मंगलवार, 7 मई 2019

बात पिछले साल नवम्बर (2018) की है| यूनिवर्सिटी में परीक्षा होनी  थी, इसलिए छठ पूजा और दीपावली में अपने गाँव नहीं गया था|  ये मेरा पहला अनुभव था कि मैं अपने गाँव में छठ और दीपावली पर नहीं था| मन में बेचैनी थी, कई बार ऐसा लगा जैसे परीक्षा छोड़ दूँ|  हालकि इतना समय था मेरे पास छठ के तीन दिन बाद परीक्षा होने वाली थी| आने का मन भी होता तो  ट्रेन के रिजर्वेशन मिलना कठिन था| बगैर रिजर्वेशन छठ के समय बिहार पहुंचा चाँद पर जाने जैसे कठिन है| हमलोग ठहरे मजदूर और निहायती बेवकूप लोग जानवरों की तरह ट्रेन में बंधकर घर भेजे जाते है| पापी पेट का सवाल है वरना इज्जत हमें देता यहाँ देता कौन है? संदिग्ध, चोर-उचक्के, लोफर, मवाली,बावली,गुंडा और गरीबी सभी का अर्थ दिल्ली हो चाहे भोपाल या अन्य बिहारी ही है| रात को जब कमरे में कोई नहीं रहता है तो पुरे दिन अपने साथ घटने वाली घटनाएँ ऐसी तीक्ष्ण होती है कि आँखों में आंसू भर आते है| और मन कई प्रश्न आते थे- यहाँ बाकि राज्यों के लोग पढ़ रहे है और काम-काज कर करते है; उनसे कोई कुछ नहीं बोलता है| हम ही बिहारी होने कारण पूर्वाग्रह के शिकार है| मिटटी के गोद में पले बढे है वो बाबु साहब के बच्चे है, सीधे स्वर्ग के उतरे है| सभी के सभी अभिमन्यू के भाँति जन्म से ही चक्रव्यूह भेदन की कला जानते है, ऐसी कल्पना उनके मन में रहती है| परिवेश, परवरिश और परिवार का गुण ही  है कि इतना विकसित है, चार कदम ठीक से बात नहीं कर पाते है|  जैसे पूर्वकाल में अंग्रेजों और मुगलों के दोगली निति ने वर्ण व्यवस्था में अस्पृश्यता जैसा धिनौना जहर घोल कर हिन्दू समाज को भयंकर हानि पहुंचाया है| आज कुछ ऐसा ही महसूस होता है मुझे और कही नहीं इसी भारत में| बाकि राज्यों के लोग खुद से अपने आप को सर्जिफिकेट बाँट कर साबित क्या करना चाहते है? मालूम नहीं!  बिहार ने दुनिया को जीरो से हीरो तक का मार्ग प्रस्थ किया है| ज्ञान की जननी के रूप इसका प्राचीन इतिहास रहा है|                

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