रविवार, 22 अक्टूबर 2017

नंग-धरंग था ! - गणिनाथ साहनी

नंग-धरंग था
कड़ाके की ठंड में
किसी ने झिंगोला पहना दिया
काले-कलुठे बदन में, अंग में।

नंगे पाँव चला था
मंजिल की ओर
कुछ-कुछ अभाव में
किसी ने चप्पल पहना दिया
हमारे पाँव में।

बेघर, यायावर, अनिकेत था
किसी ने ठौर दिया,
क्षुधा अतृप्त थी
किसी ने निवाला दिया,
रोटी का कौर दिया।

जीवन से निराश था
किसी ने आस दिया,
कर्तव्यपथ पर चलने की प्रेरणा दी,
विश्वास दिया।
इस तरह जीवन की गाड़ी
पटरी पर चलने लगी,
स्नेह की चिकनाई से
धुरी में गति आ गई, फिसलने लगी।

वह कोई और नही था
माँ थी !
जिसने ममता की छाया में
पाल-पोसकर बड़ा किया,
अंगुली पकड़ाकर चलना सीखलाया
अपने पैरो पर खड़ा किया।

          - गणिनाथ सहनी (रेवा, मुजफ्फरपुर -बिहार)

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