शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

लव स्टोरी: हम फिरसे स्कूल में पढ़ सकते है? - जितेश कुमार

आज बहुत दिन बाद जब तुमको देखा, तो तुमसें बाते करने का दिल कर रहा था| कितना कुछ बोलने का मन था| लेकिन अब मेरे लिए तेरे पास वक्त ही नहीं होगा यह सोच कर मौन हो गई| एक समय वो था जब तुम मेरे आगे-पीछे धूमते थे| हर बार ऐसा कुछ करते थे जिससे मेरा ध्यान तुम्हारे ऊपर जाये| आज जब आखों के सामने से गुजरते हो तो कुछ बोलने और सोचने का सवाल ही नहीं था| लेकिन जो मेरे मन में सवाल का बवंडर उठ रहा था| उसकी क्या कहानी होगी? हम तो तुमको इसलिए सताते थे ना, तुम मुझे परेशान करते थे| शायद नोंक-झोक हमारे बीच बहुत बार हुआ, बार-बार हुआ पर कभी तुमने ऐसा कुछ नहीं किया होगा जिससे मुझे ख़ुशी मिले| हर बार मुझे चिढ़ाते रहते थे| दोस्तों के बीच मेरी हंसी उड़ाते थे| कभी-कभी तो मन करता था तुम्हारा मुंहनोच लू| पर ऐसा भी कभी मौका नहीं मिला| एक बार तुम मेरे बेंच पर चप्पल से गन्दा लगा दिए थे याद है तुमको| उस समय मन किया तुम्हारा गला दबा दे| कितना मुझे तंग करते थे? 
आज ऐसे कोई तंग नहीं करता है, तुम आओगे तंग करने बोलो| छोड़ों क्या आओगे? तुमने तो हमेशा मुझे तड़पाने का ही काम किया है चाहे तब हो या अब| 
शायद मैं इतना कुछ ना तब बोल पायी, ना अब| इसलिए यह पत्र लिख रही हूँ क्या हम फिरसे स्कूल में पढ़ सकते है?
भाषा तो तुम्हारी थी पर लिखा मैंने इसे| तुम सच में मुझे सोचती हो, एक संकेत तो दो| क्या मैं आज भी                                                   जिन्दा हूँ तेरे दिल में|

                                        "तुम आओ ना, फिरसे स्कूल में|
                                             तुम बैठना अपनी जगह 
                                               मैं बैठूंगा अपनी जगह|"     

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