भाजपा की लोकाप्रियता अपने चरम सीमा पर है| प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष श्री अमित साह के आगुवाई में भाजपा एक के बाद एक राज्य में सफलता हासिल करती जा रही है| वर्तमान में स्थिति ऐसी है कि देश के सभी राजनीतिक दल क्या राष्ट्रीय और क्या क्षेत्रीय सभी के सभी अपने अस्तिव बचने में लगे है? कुछ ऐसे भी गठबंधन किये बैठे है, जिनका अस्तित्व ही उस पार्टी के विरोधी और उसके काट के रूप में समाज ने माना है| जिनके समर्थक एक दुसरे को आये दिन कोसते रहते है| विचारणीय है कि क्या ये राजनीती है या कुर्सीनीति? देश में

जितेश सिंह
अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल
जातिवाद, क्षेत्रवाद, आराजकता, साम्प्रादायिकता, आपसी मतभेद, धर्म परिवर्तन, हिन्दू विभाजन करा कर किसी तरह राजनीति में बने रहने को उतारू पार्टी| आज विकास और हिंदुत्व की राजनीति में आपने आस्तित्व को तलास रही है| पाकिस्तान से लेकर चीन तक कुछ राजनीति दल हाथ-पाव मार रही है तो कई दुश्मन देशों में इनके राजनीतिक नेता मारे-मारे फिर रहे है| कुछ पार्टियां कुतर्क करके तो कुछ दंगे फैलाकर अपनी महत्वकांक्षा की पूर्ति करने के लिए तैयार खडी़ है| इनके साथ खडा़ है देश का चौथा स्तम्भ| अभी हाल में ही तीन दंगे हुए जिसमें मीडिया की भी रिपोर्टिंग मतभेद के कुचक्र में फसी हुई दिखी| मीडिया संस्थानों ने दंगे के पीछे खड़ी राजनीती दलों को और उनका समर्थन कर रही पार्टियां को बचने का प्रयास किया है| पहला पद्मावती विरोध- जिनकी वीरता की कहानी सुन कर हमारा मस्तक गगन को छूता है ऐसे शौर्य प्रतीक माता पद्मवाती के इतिहास से छेड़छाड़ और उसे तोड़-मरोड़ कर फिल्म बनाने के विरोध में राजपूत समाज खास कर करणी सेना ने आपत्ति जतायी थी| परन्तु फिल्म निर्माता और सेंसर बोर्ड चुप था ऐसे में मीडियाकर्मी विभिन्न प्रकार के सर्वे और दावे करना शुरू कर दिये| इतिहास में पहली ऐसी घटना होगी जब सेंसर बोर्ड से बिना अनुमति लिए फिल्म को मीडिया से जुड़े लोगों को दिखाई गई हो| ऐसे में अफवाहे के स्वर बढ़ाते गई| कुछ मीडिया पक्ष में तो कुछ विपक्ष में नजर आये और यही कारण था कि विरोध बढ़ा, आखिर क्या सीरीज से पहले फिल्म को दिखाई गई या देखने की जरूरत पड़ी? विरोध फिल्म का नहीं इतिहास के साथ छेड़छाड़ का परन्तु मीडियाकर्मी ने खबर को गलत स्वर में पेश किया और देखते-देखते पूरे भारत में फिल्म के पक्ष और विपक्ष में काना-फूसी शुरू हो गई| सोशल मीडिया के आज्ञात महानुभावों ने अनबन फेसबुक और ट्वीटर के माध्यम से फेकना शुरू कर दिया| कुछ देश विरोधी तकते वामपंथी ने आग में धी डालने का कार्य किया| करणी सेना भी फिल्म बैन को लेकर अड़ी हुई थी| जिसके बाद सड़क पे जैसे ही लोग उतारे एक साजिस के तहत दंगे के मंशा से गाड़ियाँ और दूकान में तोड़-फोड़ किये गये| जाँच में बच्चों के स्कूल बस पे पत्थर मरने वाले से लेकर पूरे प्रदर्शन को हिंसक बनने के पीछे कोई और ही था| परतु मीडिया ने करणी सेना की खूब आलोचना की और करनी भी चाहिए| क्योंकि प्रदर्शन का समर्थन और सानिध्य तो करणी सेना ही कर रही थी, तो शांति व्यवस्था की जिम्मेदारी भी उनकी थी| योजना और उचित दिशानिर्देश नहीं होने के कारण कुछ अराजकवादी ने प्रदर्शन को दंगे के रूप में बदलने का प्रयास किया परन्तु टीआरपी के चक्कर में करणी सेना को पूर्वाग्रह का शिकार बनाया गया और मुख्य आरोपी के रूप में मीडिया ने उनका परिचय कराया था|दूसरा घटना कोरेगांव- पिछले कई वर्षो से महार समाज कोरेगांव के समीप इकठ्ठा होता रहा है| सम् 1939 के करीब बाबा साहब भीमराव अम्बेदकर ने वहां एक जन सभा को संबोधित करते हुये कहे थे हमे एकत्रित, एकता और सशक्त होना जरूरी है,जिसके बाद से महार समाज बाबा साहब के सम्मान में और अपने संगठन और समाज के सशक्तिकरण के लिए दूर-दराज से महारों को एकत्रित करते है, 1 जनवरी को उत्सव क रूप में महार वर्ग मनाने आये है क्योंकि इसी दिन बाबा साहब में जनसभा की थी| वे इसे शौर्य दिवस के रूप में मनाया आये है| किसी प्रकार की कोई दंगे और ना ही किसी समाज ने कोई आपत्ती व्यक्त की| परन्तु 1 जनवरी 2018 को ऐसा क्या हुआ? जो जगह-जगह दंगे शुरू हो गये, महार समाज का शौर्य दिवस कलंकित हो गया| क्या करण थे? उपस्थित जन सभा में किस प्रकार के व्यक्तियों की उपस्थिती थी? क्यों वो बादाम चहरे वाह आये थे, जिन पर देश विरोधी, जातिवाद भड़काने के आरोप लगे है| ऐसा मालूम हो रह था कि महार समाज के शौर्य दिवस को वामपंथी और देश विरोधी ताकतों ने हाइजैक कर लिया हो| परन्तु मीडिया ने स-समय सही खबरे नही परोसी नतीजा देश भर में गाड़ियाँ और दुकाने जलाये गये| लेकिन ताजुब इस बात की है इस बार के दांगे में दंगाई को बचाया गया| सही स्थिति को छुपाया गया| इस दंगे में पूरी तरह दंगाई को मीडिया के कुछ घरानों का समर्थन प्राप्त था| तीसरा घटना भारत बंद- देश भर में मायावाती के समर्थक ने सुप्रीम कोट के विरोध में जगह-जगह हिंसक दंगे शुरू किये| जबरन डंडे और लाठी के दम पर दुकाने बंद करवाए गई| सडकों पर आगजनी की गई| यहाँ तक की एम्बुलेस तक तो जाने के आनुमति नहीं दी गई जिसके कारण एक माँ के गोद में ही नन्ही सी जान से दम तोड़ दिया| देश भर में एक दर्जन से ज्यादा लोग मारे गये| सैकडे़ धायल हुए फिर कांगेस और बाकि के भाजपा विरोधी राजनीती गुट ने दंगे को पूरा-पूरा समर्थन दिया| इसके बाद भी मीडिया सवाल नहीं पूछ सकी! आखिर क्या वजह थी कि हिंसक दंगे का समर्थन करना पड़ रहा है? कांगेस जैसी गाँधीवादी विचार के पार्टी ने भी दंगे को अपना समर्थन दिया| जो हर रोज डंके के चोट पर अपने आप को गाँधी का सबसे बड़ा हितैषी मानती है| आज फिर से भारत असहिष्णु लगता कुर्सी की राजनीति ने मानवता की सीमा लांघ दी हैं| घोर संकट तो हैं ही एक दंगे को समर्थन दिया जा रहा है| हिंसात्मक और उग्रवादी घटना को बढावा दिया जा रहा है सरेआम राजनितिक पार्टियां दंगाईयों के समर्थन का अलाप जप रही है और मीडिया आपना कान और आँख बंद किये हुए है| आज देश बड़े-बड़े पत्रकार और एंकर मानों मृत हो गये हो| ऐसी स्थिति में देश का चौथा स्तंभ और लोकतंत्र का पहरी 'पत्रकारिता' | एक हेर-फेर, बेच- खरीद, दलाल के अलावा और कुछ नही है|

अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल
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