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मंगलवार, 11 मई 2021

आप हिन्दू मुस्लिम राजनीति करते है?

जवाब मेरे सलाह से आपको कुरान शरीफ पढ़ना चाहिए क्यों कि हिन्दू-मुस्लिम विवाद BJP के जन्म से पहले से है। और अधिक भयावह भी, वीभत्स भी। 
इस्लाम जबतक अपने मूल ग्रंथ कुरान में परिवर्तन नहीं करता तब तक वह ऐसे ही दुनिया से लड़ता रहेगा, इसलिए इंसानी जिंदगी की कीमत है तो कुरान से वह सब आयतों को हटाया जाये, जो केवल ख़ुदा को मानने वाले को ही जन्नत नशीब होता है यह कहता है और सभी धर्म के भगवान को शैतान मानता है, उनके पुजक को काफ़िर कहता है और इन काफिरों की हत्या से जन्नत नशीब होता है यह मानता है। पहले ऐसे विचार को खत्म करना होगा  हमने धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता मानवता और  विज्ञानवाद के लिए भी। उन आयतों को बदलने की मांग को जोड़ शोर से बोलना होगा जिसे वसीम रिजवी ने कुछ दिन पहले कहा है? 
हम हिन्दूओं की सोच संकीर्ण है या हिन्दू हृदय ऐसा ही रहा अबोध अविवेकी, भविष्यहीन। जो सिर्फ लालच पैसा और मोह में फंसा है, क्या किसी मुस्लिम को देखे है, देश के तरक्की रोजगार शिक्षा के लिए वोट करते? नहीं! वो सिर्फ उनके साथ है, जो उनको अल तकिया जिहाद करने देते है, लव जिहाद करने देते है, लैंड जिहाद करने देते है

और शरिया कानून के नाम पर औरतों को तीन तलाक , चार विवियाँ और चौदह बच्चे पैदा करने देते है। 
हम हिन्दू वास्तविक जानकारी से परे अविवेकी कुतर्क से घेरे है और अपने आप का पीठ थपथपा रहा है कि हम हिन्दू मुस्लिम राजनीति में नहीं पड़ते है बुद्धिजीवी है। हमने देश की तरक्की रोजगार से मतलब है अरे भाई यह देश रहेगा तो मरेगा कौन! और यह देश मिटेगा तो बचेगा कौन! इतनी मामूली सी बात नहीं समझ आती है। आपकी शक्ति क्या है, जिसके बल पर हम वो सब पा सकते है जिसकी हमने जरूरत है, क्या वो केवल शिक्षा है? रोजगार है?  बहुत सारे पैसे है? नहीं! वो हमारा देश है। जब तक यह सुरक्षित है, वो सबकुछ हम अपने बलबूते खड़ा कर सकते है, जिसकी हमने कभी कल्पना की थी। इस देश के प्रत्येक हिन्दू को इस राष्ट्र की सुरक्षा किन हाथो में है ऐसे लोगों का पक्षघर बनाता चाहिए। इतिहास में की भूल से सीखकर वतर्मान और भविष्य ठीक करना चाहिए। 
लेकिन सिर्फ नौकरी और मंहगाई के नाम जब हम निर्णय लेते हैं? और वर्तमान समस्या को केवल हिन्दू मुस्लिम की राजनीति कहकर पल्ले झड़ते है और बडी बडी बाते छोड़ते है तो इस दशा को देखकर गुस्सा कम और उन हिंदुओं पर तरस अधिक आता है। उनकी भी यह मनोदशा तब तक है जब तक उनके यहाँ मुस्लिम 70 प्रतिशत नहीं होते है, होते ही मेरी बाते यथार्थ और परम् सत्य नजर आएगा। किंतु तब आप कश्मीरी हिन्दू की तरह बहन बेटियों को उनके हवाले छोड़कर भागने या बलिदान होने के अलावे कुछ नहीं कर सकते। यही बात पाकिस्तान के प्रथम कानून मंत्री योगेंद्र मंडल तब नहीं समझे थे और लाखों दलितों को पाकिस्तान में छोड़कर बंगाल में शरण लेकर रहे और गुमनाम मौत को स्वीकार किया। जिन्दगी भर नीम-भीम की, के कारण गुमनाम सजा काटी।  किन्तु उनके कारण जो लाखों दलित हिन्दू वहां फंस गए वो आज तक अपनी बहन बेटी को सुरक्षित नहीं कर पा रहे है। उन्ही दलित हिंदुओं में कुछ छिपते छिपाते भारत आये किन्तु यहां भी वह ऐसा ही जीवन व्यतीत कर रहे नागरिकता नहीं होने के कारण कोई सरकारी लाभ नहीं, नौकरी नहीं, उनके बच्चे अशिक्षित है। जब उनकी इस दुर्दशा को दूर करने से लिये किसी राष्ट्रपुरुष का स्वाभिमान जागृत हुआ तो उसने CAA लाया। जिससे किसी को कोई मतबल नहीं है क्यों कि जिसे हम नागरिकता दे रहे है वो पहले है यहां रह रहे है। फिर भी इन दानवी जिहादी प्रवृति के मुस्लिम और कुछ आधुनिकतावादी लोगों को यह बात अपच हो रहा है। ऐसे आधुनिकतावादी हिन्दू पर हमने तरस आता है।  हमें मोदी प्रधानमंत्री नहीं बल्कि एक अवसर मिला है इस अवसर को पहचानिए इतिहास केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं अपितु वर्तमान और भविष्य में वह गलती दोहराई न जाये इसके लिए भी पढ़ना चाहिए। मेरी इच्छा तो यही है और कोई योगेंद्र मंडल न बने...

रविवार, 15 दिसंबर 2019

CAB को लेकर साजिश; मीडिया डरी हुई


Jitesh kumar

Image result for CONGRESS पहले जिहादियों, बंगलादेशी और अब कांग्रेसियों का डर| सभी प्रकार के संवैधानिक प्रकिया के बावजूद महामहीम राष्ट्रिपति के हस्ताक्षर होने के उपरांत नागरिकता संशोधन बिल पास हुआ है| राज्यसभा में विधेयक के पक्ष में 125 जबकि विपक्ष में 99 वोट पड़े है| गृहमंत्री अमित साह ने राज्यसभा में विधेयक को पेश किया, जिस पर 6 घंटे बहस के बाद अमित साह ने सदन में विधेयक से संबंधित जवाब दिये| इसके बावजूद राज्यस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार पार्टी के हाईकमान का आदेश मानेंगे| क्या सोनीया गाँधी और राहुल गाँधी का निर्णय देश के संविधान से बड़ा है? इतने बड़े संविधान विरोधी मुद्दे को मीडिया दबा रही है, कारण क्या हो सकता है दलाली या डर? कुछ मीडिया संस्थानों को छोड़कर किसी ने CAB के बारे में सही जानकारी जनता को नहीं दिया है ये मीडिया घराने डिबेट के नाम पर देश को गुमराह कर रहें है| कानून की जानकारी रखने वाले बुद्दिजीवी, प्रोफ़ेसर, वकील, जज से इसके बारे में वास्तविक जानकारी साझा करनी चाहिए जिससे बिल के बारे में जनता को ठीक जानकारी मिले| किन्तु TRP और राजनितिक के चक्कर में डिबेट के नाम पर देश में मतभेद के बीज बोये जा रहे है| किसी ख़ास घटना पर मीडिया का हो-हल्ला और किसी घटना पर चुप्पी?


शनिवार, 16 नवंबर 2019

साध्वी प्रज्ञा का जीवन

जितेश कुमार
बीते लोकसभा चुनाव, 2019 में मैं भोपाल था। तब मैंने लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया, मीडिया संपर्क तथा कई नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से चुनाव प्रचार को करीब से देखा, उसमें भाग लिया। साध्वी प्रज्ञा दीदी के चुनाव प्रचार में  उनके साथ प्रचार में शामिल रहा। मैं देख रहा था कि वैसे तो भोपाल भारत का भौगोलिक केंद्र पहले से ही था परंतु साध्वी प्रज्ञा के चुनाव में उतरने से भोपाल भारतीय लोकतंत्र के निर्णायक जनादेश का केंद्र बिंदु बन गया है।   
भगवा आतंक तथा हिन्दू आतंकवाद जैसे शब्दों के जनक, आतंकी को अफजल जी, मौलाना जी पुकारने वाले, उसकी हत्या पर आंसू बहाने वाले कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह चुनावी मैदान में जैसे उतरे। साध्वी प्रज्ञा ने राजनीति में उतरने में देर नहीं की। जिस प्रकार वर्ष 2008 में मालेगांव धमाका में उनको फंसाया गया और घोर यातनाएं दी गई।
इन सबके पीछे दिग्विजय सिंह का हाथ रहा था। ऐसे में साध्वी प्रज्ञा लोकसभा क्षेत्र भोपाल से भाजपा की प्रत्याशी के रूप में चुनाव में खड़ी हुई तो देश-दुनियां के मीडिया, नेता, यहां तक की आम जनता ने इसे चुनाव मात्र नहीं समझा, यह तो धर्म युद्ध था। हिंदुओं को आतंकी कहने वाले दिग्गी के सामने सनातनधर्म की सन्याशनी चुनाव लड़ रही थी और यह तय था कि साध्वी प्रज्ञा के राजनीति में उतरने से केवल भोपाल ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारतवर्ष में राजनीति का परिष्करण एवं परिमार्जन होने जा रहा था। 
भिंड जिले की लहार तहसील की रहने वाली प्रज्ञा सिंह ठाकुर का जन्म 2 फरवरी, 1970 को मध्यप्रदेश के दतिया जिले में हुआ था। उनके पिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। यही कारण था कि बाल्यकाल से ही प्रज्ञा का रुझान राष्ट्र और समाज कार्य की ओर रहा। सामाजिक संवेदनशीलता उन्हें अपने सामाजिक दायित्व के प्रति सजग, सचेत और संकल्पित करती रहीं। वह किसी न किसी रूप में समाज को अपना योगदान देती रहीं। अल्पआयु से ही उनकी लेखनी से कविताएं और गीत फूटने लगे। उनकी रचनाओं के केंद्र में राष्ट्र ही रहता था। सनातनी मूल्यों ने उनके व्यक्तित्व का श्रृंगार किया। वे वास्तव में अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति हैं। वर्ष 1987 में जब वह नवमीं कक्षा में थी तब उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की सदस्यता प्राप्त की लगभग 15 वर्षों तक सक्रिय रहीं। प्रारंभिक सदस्यता के बाद साध्वी शीघ्र ही नगर इकाई की प्रमुख बन गई फिर जिला इकाई और उसके पश्चात पूर्णकालिक के रूप में विदिशा और भिंड की विस्तारक रही। बाद में भोपाल और उज्जैन से संगठन मंत्री रही। उनके कार्यों को देखते हुये। कुछ ही वर्षों में उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में स्थान मिला। दुर्गा वाहिनी में भी उनकी सक्रिय भूमिका रहीं। इसी दौरान उन्होंने उज्जैन में वर्ष 1996 में प्रज्ञा उत्क्रांत सामाजिक संस्थान की स्थापना की और इसके माध्यम से परिवारिक विवादों में मध्यस्थता करते हुए समस्याओं का निराकरण किया। भारतीय संस्कृति में दृढ़ आस्था होने के कारण वो समझने और समझाने लगी कि वर्तमान परिवारिक विघटन और विखंडन के मुख्य कारण व कारण क्या है? उनकी सेवा कार्य का शनै: शनै: विस्तार होता गया। उसमें नये आयाम जुड़ते गये। वर्ष 1998 में उन्होंने भिंड जिले में जय वंदेमातरम सामाजिक संस्थान की स्थापना की और उसकी राष्ट्रीय अध्यक्षा रहीं। खेल में उनकी रुचि बचपन से ही प्रगाढ़ रही। कालांतर में वे कबड्डी की स्टेट प्लेयर बनी और आत्मरक्षा के आशय से उन्होंने कराटे की शिक्षा प्राप्त की और ब्लैकबेल्ट बनी। उन्होंने महिला सुरक्षा के लिए भी काम किया। गृहनगर लहार में छात्राओं के लिए अलग से सेंटर कॉलेज और महाविद्यालय बने इसके लिए उन्होंने वर्ष 1990 में सफल जनान्दोलन किया और सरकार से स्वीकृति प्राप्त कर उन्हें खुलवाया। 
राष्ट्रीय सेविका समिति की सदस्यता के रूप में उन्होंने चुनाव संबंधित कार्य में भी अपना कौशल दिखाया। वर्ष 2002 के गुजरात विधानसभा चुनाव में उनकी सक्रिय भूमिका को सराहा गया। उन्होंने संकल्प लिया और अपने समिति संसाधनों से वे सश्रम सेवा कार्य में जुट गई। सेवा से मिलने वाले आनंद की अनुभूति व्यसनादि से अधिक मादक होती है। समय के साथ सेवा ही सेवक का स्वभाव बन जाता है। सेवा की यात्रा में स्वत्: दुर्लभ मनीष संत मिलने लगते हैं और सेवा कार्य के आयाम विकसित होने लगते हैं। वर्ष 2007 में ऐसा ही हुआ अवसर था अर्धकुंभ का और स्नान प्रयागराज। जूनागढ़ अखाड़े के महामंडलेश्वर परमपूज्य स्वामी अवधेशानंदगिरी जी महाराज से उन्होंने संन्यास की दीक्षा ली और पूर्ण रूप से सन्यासी जीवन में प्रवर्त हो गई और साध्वी प्रज्ञा बन गई। 
संघ के प्रभाव तथा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अनुभवों से साध्वी का आत्मविश्वास और दृढ़ होता गया। उन्हें लगने लगा कि राष्ट्रहित में अच्छा कार्य करने की आवश्यकता तो है ही साथ ही  असीम संभावनाएं भी है और वे उस पथ पर बढ़ चली। कभी सामूहिक रक्तदान, कभी गौसेवा के प्रकल्प तो कभी महिला सुरक्षा के उपकरण। वे धीरे-धीरे आयुर्वेद, योग, ध्यान और अध्यात्म के रहस्य व उनसे मिलने वाली चमत्कारिक लाभों से भी समाज को जोड़ने का प्रयास करने लगी। 
साध्वी प्रज्ञा एक प्रखर वक्ता थी जब वह राष्ट्रवाद और समाज की कुरीतियों पर अपना मंतव्य मंच से व्यक्त करती थी। तो वहां बैठे लोगों के हृदय में क्रांति की ज्वाला भड़क उठती थी। धीरे-धीरे साध्वी प्रज्ञा हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के साथ-साथ महिला की भी ब्रांड एमेस्टर बन गई। और यह बात कुछ तथाकथित ढोंगी लोगों को रास नहीं आया। 
यही कारण था कि वर्ष 2008 में एक प्रायोजित षड्यंत्र के तहत मालेगांव मस्जिद में हुये बम विस्फोट में उनका नाम जोड़ा गया। कुछ कुत्सित राजनीतिज्ञों ने अपने आकाओं के निर्देश पर राष्ट्रद्रोह का बिगुल फूंक दिया। उस ह्रदय विदारक कालखंड की यातनाएं एवं प्रताड़नाओं के स्मरण से ही आंसू टपकने लगते हैं। साध्वी प्रज्ञा को तुरंत स्पष्ट हो गया कि देश और सनातन धर्म के शत्रुओं ने उन्हें मोहरा बनाया है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में शांति प्रिय हिंदू समाज पर सबसे बड़ा हमला बोला गया था। गद्दार, हिंदू समाज पर लांछन लगा रहे थे। गद्दारों के सरगना ने तो भगवा आतंक और हिंदू आतंकवाद जैसे अपशब्दों से भारत भूमि और हिंदू धर्म को अपूर्णक्षति पहुंचाने का अक्षम्य अपराध किया था। साध्वी प्रज्ञा को तोड़ने के लिए उन्हें जेल में भयंकर यातनाएं दी गई। ज्ञात भारत के इतिहास में जिस प्रकार से जेल में साध्वी प्रज्ञा को यातनाएँ दी गई, इसका कोई दूसरा इतिहास नहीं। जेल में कई पुलिसकर्मी एकसाथ मिलकर उनको बेल्ट और जूते से तब तक मरते रहते थे जब तक वो बेहोश नहीं हो जाती थी। होश में लाने के लिए उन पर गर्म पानी फेंका जाता था फिर वही बेल्ट, जूतों यहां तक कि सिगरेट से उनके शरीर को जगह-जगह जलाया जाता था, उनको उठाकर जेल के दीवारों पर फेंका जाता था। उन्होंने बताया कि इसी बीच जेल एक दिन उनसे मिलने ढोंगी सन्यासी जिसकी आजकल अत्र-तत्र, सर्वत्र पिटाई होती रहती है, स्वामी अग्निवेश आये। उन्होंने कहा कि आप मालेगांव बम धमाके में अपना जुर्म कबूल करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख के इशारों पर ऐसा किया यह बयान दे। जेल में आपसे कोई मारपीट नहीं होगी। उल्टे आपको सभी प्रकार से सुख-सुविधा दिया जायेगा। जल्द ही आपकी रिहाई हो जायेगी। परंतु बचपन से ही साध्वी प्रज्ञा में राष्ट्रवाद की भावना कूट-कूट कर भरी थी। वो हिंदुत्व को कैसे लांक्षित कर सकती थी। उन्होंने इस प्रस्ताव को अस्वीकार किया और सहज ही अपने लिए कष्ट के दिन मांग लिए। लेकिन समय ने करवट ली। 2014 के चुनाव ने देश के राजनीति को बदल दिया। नरेंद्र मोदी की सरकार आयी। उस समय गृहमंत्री रहे राजनाथ सिंह ने साध्वी प्रज्ञा पर लगे आरोप की जांच के बाद उनको दोषी नहीं साबित होने के स्थिति में उन्हें छोड़ दिया गया। इस अग्नि परीक्षा से साध्वी प्रज्ञा बेदाग बाहर निकल गई। 
जब भोपाल से दिग्विजय सिंह चुनाव में उतरे तो विरुद्ध में साध्वी प्रज्ञा सामने खड़ी थी। उन्हें अपार जनसमर्थन मिला। साध्वी प्रज्ञा के चुनाव में उतरने से भोपाल लोकसभा सीट ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। चुनाव प्रचार के दौरान भोपाल में मैंने जो दृश्य देखे। सच में यह धर्म और पाप की लड़ाई थी। सौभाग्य से साध्वी प्रज्ञा को प्रचंड बहुमत से विजयी मिली।

रविवार, 7 जुलाई 2019

हिन्दु राजा अनंगपाल तॊमर ने 1060 AD में लाल किला बनवाया था

भारत में मुगल शासकों द्वारा संशोधित  इतिहास को सच मानने के लिए हमें मजबूर किया गया है। हमें बताया गया है कि शाहजहां ने 1639 से 1648 के बीच वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी द्वारा लाल किले को बनवाया था। लेकिन हमें यह नहीं बताया गया है कि मुगलों के भारत आने से पूर्व से ही लाल किला दिल्ली में स्थित था। मुगलों ने उसी किले को क्षत विक्षत कर अपना
नाम किले के साथ मंढ दिया। वास्तव में 1060 ईस्वी में राजा अनंगपाल द्वारा लाल किले का निर्माण किया गया था। किले के अंदर बहुत सी वास्तुकला हैं जो चीख चीख कर कहती है कि लाल किला हिन्दू राजा द्वारा बनवाया गया था। पहला साक्ष्य तो यह है कि ऒक्सपर्ड के Bodleian Library में एक चित्र है जिसमें 1628 में शाहजाहन लाल किले के दिवान -ए -आम में एक पर्शियन राजदूत का स्वागत कर रहा है। उसी साल शाहजहान ने तख्त पर कब्ज़ा कर लिया था। इसका अर्थ है कि लाल किला शाहजहान के तख्त पर बैठने से पहले ही मौजूद था। अगर लाल किले को 1639 में बनवाया था तो 1628 में वह लाल किले में कैसे मौजूद था लाल किले के अंदर “खास महल” में राजा अनंगपाल के शाही प्रतीक को देखा जा सकता है। इस प्रतीक में एक हिन्दू कलश के बीच में दो तलवारॊं को ऊपर की ऒर घुमाकर चित्रित किया गया है। कलश पर एक कमल की कली है और उसके ऊपर न्याय का तराज़ू है। दोनों तलवारों की नॊख पर दो शंख चित्रत हैं जो की हिन्दू प्रतीक है। कलश, शंख और कमल इन सभी चीज़ों की सनातन धर्म में महत्वपूर्ण मान्यता है। यही नहीं इस शाही प्रतीक में सूर्य देवता का भी चिन्ह है जो राज परिवार के सूर्य वंश से संबंध को दर्शाता है। महल के दरवाज़े के कमान पर दुपहर के सूर्य का चिन्ह है जो कि सूर्य वंश का प्रतीक है। इस कमान पर हिन्दुओं का पवित्र शब्द “ऒम” भी खुदा गया है। उसके नीचे शाही परिवार के प्रतीक चिन्ह है जो सनातन धर्म का प्रतीक है। इन प्रतीकों के बीच की जगहों पर उर्दू के शिलालेखों को जबरन घुसाया गया है। लाल किले के दिल्ली दरवाज़े पर बनी दो हाथियों की भव्य मूर्तियां किले के हिंदू मूल के एक अचूक संकेत हैं। केवल हिन्दु महलों और मंदिरॊं में ही हाथी के मूर्तियां और कलाकृतियां बनाई जाती है। हिन्दुओं के लिए हाथी शक्ति, महिमा और धन का प्रतीक होता है। ग्वालियर, उदयपुर और कॊटा के महलों में भी इसी प्रकार की कलाकृतियां देखने को मिलती है। “मोती मस्जिद” के प्रवेश द्वार को देखने से यह पता चलता है कि वहां की वास्तुकला किसी मंदिर की प्रवेश द्वार की कला के जैसे प्रतीत होती है। द्वार के गुंबदों के बीच के कवच में हिंदू पूजा में उपयोग किए जाने वाले केले के चिन्ह हैं और बीच में भगवान को अर्पित करने वाले पांच फल है। ध्यान रहे मुस्लिम मस्जिदों में फल ले जाना निषिद्ध है। केवल हिन्दू मंदिरों में भगवान को फल फूल अर्पण करने की प्रथा है। महलों को हीरे जवाहरातों का नाम देना भी हिन्दू प्रथा है। केले के अंदर “रंग महल” के दीवारों पर मंदिर की नक्काशी इस बात का प्रतीक है कि इस किले को शाहजहान ने नहीं बल्कि राजा अनंगपाल नामक हिन्दू राजा ने बनवाया था। रंग महल नाम भी हिन्दू मूल का है। मंदिर के मंडप के ऊपर बनी छॊटी छत्री की हिन्दू धरम में बड़ी मान्यता है। आज भी उत्सवों में ऐसी छत्रियों का उपयॊग सनातन परंपरा में किया जाता है। खास महल और रंग महल के अंदर छिद्रित संगमरमर की जेलियों का उल्लेख “रामायण” में भी किया गया है तॊमर राजवंश ने सन 736 में “लाल कॊट” साम्राज्य की स्थापना की थी। महान नायक पृथ्वी राज चौहान का जन्म इसी वंश में हुआ था। तॊमर अनंगपाल ने लाल कोट की स्थापना की थी जिनका नाम दिल्ली के कुतुब परिसर के लोहे के स्तंभ में खुदा गया है। दिल्ली के मेहरौली में लाल कोट (लाल किला) तॊमर वंश द्वारा बनाया गया था और इसके अवशेष लाल रंग के पत्थरों के साथ अभी भी देखने को मिलते हैं। मुगलों ने भारत के हिन्दू मंदिरों और स्मारकों को क्षत विक्षत किया और भारत के स्वांग रचने वाले बुद्दिजीवियों और पाखंडी धर्मनिरपॆक्ष लोगों ने भारत के इतिहास को क्षत विक्षत किया है। आज सभी साक्ष्य हमारे सामने हैं, कम से कम अब तो हमें सच बॊलना चाहिए।



शनिवार, 27 अप्रैल 2019

रविश कुमार को भविष्य मालूम है

'भारत के टुकडे' और 'अफजल को घर से घर पैदा' करने वाले कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य और 7 कश्मीरी छात्र ही है. घटना के तीन वर्ष बाद दिल्ली पुलिस ने 14 जनवरी, 2019 को पटियाला कोर्ट में 1200 पेज के चार्जसीट दर्ज की. चार्जसीट में कुल 46 लोगों  आरोपी है. इसमें 10 लोगों को सीधे तौर पर आरोपी है, कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य और 7 कश्मीरी छात्र
शामिल है. करीब 90 लोगों की गवाही दर्ज की गई है. गवाही चश्मदीद छात्रों और सिक्योरिटी गार्ड में तैनात लोगों की है. इसके अलावे सीडीआर (कॉल रिकॉर्ड) कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य के निकली गई है और नारेबाज़ी की 13 वीडियो क्लिप्स भी शामिल की है, इसकी जाँच CFSC ने सही माना है. जैसा की पहले कुछ नेताओं, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने वीडियो फुटेज को फेंक और एडिटेड बताया था. इसके विपरीत पुलिस के हाथ लगी 13 वीडियो क्लिप्स जाँच में सही पाए गये है. इसमें देशविरोधी नारे लगाते आरोपियों की आवाज़ और चेहरा पहचाना जा सकता है. इसके अलावे सीडीआर (कॉल रिकॉर्ड) कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य के निकली गई है| चार्जशीट में यह भी लिखा है कि घटना स्थल पर कन्हैया कुमार की मौजूदगी थी| उसके मोबाईल का लोकेशन इस वक्त जेएनयू में ही पाया गया था, इसकी भी पुष्टि चार्जशीट में की गई है|  
अब सवाल उठता है कि कन्हैया बेगुसरय से चुनाव क्यों लड़ रहे है? कारण साफ है सजा होने से बच सके या सजा की अवधी कम हो जाये| जमानत की सुविधा उपलब्ध हो, जैसे आज गाँधी परिवार के लिए है|
कांग्रेस की प्रताड़ना की शिकार  
जेएनयू के देश विरोधी नारे, भारत के टुकडे करने की घटना के ठीक बाद से अब तक कुछ अनुभवी पत्रकार इसमें रविश कुमार भी शामिल है कन्हैया को निर्दोष ऐसे साबित करने में लगे है जैसे न्यायपालिका से इनकी साठ-गाठ हो| क्या मिथ्या प्रचार करना ही रविश कुमार ने अपना धर्म मान लिया है? रविश जिस प्रकार भोपाल से बीजेपी की प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के बारे में बेबाकी से  बोल रहे है वैसे ही कन्हैया के खिलाफ क्यों नहीं? जब की कन्हैया कुमार को किसी प्रकार की वर्तमान सरकार में शारीरिक या मानशिक प्रताड़ना नहीं भुगतनी पड़ी है| इसके विपरीत साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को जेल असहनीय और अकल्पनीय प्रताड़ना के गुजरना पड़ा था| बिना चार्जशीट के 9 वर्षों तक जेल में प्रताड़ित किया| उसकी रीढ़ के हड्डी तक टूटी हुई है, हजारों शारीर पर घाव के निशानी है| दो कदम ठीक से चलाना मुश्किल है इसके बड़ा प्रताड़ना का प्रमाण क्या हो सकता है भला| और प्राईम टाइम में झूठा रिपोर्ट दिखाते है जिसे कांग्रेस के शासन में मनावाधिकार ने प्रकाशित किया था| आज साध्वी प्रज्ञा  भोपाल में पुरे देश की बीच है, क्यों नहीं बोलते मानवाधिकार की रिपोर्ट गलत है? क्योंकि वो हिन्दू धर्म की साध्वी है| अगर ऐसा है तो दोगली पत्रकारिता विदेशी और आतंकी से फंडिग लेने वाले पत्रकर की भाषा ऐसे ही होती है| कन्हैया निर्दोष है और साध्वी प्रज्ञा हिन्दूआतंकी यह न्यायालय से पहले ही तय कर लिया जैसे रविश कुमार को भविष्य मालूम हो| 

जनता की अदालत 




गुरुवार, 25 अप्रैल 2019

साध्वी नहीं, कटघरे में कांग्रेस और मानवाधिकार की रिपोर्ट

जितेश कुमार
साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर लगे आरोप का खंडन भी होगा| पहले मानवाधिकार की रिपोर्ट कितना सच है और कितना झूठ? कुछ पत्रकारों ने मानवाधिकार की रिपोर्ट के सहारे यह सवाल उठाये है कि साध्वी प्रज्ञा के साथ कोई मारपीट नहीं की गई| ऐसे प्रश्न पूछने वाले
पत्रकारों को ईश्वर ने आँख दिया है तो भोपाल आकर आखों देखा साक्षात्कार करों| क्यों की पेपर पर चोट के निशान नहीं, शारीर पर होते है| फिर कांग्रेस की सरकार और देश की न्यायपालिका के पूछो किस आरोप और कौन से साबुत के आधार पर साध्वी प्रज्ञा को 9 वर्ष तक जेल ही नहीं बल्कि अमानवीयता के सभी हद टूट जाये ऐसा कुकृत किया गया| क्यों? मीडिया को पता है फिर भी मौन है| यह स्थति ऐसी है, जैसे माँ दुश्मनों के बीच घिरी हो और बेटा दुश्मन की ताकत के घबराकर दुबक गया हो| 
सनातन (हिन्दू धर्म) का 5000 वर्ष के ज्ञात इतिहास में पहली बार साल 2008  में कांगेस की सरकार में हुए मालेगांव विस्फोट के पीछे हिंदू आतंकवाद है, शब्द बोलने का दुस्साहस किया| इससे पहले देश-दुनिया में हुए आतंकी हमला में जब एक विशेष धर्म संप्रदाय के लोग पकड़े जाते रहे थे और अभी भी पकड़े जाते  है| भारत में ही कई मुस्लिम धर्म के आरोपियों को हमले करने के जुर्म में फंसी तक की सजा मिली है कसाब, अफजल और याकूब मेमन जैसे मुस्लिम आतंकी| किन्तु सरकार मीडिया या किसी जाँच एजेंसी ने इसे मुस्लिम आतंकवाद का नाम दिया| उलटे आतंकी को भटके हुए और इसप्रकार के घटना को हमारे बीच ऐसा परोसा की जैसे दोषी जनता ही है| 
गौर करने की बात यह है कि जिस मालेगांव विस्फोट में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को दोषी ठहराया जा रहा है, वह पहली घटना नहीं है| इससे पहले भी 2006 में माले गांव की मस्जिद के बाहर विस्फोट हुआ था| जिसमें कई लोग मारे गए थे| इस विस्फोट की जांच भी महाराष्ट्र पुलिस ने ही की थी| लेकिन उनकी जांच पर जब सवालिया निशान लगाए गए तो सीबीआई को सौंप दी गई| यह वही स्पेशल टास्क फोर्स है, जिसने 1993 के मुंबई बम धमाकों की जांच की थी और इसी जांच के आधार पर इसके लिए लगभग 117 आरोपियों की मुंबई की विशेष अदालत ने सजा सुनाई थी| तमाम छानबीन के बाबजूद ना तो साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ कोई साबुत मिले; ना ही हिन्दू आतंकवाद के खिलाफ| लेकिन सीबीआई कहना था कि जांच से यह जरूर पता चला है कि इस विस्फोट के पीछे भी उन्हीं लोगों का हाथ है जिन्होंने हैदराबाद की मक्का मस्जिद समेत देश के विभिन्न शहरों में विस्फोट को अंजाम दिया है| एक बात और जिस समय मालेगांव में विस्फोट हुआ उसी समय गुजरात के मोडासा में भी विस्फोट हुआ था| खुफिया एजेंसी का तब कहना था कि इन दोनों विस्फोट के पीछे एक ही आतंकवादी संगठन का हाथ है| ऐसा इसलिए कि दोनों हमले एक दिन के अंतर पर हुए थे| दोनों धमाके रात में लगभग 9:30 के आप-पास हुए थे| और दोनों धमाके में विस्फोटक मोटरसाईकिल में छुपाया गया था| लेकिन एनआईए की टीम ने प्रज्ञा सिंह ठाकुर और अन्य आरोपियों से पूछताछ के बाद साफ कर दिया कि मोडासा विस्फोट में प्रज्ञा ठाकुर और अभिनव भारत संगठन का कोई हाथ नहीं है| एनआईए के रिपोर्ट के अनुसार कुछ तथ्य जरुर सामने आये जो इस जाँच की दिशा मोड़ दी| रिपोर्ट में एनआईए ने कहा है कि उनके पास किसी को आरोपी बनाने लायक सबूत नहीं हैं। ब्लास्ट के लिए जिस हीरो होंडा बाइक का उपयोग किया गया था, उसके चेसिस नंबर के सिर्फ दो ही अंक मिले। अधिकारियों ने हीरो होंडा के गुड़गांव वाले प्लांट में संपर्क किया तो पता चला कि 71 बाइक्स में ये दो अंक मिलते हैं। अधिकारियों ने 70 बाइक मालिकों से पूछताछ की, लेकिन 71वां नहीं मिला और ना नहीं कभी एनआईए ने उस बाईक मालिक के नाम साझा किये। एनआईए ने 117 गवाहों की जांच की, लेकिन कोई सुराग हिन्दू आतंकवाद का नहीं मिला। पुलिस के मुताबिक मोडासा ब्लास्ट में यूज हुई बाइक पर '786' नंबर का स्टिकर लगा था। अब मामला साफ था कि हैदराबाद की मक्का मस्जिद समेत देश के विभिन्न शहरों में विस्फोट करने वाले हिन्दू नहीं इस्लामिक आतंकी है| कांग्रेस की सरकार के इशारे पर गुजरात में हुए बम धमाके में इस्तेमाल बाईक के मालिक का नाम तो एएनआई ने छुपा ली| किन्तु देश की नज़रों उस बाईक पर लगा 786  नंबर का स्टिकर छुपा नहीं पायी और वह वायरल हो गया| फिर भी किसी प्रकार से कांग्रेस की सरकार जिसमें दिग्विजय सिंह की भूमिका रही है ने हिन्दू को आतंकी घोषित करने के लिए साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को शारीरिक और मानशिक रूप से प्रताड़ित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा| हाथ पैर और रीढ़ की हड्डी तक पिटते-पिटते तोड़ गए और देश मीडिया मुंह बंद किये इस घोर अपराध की दोषी बनी रही| द्रोपदी को तो नुयुद्ध सभा में केवल बाल पकडे के घसीटा गया था| लेकिन साध्वी को उससे भी अधिक प्रताड़ित किया गया| इस प्रकार के कुकृत का ना तो इतिहास में कोई पन्ना दर्ज है ना ही वर्तमान में| किसी को आतंकी जबरन बनाने के लिए मानवता की सारी सीमा लाँघ दी गई| इतना ही नहीं मानवाधिकार की टीम भी इस षड्यंत्र में सामिल थी और उसने अपने रिपोर्ट न्यायालय को सौपी जो मीडिया में भी प्रकाशित की गई और आज-कल वायरल हो रही है| जिसमे यह साफ तौर पर लिखा गया था| साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के साथ कोई मार-पिट नहीं की गई है| तब साध्वी प्रज्ञा जनता के के नज़रों से ओछल जेल में थी, किन्तु अब नहीं; उनके साथ की गई प्रताड़ना और उनकी स्थिति आज सब के बीच है| आपको यह मालूम हो कि साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के दो-दो बार ब्रेन मैपिंग और नार्को टेस्ट किये गए पर साध्वी सभी वैज्ञानिक जांचों में बेदाग निकल गई थी| और एएनआई ने उन्हें क्लीन चिट सौफ दी है| 
साध्वी प्रज्ञा ने ‘आप की आदालत’ रजत शर्मा की टीवी शो में यह खुलासा किया कि उनसे एक दिन जेल में मिलाने स्वामी अग्निवेश आये थे| और उन्हें जुर्म अपने माथे पर लेने की बात कही और दिलासा दिलाया कि जेल में कोई आपको परेशानी नहीं होगी| हमारी लड़ाई आरएसएस से है| एक बार ऐसा पिटाई अग्निवेश की जाये तो मीडिया की स्थिति क्या होगी? सोच कर ही तरस आती है| मीडिया हमेशा से पैसा और बुकाऊ रही है इसका प्रमाण भी है, कुछ दिन पहले साध्वी प्रज्ञा ठाकुर एक टीवी डिबेट में थी और उनसे सवाल किया गया मानवाधिकार की रिपोर्ट के अनुसार आपके साथ कोई मारपीट नहीं की गई| सवाल सुनते ही प्रज्ञा ठाकुर ने वही किया जो कोई भी प्रताड़ित व्यक्ति करता| डिबेट छोड़ कर उठा गई| मैं उस टीवी एंकर को बुलाता हूँ स्वयं भोपाल आये साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की शारीरिक स्थति देखे| क्युकि पेपर पर चोट नहीं दिखते है, घाव और प्रताड़ना की गवाही तो स्वयं उनका शारीर चीख चीख दे रहा है| 

शनिवार, 20 अप्रैल 2019

अगर तुम बदलना चाहते हो, तो मैं नया कुरान लिख दूँ

जितेश कुमार 

आतंकी तो अफजल गुरु और याकूब मेमन था. जिसे मृत्यु अवश्य मिली. किन्तु जेल में भी फाइव स्टार होटल जैसी व्यवस्था का सुख प्राप्त हुआ. करोड़ों की सरकारी खजाने लुटाये गए. राज कांग्रेस का था और आतंकवादियों की मेहमान नवाजी करने की इनकी परंपरा है.
आज के आतंकी+ रक्त समूह के कोंग्रेसी उसी परम्परा से है जो किसी आतंकी के सामने सर झुकाती है, साष्टांग उसके चरणों में लेट जाती है. देश के आतंकियों की मेहमान नवाजी का क्या उद्देश्य हो सकता है?
केवल और केवल मुस्लिम तुष्टिकरण. अब तो बहुत हद तक मुस्लिम समुदाय भी समझने लगे हैं कि कांग्रेस ने केवल राजनीतिक लाभ के लिए उनका उपयोग किया है. कदाचित आतंकियों को विशेष सुविधा देकर उनको देशद्रोही साबित भी की है. हे अशफाक उल्ला खान के वंशजों, हे मौलाना आजाद के वंशजों, हे कलाम के वंशजों, अपने राष्ट्रभक्ति का प्रमाण दो. और अपनी धार्मिक पुस्तक कुरान को निष्कलंक करो. हे कुरान प्रेमियों, फर्जी और मुल्लाह-मौलवियों के मुख से उत्पन्न आतंकित रक्तजनित विनाशक विवेकहीन और अत्याचारी अपराधिक असमानता वाली कुरान का दहन करो. वास्तविक कुरान की आयतें पढ़ो देशभक्त बनो और देश से प्रेम करो तुम सीमा पर अब्दुल हमीद बनो. देश के लिए कलाम बनो. विदेशियों से लोहा लेने के लिए अशफाक उल्ला खान बनो. भारत की संस्कृति को पढ़ो, इस देश की इतिहास को पढ़ो, इस देश की विराट परम्परा को आत्मसात करो. इस देश के स्वाभिमान को समझो. यही तुम्हारा वास्तविक कुरान है, जरा इस कुरान को समझो. 
 यह आसमानी किताब नहीं राष्ट्रभक्ति की ज्वाला से उत्पन्न कुरान है, यहां अल्लाह हू अकबर नहीं, कोई नमाज नहीं, महिलाओं पर अत्याचार नहीं, बेजुबान जानवरों को मारना कोई पर्व त्यौहार नहीं, ना हड़पने की ख्वाहिश न बांटने की इच्छा. यह कुरान मारने-मरने की भक्ति नहीं देता है. यह कुरान भाईचारा, प्रेम और देशभक्ति की शपथ देता है

रविवार, 14 अप्रैल 2019

दोगली पात्रता रखने वाले गाँधी फैमली किस जाति धर्म के है? जरा सोचे

जीन्स छोड़ के पहिन साड़ी, न त वोटवा ख़राब हो जाई, ये बहिन लगाव माथे पर चंदनवा न त बीजेपी के दुबारा सरकार बन जाई| 

संबंधित इमेजकुछ स्वतंत्र विचार वाले लोग मुझे पर संदेह करने लगे है, कही मैं राष्ट्र्वादी और भारत माता की जय कहने वाला अपराधी तो नहीं| कपिल सिब्बल के बयान को ढाल बनाकर मैं अपनी निष्पक्षता को आपके बीच रखता हूँ| जिस बयान में सिब्बल कांग्रेस पर लगे  परिवारवाद के सबसे बड़े आरोप को ख़ारिज करता है कहता कि संघ (RSS) परिवारवाद का सबसे बड़ा आरोपी  है| सिब्बल ने कहा कि किसी भी राज्य में बीजेपी जीते इनके अनुसार ही मुख्यमंत्री तय होता है| सिब्बल जैसे बड़े राजनेता को भी संघ के प्रचारकों का अविवाहित रहकर,  हिन्दू समाज को संगठित करना ही एकमात्र ध्येय है पता है| इसके बावजूद परिवारवाद का यह मिथ्या आरोप क्यों? किसी मीडिया संस्था के लोगों ने नहीं पूछा और जिस मीडिया मंच से यह बेतुका बयान दिया जा रहा था वह भी इस बयान पर स्पष्टीकरण नहीं मांगी| किस आधार पर यह आरोप आप लगा रहे है? जबकि नेहरू से राहुल तक के परिवारवाद देश के सामने है| 
परिवारवाद के आरोपों से तिलमिलाहट ने सिब्बल जैसे चतुर चाटुकार को असहज कर दिया, तभी परिवारवाद का आरोपी  संघ को  बता रहा है| संघ राजनीति में सीधे रूप से सक्रीय नहीं है, जब कि संघ में वह काबलियत है कि देश की राजनीतिक बागडोर संभाल सकता है| संघ के सरसंघचालक (संघ प्रमुख) मोहन भागवत ने अपने एक व्याख्यान में कहा था कि सभी प्रकार से श्रेष्ठ और नेतृत्त्व में निपुण होने के बावजूद हम राजनीति नहीं करते है, क्योंकि हमारा उद्देश्य राजनीति सत्ता पर काबिज होना नहीं, बल्कि भारतीय समाज (हिन्दू समाज)  को संगठित करना, संस्कृति की उत्थान और भारत को परम वैभव बनाना है| एकमात्र इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु देश भर में संघ हजारों प्रचारक और करोड़ों स्वयंसेवक की अनवरत साधना से दिन रात कड़ी से कड़ी संघर्षों और आलोचनाओं के बावजूद सतत समाज के बीच कार्यरत है| 
इसके बावजूद संघ को राजनीति में घसीटा जाता है| कांग्रेसी और वामपंथी संघ की आलोचना करते थकते नहीं है| क्योकि संघ भारत को केवल राजनीतिक लाभ बनाने वाले पार्टियों के लिए संघ एक चुनौती है, यही कारण है कि संघ को राजनीति में घसीटे जाता है| इतिहास के तहखाने को कुदेरेंगे तो सामने आयेगा कि नेहरू, संघ के घोर विरोधी थे और समाजवाद के पुजारी| हिन्द-चीन भाई-भाई का अलाप जपने वाले इस मुर्ख प्रधानमंत्री का भ्रम 1962 के युद्ध में टूट गया| उस वक्त मुसीबत की घरी में वामपंथी दल (सीपीएम) जिस पर नेहरू को आँख मुंद  कर भरोसा था  ने चीनी सैनिको को खून देने के लिए देश में प्रचार-प्रसार किया और भारतीय सैनिकों को खून मिले इसके विरुद्ध भी सभाएं और लोगों को बहकाने का कार्य किया था| इसके बाद नेहरु भी 'संघम शरणम् गच्छामि' संघ के पास पहुंचे| उस समय गुरुजी सरसंघचालक (संध प्रमुख) थे| इनके एक आह्वान पर देश भर के स्वयंसेवक सुबह कतार में खड़े होकर रक्तदान के लिए ऐसे पंक्ति में लगे थे, जैसे मुफ्त में सरकारी राहत बांटी जा रही  हो| इतना ही नहीं युद्ध के दौरान कई शहर के ट्राफिक पुलिस का भी कार्य स्वयंसेवकों ने संभला था| 1947 में पकिस्तान ने आचानक कश्मीर पर चढ़ाई की थी| उस वक्त भी संघ ने एयरपोर्ट जमे बर्फ हटाने का कार्य किया| सैनिकों के लिए भोजन और हथियार भी युद्ध के दौरान पहुंचाने का कार्य किया था| उस समय कांग्रस की सरकार थी, जब-जब देश संकट में पड़ा, संघ ने सरकार की मदद की| नेहरु संघ के राष्ट्रवादी विचार से इतना प्रभावित हुए ही 1962 के गणतंत्र दिवस के परेड में सामिल होने का निमंत्रण भेजा था| अंत समय में नेहरू को सद्बुद्धि मिली और वह संघ के शरण में पहुंचा|
आज की कांग्रस क्या संघ के राष्ट्रवाद को समझती है, नहीं|  क्योकि कांग्रेस की राजनीति लम्बे समय तक ऐसे व्यक्ति के हाथ में था जो भारतीय ही नहीं, यही एकमात्र कारण है की कांग्रेस अपना आत्मविश्वास खो चुकी है| ऐन-केन पराकेन सत्ता पाने के लिए अंग्रेजों की निति 'फुट-डालो, राज करो' की भावना से कार्य कर रही है| यंहा तक की 9 फरवरी 2016 को JNU में कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य के अगुवाई में देशविरोधी नारे और प्रदर्शन किये गये थे| 9 फ़रवरी का दिन इन देशद्रोहियों के द्वारा इसलिए तय गया था कि इसी दिन देश के सर्वाच्च सदन पर हमला करने वाले अफ़जल गुरु आतंकी को देश की सर्वाच्च अदालत ने फांसी की सजा दी थी. आतंकी अफ़जल की बरसी के दिन आयोजन करना ही अपने आप में देशद्रोह का बहुत बड़ा सबूत है|इसके बावजूद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल, (माफ़ कीजिएगा मैं राहुल गाँधी नहीं बोलता हूँ गाँधी उपनाम केवल देश को भ्रमित करने के लिए इन्होने लगाया है| मीडिया यह उपनाम चाटुकारितावश या चर्चित है इसके कारण प्रयोग करती हो) जेएनयू गया और यही प्रमाण था कि राजनीति लाभ के लिए राहुल किसी भी हद तक जा सकता है| अय्यर और नवजीत सिंह सिद्धू जैसे पाकिस्तान परस्त नेता| जिसे लात मार कर पार्टी से हटाना चाहिए, इसके हाँ में हाँ भरते रहा है केवल मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए| आने वाले लोकसभा चुनाव 2019 के धोषणा पत्र में देशद्रोही कानून धारा 124 को हटाने और सैन्य शक्ति को कमजोर करके कांग्रेस ने यह आह्वान सीधे तौर पर दिया है, 'भारत के टुकड़ें' करने के इरादे से चुनाव में समूचे देशद्रोही दल-बल कांग्रेस के हाथ को थामे| वही हिन्दुओं को भ्रमित करने के लिए कल तक जीन्स पहनने वाली प्रियंका वाड्रा आज माथे पर चन्दन और साड़ी पहने पूर्ण भारतीय बने धूम रही है| दोगली पात्रता रखने वाले गाँधी फैमली किस जाति धर्म के है? जरा सोचे!                 

बुधवार, 3 अप्रैल 2019

बेगुसराय तय करेगी; भारत के टुकड़े करने वाला देशद्रोह का आरोपी, कन्हैया कुमार का भविष्य जेल या सदन में|

बेगुसराय बिहार| बेगुसराय की सीट लोकसभा 2019 हाई प्रोफाइल संसदीय
क्षेत्र  है| इसकी वजह बीजेपी से प्रखर हिंदूवादी और कदावर नेता श्री गिरिराज सिंह के विरुद्ध जेएनयू  के वामपंथी और छात्र संघ के पूर्व नेता कन्हैया कुमार का मैंदान में उतरना है| बेगुसराय के ही रहने वाले कन्हैया कुमार तीन साल पूर्व जेएनयू में 9 फ़रवरी 2016 यूनिवर्सिटी के परिसर में वामपंथी और कश्मीरी छात्रों के सहयोग से आतंकी अफजल गुरु के बरसी और देशविरोधी  विरुद्ध नारे लगाने के आरोपी है| भारत के टुकड़े करने वाले नारों से लोकप्रियता और देश के नजर में उभरने वाले कन्हैया कुमार से परिचित तो सभी है|  जहाँ देश के विकास और एकाजुटता का पक्ष हो| वहां कन्हैया जैसे देशद्रोह के आरोपी को कितना बेगुसराय की जनता ताबजुम देती है यह तो आने वाले परिणाम ही बताएँगे| बेगूसराय राष्ट्र  कवि रामधारी सिंह दिनकर की भूमि है, यहाँ के लोगों में दिनकर की खून  है, यही कारण है कि राष्ट्रवादी  दल यहाँ अपराजय है| फिरभी बीते 30 वर्षों में माओवाद के  विचारकों का यहाँ के कुछ प्रखंडों में दबदबा है| इसी दबदबा के बल पर कन्हैया कुमार चुनाव में खड़े हुए है| 1962 चीन के युद्ध में इसी दल ने भारतीय सैनिकों को रक्त देने से इनकार कर दिया और अपना समर्थन चीनी सैनिकों के प्रति दिखाई, तभी से देश भर में इनके समर्थक नगण्य हो गए और चन राज्यों के जिलों के प्रखंडों में यह दल सिमट गया | एक समय बिहार में वाम विचार बहुसंख्यक थे| आज यह नक्सलवाद और लुट-पाट करने वाले लोगों में तबदील हो गए है| 
बिहार ही नहीं समूचे भारत में  वामविचार अपनी आखरी सांस फुक रही मालूम पड़ती है तो वही गिरिराज सिंह की चमक-धमक और बिहार के प्रति उनका बेबाकी से बोलना भविष्य में उन्हें बिहार के प्रतिनिधि के रूप में देखता है| गिरिराज सिंह बेगुसराय चुनाव में उतर कर यह सन्देश दिए है कि वो केवल राजनेता नहीं, प्रखर राष्ट्रवादी नेता भी है| जिसके लिए उनकों पूरा भारत जानता है ठीक वही अंदाज में बेगुसराय में धारा 124 क देशद्रोही के आरोपी कन्हैया के विरुद्ध खड़े है| 
कुछ कानून जानने वाले का  कहना है कन्हैया कुमार पर जेएनयू कांड के बाद 1200 पेज की जो पटियाला कोर्ट में दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की है, इससे कन्हैया बचने  के लिए राजनीति  आशय की लालच में  चुनाव में उतारे है ताकि इन पर लगे मामले ढीला हो जाये| अब तो वक्त का इन्तजार करना होगा| बेगुसराय की जनता तय करेगी कि जेएनयू से यह देशद्रोह का आरोपी भविष्य में जेल में होगा या सदन में|





सोमवार, 1 अप्रैल 2019

देशद्रोह के आरोपी कन्हैया, ख़ालिद और अनिर्बान

जितेश कुमार 
कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य और 7 कश्मीरी छात्रों पर धारा 124 (क) देशद्रोही, धारा 323 जानबूझ कर चोट पहुँचाने, धारा 465 जालसाज़ी, धारा 71 फर्जी दस्तावेज, धारा 143 गैर-कानूनी ढंग से इकठ्ठा होना, धारा 149, धारा 147 उपद्रव करना और 120 आपराधिक साजिश के तहत आरोप दर्ज किये गये है. 
घटना के तीन वर्ष बाद दिल्ली पुलिस ने 14 जनवरी, 2019 को पटियाला कोर्ट में 1200 पेज के चार्जसीट दर्ज की. चार्जसीट में कुल 46 लोगों को आरोपी पाया गया है. इसमें 10 लोगों को सीधे तौर पर आरोपी
बनाया है. इनमें कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य और 7 कश्मीरी छात्र शामिल है. करीब 90 लोगों की गवाही दर्ज की गई है. गवाही चश्मदीद छात्रों और सिक्योरिटी गार्ड में तैनात लोगों की है. इसके अलावे सीडीआर (कॉल रिकॉर्ड) कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य के निकली गई है और नारेबाज़ी की 13 वीडिओ क्लिप्स भी शामिल की है, इसकी जाँच CFSC ने सही माना है. जैसा की पहले कुछ नेताओं, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने वीडियो फुटेज को फेंक और एडिटेड बताया था. इसके विपरीत पुलिस के हाथ लगी 13 वीडिओ क्लिप्स जाँच में सही पाए गये है. इसमें देशविरोधी नारे लगाते आरोपियों की आवाज़ और चेहरा पहचाना जा सकता है. 
आपको बता दे कि 9 फ़रवरी,2016 को JNU में कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य के अगुवाई में देशविरोधी नारे और प्रदर्शन किये गये थे. 9 फ़रवरी का दिन इन देशद्रोहियों के द्वारा इसलिए चुना गया था कि इसी दिन देश के सर्वाच्च सदन पर हमला करने वाले अफ़जल गुरु आतंकी को देश की सर्वाच्च अदालत ने फांसी की सजा दी थी. आतंकी अफ़जल के बरसी के दिन आयोजन रखना ही अपने आप में देशद्रोह का बहुत बड़ा सबूत है. खैर करीब तीन साल बाद पूरी मुस्तैदी से पुलिस ने सबूत जुटाए और वीडिओ फुटेज की जांच करने के बाद 1200 पेज के चार्जसीट दर्ज की है. अब ज्यादा दिन ये देशद्रोही खुली हवा में सांस नहीं ले सकते है. जैसे ही घटना पर सुनवाई शुरू होंगी. आरोपी जेल के अंदर होंगे. 
अभी धूम ले मुचलके पर खुब. ससुराल जाने से अब कोइ रोक नहीं सकता है. देखा जाये तो बहुत लोग संदेह करते थे, उनका मानना था कि कन्हैया देशद्रोही है, तो बाहर क्यू है? प्रशाशन और पुलिस मोदी जी के नियंत्रण में है, तो पकड़ों जेल में डालो. उन लोगों को पता होना चाहिए था, भारतीय संविधान में कार्यपालिका सरकार के हाथ में है, न्यायपालिका नहीं. न्याय, भारत में 20-22 साल से पहले संभव नहीं. अभी तो मामला दर्ज है. बिहार के थेथर नेता चाराचोर लालू यादव लगभग 20 साल बाद जेल पहुचे ऐसे ही ये सभी आरोपी शैन: शैन: जेल में होंगे.
सबूत : दिल्ली पुलिस द्वारा कोर्ट को सौपे गये है- 
1. घटना की रात (9 फ़रवरी) JNU में कन्हैया थे (गवाही, वहां उपस्थित छात्रों और सिक्युरिटी गार्ड ने दी)
2. उमर खालिद और कन्हैया बात की कॉल रिकॉर्ड  
3. SFSC के दौरान 13 वीडिओ फुटेज सही पाये गये है, (इसमें भारत के टुकड़े के नारे लगाते आरोपी दिखे है.) 
4. कन्हैया का फ़ोन लोकेशन, घटना स्थल पर पाया गया.
5. 90 लोगों की गवाही, कन्हैया के विरुद्ध.
6. JNU के गार्ड और चौकीदार की गवाही 
7. उमर ख़ालिद के हैंड राइटिंग में कार्यक्रम की अनुमति की परफार्मा.
8. कुछ छात्रों के जाली हस्त्ताक्षर.
के साथ और कई तथ्य दिल्ली पुलिस को बरामद हुई है, जिसके आधार पर दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट दायर की है.

रविवार, 24 मार्च 2019

भारत में न्याय से अपमानित कोई शब्द नहीं

प्रशासनिक भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर होते रहते हैं. शिकायत और दरख्वास्त तो साहब, आम लोगों को परेशान करने के लिए करते है. लोगों के हौसलों को चकनाचूर करने के लिए करते है. प्रशासनिक और अदालती कामकाज इतना पेचीदा है कि न्याय मांगने

वाले लोगों के पास कुछ नहीं बचता है, जमीन और ज़मीर दोनों नीलाम हो जाते हैं.
जब जब समाज की सेवा करने वाले, समाज को दिशा-दशा दिखाने वाले, समाज के प्रति कर्तव्य निष्ठ लोग और प्रशासनिक तंत्र निष्पक्षता को भूलता है. और लोभ-लालच, जातीय- मजहबी और धार्मिक रूप से एक पक्षीय होता है. स्वाभाविक है कि समाज के सज्जन शक्ति के पास सिर्फ उग्रता का मार्ग बचता है. जिस प्रकार न्यायालयों में करोड़ों लोगों की सुनवाई दशकों से चल रही है. तारीख पे तारीख की प्रक्रिया से समाज के सब्र का बांध अब टूटने लगा है. सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर भी प्रशासनिक और अदालती कार्यवाही ने छलावा किया है. श्री राम जन्मभूमि उनमें से एक है. करीब तीन दशक से यह मामला न्यायालय में है. लेकिन इस पर कोई प्राथमिकता सुप्रीम कोर्ट की दिखाई नहीं देती है. लोगों के सब्र का बांध और धैर्य टूट ना जाए और हिंदू समाज सड़कों पर खड़ा होकर अपने बाहुबल के द्वारा भव्य मंदिर निर्माण करें. इससे पहले हे धर्मराज कुर्सी , तुम्हारे ऊपर बैठे तुच्छ मनुष्यों के ह्रदय में न्याय की अलख जगाओ. न्याय क्या है? न्यायाधीशों को समझाओ. 
एक तरफ देश में अल्पसंख्यक-अल्पसंख्यक का रोना रोकर सरकारी जमीनों पर कब्जा कर मस्जिदों और इसके चारदीवारी का निर्माण चल रहा है. वही प्रशासन की मिलीभगत से वहां के समाज को दबाकर सरकारी जमीनों को मुस्लिम समुदायों को तोफे में दिया जा रहे  है. प्रशासनिक अधिकारी मुस्लिम समुदायों के साथ मिलकर पैसे की लालच में आम लोगों को दबाकर धड़ल्ले से सरकारी जमीनों पर मस्जिदों और इसके चारदीवारी का निर्माण करवा रहे हैं और मिठाइयां खा रहे है. सरकार और देश की न्यायालयों से पूछना चाहता हूं कि पिछले 10 वर्षों में कितने सरकारी जमीनों को दरगाह, मस्जिद, कब्रिस्तान के नाम पर मुस्लिमों से बेचा गया है. वोट बैंक की राजनीति ने समाज में पर्याप्त विध्वंस फैलाये है. इसका जिम्मेदार कौन? अगर न्याय प्रक्रिया समाज का साथ नहीं देगी तो एक सामाजिक युद्ध की शुरुआत करनी होगी, तब न्यायालय की बात कोई नहीं मानेगा. इससे पहले हे न्यायधीश उठो जागो और अपने कर्तव्य का पालन करो.
हाल में ही बिहार मुजफ्फरपुर के सरैया प्रखंड की घटना उजागर हुई है. जहां सरकारी जमीन को यहां के स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी ने पैसे लेकर मुस्लिम समुदाय को मस्जिद के चारदीवारी के लिए सौप दिया है. वहां के लोगों को डरा, धमकाकर और पुलिसकर्मियों की तैनाती कर मस्जिद के चारदीवारी का निर्माण कराया गया. लोगों का कहना है कि इसके लिए स्थानीय सीओ और एसडीओ को मोटी रकम मिली है. इस घटना में लिप्त थाना प्रभारी, सीईओ और एसडीओ घटनास्थल के घेराव कर,  स्थानीय लोगों को डरा धमका कर मस्जिद के चारदीवारी का निर्माण करवाया. जबकि यह निर्माण पूरी तरह अवैध है. इससे वहां तनाव के माहौल बने है. देखा जाये तो देश में  यह कोई आखरी और पहली घटना नहीं है. इस प्रकार के घटना देश में सैकड़ों नहीं, हजारों लाखों की तादात में है. कभी वोट बैंक के नाम पर तो कभी प्रशासनिक अधिकारियों के द्वारा घूस लेकर सरकारी जमीनों का इस्तेमाल मस्जिद, दरगाह, कब्रिस्तान और इसके चारदीवारी बनवाने के लिए किया गया है और अभी चल रहा है. संभवत: रोका नहीं गया तो आगे भी होते रहेगा. आखिरकार जिम्मेदार कौन? समाज की निष्क्रियता या सरकार की वोट बैंक की नीति या प्रशासन. जिम्मेदार जो भी हो अब वक्त आ गया इस प्रकार के मामलों पर शीघ्रता से करवाई करने की.

सोमवार, 11 मार्च 2019

#सर्फ़एक्सेल # जिहाद #होली - जितेश कुमार

सोशल मीडिया पर आज #सर्फऐक्सल के विरुद्ध कई लोगों ने अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दर्ज करायी है. सोशल मीडिया पर लोग ऐक्सल कंपनी को धर्म विरोधी और हिंदू विरोधी बता रहे है. तो किसी ने आस्था के साथ खिलवाड़ का आरोप लगाया है.  
आपको बता दें कि #दाग अच्छे हैं  #हिन्दू विरोधी एक्सेल को टैग करके लोगों ने जमकर एक्सेल कंपनी पर अपना गुस्सा प्रदर्शित किया है. दाग अच्छे हैं 
टैगलाइन से कई विज्ञापन सर्फ ऐक्सल के  टेलीविजन पर प्रसारित होते रहते हैं. जो कई लोगों को अच्छे भी लगते हैं. इसके कुछ विज्ञापन तो सदाचारी भी मालूम पड़ते थे. इसमें माता-पिता, दादा-दादी और दोस्तों की  मदद करते हुए दिखाया गया था. बच्चे इससे प्रभावित भी होते थे. लेकिन हाल में टेलीविजन पर दिखाई जाने वाले सर्फ ऐक्सल के इस विज्ञापन पर कई लोगों ने अपनी आपत्ति जताई है. फेसबुक, टि्वटर और व्हाट्सएप पर इसके विरूद्ध आंधी चल रही है. विज्ञापन में होली के त्यौहार को केंद्रबिंदु बनाकर दिखाए गये है. होली भारत में सर्वाधिक हर्ष और उल्लास के साथ मनाये जाने वाला त्यौहार है. बसंत का त्यौहार है, रंग और उमंग का त्यौहार है. ऐसे में होली की पवित्रता को देखते हुए लोगों ने इस विज्ञापन का कड़ा विरोध किया है. 
विज्ञापन के अनुसार:-
एक हिंदू बच्ची होली के दिन साईकिल लेकर गली में निकलती हैं. जहाँ छतों पर बच्चे बाल्टियों में रँगों से भरकर बलून रखें हुए है. बच्ची पूछती हैं, रँग फेंकना हैं तो फेंको. सभी बच्चे उस पर कलर बलून फेंकने लगते हैं. बच्ची गली में साईकिल घुमा घुमाकर रंगों से सरोबार हो जाती हैं. जब बच्ची पर रँग पड़ना बन्द हो जाते है. वो साइकिल रोककर छत पर खड़े बच्चों से पूछती हैं. हो गये रँग खत्म या औऱ हैं?
बच्चों के मना करते ही एक घर से सफ़ेद कुर्ता पजामा पहने मुस्लिम बच्चा बाहर निकलता हैं. जिसे हिन्दू बच्ची अपने साईकिल के पीछे बैठाकर मस्जिद छोड़ने जाती हैं. बच्चा कहता हैं "नमाज पढ़कर आता हूँ।" और उसी दौरान विज्ञापन में शबाना आजमी की आवाज सुनाई देती हैं.अपनो की मदद करने मे #दाग लगे तो "दाग" अच्छे हैं. यहाँ विज्ञापन में एक साथ कई निशाने साधे हैं. पहला होली के पवित्र रँगों को "दाग" कहने की चेष्टा की गई. वह भी अन्य मज़हब के लिये. बच्ची द्वारा होली के रंगों में सरोबार होना. सर्फ विज्ञापन में "दाग" नजर आते है. एक प्रकार से नमाज की पवित्रता औऱ आवश्यकता होली के त्यौहार से अधिक महत्वपूर्ण बताने की इसमें चतुराई पूर्वक कुत्सित प्रयास किया गया हैं.
वही भड़के लोगों ने न्यायिक प्रक्रिया पर भी जम कर बरस रहे है. कुछ लोगों ने तो यहाँ तक लिखा है कि सिर्फ हिंदुओं ने ही अपने आपको इतना सस्ता कर लिया है कि मिलार्ड, केजरी, ममता, बुद्धिजीवी, मीडिया, जेहादी, टुकड़े टुकड़े गैंग, वामपंथी,सेक्युलर कीड़े या जिसका भी दिल करे वही करता है, छेड़छाड़ इनकी परम्पराओं और धार्मिक मान्यताओं से. ये कुछ नहीं करेंगे. मरी हुई कौम है.
साथ ही कई लोगों ने निवेदक भी किया है. सर्फ एक्सेल का बहिष्कार कीजिए. अपनी बहुसंख्यक आर्थिक ताकत से इसे झुकाइये. ताकि सर्फ एक्सेल ये विज्ञापन वापिस ले औऱ भविष्य में दोबारा ऐसा दुःसाहस न करे.
और खूब होली खेलिए खुशियों के रंग अपने त्योहारों के संग!
#BuycutSurfExcel #SufExcel #Holi 
#Jihad #Propeganda #SurfAd 
#SurfExcelAd #BoyCottSufexcel

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2019

3rd डिग्री नवजीत सिहं सिद्धू और अय्यर को दो

देश भुला नहीं है कॉग्रेस के दोनों नेताओं को मणिशंकर

  • अय्यर और नवजीत सिंह सिद्धू| जिन्होंने पाकिस्तान जाकर, पाक को शांति प्रिय देश और भारतीय सेना को उग्र बताया था| अय्यर ने तो यहां तक कहा था कि भारत से ज्यादा प्यार मुझे पाकिस्तान ने मिला है| कल जो घटना घटी है काश्मिर घाटी में उसकी जवाबदेही और पुर्व सुचना किसी भारतीय के पास होना हो तो हम जनता के लोग सरकार, प्रशासन और सेना को कहेंगे कॉग्रेस के दोनों

नेता को गिरफ्तार करो और 3rd डीग्री दो सच खुद-ब-खुद बाहर आ जायेगा|मणिशंकर अय्यर पहले से ही पाकिस्तान का लाडला है और वर्तमान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने क्रिकेटर इमरान खान से नवजीत सिंह का रिस्ता बहुत ही चर्चित है| गर पाकिस्तान इस आतंकी साजिश में जिम्मेदार है तो सिद्धू और अय्यर क्यू नहीं! 
इस लिए आतंकवाद से लड़ाई होनी है तो महाभारत के उस श्लोक को आत्मसात करना होगा| जिसका अर्थ यह कहता है जिसे राष्ट्र प्यारा ना हो, वह कितना भी अपना क्यू ना हो, उसे दुश्मन की तरह त्याग देना चाहिए| आज पाकिस्तान से इस कायराना हमला के जवाबी करवाई में उन हाथों को भी काट कर फेंकने का समय आ गया है जो आतंकिस्तान के गुण गाते थे| जो भारतीय सेना पर ही आरोप लगाते थे| ऐसे लोगों को प्राथमिकता के आधार पर पकड़कर 3rd डीग्री दो|
जरूर पाकिस्तान परस्त नेताओं से इस घटना के कुछ साबुत मिल सकते है| हमें इस कायराना हमला का मुंहतोड़ जवाब देना है तो उस हाथ को कटना जरूरी हो जाता है जो पाक के लिए, पाक के पक्ष में उठते रहे है जो भारतीय सेना के विरोध में उठे, जो काश्मीर में पत्थरबाज और उसके समर्थन के रूप में उठे है| पकड़ो सिद्धू को और अय्यर को दो 3rd डीग्री| हम जनता के लोग चाहते है कि बदला लेने़ से पहले घर के बैरी को समाप्त करो| खोज-खोज के मारो|
कल के इस आतंकी हमला का जिम्मेदार कौन है? इस प्रश्न को देश के जनता को सोचना और समझना पड़ेगा| आखिर कीड़े-मकोड़े के समान दिखने वाला पाकिस्तान हम पर बार-बार आक्रमण क्यू करता है? इसके पीछे यह भी एक सत्य है की कोई भी स्थान पर किसी कायराना हमला को अंजाम देना हो| तभी सफल होगा जब वहां के लोग दुश्मन के दोस्त और राष्ट्र के गद्दार होंगे| भारत में बार-बार जिस तरह से आतंकी हमला होता आया है, इसके भी पीछे काश्मीरियों का हाथ है कोई बंदूक तो, कोई गोला बारूद, तो कोई उनको रहने और फुल प्लानिंग करने के लिए स्थान दिये होंगे, तो कोई पाकिस्तान के पक्ष में अपने छद्म राष्ट्रवाद के नाते उसको सहयोग पहूंचाया है तभी उसका हौसला इतना बढ़ा है|

शनिवार, 3 नवंबर 2018

मुगलों के खून में यौनशोषण! - जितेश सिंह

पढ़े यौन अपराध किसकी की देन है? मेरा निवेदन है एक बार समय निकाल कर पढ़ियेगा जरूर! आखिर भारत जैसे देवियों को पूजने वाले देश में बलात्कार की गन्दी मानसिकता कहाँ से आयी? आखिर क्या बात है कि जब प्राचीन भारत के रामायण, महाभारत आदि लगभग सभी हिन्दू-ग्रंथ के उल्लेखों में अनेकों लड़ाईयाँ लड़ी और जीती गयीं, परन्तु विजेता सेना द्वारा किसी भी स्त्री का बलात्कार होने का जिक्र नहीं है। अब आखिर ऐसा क्या हो गया कि आज के आधुनिक भारत में बलात्कार रोज की सामान्य बात बन कर रह गयी है? 

 ईसापूर्व इतिहास में~220-175 ईसापूर्व में यूनान के शासक "डेमेट्रियस प्रथम" ने भारत पर आक्रमण किया। 183 ईसापूर्व के लगभग उसने पंजाब को जीतकर साकल को अपनी राजधानी बनाया और पंजाब सहित सिन्ध पर भी राज किया। लेकिन उसके पूरे समयकाल में बलात्कार का कोई जिक्र नहीं। इसके बाद "युक्रेटीदस" भी भारत की ओर बढ़ा और कुछ भागों को जीतकर उसने "तक्षशिला" को अपनी राजधानी बनाया। बलात्कार का कोई जिक्र नहीं। "डेमेट्रियस" के वंश के मीनेंडर (ईपू 160-120) ने नौवें बौद्ध शासक "वृहद्रथ" को पराजित कर सिन्धु के पार पंजाब और स्वात घाटी से लेकर मथुरा तक राज किया परन्तु उसके शासनकाल में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं मिलता। "सिकंदर" ने भारत पर लगभग 326-327 ई .पू आक्रमण किया जिसमें हजारों सैनिक मारे गए के बाद भी "यूनानियों" (यवनों) की सेनाओं ने किसी भी भारतीय महिला के साथ बलात्कार

 जितेश सिंह 

नहीं किया और न ही "धर्म परिवर्तन" करवाया। इसके बाद "शकों" ने भारत पर आक्रमण किया (जिन्होंने ई.78 से शक संवत शुरू किया था)। "सिन्ध" नदी के तट पर स्थित "मीननगर" को उन्होंने अपनी राजधानी बनाकर गुजरात क्षेत्र के सौराष्ट्र , अवंतिका, उज्जयिनी,गंधार,सिन्ध,मथुरा समेत महाराष्ट्र के बहुत बड़े भू भाग पर 130 ईस्वी से 188 ईस्वी तक शासन किया। परन्तु इनके राज्य में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं। इसके बाद तिब्बत के "युइशि" (यूची) कबीले की लड़ाकू प्रजाति "कुषाणों" ने "काबुल" और "कंधार" पर अपना अधिकार कायम कर लिया। जिसमें "कनिष्क प्रथम" (127-140ई.) नाम का सबसे शक्तिशाली सम्राट हुआ। जिसका राज्य "कश्मीर से उत्तरी सिन्ध" तथा "पेशावर से सारनाथ" के आगे तक फैला था। कुषाणों ने भी भारत पर लम्बे समय तक विभिन्न क्षेत्रों में शासन किया। परन्तु इतिहास में कहीं नहीं लिखा कि इन्होंने भारतीय स्त्रियों का बलात्कार किया हो। इसके बाद "अफगानिस्तान" से होते हुए भारत तक आये"हूणों" ने 520 AD के समयकाल में भारत पर अधिसंख्य बड़े आक्रमण किए और यहाँ पर राज भी किया। ये क्रूर तो थे परन्तु बलात्कारी होने का कलंक इन पर भी नहीं लगा। इन सबके अलावा भारतीय इतिहास के हजारों साल के इतिहास में और भी कई आक्रमणकारी आये जिन्होंने भारत में बहुत मार काट मचाई जैसे "नेपालवंशी" "शक्य" आदि, पर बलात्कार शब्द भारत में तब तक शायद ही किसी को पता था।
     
अब आते हैं मध्यकालीन भारत में जहाँ से शुरू होता है इस्लामी आक्रमण~और यहीं से शुरू होता है भारत में बलात्कार का प्रचलन। सबसे पहले 711 ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर हमला करके राजा "दाहिर" को हराने के बाद उसकी दोनों "बेटियों" को "यौनदासियों" के रूप में "खलीफा" को तोहफा भेज दिया। तब शायद भारत की स्त्रियों का पहली बार बलात्कार जैसे कुकर्म से सामना हुआ जिसमें "हारे हुए राजा की बेटियों" और "साधारण भारतीय स्त्रियों" को इस्लामी सेना" द्वारा बुरी तरह से बलात्कार और अपहरण किया गया। फिर आया 1001 इस्वी में गजनवी| इसके बारे में ये कहा जाता है कि इसने "इस्लाम को फ़ैलाने" के उद्देश्य से ही आक्रमण किया था। सोमनाथ के मंदिर को तोड़ने के बाद इसकी सेना ने हजारों "हिन्दू औरतों" का बलात्कार किया फिर उनको अफगानिस्तान ले जाकर "बाजारों में बोलियाँ" लगाकर"जानवरों" की तरह "बेच" दिया। फिर मोहम्मद ग़ोरी ने 1192 में "पृथ्वीराज चौहान" को हराने के बाद भारत में "इस्लाम का प्रकाश" फैलाने के लिए "हजारों काफिरों" को मौत के घाट उतर दिया और उसकी "फौज" ने "अनगिनत हिन्दू स्त्रियों" के साथ बलात्कार कर उनका "धर्म-परिवर्तन"करवाया। मुहम्मद बिन कासिम से लेकर सुबुक्तगीन, बख्तियार खिलजी, जूना खाँ उर्फ अलाउद्दीन खिलजी, फिरोजशाह, तैमूरलंग, आरामशाह, इल्तुतमिश, रुकुनुद्दीन फिरोजशाह, मुइजुद्दीन बहरामशाह, अलाउद्दीन मसूद, नसीरुद्दीन महमूद, गयासुद्दीन बलबन, जलालुद्दीन खिलजी, शिहाबुद्दीन उमर खिलजी, कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी, नसरत शाह तुगलक, महमूद तुगलक, खिज्र खां, मुबारक शाह, मुहम्मद शाह, अलाउद्दीन आलम शाह, बहलोल लोदी, सिकंदर शाह लोदी, बाबर, नूरुद्दीन सलीम जहांगीर, अपने हरम में "8000 रखैलें रखने वाला शाहजहाँ। इसके आगे अपने ही दरबारियों और कमजोर मुसलमानों की औरतों से अय्याशी करने के लिए "मीना बाजार" लगवाने वाला "जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर"। मुहीउद्दीन मुहम्मद से लेकर औरंगजेब तक बलात्कारियों की ये सूची बहुत लम्बी है। जिनकी फौजों ने हारे हुए राज्य की लाखों "हिन्दू महिलाओं" "(माल-ए-गनीमत)"का बेरहमी से बलात्कार किया और "जेहाद के इनाम" के तौर पर कभी वस्तुओं की तरह "सिपहसालारों" में बांटा तो कभी बाजारों में "जानवरों की तरह उनकी कीमत लगायी" गई। ये असहाय और बेबस महिलाएं "हरमों" से लेकर"वेश्यालयों" तक में पहुँची। इनकी संतानें भी हुईं पर वो अपने मूलधर्म में कभी वापस नहीं पहुँच पायीं। वास्तव में मध्यकालीन भारत में मुगलों द्वारा"पराजित हिन्दू (काफिर) स्त्रियों का बलात्कार" करना एक आम बात थी क्योंकि वो इसे "अपनी जीत" या "जिहाद का इनाम" (माल-ए-गनीमत) मानते थे। केवल यही नहीं इन सुल्तानों द्वारा किये अत्याचारों और असंख्य बलात्कारों के बारे में आज के किसी इतिहासकार ने नहीं लिखा। बल्कि खुद इन्हीं सुल्तानों के साथ रहने वाले लेखकों ने बड़े ही शान से अपनी कलम चलायीं और बड़े घमण्ड से अपने मालिकों द्वारा काफिरों को सबक सिखाने का विस्तृत वर्णन किया। गूगल के कुछ लिंक्स पर क्लिक करके हिन्दुओं और हिन्दू महिलाओं पर हुए "दिल दहला" देने वाले अत्याचारों के बारे में विस्तार से जान पाएँगे। वो भी पूरे सबूतों के साथ। इनके सैकड़ों वर्षों के खूनी शासनकाल में भारत की हिन्दू जनता अपनी महिलाओं का सम्मान बचाने के लिए देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भागती और बसती रहीं। इन मुस्लिम बलात्कारियों से सम्मान-रक्षा के लिए हजारों की संख्या में हिन्दू महिलाओं ने स्वयं को जौहर की ज्वाला में जलाकर भस्म कर लिया। ठीक इसी काल में कभी स्वच्छंद विचरण करने वाली भारतवर्ष की हिन्दू महिलाओं को भी मुस्लिम सैनिकों की दृष्टि से बचाने के लिए पर्दा-प्रथा की शुरूआत हुई। महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार का इतना घिनौना स्वरूप तो 17वीं शताब्दी के प्रारंभ से लेकर 1947 तक अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भी नहीं दिखीं। अंग्रेजों ने भारत को बहुत लूटा परन्तु बलात्कारियों में वे नहीं गिने जाते। 1946 में मुहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन प्लान, 1947 विभाजन के दंगों से लेकर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम तक तो लाखों हिन्दू(काफिर) महिलाओं का बलात्कार हुआ या फिर उनका अपहरण हो गया। फिर वो कभी नहीं मिलीं। इस दौरान स्थिती ऐसी हो गयी थी कि "पाकिस्तान समर्थित मुस्लिम बहुल इलाकों" से "बलात्कार" किये बिना एक भी "हिन्दू (काफिर) स्त्री" वहां से वापस नहीं आ सकती थी। विभाजन के समय पाकिस्तान के कई स्थानों में सड़कों पर काफिर स्त्रियों की "नग्न यात्राएं (धिंड) "निकाली गयीं, "बाज़ार सजाकर उनकी बोलियाँ लगायी गयीं"और 10 लाख से ज्यादा की संख्या में उनको दासियों की तरह खरीदा बेचा गया। 20 लाख से ज्यादा महिलाओं को जबरन मुस्लिम बना कर अपने घरों में रखा गया।
इस विभाजन के दौर में हिन्दुओं को मारने वाले सबके सब विदेशी नहीं थे। इन्हें मारने वाले स्थानीय मुस्लिम भी थे। वे समूहों में कत्ल से पहले हिन्दुओं के अंग-भंग करना, आंखें निकालना, नाखुन खींचना, बाल नोचना, जिंदा जलाना, चमड़ी खींचना खासकर महिलाओं का बलात्कार करनेके बाद उनके "स्तनों को काटकर" तड़पा-तड़पा कर मारना आम बात थी। अंत में कश्मीर की बात 19 जनवरी 1990 सारे कश्मीरी पंडितों के घर के दरवाजों पर नोट लगा दिया जिसमें लिखा था "या तो मुस्लिम बन जाओ या मरने के लिए तैयार हो जाओ या फिर कश्मीर छोड़कर भाग जाओ लेकिन अपनी औरतों को यहीं छोड़कर"। लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पण्डित संजय बहादुर उस मंजर को याद करते हुए आज भी सिहर जाते हैं। वह कहते हैं कि "मस्जिदों के लाउडस्पीकर" लगातार तीन दिन तक यही आवाज दे रहे थे कि यहां क्या चलेगा,"निजाम-ए-मुस्तफा", 'आजादी का मतलब क्या "ला इलाहा इलल्लाह", 'कश्मीर में अगर रहना है, "अल्लाह-ओ-अकबर"कहना है।~और 'असि गच्ची पाकिस्तान, बताओ "रोअस ते बतानेव सान" जिसका मतलब था कि हमें यहां अपना पाकिस्तान बनाना है, कश्मीरी पंडितों के बिना मगर कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ। सदियों का भाईचारा कुछ ही समय में समाप्त हो गया जहाँ पंडितों से ही तालीम हासिल किए लोग उनकी ही महिलाओं की अस्मत लूटने को तैयार हो गए थे। सारे कश्मीर की मस्जिदों में एक टेप चलाया गया। जिसमें मुस्लिमों को कहा गया की वो हिन्दुओं को कश्मीर से निकाल बाहर करें। उसके बाद कश्मीरी मुस्लिम सड़कों पर उतर आये। उन्होंने कश्मीरी पंडितों के घरों को जला दिया, कश्मीर पंडित महिलाओ का बलात्कार करके, फिर उनकी हत्या करके उनके "नग्न शरीर को पेड़ पर लटका दिया गया"। कुछ महिलाओं को बलात्कार कर जिन्दा जला दिया गया और बाकियों को लोहे के गरम सलाखों से मार दिया गया। कश्मीरी पंडित नर्स जो श्रीनगर के सौर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में काम करती थी, का सामूहिक बलात्कार किया गया और मार मार कर उसकी हत्या कर दी गयी। बच्चों को उनकी माँ के सामने स्टील के तार से गला घोंटकर मार दिया गया। कश्मीरी हिन्दू महिलाएँ पहाड़ों की गहरी घाटियों और भागने का रास्ता न मिलने पर ऊंचे मकानों की छतों से कूद कूद कर जान देने लगीलेखक राहुल पंडित उस समय 14 वर्ष के थे। बाहर माहौल ख़राब था। मस्जिदों से उनके ख़िलाफ़ नारे लग रहे थे। पीढ़ियों से उनके भाईचारे से रह रहे पड़ोसी ही कह रहे थे, 'मुसलमान बनकर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो या वादी छोड़कर भागो'। राहुल पंडिता के परिवार ने तीन महीने इस उम्मीद में काटे कि शायद माहौल सुधर जाए। राहुल आगे कहते हैं,"कुछ लड़के जिनके साथ हम बचपन से क्रिकेट खेला करते थे, वही हमारे घर के बाहर पंडितों के ख़ाली घरों को आपस में बांटने की बातें कर रहे थे और हमारी लड़कियों के बारे में गंदी बातें कह रहे थे। ये बातें मेरे ज़हन में अब भी ताज़ा हैं। 1989 में कश्मीर में जिहाद के लिए गठित जमात-ए-इस्लामी संगठन का नारा था- 'हम सब एक, तुम भागो या मरो'। घाटी में कई कश्मीरी पंडितों की बस्तियों में सामूहिक बलात्कार और लड़कियों के अपहरण किए गए। हालात और बदतर हो गए थे। कुल मिलाकर हजारों की संख्या में हिन्दू(काफिर) महिलाओं का बलात्कार किया गया। आज आप जिस तरह दाँत निकालकर धरती के जन्नत कश्मीर घूमकर मजे लेने जाते हैं और वहाँ के लोगों को रोजगार देने जाते हैं। उसी कश्मीर की हसीन वादियों में आज भी सैकड़ों कश्मीरी हिन्दू बेटियों की बेबस कराहें गूंजती हैं, जिन्हें केवल "हिन्दू(काफिर)" होने की सजा मिली। घर, बाजार, हाट, मैदान से लेकर उन खूबसूरत वादियों में न जाने कितनी जुल्मों की दास्तानें दफन हैं जो आज तक अनकही हैं। घाटी के खाली, जले मकान यह चीख-चीख के बताते हैं कि रातों-रात दुनिया जल जाने का मतलब कोई हमसे पूछे। झेलम का बहता हुआ पानी उन रातों की वहशियत के गवाह हैं जिसने कभी न खत्म होने वाले दाग इंसानियत के दिल पर दिए। लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पंडित रविन्द्र कोत्रू के चेहरे पर अविश्वास की सैकड़ों लकीरें पीड़ा की शक्ल में उभरती हुईं बयान करती हैं कि यदि आतंक के उन दिनों में घाटी की मुस्लिम आबादी ने उनका साथ दिया होता जब उन्हें वहां से खदेड़ा जा रहा था, उनके साथ कत्लेआम हो रहा था तो किसी भी आतंकवादी में ये हिम्मत नहीं होती कि वह किसी कश्मीरी पंडित को चोट पहुंचाने की सोच पाता लेकिन तब उन्होंने हमारा साथ देने के बजाय कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेक दिए थे या उनके ही लश्कर में शामिल हो गए थे। अभी हाल में ही आप लोगों ने टीवी पर "अबू बकर अल बगदादी" के जेहादियों को काफिर "यजीदी महिलाओं" को रस्सियों से बाँधकर कौड़ियों के भाव बेचते देखा होगा। पाकिस्तान में खुलेआम हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर सार्वजनिक रूप से मौलवियों की टीम द्वारा धर्मपरिवर्तन कर निकाह कराते देखा होगा। बांग्लादेश से भारत भागकर आये हिन्दुओं के मुँह से महिलाओं के बलात्कार की हजारों दुःखद घटनाएँ सुनी होंगी। यहाँ तक कि म्यांमार में भी एक काफिर बौद्ध महिला के बलात्कार और हत्या के बाद शुरू हुई हिंसा के भीषण दौर को देखा होगा। केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनियाँ में इस सोच ने मोरक्को से ले कर हिन्दुस्तान तक सभी देशों पर आक्रमण कर वहाँ के निवासियों को धर्मान्तरित किया, संपत्तियों को लूटा तथा इन देशों में पहले से फल फूल रही हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता का विनाश कर दिया। परन्तु पूरी दुनियाँ में इसकी सबसे ज्यादा सजा महिलाओं को ही भुगतनी पड़ी| बलात्कार के रूप में आज सैकड़ों साल की गुलामी के बाद समय बीतने के साथ धीरे-धीरे ये बलात्कार करने की मानसिक बीमारी भारत के पुरुषों में भी फैलने लगी। जिस देश में कभी नारी जाति शासन करती थीं, सार्वजनिकरूप से शास्त्रार्थ करती थीं, स्वयंवर द्वारा स्वयं अपना वर चुनती थीं, जिन्हें भारत में देवियों के रूप में श्रद्धा से पूजा जाता था आज उसी देश में छोटी-छोटी बच्चियों तक का बलात्कार होने लगा और आज इस मानसिक रोग का ये भयानक रूप देखने को मिल रहा है।

बुधवार, 31 अक्टूबर 2018

2001: बॊस्टन हवाई अड्डे अमरीका के एफ़.बी.आई ने राहुल को गिरफ्तार कर लिया था। - हिन्दू भूमि

देश जानता है कि सन 2001 के दौरान जब राहुल गाँधी और उसकी प्रेमिका वेरोनिका जो की कंबोडियन ड्रग्स तस्कर की बेटी है  अमरीका जा रहे थे तो उसे बॊस्टन हवाई अड्डे पर

गिरफ्तार कर लिया गया था। कारण था कि वह अवैध तरीके से अपने साथ हेरोइन नाम का ड्रग्स और 1.6 लाख डॉलर ले जा रहा था। अमरीका मॆं यह जघन्य अपराध है इस के लिये कडी सी कडी सजा भी दी जाती है। अमरीका के एफ़.बी.आई ने राहुल को गिरफ्तार कर लिया और उसे पूछ्ताछ के लिये हिरासत में लिया।
अपने एक मात्र युवराज के गिरफ्तारी से बौखलायी काँग्रेस की राजमाता बिलबिलाने लगी और उस वक़्त के प्रधानमंत्री अटल जी से अपने बेटे की रिहाई की दुहाई माँगी। हालाकी ग्रेव एक्ट के चलते राहुल की रिहाई मुमकिन तो नहीं था। उसे कम से कम 50 साल कैद की सजा होती। लेकिन अटल जी ने अपनी सारी शक्ति का प्रयॊग राहुल कॊ छुडाने में लगा दिया। उन्होने अपनॆ निजी कार्यदर्शी ब्रिजेष मिश्रा कॊ काँडॊंलिना रैस से बातचीत करने कॊ कहा। उनके अथक प्रयासों के बाद राहुल को छुडाया गया। क्यॊंकी यहाँ बात राहुल या काँग्रेस की नहीं बल्की देश की थी। दुनिया हम पर हँसती की देश एक पार्टी जिसने देश पर सत्ता किया वह ड्रग्स की तस्करी करता है। इस केस को भारत के गुप्त विभाग द्वारा हमेशा के लिए छुपा दिया गया । राहुल को छुडाने के बदले में मॆडम जी ने आनेवाले चुनावॊं मॆं सँवीधानिक रूप से ही लडने का वादा किया था। लेकिन गद्दारी तो उनके खून में ही बहती है। जैसे ही बॆटा जेल से बाहर हुआ मॆडम्जी ने अपना असली रूप दिखाया और आज आप सब देख ही रहे है...

खबर की पुष्टता :-

१. http://www.dainik-bharat.org/2017/10/50_21.html

२. http://www.thehindu.com/2001/09/30/stories/02300003.htm

३. http://zeenews.india.com/news/india/rahul-gandhi-was-caught-in-us-with-drugs-vajpayee-got-him-released-swamy_1634107.html

४. https://www.quora.com/Why-did-Atal-Bihari-Vajpayees-government-save-Rahul-Gandhi-when-he-was-detained-by-the-FBI-at-the-Boston-Airport-in-America-along-with-drugs-and-an-illegal-amount-of-cash

५. https://googleweblight.com/i?u=http://storify.com/aashish81us/sept-27-2001-rahul-gandhi-and-his-girl-friend-vero&grqid=HpqeDk5_&hl=en-IN

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2018

गैर-गुजरातियों के पलायन पीछे जिम्मेदार क्षेत्रवादी नेता! - जितेश सिंह

गुजरात में हिंसात्मक माहौल के बीच बिहार, यूपी सहित कई गैर-गुजराती श्रमिकों का पलायन जारी है| गैर-गुजरातियों के घर-घर जाकर उनके परिवारों को धमकाया जा रहा है| उन्हें गुजरात से तुरंत भागने को कहा जा रहा है| 'शीध्रता से गुजरात नहीं छोड़ने पर इसका अंजाम बुरा होगा' धमकी दिया जा रहा है| बीते दिन कई ऐसे मामले उभर कर आये है| प्रशासन के सख्त कार्यवाही की बात तो की है| फिर भी भय बना हुआ है; लोगों का पलायन जारी है| गुजरात से आने वाली सभी ट्रेनें खचाखच भर-भर कर आ रही है|
जिससे वहां के तनाव और डर का अंदाजा लगाया जा सकता है| गुजरात के उत्तरी हिस्सा में प्रदर्शन हिंसात्मक रूप धारण किये हुए है| 'गुरजात खाली करो; गैर-गुजरातियों' का नारा जोरों पर है तो इसके साथ दंगा और हिंसात्मक माहौल भी जोर पकड़े हुए हैं| बाहरी श्रमिकों के साथ मार-पीट कर के उन्हें पलायन को मजबूर किया जा रहा है| खासकर बिहार-यूपी के श्रमिक इस हिंसा और उत्पीडन के केंद्र-बिंदु है|
ऐसे में सवाल और बवाल उठना स्वभाविक है कि कौन गुजरातियों में इस प्रकार से हिंसात्मक जहर घोल रहा है? इस क्षेत्रवादी राजनीति के पीछे कौन है? जो अपनी राजनीति रोटी सेकने के लिए हिंसा करवा रहा है? कौन श्रमिकों को जान से मारने की धमकी दे रहा है?
सोशल मिडिया पर लगातार बाहरी लोगों और श्रमिकों के खिलाफ भड़काऊ वीडियो पोस्ट और शेयर किया जा रहा है| सोशल मिडिया पर गैर-गुजराती लोगों को धमकाने और घर खाली करने की चेतावनी वाले वीडियो भी सामने आये है| इसमे कांग्रेस के कुछ नेता को भी धमकी देते देखा जा सकता है| उत्तरी क्षेत्र में बसे गैर-गुजराती लोग पुलिस के तमाम प्रबंधन के बावजूद वे अपनी और परोजनों की सुरक्षा को लेकर काफी भयभीत है| जिसके एवज पलायन को मजबूर है|
गैर-गुजराती पर अचानक हुए हमलों के बाद ख़ुफ़िया विभाग अलर्ट हो गया है| माना जा रहा है कि किसी साजिश के तहत यह हमले हुए है| अब तक प्रशासनिक कार्यवाही में 42 मामले दर्ज कर 342 लोगों की गिरफ़्तारी की गयी है| सोशल मिडिया के दुरुपयोग और अफवाह फ़ैलाने के मामले में भी 6 लोगों को पकड़ा गया है| इस कांड से सम्बंधित गिरफ्तारी साबरकाठा में 95, महेसाणा जिले में 89, अहमदाबाद में 73, गांधीनगर में 27, अरावल्ली में 20, अहमदाबाद के ग्रामीण क्षेत्रों में 36 और सुरेंद्रनगर में 2 लोगों की हुई है|
इस प्रकरण की शुरुआत एक रेप केस के बाद हुई| कुछ दिन पहले उत्तर गुजरात के साबरकांठा जिले के ग्रामीण क्षेत्र में ठाकोर समाज के 14 वर्ष की एक बालिका के साथ बिहार के मूल निवासी एक फैक्ट्री श्रमिक के कथित तौर पर दुष्कर्म से स्थानीय लोगों में गुस्सा और तनातनी का माहौल बना गया|
जिसके खिलाफ अल्पेश ठाकोर और कांग्रेस के एक विधायक ने भड़काऊ बयान जारी किये थे| जिसके बाद वहाँ हिंसा शुरू हो गई| देखते-देखते समूचे उत्तरी गुजरात के भाग को इस हिंसा ने अपने चपेट में ले लिया| जिसके बाद गैर-गुजराती श्रमिकों को योजना बनाकर भीड़ में मार-पीट की गयी| अधिकतर हमले तब हुए जब शाम से समय श्रमिक फैक्ट्रियों में शिफ्ट बदलने पर बाहर निकलते थे|
ठाकोर परिवार के जिस बालिका के साथ इस प्रकार के निदानात्मक घटना हुई है| उनके साथ प्रशासन खड़ा हो और आरोपी को जल्द-जल्द कड़ी सजा दी जाये| जिससे लोगों का क्रोध शांत हो और शांति का वातावरण स्थापित हो| कई बार न्याय में देरी के कारण ऐसी घटना होती है| लोगों के आक्रोश का गलत फायदा क्षेत्रवाद और जातिवाद करने वाले राजनीतिक लोग उठाते है|
एक सवाल यह भी है कि जो लोग गरीबों और नीचे जाति के लोगों के नेता बनाने का ढोंग करते फिरते है| नीची जाति को भड़का कर अपनी राजनीति गाड़ी चलाते है|

जितेश सिंहपत्रकारिता छात्र

वैसे ही नेतागण गुजरात की इस घटना में सामिल है| उनसे पूछा जाना चाहिए अन्य श्रमिकों की क्या गलती थी? और जिसको मारा पीटा गया है, गुजरात छोड़ने को धमकाया गया है; उसकी जाति क्या है? कौन से वर्ग के लोग इसके शिकार हुए है?                     
                 

सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

जातिवाद के कारण खतरे में "हिंदुत्व" - अंकित पचौरी

आज जो परिस्थितियां देश में पैदा हुई है । उसे समाज भलि-भांति जानता है। अपनी राजनीति और लोकप्रियता को बढ़ाने के एवज में कुछ लोगों ने देश की अखंडता को भी बलि का बकरा बना दिया। आजादी के इतने समय बाद भी इस तरीके के षडयंत्रो

            अंकित पचौरी

          यूवा पत्रकार 

का सफल होना वाकई दुखद और शर्मनाक है। आज जहाँ लोग चांद से लेकर मंगल की सफल यात्रा कर रहे है | वहीं पूर्व में विश्व गुरु रहा हमारा 'भारत' जातिय भेदभाव और जातिय समीकरण की राजनीति में पिछड़ता जा रहा है। ऐसे आंदोलनकारी लोगों को देख कर मुझे भेड़ की याद आती है। 
देश में कई अन्य समस्याओं ने भी डेरा डाल रखा है, लेकिन गरीबी, शिक्षा, बेरोजगारी की समस्या छोड़ कर सिर्फ ये आंदोलनकारियों को एट्रोसिटी एक्ट कानून ही दिखा जैसे मानो इस कानून को पुनः स्वरूप मिलने से देश मे कयामत आने वाली हो। 
एक महाशय है जो आंदोलन को आगे लेकर गए जिनका नाम बहुत ही खूबसूरत और पवित्र है, पर उनके कर्म और भड़काऊ भाषण को आप क्या मानते है, ये हम पर निर्भर करता है। देश में समाज को प्रेम और एकता का संदेश देने वाले लोगों ने ही देश में जातिवाद का फिर एक गहरा जख्म दे दिया है। बस डर तो इतना सा है, कही ये जख्म धारदार हो गया तो हिंदुत्व खतरे में पड़ जायेगा। लेकिन इतना तो साफ है भविष्य में नेता बनने और बनाने वाले लोगों को हिंदुत्व की तो फीकर नही है, पर सत्ता की चिंता रात के सपने में भी सताती रहती है। 


                                             अंकित पचौरी
                                             युवा पत्रकार

कांग्रेस की निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में भारी गिरावट के पूर्वानुमान

भविष्य में क्या होंगी, मैं नहीं जनता हूँ |  इस दौर में बहुत लोग अभिव्यक्ति की आजादी का अलाप जप रहे है |  तो मुझे भी संविधान के धारा  19  क...