बुधवार, 16 जनवरी 2019

राजनीति, जातिवादी और राजनीति - जितेश सिंह

देश का सबसे बड़ा रोजगार राजनीति है। मुफ्त का धंधा है ''न तो फायदा है, न घाटा।'' जिसे देखो वही बहुत बड़े राजनीतिक पंडित की तरह बातें करता है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि ये लोग सच में किसी ना किसी
राजनीतिक पार्टी के चुनावी गुरु है। यहां केंद्र से लेकर राज्य, जिला से लेकर पंचायत सभी प्रकार के चुनावी विशेषज्ञ हर गाँव और प्रत्येक चौक-चौराहा पर मिल जाता है। कुछ ऐसे भी लोग चुनाव जीतने के लिए अपने विचार को साझा करते है; जिसने कभी वार्ड का भी चुनाव नहीं जीता हो। ऐसे महान हस्तियों को पता है कि ऐसा करने पर जनता एक एक वोट उक्त प्रत्याशी को देगी। पर वास्तव में खुद इस घिसे-पीटे फार्मूला से अपने लिए दो वोट हासिल करने की गुंजाईश नहीं रखते है। ले-दे-के एक ही हथियार है जिससे खुद गला ही क्यूँ ना कटता हो, उसी का प्रयोग इनको सबसे सटीक और सुलभ मालूम पड़ता है। जिसे जातिवाद कहते है। भारत के नस-नस में जातिवादी विषाक्त भरा पड़ा है। हम भारतीय रोटी-बेटी और वोट किसी दूसरे जाति को नहीं देते है। 
एक प्रेम विवाह होता है लड़की और लड़का अपने पसंद से सादी करते है। कुछ लोग दोनों की मर्जी और ख़ुशी देखकर, इसे मन भारी करके स्वीकार भी कर लेते है। तो हट्टी और रूढ़िवादी परिजनों को सबक सीखने के लिए भगऊआ विवाह प्रचलित है। जिसका सिद्धांत यही है 'नमक-रोटी खाकर, आसमान के नीचे सोये। तू ठण्ड में मुझे ओ लेना और मै तुमको।' शायद इस प्रकार की सोच का प्रादुर्भाव तो रोटी-रोटी में पहले हो चला था अब सादी-विवाह में भी होने लगा है। मर्जी से या फर्जी से समाज में बदलाव आ चुका है। देखना है अब इस जातिवादी अराजक स्थिति से राजनीति कैसे निकलती है? रोटी-बेटी तो फेर बदल होने लगे है, ख़ुशी और स्व के अच्छे दिन के लिए, अच्छे भविष्य के बाबत। देश, समाज और सीमा को सशक्त करने के लिए क्या हम जाति के आधार पर वोट देना छोड़ पाएंगे? नहीं तो क्यूँ नहीं, आखिर हमें आजादी के बाद से फुट डालो राज करो' वाली अंग्रेजी सोच से मिला क्या? भ्रष्टाचार, गरीबी, जातीय-मजहबी संघर्ष और 2जी, कोयला चोर, चारा चोर जैसे नेताओ का झुण्ड। देश को यहाँ के राजनेता से लुटा है तो जिम्मेदार हम है, हम जातिवादी ऐनक लगा कर अपनी ही मातृ को लुटते देखते रहते है। नेता भ्र्ष्ट है मतलब की जनता भी भ्रष्ट है।  हमें निर्मल और राष्ट्रमुखी विषयों को घ्यान में रख कर वोट करेने की आदत को सीखना चाहिए। जाति के रूप में नहीं जनता के रूप में देश की सत्ता को कुशल और भरोसे मंद हाथों में सौंपना होगा। जिसके पास देश और देश के विकास, यहाँ की संस्कृति, समाज के लिए कोई विजन हो। 

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