जितेश कुमार
प्रकृति हमारी जननी है. इसके गोद में उत्पन्न सभी जीव-प्राणी इसी जननी की अनेक रूप है. इस नाते से गंगा, गाय, धरती, राष्ट्र, जन्मजननी और जन्म स्थल में माँ है. यही वह शक्ति है, जिससे हमारा अस्तित्व है, ये सभी है तो हम है, नहीं तो कुछ नहीं. हमारी सार्थकता
इन्हीं के चरणों और सेवा में समर्पित होना है. इससे बड़ा दुनिया का कोई ज्ञान नहीं, कोई धर्म नहीं, कोई त्याग और तपस्या नहीं. लक्ष्य एक है, गंगा, धरती, राष्ट्र, गौ, जन्मस्थल और जन्मजननी की सेवा करना. इस प्रकृति से उत्पन्न सभी धरोहरों से प्रेम करना. हर एक जीव की उन्नति और उत्थान का माध्यम निर्मित करना है ही एक मात्र लक्ष्य है. किसी की आह से उत्पन्न मूलवान वस्तु की कामना ही भोग है, भोग लालच का मार्ग है और लालच पाप का मार्ग और पाप नरक का द्वार है.
प्रकृति हमारी जननी है. इसके गोद में उत्पन्न सभी जीव-प्राणी इसी जननी की अनेक रूप है. इस नाते से गंगा, गाय, धरती, राष्ट्र, जन्मजननी और जन्म स्थल में माँ है. यही वह शक्ति है, जिससे हमारा अस्तित्व है, ये सभी है तो हम है, नहीं तो कुछ नहीं. हमारी सार्थकता
इन्हीं के चरणों और सेवा में समर्पित होना है. इससे बड़ा दुनिया का कोई ज्ञान नहीं, कोई धर्म नहीं, कोई त्याग और तपस्या नहीं. लक्ष्य एक है, गंगा, धरती, राष्ट्र, गौ, जन्मस्थल और जन्मजननी की सेवा करना. इस प्रकृति से उत्पन्न सभी धरोहरों से प्रेम करना. हर एक जीव की उन्नति और उत्थान का माध्यम निर्मित करना है ही एक मात्र लक्ष्य है. किसी की आह से उत्पन्न मूलवान वस्तु की कामना ही भोग है, भोग लालच का मार्ग है और लालच पाप का मार्ग और पाप नरक का द्वार है.
इसलिए इस मृत्युलोक ने जीव, जगत और जगदीश को ही वास्तविक माना है. प्रत्येक जीव इस ब्रमांड का ही सूक्ष्म स्वरूप है और यह ब्रमांड ही जगदीश का रूप है. इसीलिए भारतीय ऋषि यों ने कहा "कंकर कंकर शंकर है. कण-कण में भगवान है." क्रोध, लोभ और मोह यह तीनों गति पतन और नरक का मार्ग है उसी प्रकार ज्ञान, त्याग और प्रेम ही सच्चा जीवन है.
पंचतत्व का ही सूक्ष्म रूप हमारा शरीर है, और इस जगत की भी उत्पत्ति इन्हीं पंचतत्व से हुई है यही सत्य है. इनके सेवा और उपयोग से ही हमारा अस्तित्व, इनके उपभोग और दोहन ही हमारा विनाश है. हम प्रकृति के अंश है, इसे एक वृक्ष मानलिया जाए तो हम वृक्ष के पत्ते है, जो उसी वृक्ष के जड़ को रौंदना ही उन्नति और विकास का काम समझ रहा है. स्वयं को नष्ट करना ही पुरुषार्थ मानता है, जबकि यह मूर्खता है पुरुषार्थ नहीं.
जैसे नदी की नियति समुंद्र में मिलना है, अनेक दुर्गम पथ और पहाड़ को चीरते हुए. वैसे ही जीव का लक्ष्य जगत में समाहित होना है. नदी को कभी विशाल पहाड़ अपने प्रचंड शक्ति से रोकता है, तब भी नदी अपने नियति के कारण उस पहाड़ को काट कर रास्ता बना लेती है और समुंद्र से जाकर मिलती है. यह पहाड़ की निर्बलता नहीं, कि पहाड़ उस नदी को रोक नहीं पाया, यह तो नदी कि नियति है. उसी प्रकार शक्तिशाली पहाड़ रूपी मनुष्य जगत को बदलना चाहते है, अपने लिए इस संसार के विरुद्ध, महाशक्तिमान घेरा बना रहे. वह भी एक समय बाद जीवों के नियति के कारण टूट ही जाना है. एक निश्चित समय के बाद जगत में ही विलन होना है. यही सत्य है, इसी का ज्ञान धर्म है.
आज हम जिस तकनिकी और रासायनिक अस्त्र-शस्त्र को सुरक्षा समझ रहे वह वास्तव में विनाशक यंत्र है, इसके प्रहार से सुरक्षा नहीं, जीवन का अंत होता है. राष्ट्र का सम्पूर्ण विध्वंस होता है.

Very good bhai
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