शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

माँ का दर्द। - गणिनाथ सहनी

बहुत कमाया नाम व पैसा
छोड़के अपना गाँव-वतन
तरस गई है बूढ़ी आँखे
बरस रही बेमौसम झरझर।
अब तो उर भी सूख चुका है,
कहाँ से लाए नीर नयन।
नही टिकौना तुम बिन मेरा
उजड़ा लगता पल्लवित वन।
कहाँ गया किस देश में रहता !
न चिट्ठी न खोज खबर।
रोज-रोज टकटकी लगाए
बैठी रहती हूँ चौखट पर।

पूछा था रामभरोसी से
कहाँ रहता है मेरा रतन ?
कब आएगा कुछ खबर भी है ?
लौटकर वह अपने वतन।

रामभरोसी कम पढ़ा-लिखा है,
रामकथा में सुना है लंका
और केवल लंका को ही विदेश समझता है,
इसलिए कहा-
शायद वह लंका में है।

माँ बोली-
लंका में होता तो
राम की तरह चौदह वर्ष में आ जाता
अब तो पंद्रह बीत गये
शायद वह लंका से भी दूर
पलंका में है।

पथरा गई है माँ की आँखे
देखते-देखते राह
अब बची नही है शेष
जीने की चाह।

          - गणिनाथ सहनी, (रेवा, मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार)

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