सोमवार, 13 मई 2019

तब और अब के परिवर्तन


गाँव के लिए इमेज परिणामशाम को पकड़ी के पेड़ के नीचे कुश्ती होती थी| गाँव के सभी बच्चे आपस में कुश्ती लड़ते थे| कुछ बड़े लोग हमें आपस में लड़वाने के लिए प्रेरित करते थे| उस समय नोकझोक के क्रम में हाथ-पाँव का छिल जाना और रक्त निकलना तो आम बात थी| ये सब वीरता और बहादुरी के प्रतिक थे| चोट नहीं लगना, खून नहीं बहना डरपोक और बुजदिली समझा जाता था| मारपीट के क्रम में पैर में चोट आना हाथ की केहुनी से रक्त निकलना मानों ऐसा था जैसे सीमा पर वीर सैनिकों का जख्मी होना| बड़ा गर्व होता था ऐसे गाँव की कोख से पैदा हुआ हूँ मैं| जहाँ रक्त को बहाना बचपन के खेल से सीखे थे और खेल-खेल में जख्मी होने का एहसास सीमा पर तैनात शौर्यवान जवानों की याद दिलाती थी| बचपन से ही एक योद्धा, एक सैनिक बनाने की ललक सभी दोस्तों में थी| आज कुछ लोग देश के सीमा पर तैनात है और कुछ प्रयत्नशील है| मेरे जैसे निकम्मे बीती बातों को लिखने में लगे है| लगभग 12 वर्ष बीत गये होंगे गाँव में कुश्ती बंद हुये ऐसा नहीं है कि गावं में बच्चे नहीं है| है, लेकिन स्मार्टफ़ोन पर ही सभी खेल मौजूद है तो क्रिकेट, गाना, वीडियो, पबजी में व्यस्त रहते है| झूठी बहादुरी और शान में जिये जा रहे है, कोई डाट कर बहार खेल के मौदान में भेजने वाला नहीं है| घरवालें तर्क देते है कि अच्छा ही तो है, बगल के पिंटूवाँ के संघत से तो अच्छा है घर में मोबाईल ही देखे| कितना बेलगाम है दिन भर पैतरा काटते रहता है दंतनिकला के घर से लेकर चवर पार कुईसा के घर तक धूमते रहता है| पढ़ता है कि नहीं, रोज देखते है सरकारी स्कूल ही जाता है|

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