शंखिनी नदी का उद्गम दंतेवाडा के नंदिराज शिखर के बैलाडीला से है इसे छत्तीसगढ़ की सर्वाधिक प्रदूषित नदी माना जाता है दंतेवाडा में यह नदी डंकिनी नदी में मिल जाती है डंकिनी-शंखिनी के संगम पर प्रशिद्ध दंतेश्वरी मंदिर स्थित है महान मंत्रदृष्टा ऋषि अगस्त्य ने दक्षिण की अपनी यात्रा के दौरान दो नदियों को पार किया था इन नदियों को मां के रूप में प्रतिष्ठित किया गया यह नदियाँ स्थानीय समाज में वर्षों से मां गंगा जितनी ही पूजनीय थी इन नदियों को शंखिनी और डंकिनी के नाम से जाना जाता था ललिता सहस्त्रनामम ( देवी की 1000 स्तुतियों) में देवी मां को शंखीनिंबा स्वरूपिणी कहा जाता है ( अर्थात वह जो शंखनी का रूप धारण करती है) और डंकिनीश्वरी ( अर्थात वह जो डंकिनी नदी का ही देवी स्वरूप है) यह दोनों नदियां छत्तीसगढ़ में बहती थी और वहां के स्थानीय समुदायों के लिए ना सिर्फ पानी की आपूर्ति का महत्वपूर्ण स्रोत थी बल्कि उनकी आजीविका के तमाम संसाधन भी इन्हीं नदियों से जुड़े थे
बात दिग्विजय सिंह के दुसरे कार्यकाल है जब वो अविभाजित मध्यप्रेश (छत्तीसगढ़ सहित) के मुख्यमंत्री थे उस वकत केंद्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों के तहत आने वाले नेशनल मिनिरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएमडीसी) ने इस इलाके में खनन से जुड़ी गतिविधियां शुरू की थी इन्हें बैलाडीला लौह अयस्क खदान, बछेली, किरनदुल और द्रोणिमलै की खदान के नाम से जाना जाता है इन खदानों से बड़े पैमाने पर निकलने वाले मलबे को नदी के किनारे पर फेंका जाता रहा इस पूरे प्रोजेक्ट को तात्कालिक मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह (2001-02) की मंजूरी हासिल थी बतौर मुख्यमंत्री इस राजनेता ने नदियों को बचाने के लिए कोई भी कदम नहीं उठाया था खदानों से निकले विषैले तत्वों की वजह से इन नदियों का पानी धीरे-धीरे जहरीला होता गया स्थानीय निवासियों ने इसे लेकर काफी विरोध प्रदर्शन किया लेकिन राज्य सरकार में उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई जिसके बाद शांत विद्रोह प्रदर्शन हिंसक विद्रोह में तब्दील हो गए और इनकी तापिश आज भी इस इलाके को झुलसा रही है
बात दिग्विजय सिंह के दुसरे कार्यकाल है जब वो अविभाजित मध्यप्रेश (छत्तीसगढ़ सहित) के मुख्यमंत्री थे उस वकत केंद्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों के तहत आने वाले नेशनल मिनिरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएमडीसी) ने इस इलाके में खनन से जुड़ी गतिविधियां शुरू की थी इन्हें बैलाडीला लौह अयस्क खदान, बछेली, किरनदुल और द्रोणिमलै की खदान के नाम से जाना जाता है इन खदानों से बड़े पैमाने पर निकलने वाले मलबे को नदी के किनारे पर फेंका जाता रहा इस पूरे प्रोजेक्ट को तात्कालिक मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह (2001-02) की मंजूरी हासिल थी बतौर मुख्यमंत्री इस राजनेता ने नदियों को बचाने के लिए कोई भी कदम नहीं उठाया था खदानों से निकले विषैले तत्वों की वजह से इन नदियों का पानी धीरे-धीरे जहरीला होता गया स्थानीय निवासियों ने इसे लेकर काफी विरोध प्रदर्शन किया लेकिन राज्य सरकार में उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई जिसके बाद शांत विद्रोह प्रदर्शन हिंसक विद्रोह में तब्दील हो गए और इनकी तापिश आज भी इस इलाके को झुलसा रही है
मौरीन नंदिनी मिश्रा, डाउन अर्थ सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट स्टडी ने 31 दिसंबर 2006 को रिपोर्ट लिखी
छत्तीसगढ़ में बहने वाली शंखिनी और डंकिनी नदी प्रदूषण की वजह से दम तोड़ रही है स्थिति को सुधारने के लिए कागजों में योजनाएं बनी लेकिन उसमें एक भी अंजाम तक नहीं पहुंची 2010 में केंद्र सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रकोष्ठ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा खदानों के अंधाधुंध दोहन और उससे निकलने वाली जहरीले तत्व और अपशिष्ट पदार्थों को नदियों में बहाने की वजह से यह नदियां बुरी तरह प्रभावित हुई है यही नहीं इनके पानी का उपयोग करने की वजह से बैलाडीला के आसपास की 15000 हेक्टेयर से भी ज्यादा कृषि और वन भूमि भी बर्बाद हो गई है
इलाके के तकरीबन एक सौ गांवों के लोग अपने रोजमर्रा के जीवन में इन्हीं प्रदूषित और जहरीली हो चुकी शंखिनी-डंकिनी नदी के पानी का इस्तेमाल करते हैं 4 साल बाद तत्कालीन छत्तीसगढ़ सरकार ने माना कि शंखिनी डंकिनी नदियों के बहाव क्षेत्र में आने वाले 65 गांव पानी के पूरी तरह प्रदूषित होने की वजह से प्रभावित है यही नहीं सरकार के एसएमडीसी (नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन) को आदेश दिया कि वह गांव में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए 200 कुएं खोदे आदेशानुसार काम चलाऊ कुएँ खोदे दिए गए लेकिन किसी भी कुएं को मानक के मुताबिक नहीं खोदा गया लिहाजा वर्तमान में इन में एक भी कुऐ काम के लायक नहीं बचा है जाहिर सी बात है अधिकारियों में पेयजल को लेकर जरा भी चिंता नहीं थी
तमाम दूसरे आंदोलन की तरह इन बेचारे गांव वालों के लिए एक भी मेघा पाटकर, अरुंधति, अरुणा राय, प्रिया पिल्लई या हर्ष मंदार सामने नहीं आये इसी तरह दूसरे मानवाधिकार समाजवादी कार्यकर्ता और वकील इन गरीबों की मदद के लिए उनकी आवाज नहीं बने नहीं इन को किसी तरह की फंडिंग ही मिल सकी जाहिर तौर पर ऐसा करने से इनकी रोजी-रोटी जो खतरे में पड़ जाती भाड़ में जाये लोगों की जिंदगी भाड़ में जाए मानवाधिकार अपने को तो रोटी सेंकनी है वह भी सेकुलर रोटी
छत्तीसगढ़ के इस इलाके में नक्सल समस्या को और गंभीर बनाने में मनमाने तरीके से चलाएंगे इस प्रोजेक्ट का बड़ा हाथ है शिक्षाविद बेला भाटिया भी नक्सल प्रभावित इलाके में सक्रिय मानवाधिकार कार्यकर्ता में से एक हैं बेला प्रदेश और केंद्र की सरकार (दोनों जगहों पर भाजपा का काबिज थी) पर अपने तीखे हमले और आक्षेपों के लिए जानी जाती है बेला का तर्क है कि मानव अधिकारों के हनन और लोगों के शोषण की वजह से छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद जैसी समस्याओं के लिए मुफीद जमीन तैयार हुई बेला के पति ज्यां पाँल द्रेज यूपीए सरकार के वक्त राष्ट्रीय सलाहकार समिति के सदस्य रह चुके हैं इस समिति को काफी प्रभावशाली माना जाता है लेकिन अपनी पत्नी के इस तर्क के बावजूद उन्होंने इस दिशा में कुछ भी नहीं किया दिग्गी राज में कैसे दो सांस्कृतिक नदियाँ बर्बाद हो गई कैसे वहां के लोगों की कृषि भूमि ही नहीं बल्कि रोजी-रोटी के साधन छीन गए कैसे लोगों को नदियों के जहरीले पानी का उपयोग करने से कई संक्रमण रोग हुए और आज भी जन्मजात उनसे पीढ़ियों में फ़ैल रहे है
सवाल उठता है दोनों नदियाँ डंकिनी-शंखिनी को उस समाय की शासन जिसके मुखियां दिग्विजय सिंह थे क्यों नहीं बचाया कही इसलिए तो नहीं की दोनों नदियाँ का इतिहास रामायण काल से जुड़ा है और दिग्विजय ऐसा करते तो उन्होंने जो हिन्दू धर्म से तटस्थता की थी भंग हो जाती देश के सेकुलर नेता उनसे नाराज हो जाते सेकुलरों की सभा में उनकी फजीयत होती दिग्गी के खुद को सेकुलर साबित करने की कीमत ने दो एतिहासिक सांस्कृतिक और छत्तीसगढ़ के बैलाडीला से निकालने वाली गंगा रूपी नदियों को जहरीला किया है गरीबों से पानी तक छीन लिया उनको प्रदूषित जल पानी पीकर मरने के लिए छोड़ दिया कृषिभूमि नष्ट की आर्थिक बाजार ध्वस्त किया और ऐसे वहां की गरीबी शैन: शैन: दिग्विजय की शासन में दूर हुई क्या विकास मॉडल था
सवाल उठता है दोनों नदियाँ डंकिनी-शंखिनी को उस समाय की शासन जिसके मुखियां दिग्विजय सिंह थे क्यों नहीं बचाया कही इसलिए तो नहीं की दोनों नदियाँ का इतिहास रामायण काल से जुड़ा है और दिग्विजय ऐसा करते तो उन्होंने जो हिन्दू धर्म से तटस्थता की थी भंग हो जाती देश के सेकुलर नेता उनसे नाराज हो जाते सेकुलरों की सभा में उनकी फजीयत होती दिग्गी के खुद को सेकुलर साबित करने की कीमत ने दो एतिहासिक सांस्कृतिक और छत्तीसगढ़ के बैलाडीला से निकालने वाली गंगा रूपी नदियों को जहरीला किया है गरीबों से पानी तक छीन लिया उनको प्रदूषित जल पानी पीकर मरने के लिए छोड़ दिया कृषिभूमि नष्ट की आर्थिक बाजार ध्वस्त किया और ऐसे वहां की गरीबी शैन: शैन: दिग्विजय की शासन में दूर हुई क्या विकास मॉडल था
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