शनिवार, 5 जनवरी 2019

इश्क में हर बाजी में इक्का है, फिर भी हर कोई हार जाता है; इस घोटाले की जाँच हो - जितेश सिंह

आज बहुत दिन बाद उसे देखा और देखते रहा|  बहुत से पुराने ख्याल का
बवंडर सुनामी की तरह शरीर में हलचल मचा रही थी| फिर भी मेरी सहिष्णुता ही थी जो मुझे अडिग शांत की हुई थी| शायद उसके मिलाने की खिलखिल्लाहट से ज्यादा प्रबल मेरी शांति थी| शायद अब बड़े हो गए है; नहीं तो अंदर जो तूफान है उसके बारे में क्या बताऊ? इतना ही बताऊँगा 'दिल तो अभी बच्चा है', मैं तो सायना हूँ ना| 18-19 साल की उम्र में दिल की सब बात मान लिया जाये ये जरुरी तो नहीं है लेकिन मैं दिल की सब बात सुनाता जरूर हूँ| कोई व्यावसायिक की तरह जब कैरियर और तुझमे प्रॉफिट-लॉस की दूरगामी परिणाम को खोजता हूँ तो ऐसा प्रतीत होता है, मैं आज सच्चा खरीदा हूँ तेरी मुहब्बत का| लोग तो ऐसा ही समझते है पर मैं जनता हूँ; इश्क के मार्केट में मैं इक्लौता व्यापारी
जो मुफ़त में दिल और दिमाग दोनों को बेंचते  है| बाहर की हंसी, तेरे बिना जीना, कुछ ऐसा ही है; जैसे कृत्रिम फूलों के गमले, दिखते फूल की तरह पर फूल नहींं होते हैै| कोई नई बात तो मैंने नहीं की ना, सभी की आवश्यकता ही आज-कल वही है 'कपड़ा, गाड़ी और बंगला'। शायद हंसी, प्रेम और जिंदगी होती तो मैं भीं यह गाना गुनगुनाता 'मैं तुझको उठा लाऊंगा, तेरे घर से|' बेमतलब के इश्क में हर बाजी में इक्का है फिर भी हर कोई हार जाता है| इस घोटाले की जाँच हो!
हाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहाहा   
         

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