जितेश कुमार
भोपाल,
चुनाव के बाद नेता वादे से मुकर जाते हैं. ऐसे में लोगों को नोट लेकर वोट देने की आदत चतुराई लगती है किन्तु यह एक बड़ी मूर्खता है. भारतीय संविधान में दिए गए वोट के अधिकारों का यह दूरप्रयोग है. सशक्त लोकतंत्र का गला घोट देती है और अयोग्य निरंकुश शासक की पुनर्स्थापना करती है. जो लोग नोट के चक्कर में अपना वोट अयोग्य व्यक्ति को देते हैं. वे स्वयं अपना भविष्य, अपने परिवार और समाज के भविष्य को अंधकार में ढकेल देते है.
हमारी लोकतांत्रिक चुनाव प्रणाली में एक कलंक "नोट दो, वोट लो" चिपक गया है. चुनाव आयोग के लाख चौकीदारी के बावजूद इस तरह की घटनाएं दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है. ऐसे में चुनाव एक राजनीतिक धंधा बन गया है जहां अनेक पार्टियों के प्रत्याशी जितना रुपए इन्वेस्ट करते हैं, वो इसके
मुकाबले कई गुना अधिक चुनाव के जीतने के बाद जनता के लूटकर खाते है. एक प्रकार से व्यावसायिक रूप में भारत की चुनाव परिणत हो गई है. इस चुनावी अभियान में सामाजिक नेता मृत और धंधेबाज फर्जी नेताओं का बोलबाला बढ़ा है. चुनाव की इस साम, दाम, दंड, भेद प्रक्रिया में. जनता को अपनी पार्टी के लाभकारी योजना और चुनावी घोषणा पत्र समझाने में असमर्थ प्रत्याशी पैसे के बल पर चुनाव जीतने पर जोर देते हैं. वही चुनाव में सफल दल भी किये गये वादे के ठीक विपरीत कार्य करते है. वोट की खरीद-फरोसी का मूल कारण अयोग्य और आर्थिक रूप से सशक्त प्रत्याशी जो नोट देकर वोट खरीदने में सक्षम होते हैं. और उक्त प्रत्याशियों के द्वारा नोट देकर वोट लेने की यह धंधा आंचलिक, ग्रामीण,अशिक्षित और आदिवासी क्षेत्रों में अधिक होती है. आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में भी नोट बांट कर वोट लेने की प्रक्रिया चुनाव के निष्पक्षता के लिए संकट है. नोट से वोट लेने की कवायद में विभिन्न पार्टियों के प्रत्याशी वैसे लोगों का चयन करते हैं. जो घोर जातिवादी और ढोंगी समाज सुधारक होते है. जिनका मुख्य पेशा स्वयं के समाज को भ्रमित कर, स्थानीय झंडा को पकड़े रहना और स्थिति अनुसार दूसरे समाज या वर्ग से संघर्ष उत्पन्न कर समाज को अविकसित और अशिक्षित बनाये रखना है. ताकि इन लोगों का धंधा अबाध्य रूप से चलता रहे. ऐसे लोग राजनीतिक प्रत्याशियों के चमचे या दलाल कहे जाते हैं. निष्पक्ष और आदर्श चुनाव प्रणाली के लिए ऐसे लोगों को चुनाव आयोग चिन्हित करें. चुनाव के दौरान इनकी गतिविधियों पर नजर रखे. और पुख्ता सबूत मिलते ही इन्हें धर दबोचे. ऐसा सबक सिखाएं भविष्य में ये लोग इस प्रकार की कुकृत्य ना करें.
वही नोट लेकर बिकने वाले लोगों को भी सावधान करना और इनको जागरूक करने का प्रयास करते रहना चाहिए. नुक्कड़ नाट्य के माध्यम से और समाज के शिक्षित बुद्धिजीवियों के सहयोग के आदर्श चुनाव की पहल करनी होंगी. अगर चुनाव आयोग पहल नहीं करती तो मीडिया और जागरूक समझने वाले तबके आगे आये.

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