प्रशासनिक भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर होते रहते हैं. शिकायत और दरख्वास्त तो साहब, आम लोगों को परेशान करने के लिए करते है. लोगों के हौसलों को चकनाचूर करने के लिए करते है. प्रशासनिक और अदालती कामकाज इतना पेचीदा है कि न्याय मांगने
वाले लोगों के पास कुछ नहीं बचता है, जमीन और ज़मीर दोनों नीलाम हो जाते हैं.
जब जब समाज की सेवा करने वाले, समाज को दिशा-दशा दिखाने वाले, समाज के प्रति कर्तव्य निष्ठ लोग और प्रशासनिक तंत्र निष्पक्षता को भूलता है. और लोभ-लालच, जातीय- मजहबी और धार्मिक रूप से एक पक्षीय होता है. स्वाभाविक है कि समाज के सज्जन शक्ति के पास सिर्फ उग्रता का मार्ग बचता है. जिस प्रकार न्यायालयों में करोड़ों लोगों की सुनवाई दशकों से चल रही है. तारीख पे तारीख की प्रक्रिया से समाज के सब्र का बांध अब टूटने लगा है. सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर भी प्रशासनिक और अदालती कार्यवाही ने छलावा किया है. श्री राम जन्मभूमि उनमें से एक है. करीब तीन दशक से यह मामला न्यायालय में है. लेकिन इस पर कोई प्राथमिकता सुप्रीम कोर्ट की दिखाई नहीं देती है. लोगों के सब्र का बांध और धैर्य टूट ना जाए और हिंदू समाज सड़कों पर खड़ा होकर अपने बाहुबल के द्वारा भव्य मंदिर निर्माण करें. इससे पहले हे धर्मराज कुर्सी , तुम्हारे ऊपर बैठे तुच्छ मनुष्यों के ह्रदय में न्याय की अलख जगाओ. न्याय क्या है? न्यायाधीशों को समझाओ.
एक तरफ देश में अल्पसंख्यक-अल्पसंख्यक का रोना रोकर सरकारी जमीनों पर कब्जा कर मस्जिदों और इसके चारदीवारी का निर्माण चल रहा है. वही प्रशासन की मिलीभगत से वहां के समाज को दबाकर सरकारी जमीनों को मुस्लिम समुदायों को तोफे में दिया जा रहे है. प्रशासनिक अधिकारी मुस्लिम समुदायों के साथ मिलकर पैसे की लालच में आम लोगों को दबाकर धड़ल्ले से सरकारी जमीनों पर मस्जिदों और इसके चारदीवारी का निर्माण करवा रहे हैं और मिठाइयां खा रहे है. सरकार और देश की न्यायालयों से पूछना चाहता हूं कि पिछले 10 वर्षों में कितने सरकारी जमीनों को दरगाह, मस्जिद, कब्रिस्तान के नाम पर मुस्लिमों से बेचा गया है. वोट बैंक की राजनीति ने समाज में पर्याप्त विध्वंस फैलाये है. इसका जिम्मेदार कौन? अगर न्याय प्रक्रिया समाज का साथ नहीं देगी तो एक सामाजिक युद्ध की शुरुआत करनी होगी, तब न्यायालय की बात कोई नहीं मानेगा. इससे पहले हे न्यायधीश उठो जागो और अपने कर्तव्य का पालन करो.
हाल में ही बिहार मुजफ्फरपुर के सरैया प्रखंड की घटना उजागर हुई है. जहां सरकारी जमीन को यहां के स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी ने पैसे लेकर मुस्लिम समुदाय को मस्जिद के चारदीवारी के लिए सौप दिया है. वहां के लोगों को डरा, धमकाकर और पुलिसकर्मियों की तैनाती कर मस्जिद के चारदीवारी का निर्माण कराया गया. लोगों का कहना है कि इसके लिए स्थानीय सीओ और एसडीओ को मोटी रकम मिली है. इस घटना में लिप्त थाना प्रभारी, सीईओ और एसडीओ घटनास्थल के घेराव कर, स्थानीय लोगों को डरा धमका कर मस्जिद के चारदीवारी का निर्माण करवाया. जबकि यह निर्माण पूरी तरह अवैध है. इससे वहां तनाव के माहौल बने है. देखा जाये तो देश में यह कोई आखरी और पहली घटना नहीं है. इस प्रकार के घटना देश में सैकड़ों नहीं, हजारों लाखों की तादात में है. कभी वोट बैंक के नाम पर तो कभी प्रशासनिक अधिकारियों के द्वारा घूस लेकर सरकारी जमीनों का इस्तेमाल मस्जिद, दरगाह, कब्रिस्तान और इसके चारदीवारी बनवाने के लिए किया गया है और अभी चल रहा है. संभवत: रोका नहीं गया तो आगे भी होते रहेगा. आखिरकार जिम्मेदार कौन? समाज की निष्क्रियता या सरकार की वोट बैंक की नीति या प्रशासन. जिम्मेदार जो भी हो अब वक्त आ गया इस प्रकार के मामलों पर शीघ्रता से करवाई करने की.
वाले लोगों के पास कुछ नहीं बचता है, जमीन और ज़मीर दोनों नीलाम हो जाते हैं.
जब जब समाज की सेवा करने वाले, समाज को दिशा-दशा दिखाने वाले, समाज के प्रति कर्तव्य निष्ठ लोग और प्रशासनिक तंत्र निष्पक्षता को भूलता है. और लोभ-लालच, जातीय- मजहबी और धार्मिक रूप से एक पक्षीय होता है. स्वाभाविक है कि समाज के सज्जन शक्ति के पास सिर्फ उग्रता का मार्ग बचता है. जिस प्रकार न्यायालयों में करोड़ों लोगों की सुनवाई दशकों से चल रही है. तारीख पे तारीख की प्रक्रिया से समाज के सब्र का बांध अब टूटने लगा है. सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर भी प्रशासनिक और अदालती कार्यवाही ने छलावा किया है. श्री राम जन्मभूमि उनमें से एक है. करीब तीन दशक से यह मामला न्यायालय में है. लेकिन इस पर कोई प्राथमिकता सुप्रीम कोर्ट की दिखाई नहीं देती है. लोगों के सब्र का बांध और धैर्य टूट ना जाए और हिंदू समाज सड़कों पर खड़ा होकर अपने बाहुबल के द्वारा भव्य मंदिर निर्माण करें. इससे पहले हे धर्मराज कुर्सी , तुम्हारे ऊपर बैठे तुच्छ मनुष्यों के ह्रदय में न्याय की अलख जगाओ. न्याय क्या है? न्यायाधीशों को समझाओ.
एक तरफ देश में अल्पसंख्यक-अल्पसंख्यक का रोना रोकर सरकारी जमीनों पर कब्जा कर मस्जिदों और इसके चारदीवारी का निर्माण चल रहा है. वही प्रशासन की मिलीभगत से वहां के समाज को दबाकर सरकारी जमीनों को मुस्लिम समुदायों को तोफे में दिया जा रहे है. प्रशासनिक अधिकारी मुस्लिम समुदायों के साथ मिलकर पैसे की लालच में आम लोगों को दबाकर धड़ल्ले से सरकारी जमीनों पर मस्जिदों और इसके चारदीवारी का निर्माण करवा रहे हैं और मिठाइयां खा रहे है. सरकार और देश की न्यायालयों से पूछना चाहता हूं कि पिछले 10 वर्षों में कितने सरकारी जमीनों को दरगाह, मस्जिद, कब्रिस्तान के नाम पर मुस्लिमों से बेचा गया है. वोट बैंक की राजनीति ने समाज में पर्याप्त विध्वंस फैलाये है. इसका जिम्मेदार कौन? अगर न्याय प्रक्रिया समाज का साथ नहीं देगी तो एक सामाजिक युद्ध की शुरुआत करनी होगी, तब न्यायालय की बात कोई नहीं मानेगा. इससे पहले हे न्यायधीश उठो जागो और अपने कर्तव्य का पालन करो.
हाल में ही बिहार मुजफ्फरपुर के सरैया प्रखंड की घटना उजागर हुई है. जहां सरकारी जमीन को यहां के स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी ने पैसे लेकर मुस्लिम समुदाय को मस्जिद के चारदीवारी के लिए सौप दिया है. वहां के लोगों को डरा, धमकाकर और पुलिसकर्मियों की तैनाती कर मस्जिद के चारदीवारी का निर्माण कराया गया. लोगों का कहना है कि इसके लिए स्थानीय सीओ और एसडीओ को मोटी रकम मिली है. इस घटना में लिप्त थाना प्रभारी, सीईओ और एसडीओ घटनास्थल के घेराव कर, स्थानीय लोगों को डरा धमका कर मस्जिद के चारदीवारी का निर्माण करवाया. जबकि यह निर्माण पूरी तरह अवैध है. इससे वहां तनाव के माहौल बने है. देखा जाये तो देश में यह कोई आखरी और पहली घटना नहीं है. इस प्रकार के घटना देश में सैकड़ों नहीं, हजारों लाखों की तादात में है. कभी वोट बैंक के नाम पर तो कभी प्रशासनिक अधिकारियों के द्वारा घूस लेकर सरकारी जमीनों का इस्तेमाल मस्जिद, दरगाह, कब्रिस्तान और इसके चारदीवारी बनवाने के लिए किया गया है और अभी चल रहा है. संभवत: रोका नहीं गया तो आगे भी होते रहेगा. आखिरकार जिम्मेदार कौन? समाज की निष्क्रियता या सरकार की वोट बैंक की नीति या प्रशासन. जिम्मेदार जो भी हो अब वक्त आ गया इस प्रकार के मामलों पर शीघ्रता से करवाई करने की.

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