रंजू सिंह
दिल्ली
बस कलम उठा अधिकार लिखूँ
लुटती इज्जत पर वार लिखूँ
या लुटी कलम का सार लिखूँ
बाली पर भारी राम लिखूँ
या कुन्ती का व्यभचार लिखूँ
हठ लिख डालूँ , दुर्योधन का
या पाँचाली के विचार लिखूँ
इतिहास लिखूँ , भूगोल लिखूँ
या दर्शन मे श्रंगार लिखूँ
उन कश्मीरो पर तंज लिखूँ
या जम्मू का विस्तार लिखूँ
लज्जत लिख डालूँ , बिस्मिल की
या गांधी के आधार लिखूँ
इस लोकतंत्र के उत्तर मे
दक्षिण लिख दूँ ,फरमान लिखूँ
कुछ गणित लिखूँ, कुछ शून्य लिखूँ
या मौन हृदय का प्यार लिखूँ
विपरीत ही हो मै जो भी लिखूँ
सो जीत के खातिर हार लिखूँ
मै हार लिखूँ या राह लिखूँ
सच से सच्चा अखबार लिखूँ।।
ए मेरे वतन मै, जब भी लिखूँ
अधिकृत दिल से सत्कार लिखूँ।
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