रविवार, 22 अक्टूबर 2017

संसार मुसाफ़िरख़ाना है ! गणिनाथ साहनी

जाग जरा वो सोने वाले
नींद में भी धन की गठरी
सिर पर ढ़ोने वाले।
स्नेहहीन वस्त्र से लिपटे रहते
केवल स्वार्थ से चिपटे रहते।
सारी गठरी यहीं रहेगी
देह की ठठरी यहीं रहेगी
यह तेरी सुकर्म भूमि है,
यहाँ न स्थायी ठिकाना है।
जाग जरा वो सोने वाले
संसार मुसाफ़िरख़ाना है।

मत व्यर्थ वितंडा बकवास में रहना
हरदम सत्य के पास में रहना।
दोनो पल में हँसते रहना
धन तो आता-जाता रहता
पर मन-हृदय से धनी रहना।
सब धन नष्ट हो जाता है,
संतोष का मिटता नही खजाना है।
जाग जरा वो सोने वाले
संसार मुसाफ़िरख़ाना है।

रजनी कितनी ही काली हो,
आती एक रोज दिवाली है।
सारी कालिमा छट जाती है,
सूर्य की लालिम से
धरा पट जाती है।
सौभाग्य बीज सदा
दबा नही रहता है,
आँधी-पानी सब सहता है।
एक दिन ऊपर आ जाता है,
मीठा फल पान कराता है।
फिर देख सभी ललचते हैं,
पीछे-पीछे पग धरते हैं।
पर वह मस्ती में गाता जाता है।
देखता रहजाता सारा ज़माना है।
जाग जरा वो सोने वाले
संसार मुसाफ़िरख़ाना है।

        - गणिनाथ सहनी, (रेवा,मुजफ्फरपुर,बिहार)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कांग्रेस की निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में भारी गिरावट के पूर्वानुमान

भविष्य में क्या होंगी, मैं नहीं जनता हूँ |  इस दौर में बहुत लोग अभिव्यक्ति की आजादी का अलाप जप रहे है |  तो मुझे भी संविधान के धारा  19  क...