बुधवार, 23 जनवरी 2019

दोस्त; तेरी निगाहों में शहर अच्छा था या बुरा - जितेश कुमार

बहुत दिन बाद मिले हो| एक दम से विदेशिए बन गए हो का| अरे गाँव है कभी-कभार आते जाते रहिये| गठबंधन बना रहता है तो अच्छा है| आज-कल का प्यार और शहर की दोस्ती कछु काम ना आवत है| दोनों के दोनों पइसा के पीछे भागत है| गाँव में खेत है, खलिहान है, जन्म-जन्म के रिस्ता है| तुम्हरा बचपनवा बिता है तो कबो-कबो तो आवत-जावत रहो भिइवा| शहर में कब दिन और रात पता ही नहीं चलता है| मशीन की तरह आदमी चलता रहता है| अरे शहर का भी जिंदगी कौनों जिंदगी है ना तो सुख- चैन है| हम तो कहते है, भईया यही गाँव में ही रहो; खेती-बाड़ी करो, दुई-चार गाये-भईसी पालो और सादी बिआह करो मजा में रहो| अब तो गाँव में अंग्रेजी स्कूलवा भी है बच्चन के पढाई-लिखाई के बारे में सोचना भी नहीं है| तुम कुछ भी कहो हमको तो शहर तनिको अच्छा नहीं लगता है| 
तुम कैसे हो? शहर में तो खूब मन लगता होगा| सुने है शहर में लड़कियां हंस-हंस के बतियाती और तईको नहीं शर्माती है| तब क्लास में कितनी लड़कियां है? तुमसे तो सब बातचीत करती होगी क्यूँ? चलो अच्छा है; हम तो घर-बाड़ और झूठो के खेती-बाड़ी के चक्कर में पर गए| सोच रहे है हम अब शहर में जाकर ही आगे की पढ़ाई करे| कम्पटीशन का एक-दो परीक्षा दे भगवान भरोसे निकल गया तो जय-जय है| नहीं तो शहर में ही कोनों रोजगार के साधन पकड़ लेंगे| एक बात बोल देते है शहर का तो बात ही अजब है, बिजली,सड़क, पानी, नौकरी, स्कूल, डॉक्टर सब के सब मिल जाते है| हम तो कहते है कि शहर की बात ही निराली है| हर प्रकार के सुख-सुविधा है| क्यूँ कछु गलत कहा है? चालो ठीक है; अभी रहना है ना घर पर फिर मिलते है... 
बहुत याद आती है ये बाते जब मै शहर के श्मशान में गाँव के मंदिर को याद करता हूँ| फिर तुमको; अय मेरे दोस्त| उससे ज्यादा वो बाते याद करता हूँ| सच में आज तक पता नहीं चला की तेरी निगाहों में शहर अच्छा था या बुरा?              

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