविवार, 15 दिसंबर 2019

CAB को लेकर साजिश; मीडिया डरी हुई


Jitesh kumar

Image result for CONGRESS पहले जिहादियों, बंगलादेशी और अब कांग्रेसियों का डर| सभी प्रकार के संवैधानिक प्रकिया के बावजूद महामहीम राष्ट्रिपति के हस्ताक्षर होने के उपरांत नागरिकता संशोधन बिल पास हुआ है| राज्यसभा में विधेयक के पक्ष में 125 जबकि विपक्ष में 99 वोट पड़े है| गृहमंत्री अमित साह ने राज्यसभा में विधेयक को पेश किया, जिस पर 6 घंटे बहस के बाद अमित साह ने सदन में विधेयक से संबंधित जवाब दिये| इसके बावजूद राज्यस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार पार्टी के हाईकमान का आदेश मानेंगे| क्या सोनीया गाँधी और राहुल गाँधी का निर्णय देश के संविधान से बड़ा है? इतने बड़े संविधान विरोधी मुद्दे को मीडिया दबा रही है, कारण क्या हो सकता है दलाली या डर? कुछ मीडिया संस्थानों को छोड़कर किसी ने CAB के बारे में सही जानकारी जनता को नहीं दिया है ये मीडिया घराने डिबेट के नाम पर देश को गुमराह कर रहें है| कानून की जानकारी रखने वाले बुद्दिजीवी, प्रोफ़ेसर, वकील, जज से इसके बारे में वास्तविक जानकारी साझा करनी चाहिए जिससे बिल के बारे में जनता को ठीक जानकारी मिले| किन्तु TRP और राजनितिक के चक्कर में डिबेट के नाम पर देश में मतभेद के बीज बोये जा रहे है| किसी ख़ास घटना पर मीडिया का हो-हल्ला और किसी घटना पर चुप्पी?


शनिवार, 16 नवंबर 2019

साध्वी प्रज्ञा का जीवन

जितेश कुमार
बीते लोकसभा चुनाव, 2019 में मैं भोपाल था। तब मैंने लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया, मीडिया संपर्क तथा कई नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से चुनाव प्रचार को करीब से देखा, उसमें भाग लिया। साध्वी प्रज्ञा दीदी के चुनाव प्रचार में  उनके साथ प्रचार में शामिल रहा। मैं देख रहा था कि वैसे तो भोपाल भारत का भौगोलिक केंद्र पहले से ही था परंतु साध्वी प्रज्ञा के चुनाव में उतरने से भोपाल भारतीय लोकतंत्र के निर्णायक जनादेश का केंद्र बिंदु बन गया है।   
भगवा आतंक तथा हिन्दू आतंकवाद जैसे शब्दों के जनक, आतंकी को अफजल जी, मौलाना जी पुकारने वाले, उसकी हत्या पर आंसू बहाने वाले कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह चुनावी मैदान में जैसे उतरे। साध्वी प्रज्ञा ने राजनीति में उतरने में देर नहीं की। जिस प्रकार वर्ष 2008 में मालेगांव धमाका में उनको फंसाया गया और घोर यातनाएं दी गई।
इन सबके पीछे दिग्विजय सिंह का हाथ रहा था। ऐसे में साध्वी प्रज्ञा लोकसभा क्षेत्र भोपाल से भाजपा की प्रत्याशी के रूप में चुनाव में खड़ी हुई तो देश-दुनियां के मीडिया, नेता, यहां तक की आम जनता ने इसे चुनाव मात्र नहीं समझा, यह तो धर्म युद्ध था। हिंदुओं को आतंकी कहने वाले दिग्गी के सामने सनातनधर्म की सन्याशनी चुनाव लड़ रही थी और यह तय था कि साध्वी प्रज्ञा के राजनीति में उतरने से केवल भोपाल ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारतवर्ष में राजनीति का परिष्करण एवं परिमार्जन होने जा रहा था। 
भिंड जिले की लहार तहसील की रहने वाली प्रज्ञा सिंह ठाकुर का जन्म 2 फरवरी, 1970 को मध्यप्रदेश के दतिया जिले में हुआ था। उनके पिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। यही कारण था कि बाल्यकाल से ही प्रज्ञा का रुझान राष्ट्र और समाज कार्य की ओर रहा। सामाजिक संवेदनशीलता उन्हें अपने सामाजिक दायित्व के प्रति सजग, सचेत और संकल्पित करती रहीं। वह किसी न किसी रूप में समाज को अपना योगदान देती रहीं। अल्पआयु से ही उनकी लेखनी से कविताएं और गीत फूटने लगे। उनकी रचनाओं के केंद्र में राष्ट्र ही रहता था। सनातनी मूल्यों ने उनके व्यक्तित्व का श्रृंगार किया। वे वास्तव में अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति हैं। वर्ष 1987 में जब वह नवमीं कक्षा में थी तब उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की सदस्यता प्राप्त की लगभग 15 वर्षों तक सक्रिय रहीं। प्रारंभिक सदस्यता के बाद साध्वी शीघ्र ही नगर इकाई की प्रमुख बन गई फिर जिला इकाई और उसके पश्चात पूर्णकालिक के रूप में विदिशा और भिंड की विस्तारक रही। बाद में भोपाल और उज्जैन से संगठन मंत्री रही। उनके कार्यों को देखते हुये। कुछ ही वर्षों में उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में स्थान मिला। दुर्गा वाहिनी में भी उनकी सक्रिय भूमिका रहीं। इसी दौरान उन्होंने उज्जैन में वर्ष 1996 में प्रज्ञा उत्क्रांत सामाजिक संस्थान की स्थापना की और इसके माध्यम से परिवारिक विवादों में मध्यस्थता करते हुए समस्याओं का निराकरण किया। भारतीय संस्कृति में दृढ़ आस्था होने के कारण वो समझने और समझाने लगी कि वर्तमान परिवारिक विघटन और विखंडन के मुख्य कारण व कारण क्या है? उनकी सेवा कार्य का शनै: शनै: विस्तार होता गया। उसमें नये आयाम जुड़ते गये। वर्ष 1998 में उन्होंने भिंड जिले में जय वंदेमातरम सामाजिक संस्थान की स्थापना की और उसकी राष्ट्रीय अध्यक्षा रहीं। खेल में उनकी रुचि बचपन से ही प्रगाढ़ रही। कालांतर में वे कबड्डी की स्टेट प्लेयर बनी और आत्मरक्षा के आशय से उन्होंने कराटे की शिक्षा प्राप्त की और ब्लैकबेल्ट बनी। उन्होंने महिला सुरक्षा के लिए भी काम किया। गृहनगर लहार में छात्राओं के लिए अलग से सेंटर कॉलेज और महाविद्यालय बने इसके लिए उन्होंने वर्ष 1990 में सफल जनान्दोलन किया और सरकार से स्वीकृति प्राप्त कर उन्हें खुलवाया। 
राष्ट्रीय सेविका समिति की सदस्यता के रूप में उन्होंने चुनाव संबंधित कार्य में भी अपना कौशल दिखाया। वर्ष 2002 के गुजरात विधानसभा चुनाव में उनकी सक्रिय भूमिका को सराहा गया। उन्होंने संकल्प लिया और अपने समिति संसाधनों से वे सश्रम सेवा कार्य में जुट गई। सेवा से मिलने वाले आनंद की अनुभूति व्यसनादि से अधिक मादक होती है। समय के साथ सेवा ही सेवक का स्वभाव बन जाता है। सेवा की यात्रा में स्वत्: दुर्लभ मनीष संत मिलने लगते हैं और सेवा कार्य के आयाम विकसित होने लगते हैं। वर्ष 2007 में ऐसा ही हुआ अवसर था अर्धकुंभ का और स्नान प्रयागराज। जूनागढ़ अखाड़े के महामंडलेश्वर परमपूज्य स्वामी अवधेशानंदगिरी जी महाराज से उन्होंने संन्यास की दीक्षा ली और पूर्ण रूप से सन्यासी जीवन में प्रवर्त हो गई और साध्वी प्रज्ञा बन गई। 
संघ के प्रभाव तथा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अनुभवों से साध्वी का आत्मविश्वास और दृढ़ होता गया। उन्हें लगने लगा कि राष्ट्रहित में अच्छा कार्य करने की आवश्यकता तो है ही साथ ही  असीम संभावनाएं भी है और वे उस पथ पर बढ़ चली। कभी सामूहिक रक्तदान, कभी गौसेवा के प्रकल्प तो कभी महिला सुरक्षा के उपकरण। वे धीरे-धीरे आयुर्वेद, योग, ध्यान और अध्यात्म के रहस्य व उनसे मिलने वाली चमत्कारिक लाभों से भी समाज को जोड़ने का प्रयास करने लगी। 
साध्वी प्रज्ञा एक प्रखर वक्ता थी जब वह राष्ट्रवाद और समाज की कुरीतियों पर अपना मंतव्य मंच से व्यक्त करती थी। तो वहां बैठे लोगों के हृदय में क्रांति की ज्वाला भड़क उठती थी। धीरे-धीरे साध्वी प्रज्ञा हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के साथ-साथ महिला की भी ब्रांड एमेस्टर बन गई। और यह बात कुछ तथाकथित ढोंगी लोगों को रास नहीं आया। 
यही कारण था कि वर्ष 2008 में एक प्रायोजित षड्यंत्र के तहत मालेगांव मस्जिद में हुये बम विस्फोट में उनका नाम जोड़ा गया। कुछ कुत्सित राजनीतिज्ञों ने अपने आकाओं के निर्देश पर राष्ट्रद्रोह का बिगुल फूंक दिया। उस ह्रदय विदारक कालखंड की यातनाएं एवं प्रताड़नाओं के स्मरण से ही आंसू टपकने लगते हैं। साध्वी प्रज्ञा को तुरंत स्पष्ट हो गया कि देश और सनातन धर्म के शत्रुओं ने उन्हें मोहरा बनाया है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में शांति प्रिय हिंदू समाज पर सबसे बड़ा हमला बोला गया था। गद्दार, हिंदू समाज पर लांछन लगा रहे थे। गद्दारों के सरगना ने तो भगवा आतंक और हिंदू आतंकवाद जैसे अपशब्दों से भारत भूमि और हिंदू धर्म को अपूर्णक्षति पहुंचाने का अक्षम्य अपराध किया था। साध्वी प्रज्ञा को तोड़ने के लिए उन्हें जेल में भयंकर यातनाएं दी गई। ज्ञात भारत के इतिहास में जिस प्रकार से जेल में साध्वी प्रज्ञा को यातनाएँ दी गई, इसका कोई दूसरा इतिहास नहीं। जेल में कई पुलिसकर्मी एकसाथ मिलकर उनको बेल्ट और जूते से तब तक मरते रहते थे जब तक वो बेहोश नहीं हो जाती थी। होश में लाने के लिए उन पर गर्म पानी फेंका जाता था फिर वही बेल्ट, जूतों यहां तक कि सिगरेट से उनके शरीर को जगह-जगह जलाया जाता था, उनको उठाकर जेल के दीवारों पर फेंका जाता था। उन्होंने बताया कि इसी बीच जेल एक दिन उनसे मिलने ढोंगी सन्यासी जिसकी आजकल अत्र-तत्र, सर्वत्र पिटाई होती रहती है, स्वामी अग्निवेश आये। उन्होंने कहा कि आप मालेगांव बम धमाके में अपना जुर्म कबूल करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख के इशारों पर ऐसा किया यह बयान दे। जेल में आपसे कोई मारपीट नहीं होगी। उल्टे आपको सभी प्रकार से सुख-सुविधा दिया जायेगा। जल्द ही आपकी रिहाई हो जायेगी। परंतु बचपन से ही साध्वी प्रज्ञा में राष्ट्रवाद की भावना कूट-कूट कर भरी थी। वो हिंदुत्व को कैसे लांक्षित कर सकती थी। उन्होंने इस प्रस्ताव को अस्वीकार किया और सहज ही अपने लिए कष्ट के दिन मांग लिए। लेकिन समय ने करवट ली। 2014 के चुनाव ने देश के राजनीति को बदल दिया। नरेंद्र मोदी की सरकार आयी। उस समय गृहमंत्री रहे राजनाथ सिंह ने साध्वी प्रज्ञा पर लगे आरोप की जांच के बाद उनको दोषी नहीं साबित होने के स्थिति में उन्हें छोड़ दिया गया। इस अग्नि परीक्षा से साध्वी प्रज्ञा बेदाग बाहर निकल गई। 
जब भोपाल से दिग्विजय सिंह चुनाव में उतरे तो विरुद्ध में साध्वी प्रज्ञा सामने खड़ी थी। उन्हें अपार जनसमर्थन मिला। साध्वी प्रज्ञा के चुनाव में उतरने से भोपाल लोकसभा सीट ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। चुनाव प्रचार के दौरान भोपाल में मैंने जो दृश्य देखे। सच में यह धर्म और पाप की लड़ाई थी। सौभाग्य से साध्वी प्रज्ञा को प्रचंड बहुमत से विजयी मिली।

शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

ये भाजपा के कार्यकर्ता है, शाह के बंधुआ मजदूर नहीं जितेश कुमार

अमित शाह के बयान से बिहार भाजपा के कार्यकर्ता नाखुश है। नाराजगी, गुस्सा और कानाफूसी तो होना ही था। आज कार्यकर्ता अपने आप को छला हुआ महसूस कर रहे हैं। जिन वैचारिक अधिष्ठान पर वो भाजपा के कार्यकर्ता बने और तन मन धन से भाजपा
को सींचने में लगे हैं। जब उसी विचार पर कुठाराघात किया जा रहा है। सत्ता और कुर्सी के मोह जाल में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के द्वारा अपने ही पार्टी की रीती-नीति और विचार को ताक पर रखा जाता हो, यह भला किसे स्वीकार है? भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं गृह मंत्री अमित शाह ने एनडीए के नेता के रूप में नितीश कुमार का पक्ष लिया तो भाजपा के सामान्य कार्यकर्ता इस फैसले से नाखुश दिखे। कारण शाह का बयान बीजेपी के संविधान में फिट नहीं बैठता है। भाजपा के कद्दावर नेता अटल बिहारी वाजपेयी को लोगों ने अभी तक भूलाया नहीं है। अटल जी कहते थे जोड़-तोड़ कर सरकार बनती हो तो ऐसे सरकार को हम चिमटे से नहीं छूएंगे। अटल जी के सामने जब सत्ता और पार्टी के आदर्श विचार में किसी एक को चुनने की बाड़ी आयी तो उन्होंने ने पार्टी के विचार ,सिंद्धांत और रीति-नीति को चुना और प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया। किंतु आज उन्हीं के पार्टी के दूसरी पीढ़ी में यह वैचारिक गुण नहीं दिखता है। लगता है यह अपने ही सिद्धांतों से विमुख हो गए हैं। किसी तरह सत्ता की प्राप्ति ही भाजपा की अंतिम मंजिल मालूम पड़ती है। हाल में ही देखा जाए तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रत्येक मुद्दे पर भाजपा को घेरने का प्रयास किया और विरोध किया है चाहे वह तीन तलाक का मामला हो, धारा 370 का मामला हो या राम मंदिर का मामला। जेडीयू बीजेपी के साथ नहीं दिखता है। फिर किस आधार पर शाह एनडीए के लिए नितीश कुमार की प्रशंसा करते हैं। इधर हाल फिलहाल में सरकार के क्रियाकलापों पर नजर डाला जाए। माननीय नितेश बाबू ने केवल धार्मिक तुष्टीकरण का ही कार्य किया है। इनके कार्यकाल में हजारों एकड़ सरकारी जमीन को अवैध रूप से मस्जिद मदरसा और कब्रिस्तान बनाने के लिए छोड़ दिया गया। उल्टे मस्जिद, मदरसा और कब्रिस्तान के चारदीवारी के लिए सरकारी पैसे खूब का खर्च हुए है। इनके अधिकारियों के द्वारा हिंदू संगठनों के विरुद्ध मुहिम चलाया जा रहा है, और अल्पसंख्यक समुदाय खास करके मुस्लिम समुदाय को अपराध करने की खुली छूट है। जगह-जगह पर इनके नेता और प्रशासन के नापाक गठबंधन के कारण मुस्लिमों द्वारा उत्पाद की घटना बढ़ी है। चर्चित सामूहिक बलात्कार कांड, सुपौल के प्रतापगंज के हुसैनाबाद की है। विजयादशमी के रात मेला देख कर लौटते हुए दो महिला और एक छोटी बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार होता है। उसके बाद उसमें से एक महिला को गोली मार कर हत्या कर दी जाती है। यह कोई सामान्य घटना नहीं थी इसके बावजूद शासन की तरफ से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया नहीं किसी भ्रष्ट अधिकारियों को निलंबित और दंडित किया गया। क्योंकि अधिकतर आरोपी मुस्लिम समुदाय से थे, सुपौल में हारून रशीद उपसभापति और यहां के डीएम, एसडीओ उसी समुदाय से आते हैं। सुपौल में मोहर्रम में जगह-जगह तलवारबाजी हुई। मैं स्वयं सहरसा से आने समय ऑटो से उतरकर 5 किलोमीटर पैदल चलकर सुपौल पहुंचा क्योंकि मुस्लिम समुदाय गाड़ियों को घेर कर तलवारबाजी कर रहा था। इसके बावजूद कोई प्रतिक्रिया प्रशासन के द्वारा नहीं किया गया। बात जब दुर्गा पूजा की होती है प्रशासन आरती के समय और साउंड बॉक्स की संख्या गिनने लगता है। दुर्गा पूजा समिति, बरेल के सदस्यों पर धारा 107, 116 (ग) लगाया जाता है। किन्तु रात्रि में मुख्य मार्ग पर मोहर्रम में मुस्लिमों के द्वारा तलवारबाजी करने पर प्रशासन को कोई दिक्कत नहीं है। इस प्रकार के पक्षपाती निर्णय के पीछे क्या शासन का हाथ नहीं है? बिल्कुल है नीतीश कुमार के द्वारा हिंदुओं को प्रताड़ित व मुस्लिमों को खुलीछुट दिया जा रहा है मुस्लिम बलात्कारियों को बचाया जा रहा है और शांति पूर्वक धार्मिक आयोजन करने वाले लोगों पर प्रशासन कार्यवाही कर रहा हैं। और यह सब तब हो रहा है जब नीतीश कुमार के साथ भाजपा शासन में है। इसके बावजूद भी अगर एनडीए के नेता श्री नितीश बाबू है तो भाजपा किस मुंह से समाज के बीच वोट मांगने जाएगी? दुर्गा पूजा में हिन्दू समाज को झूठे और बेबुनियाद आरोप में कार्यवाही हो रही है इस आधार पर, या सुपौल में मुस्लिम समुदाय के बलात्कारियों को बचाया जा रहा है इस आधार पर। नीतीश कुमार के द्वारा  चलाया जा रहा कथित तौर पर मुस्लिम तुष्टीकरण से बिहार पुनः अराजकता के चपेट में है। शाह को अपने बयान पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। नीतीश सरकार और प्रशासन का कार्य मुस्लिम तुष्टीकरण और टोपा-टोपी के खेल में उलझा है। इसका बिहार के विकास से कोई मतलब नहीं है। ऐसे में अगर एनडीए से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार नीतीश कुमार बनते है तो भाजपा के कार्यकर्ता विद्रोह कर देंगे। क्यों कि वो शाह के बंधुआ मजदूर नहीं, पार्टी के वैचारिक समर्थक है। अधिकतर हिन्दू है।

बुधवार, 19 जून 2019

अभी कंप्यूटर बाबा और मिर्ची बाबा की समाधि इंतजार

जितेश कुमार

भोपाल। लोकसभा चुनाव में दिग्गविजय सिंह को जितवाने के लिए कंप्यूटर बाबा और मिर्ची बाबा के साथ शंकराचार्य श्री स्वरूपानंद ऐड़ी-चोटी का जोड़ लगा दिये थे। तंत्र-मंत्र, साधना और शंकराचार्य का आशिर्वाद भी दिग्गी को चुनाव में विजयी नहीं बना
सकी। वही मिर्ची बाबा और कंप्यूटर बाबा की समाधि वाला हट आज हास्य का पात्र बना हुआ है। इतना तो साफ हो गया साधु संतों का प्रभाव अब राजनीति से उठने लगा है। यह भारतिय संस्कृति के लिए अच्छी बात है। दुनिया के लोग इन संतों के बर्ताव से हमारा मजाक बनाते थे। ऐसे संतों को बेदखल करना ही चाहिए। अभी कंप्यूटर बाबा और मिर्ची बाबा की समाधि का इंतजार कर रहा हूँ।
जान जाये पर वचन न जाये। भारत की यही रीति है। वचन निभाने के लिए कई मनीषियों ने अपनी निजी महत्वाकांक्षा की तिलांजलि दे दी। भारत में समाधि लेने वाले संतों की कमी नहीं है। कई पाखंडी भी साधु रूप में भारत की संत परंपरा को तीतर-वितर करने में लगे है। इससे स्वयं वो ही मजाक के पात्र बन कर रह गये है। एक छ्द्म सन्यासी का रूप धारण कर जितना धन इन वैराग्य संतों ने बटोरा। उतना तो सफेद कुर्ता पहन कर, लोगों को मूर्ख बनाने वाले नेता ने भी नहीं कमाया होगा। लग्जरी कार और सेवन स्टार आश्रम। मीडिया के माध्यम से ही राम रहीम का आश्रम जनता ने देखा था क्या किसी हाई-फाई होटल से कम है, बिलकुल नही। 
अब तो सन्यासी राजनीति प्रत्याशी को चुनाव में जितवाने के लिए मिर्ची यज्ञ कर रहे और असफल होने पर समाधि लेने की बात कर रहे। कहाँ है कंप्यूटर बाबा और मिर्ची बाबा सांप - छछूंदर की तरह बिल में धुस गये।  भोपाल ने भारी मतों से साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को जनता ने वोट देकर विजयी बनाया है। लोकसभा में भी सपत समारोह खत्म हुआ। बाबा कही दिखे नहीं, मीडिया को ऐसे बाबाओं का पर्दाफास करना चाहिए। बताईये कोई कंप्यूटर बाबा है, नाम से ही झूठा और पाखंडी लगता है। लोग ऐसे बाबाओं के नाम से प्रदेश की खिल्ली उड़ा रहे है।
किसी ने तो यहां तक कहा बाबा के पास कंप्यूटर की कोई डिग्री भी है, या युहीं हिम्मत सिंह नाम लिख कर घर ने दुबके रहने की आदत है। एक मित्र ने कहा "दिग्विजय सिंह जैसे राजनीतिक चतुर व्यक्ति इसके चंगुल में कैसे फंस गया।" फेसबुक पर किसी ने पोस्ट लिखा  "अब समाधि दिलवाकर इन संतों को दिग्विजय भविष्य की राजनीति बचा सकते है।" संत समाज और प्रदेश की भोली भाली जनता ऐसे संतों का तिरस्कार कर अपना धर्म बचाये। मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी है ऐसे संतो का पर्दाफास कर जनता को आगाह करे है।

शनिवार, 4 मई 2019

कांग्रेस की निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में भारी गिरावट के पूर्वानुमान

भविष्य में क्या होंगी, मैं नहीं जनता हूँइस दौर में बहुत लोग अभिव्यक्ति की आजादी का अलाप जप रहे हैतो मुझे भी संविधान के धारा 19 का प्रयोग करना चाहिए ऐसा मुझे कल सपने में बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर ने कहाउन्होंने कहाशांत मत बैठो आने वाली पीढ़ी गलियां देगीआवाज उठाने वाले इतिहास में अमर हो जाते है और शांत होकर देखने वाले की मृत्यु होती हैइनके 13वीं के बाद स्वयं के घर के लोग ही भूल जाते है|” उन्होंने ने ये भी कहा कि देश और समाज में उठ रही प्रत्येक समसामयिक मुद्दे पर अपनी राय और अपनी बात रखो| कोई नहीं पढ़े और सुने तो भी पागलों की तरह लिखते बोलते रहोअपने ज्ञान्द्रियों से जो नजर आ रहा है उसे अपनी ह्रदय की सच्चाई से सभी के बीच रखो|
kamalnath
  मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार के लगभग तीन माह बीत गये हैअभी कुछ भी उटपटांग भविष्यवाणी करना ठीक नहीं हैइतना तो कहने कि स्थिति है ही कि बीते तीन महीने की कमलनाथ सरकार से भय का वातावरण निर्मित हुआ हैलेकिन यह भय गुंडोंदरिंदोंबदमाशोंभ्रष्टाचारियों में कतई नहीं है| भोपाल और इंदौर जैसे सुरक्षित शहरों में भी आराजकता और गुंडागर्दी बढे हैअपहरण और बलात्कार के भी मामले पहले से ज्यादा हुए हैलोगों का कहना है कि कर्जमाफ़ी और बेरोजगारी भत्ता के नाम पर मध्यप्रदेश की कांग्रेस की सरकार ने आम जनता को अंगूठा दिखाया हैरोजगार और किसानों की कर्जमाफ़ी के साथ महिला उत्पीडन जैसे विषय विधानसभा चुनाव के केंद्र में थेऐसा प्रतीत होता था कमलनाथ युवा जो बेरोजगार हैकिसान जो परेशान है और महिलाएं जो असुरक्षित है इनकी सबसे पहले कष्ट हर लेंगे| कर्ज माफ़ी का सिर्फ ढोल पीटा गया है, किसान का कर्ज माफ़ी तो दूर ऐसी स्थिति है कि बोये क्या कटे क्यापैगम्बर ने कर्जमाफ़ी के नाम पर ऐसा प्रपंच किया है कि बैंक लोन अब देने को तैयार नहीं और किसान कुछ करने की स्थिति में नहीं हैऐसे में कमलनाथ के गृह क्षेत्र छिंदवाड़ा में किसान की आत्महत्या ने सरकार की धोखाधड़ी की पोल खोल दी हैकर्ज माफ़ी हुई है और स्थिति पहले से बेहतर है तो आत्महत्याएं क्यों नहीं रुक रही हैअपने आप को किसानप्रेमी सरकार की उपाधि देने वालेसत्ता संभालते ही युरियां खा गये और युरियां मांगने गये किसान को डंडे दिखाये गयेदुकान के पीछे से दुगुना-तिगुना दाम देकर युरियां कुछ किसानों को नसीब हुई हैयह काण्ड मीडिया के माध्यम से लोगों ने देखा है और भुलाया भी नहीं हैदबे-कुचले वर्ग जो कल तक कांग्रेस की हवाहवाई वादे पर मोहीत थेआज वही लोग भड़के हुए हैऐसा इसलिए क्योकि हाल में सीबीआई के छापे में जप्त 281 करोड़ की अवैध सम्पति ने प्रदेश की सरकार को कलंकित किया हैसरकार इस कदम से इतना बौखलाये हुये है कि रोज अखबार में खबर छपती है अधिकारीयों को देखेंगे’, कोई कहता है जूता साफ करवाएंगे’ और तो और सरकार ने पार्टी के सदस्यों से ऐसे अधिकारी का लिस्ट भी तैयार करने को कहा है, चुनाव के बाद इनसे निपटा जायेंगाजनता मौन रूप धारण किये समय के इन्जार में है या कमलनाथ पर भरोसा करके शांत है यह तो वक्त जानता हैफिलहाल तो माहौल तीन महीने की रिपोर्ट से असंतुष्ट और भड़की दिखाती है|
यह तो बात किसानयुवा और मजदूर की हैकर्मचारीअफसरशिक्षक और प्रोफेसर के साथ एक बहुत बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग ने सरकार के रवैये से नाराजगी जाहिर की हैउनका कहना है कि कमलनाथ ने प्रदेश की स्थति (गरीबीकिसानीरोजगारसुरक्षाशिक्षा और अपने संकल्प पत्रसे मुंह मोड़ लिया हैबदले की राजनीति में हाथ धोकर पड़े हुये है प्रदेश में अपने से विपरीत विचार के विरुद्ध सामदामदंड और भेद किसी भी तरीके से उसे समाप्त करना ही अपना लक्ष्य मान लिया है| प्रशासनिक अधिकारीयों के स्थानांतरण के ताबतोड़ निर्णय के साथ तमाम शैक्षणिक संस्थानों के साथ ही माखनलाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी में सरकार के द्वारा और मुख्यमंत्री के इशारे पर जो कुछ बीते महीने हुआ है वह बेहद ओछी और नीचता कर प्रमाण हैप्रदेश सरकार को सोचना चाहिए माखनलाल यूनिवर्सिटी पुरे भारत में ही नहीं समूचे एशियाई देशों में अपने योग्यता से लोकप्रियता और पहचान हासिल की हैऐसे संस्थानों में इस प्रकार की राजनीतिक उथल-पुथल अशोभनीय है| प्रदेश और देश की जनता इसे ठीक नहीं मानती है कि कोई दल अपने सत्ता के में मद में शिक्षण संस्थाओं को भंडोल करेपूर्व की सरकार के खामियों की वजह से कुछ अवगुण उत्पन्न हुए है या भ्रष्टाचार के ही मामले प्रकाश में आये है तो वैधानिक जाँच होनी चाहिए ऐसे प्रतिशोध की भावना से जल्दीबाजी में नहींमाखनलाल यूनिवर्सिटी प्रदेश की शान है ऐसे में इसे कलंकित करने जो प्रयास वर्तमान की कमलनाथ सरकार ने की है| इससे बुद्धिजीवियों में ठीक सन्देश नहीं पहुंचा हैबातचीत में एक विद्वान ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र में सत्ता में विराजमान पार्टी को भी भारतीय संविधान की निहित प्रक्रियाओं का अनुकरण कारण पड़ता हैउन्होंने उदाहरण देते हुये कहा कि एक न्यायधीश किसी व्यक्ति को हत्या करते हुये भी देखता हैफिर भी उसे सीधा फंसी की सजा नहीं सुना सकता हैजज को संविधान में निहित प्रक्रियाओं और आरोपी पक्ष के वकील और स्वयं आरोपी के बयान को सुनना होगा और संपूर्ण प्रक्रियाओं की सत्यता के बाद ही निर्णय लेने के कर्तव्य न्यायधीश को हैफिर दो दिन की कमलनाथ सरकार ने कौन-सी संवैधानिक नैतिकता का पालन करके 20 विद्वानों की नियुक्ति रद्द की है और माननीय कुलपति के पद को अपमानित किया है| इसका जवाब कमलनाथ को देना होंगा| अंत में उन्होंने कि तत्काल मुख्यमंत्री क्षमा मांगे और विद्वानों की नियुक्ति करे| अपने घोषणा और वादे को पूरा करे; ना की सत्ता के मद में तानाशाही और अराजकता उत्पन्न करे| जो बीते दिनों गैर-जिम्मेदाराना और बदले की भावना से कमलनाथ सरकार ने कार्य किये है इससे आम जनता काफी नाराज है ऐसे में अब तक की रिपोर्ट से लगता है इस बार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में भारी गिरावट के पूर्वानुमान है 


गुरुवार, 2 मई 2019

दो सांस्कृतिक नदियाँ शंखिनी-डंकिनी के हत्यारे थे दिग्गी

दिग्विजय के लिए इमेज परिणाम
शंखिनी नदी का उद्गम दंतेवाडा के नंदिराज शिखर के बैलाडीला से है इसे छत्तीसगढ़ की सर्वाधिक प्रदूषित नदी माना जाता है दंतेवाडा में यह नदी डंकिनी नदी में मिल जाती है  डंकिनी-शंखिनी के संगम पर प्रशिद्ध दंतेश्वरी मंदिर स्थित है महान मंत्रदृष्टा ऋषि अगस्त्य ने दक्षिण की अपनी यात्रा के दौरान दो नदियों को पार किया था इन नदियों को मां के रूप में प्रतिष्ठित किया गया यह नदियाँ स्थानीय समाज में वर्षों से मां गंगा जितनी ही पूजनीय थी इन नदियों को शंखिनी और डंकिनी के नाम से जाना जाता था  ललिता सहस्त्रनामम ( देवी की 1000 स्तुतियों) में देवी मां को शंखीनिंबा स्वरूपिणी कहा जाता है ( अर्थात वह जो शंखनी का रूप धारण करती है) और डंकिनीश्वरी (  अर्थात वह जो डंकिनी नदी का ही देवी स्वरूप है) यह दोनों नदियां छत्तीसगढ़ में बहती थी और वहां के स्थानीय समुदायों के लिए ना सिर्फ पानी की आपूर्ति का महत्वपूर्ण स्रोत थी बल्कि उनकी आजीविका के तमाम संसाधन भी इन्हीं नदियों से जुड़े थे
बात दिग्विजय सिंह के दुसरे कार्यकाल है जब वो अविभाजित मध्यप्रेश (छत्तीसगढ़ सहित) के मुख्यमंत्री थे उस वकत केंद्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों के तहत आने वाले नेशनल मिनिरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएमडीसी) ने इस इलाके में खनन से जुड़ी गतिविधियां शुरू की थी  इन्हें बैलाडीला लौह अयस्क खदान, बछेली, किरनदुल और द्रोणिमलै की खदान के नाम से जाना जाता है इन खदानों से बड़े पैमाने पर निकलने वाले मलबे को नदी के किनारे पर फेंका जाता रहा इस पूरे प्रोजेक्ट को तात्कालिक मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह (2001-02) की मंजूरी हासिल थी  बतौर मुख्यमंत्री इस राजनेता ने नदियों को बचाने के लिए कोई भी कदम नहीं उठाया था खदानों से निकले विषैले तत्वों की वजह से इन नदियों का पानी धीरे-धीरे जहरीला होता गया स्थानीय निवासियों ने इसे लेकर काफी विरोध प्रदर्शन किया लेकिन राज्य सरकार में उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई जिसके बाद शांत विद्रोह प्रदर्शन हिंसक विद्रोह में तब्दील हो गए और इनकी तापिश आज भी इस इलाके को झुलसा  रही है 
 मौरीन नंदिनी मिश्रा, डाउन अर्थ सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट स्टडी ने 31 दिसंबर 2006 को रिपोर्ट लिखी 
छत्तीसगढ़ में बहने वाली शंखिनी और डंकिनी नदी प्रदूषण की वजह से दम तोड़ रही है स्थिति को सुधारने के लिए कागजों में योजनाएं बनी लेकिन उसमें एक भी अंजाम तक नहीं पहुंची 2010 में केंद्र सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रकोष्ठ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा खदानों के अंधाधुंध दोहन और उससे निकलने वाली जहरीले तत्व और अपशिष्ट पदार्थों को नदियों में बहाने की वजह से यह नदियां बुरी तरह प्रभावित हुई है यही नहीं इनके पानी का उपयोग करने की वजह से बैलाडीला के आसपास की 15000 हेक्टेयर से भी ज्यादा कृषि और वन भूमि भी बर्बाद हो गई है
 इलाके के तकरीबन एक सौ गांवों के लोग अपने रोजमर्रा के जीवन में इन्हीं प्रदूषित और जहरीली हो चुकी शंखिनी-डंकिनी नदी के पानी का इस्तेमाल करते हैं 4 साल बाद तत्कालीन छत्तीसगढ़ सरकार ने माना कि शंखिनी डंकिनी नदियों के बहाव क्षेत्र में आने वाले 65 गांव पानी के पूरी तरह प्रदूषित होने की वजह से प्रभावित है यही नहीं सरकार के एसएमडीसी (नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन) को आदेश दिया कि वह गांव में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए 200 कुएं खोदे आदेशानुसार काम चलाऊ कुएँ खोदे दिए गए लेकिन किसी भी कुएं को मानक के मुताबिक नहीं खोदा गया लिहाजा वर्तमान में इन में एक भी  कुऐ काम के लायक नहीं बचा है जाहिर सी बात है अधिकारियों में पेयजल को लेकर जरा भी चिंता नहीं थी
 तमाम दूसरे आंदोलन की तरह इन बेचारे गांव वालों के लिए एक भी मेघा पाटकर, अरुंधति, अरुणा राय, प्रिया पिल्लई या हर्ष मंदार सामने नहीं आये इसी तरह दूसरे मानवाधिकार समाजवादी कार्यकर्ता और वकील इन गरीबों की मदद के लिए उनकी आवाज नहीं बने नहीं इन को किसी तरह की फंडिंग ही मिल सकी जाहिर तौर पर ऐसा करने से इनकी रोजी-रोटी जो खतरे में पड़ जाती भाड़ में जाये लोगों की जिंदगी भाड़ में जाए मानवाधिकार अपने को तो रोटी सेंकनी है वह भी सेकुलर रोटी
 छत्तीसगढ़ के इस इलाके में नक्सल समस्या को और गंभीर बनाने में मनमाने तरीके से चलाएंगे इस प्रोजेक्ट का बड़ा हाथ है शिक्षाविद बेला भाटिया भी नक्सल प्रभावित इलाके में सक्रिय मानवाधिकार कार्यकर्ता में से एक हैं बेला प्रदेश और केंद्र की सरकार (दोनों जगहों पर भाजपा का काबिज थी) पर अपने तीखे हमले और आक्षेपों के लिए जानी जाती है बेला का तर्क है कि मानव अधिकारों के हनन और लोगों के शोषण की वजह से छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद जैसी समस्याओं के लिए मुफीद जमीन तैयार हुई बेला के पति ज्यां पाँल द्रेज यूपीए सरकार के वक्त राष्ट्रीय सलाहकार समिति के सदस्य रह चुके हैं इस समिति को काफी प्रभावशाली माना जाता है लेकिन अपनी पत्नी के इस तर्क के बावजूद उन्होंने इस दिशा में कुछ भी नहीं किया दिग्गी राज में कैसे दो सांस्कृतिक नदियाँ बर्बाद हो गई  कैसे वहां के लोगों की कृषि भूमि ही नहीं बल्कि रोजी-रोटी के साधन छीन गए कैसे लोगों को नदियों के जहरीले पानी का उपयोग करने से कई संक्रमण रोग हुए और आज भी जन्मजात उनसे पीढ़ियों में फ़ैल रहे है 
सवाल उठता है दोनों नदियाँ डंकिनी-शंखिनी को उस समाय की शासन जिसके मुखियां दिग्विजय सिंह थे क्यों नहीं बचाया कही इसलिए तो नहीं की दोनों नदियाँ का इतिहास रामायण काल से जुड़ा है और दिग्विजय ऐसा करते तो उन्होंने जो हिन्दू धर्म से तटस्थता की थी भंग हो जाती देश के सेकुलर नेता उनसे नाराज हो जाते सेकुलरों की सभा में उनकी फजीयत होती दिग्गी के खुद को सेकुलर साबित करने की कीमत ने दो एतिहासिक सांस्कृतिक और छत्तीसगढ़ के बैलाडीला से निकालने वाली गंगा रूपी नदियों को जहरीला किया है गरीबों से पानी तक छीन लिया उनको प्रदूषित जल पानी पीकर मरने के लिए छोड़ दिया कृषिभूमि नष्ट की आर्थिक बाजार ध्वस्त किया और ऐसे वहां की गरीबी शैन: शैन: दिग्विजय की शासन में दूर हुई क्या विकास मॉडल था 

रविवार, 28 अप्रैल 2019

कहानी महिलाओं के सम्मान और कांग्रेस के कुख्यात विख्यात नेतागण की

जितेश कुमार 
कांग्रेस पार्टी महिलाओं को कितना सम्मान देती है इसका प्रमाण कुछ दिन पहले मथुरा की सभा में पूर्व कांग्रेस की प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी के साथ की गई उत्कृष्ट व्यावहारिकता से झलकता है दरअसल कांग्रेस कार्यकर्ताओं के अभद्र व्यवहार और उनके खिलाफ पार्टी की ओर से उचित कार्रवाई नहीं किए जाने से नाराज प्रियंका चतुर्वेदी ने कांग्रेस से रिश्ता तोड़ दिया था यह कोई पहली घटना कांग्रेस पार्टी की नहीं है ऐसी घटनायें और अभद्र टिप्पणियों की तो एक लम्बी लिस्ट तैयार है कांग्रेस की महासचिव प्रियंका वाड्रा तक कांग्रेसी
कार्यकर्त्ताअों की अभद्रता की शिकार झेल चुकी है इतना ही नहीं कांग्रस दफ्तर में काम कर रही एक लड़की ने अपने साथ छेड़छाड़  के आरोप लगाये और राहुल गाँधी को पत्र लिखीं, इसके बावजूद राहुल गाँधी चुपी साधे थे इसके बाद लड़की ने पुलिस से गुहार लगाई और बाद में दोषी को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया महिलाओं के प्रति संवेदनहीनता के कई उदहारण प्रकाश में आये है इसके साथ महिलाओं के साथ बलात्कार की भी कई घटना के आरोप में कोंग्रेस के नेताओं पर उंगली उठाये गए है ऐसे में एक बड़ा सवाल है कांग्रेस सरकार में महिलाओं की सुरक्षा कौन करेगा? महिलाओं को अवसर कौन देगा  मध्यप्रदश के मुख्यमंत्री महिलाओं को सजावटी सामान कहते है तो पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह अपने ही सांसद मीनाक्षी नटराजन को टंच माल कहते है     
राहुल गाँधी ने  10 अक्तूबर 2017 को गुजरात के वड़ोदरा में आरएसएस को घेरने के प्रयास में मंच से अमर्यादित बयान दिया था राहुल गाँधी ने संघ पर आरोप लगते हुए कहा कि क्या संघ की शाखाओं में महिलाएं छोटे कपड़े (शांर्ट्स) पहने दिखती है इस बयान पर देश भर की कई महिलाओं ने आपत्ति जताई थी दूसरी घटना  मुंबई 15 अप्रैल 2018 की है कठुआ और उन्नाव बलात्कार के विरोध में कैंडल मार्च निकला गया था इसमें राहुल गाँधी भी मौजूद थे इस मार्च में कांग्रेस के कार्यकर्त्ताओं ने आज तक के रिपोटर मौसमी सिंह के साथ बदसलूकी की| मौसमी सिंह ने रो-रोकर अपने साथ हुये बदसलूकी की जानकारी दी राहुल गाँधी से लिखित शिकायत की| इसके बावजूद राहुल गाँधी चुप थे प्रियंका चतुर्वदी के मामले में भी राहुल गाँधी चुप रहे यह घटनाएँ राहुल गाँधी की ओछी सोच को प्रकट करता है 
दिग्विजय सिंह घटना 27 जुलाई 2013  को इंदौर की एक सभा में अपने ही दल के सांसद मीनाक्षी नटराजन को टंच माल कह कर संबोधित करते है दिग्वियज की दूसरी शादी अमृता राय से हुई है, इसे लेकर भी कई सवाल राजनीति-पत्रकारिता के गलियारों में विचरण करते रहते है कई पत्रकारों ने पुर्व के अखबारों में यहाँ तक लिखा है कि अमृता राय की पहली पति का नाम आनंद राय था शादी के बावजूद दिग्गी का अमृता राय से मिलना जुलना था बात जब मीडिया तक पहुंची तो अमृता राय ने अपने पहले पति से तलाक लेकर दिग्विजय से शादी की| 
कमलनाथ मुख्यमंत्री मप्र ने हाल में विधानसभा चुनाव में महिलाओं को सजावटी सामान कहा था विरोध के बावजूद वो अपने कथनी पर अड़े रहे   
शशि थरूर अपने एक ट्विट के जरिये छिल्लर के मिस वर्ल्ड बनने पर उन्हें चिल्लर कह कर मजाक उड़ाया था थरूर ने 19 नवंबर, 2017 को ट्विट कर लिखा, ‘हमारी मुद्रा का विमुद्रीकरण करना कितनी बड़ी भूल थी! बीजेपी को इस बात का अहसास होना चाहिए कि भारतीय मुद्रा का विश्व भर में वर्चस्व है, देखिए हमारी चिल्लर भी मिस वर्ल्ड बन गई है आपको बात दे की शशि थरूर पर अपने ही पत्नी सुनंदा पुष्कर को मारने का आरोप भी न्यायलय में चल रहा है 
अभिजित मुखर्जी कांग्रेस पार्टी के युवा नेता भी है और कांग्रेस के सांसद और पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी  के बेटे भी 28 दिसम्बर 2012 को दिल्ली निर्भया कांड के बाद महिला प्रदर्शनकारियों का मजाक उड़ाते हुए कहा था ये महिलाएं अब प्रदर्शन कर रही है और रात को मेकअप पोतकर पब जाएँगी हालाकिं इस पर उनकी बहन शर्मिष्ठा मुखर्जी ने ही आपत्ति जताई थी इसके बाद इन्होने माफ़ी मांगी 
दामोदर राउत पूर्व मंत्री रह चुके कांग्रेस पार्टी के दामोदर राउत ने अपने ही दल के प्रवक्ता सुलोचना दास पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा था कि मुझे पता है किसे खुश करके आप कांग्रेस की प्रवक्ता बनी हैं 
संजय निरुपम मुंबई से कांग्रेस के जानेमाने नेता है इन्होने केन्द्रीय मंत्री स्मृति रानी को पैसे के लिए ठुमके लगाने वाली कहा था
रेणुका चौधरी बुलंदशहर में एक एक टीवी बहस के दौरान रेप जैसे जघन्य अपराध पर कहा था कि 'रेप इज कॉमन' आपको पता हो की देश के पीएम नरेन्द्र मोदी भी लोकसभा में जब भाषण दे रहे थे तो भाषण को बाधित करने के लिए जोर-जोर से ठहाका लगाकर हंस रही थी कई बार लोकसभा स्पीकर के कहने पर भी नहीं मानी तो प्रधानमंत्री ने इनको ताड़का कह दिया था जिसके बाद टीवी शो में खूब विवाद हुआ
राजाराम पाल कांग्रेस पार्टी के यूपी के प्रदेश उपाध्यक्ष है ने 4 नवंबर 2016 को मीडिया से मुखातिब होते कहा "पार्टी में दलित महिलाओं से कोई भेदभाव नहीं किया जाता है महिलाओं को हमारे घर के अन्दर ही नहीं, बेडरूम तक आने की इजाजत है यहाँ ऐसी कोई महिला नहीं है, जो हमारे बेडरूम तक न आई हो"   
सुभाष चौधरी हरियाणा कांग्रेस के उपाध्यक्ष है महानुभाव पर अक्टूबर2017 में दिल्ली के तुगलक रोड पुलिस स्टेशन पर रेप का मामला दर्ज है इस मामले पर भी राहुल गाँधी ने चुप्पी साध ली तब राहुल कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थे
वीरभद्र सिंह हिमाचल प्रदेश के जघन्य गुड़िया रेप कांड पर बयान देते हुए कहा कि ऐसा कोई देश प्रदेश नहीं जहाँ अपराध नहीं होता है 
अहमद पटेल गुजरात कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे अहमद पटेल पर 2005 में शिकायत दर्ज है सेना की अफसर की पत्नी सुनीता सिंह ने पटेल पर बलात्कार के मामले दर्ज कराये है पीड़िता का कहना था कि वह पति की पिटाई से परेशान होकर घर से भाग गई और दिल्ली महिला आयोग में न्याय की गुहार लगाने आई थी राष्ट्रीय महिला आयोग ने उसे नारी निकेतन भेज दिया जहाँ आयोग की सदस्य यास्मीन अवरार उसे अपने साथ घर ले गई इसी के घर में कांगेस नेता अहमद पटेल ने उनके साथ बलात्कार किया 
शादीलाल बन्ना हरियाणा से कांग्रेस पार्टी से राज्यसभा सांसद  27 सितंबर, 2016 दिल्ली में इनके  खिलाफ रेप का यह मामला दर्ज किया गया पीड़ित महिला पेशे से वकील है
एम विंसेंट केरल से कांग्रेस पार्टी के टिकट से जीते विधायक है इन पर 51 वर्षीय महिला के रेप और आत्महत्या के लिए उसकाने का आरोप है इस आरोप में केरल पुलिस ने इनको गिरफ्तार भी किया है
हेमंत कटारे मप्र से कांग्रेस के विधायक के खिलाफ 2 फरवरी 2018 को अपहरण और दुष्कर्म के दो अलग-अलग मामले दर्ज है कटारे के खिलाफ एक महिला और उसकी बेटी प्रयांशु सिंह द्वारा दो पुलिस थानों में केस दर्ज है
ब्रजेश पांडे बिहार कांगेस के प्रदेश उपाध्यक्ष ब्रजेश पांडे पर एक नाबालिग ने यौन शोषण का आरोप लगाया, जिसके बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था
फारुख चिश्ती, नफीस चिश्ती और अनवर चिश्ती यूथ कांग्रेस अजमेर से फारुख चिश्ती अध्यक्ष, नफीस चिश्ती उपाध्यक्ष और अनवर चिश्ती संयुक्त सचिव थे 26 साल बाद आरोप दर्ज हुआ आरोप है कि इन तीनों दरिन्दे ने मिलकर स्कूल जाते सैकड़ों हिन्दू बच्चियों का यौनशोषण किया है मामला उजागर होने के बाद 8 बच्चियों ने आत्महत्या कर ली
अभिषेक मनु सिंघवी 2012 में सेक्स सीडी कांड पहली बार सामने आया था सिंघवी एक महिला वकील से शारीरिक संबंध बनाते हुए दिखाई दे रहे थे साथ ही संघवी महिला को वकील को कह रहे थे कि वे उसे जज बना देंगे 
बाबूलाल नागर 2013 राजस्थान से कांग्रेस के पूर्व मंत्री रहे बाबूलाल पर 35 वर्षीय महिला ने यौन शोषण का आरोप लगया महिला ने कहा कि बाबूलाल नागर सरकारी नौकरी देने नाम पर साझा देकर संबंध बनाये थे 
गोपाल कांडा हरियाणा से कांग्रेस पार्टी के मंत्री रहे कांडा पर 2012 में गीतिका गोपाल शर्मा जो कांडा के MLDR एयरलाइन्स में कार्यरत थी ने बलात्कार के आरोप लगाने के बाद 5 अगस्त 2012 को आत्महत्या कर ली 
नारायण दत्त तिवारी कांग्रेस नेता जिनका राजभवन में ही तीन महिलाओं के साथ सेक्स का वीडियो एक तेलगू चौनल ने ब्रॉडकास्ट कर दिया इससे बाद उन्हें राज्यपाल का पद छोड़ना पड़ा नारायण दत्त तिवारी के खिलाफ एक शख्स ने पिता होने का दावा किया था, जो बाद में DNA टेस्ट में न्यायलय ने सही माना और उन्हें उसे पुत्र मानना पड़ा था 
मदरेणा जी कांग्रेस नेता जिन पर भंवरी देवी के अपहरण, बलात्कार और हत्या करने का आरोप लगा 
ऐसे अनेकों प्रकरण जानकारी में आये है, पुष्टि और प्रकाशन आगे .. 








  

कांग्रेस की निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में भारी गिरावट के पूर्वानुमान

भविष्य में क्या होंगी, मैं नहीं जनता हूँ |  इस दौर में बहुत लोग अभिव्यक्ति की आजादी का अलाप जप रहे है |  तो मुझे भी संविधान के धारा  19  क...