रविवार, 22 अक्टूबर 2017

आस्था और वैज्ञानिकता का समावेश छठ महोत्सव ! - जितेश सिंह

आस्था और वैज्ञानिकता का समावेश छठ महोत्सव । बिहार-उत्तरप्रदेश में छठ पूजा के प्रति लोगों की आस्था । पौराणिक परंपरा, अनुशासन,वैज्ञानिकता और समाजिकता चारों का । एक अद्भुत संगम है ।
आधुनिकता का प्रभाव आज भी छठ महोत्सव से कोसों दूर है । पुरानी परंपरा रीति-रिवाज, अनुशासन, समर्पण आज भी छठ पूजा की आधारशिला है । चार दिवसीय छठ उत्सव अपने आप में एक आधुनिक प्रबंध को छिपाए हुए हैं । प्रबंध का एक वैसा नियोजित व्यवस्था है । वर्तमान में नहीं, जिसमें परंपरा, अनुशासन, वैज्ञानिकता, सामाजिकता का एक अद्भुत मेल हो । 4 दिनों का यह महाउत्सव अद्वितीय है।
प्रथम दिन स्नान करके ही भोजन बनाया जाता है, जिसे 'नहा-खा' कहा जाता है| उपासक शुद्ध होकर घरेलू साम्रगी से बने स्वनिर्मित आहार का ही ग्रहण करती है। पूजा संबंधित सारी व्यवस्था क्रमानुसार इसी दिन तय हो जाती है। अगलेे दिन (दूसरा दिन)  निर्जल उपवास रखती है । रात को पूजा उपरांत जल तथा प्रसाद ग्रहण कर। गर्वगृह (पूजा घर) में ही प्रवास करना होता है। विश्राम के लिए हस्त से बने कुश के चटाई को शुद्ध माना जाता  है। पुनः आगले दिन उपवास रखती हैं । इसी दिन (छठ पूजा के तीसरे दिन) शाम को सूर्यास्त से ठीक पहले नदी किनारे भगवान सूर्य के साक्षात दर्शन कर। सूर्यदेव से परिवार के सभी सदस्यों के लिए बल, बुद्धि, विवेक, अटूट संबंधों बना रहे। इसके लिए उनका आह्वान करती है, साथ ही सूर्य देव जैसा यशस्वी, कल्याणकारी  वंश की कामना करती हैं। जिसका तेज सूर्य के समान और बल बुद्धि का प्रयोग सूर्य देव की प्रकाश की तरह लोक-कल्यान्कारी  हो । छठ पूजा के अंतिम दिन यानी चौथा दिन प्रात: नदी किनारे भगवान सूर्य की आराधना होती है । मंगल गीत, उत्सव के साथ सूर्य देव का उदय स्वागत, आराधना के बाद इस महाउत्सव की समाप्ति होती है ।
छठ पूजा में सभी घर के सदस्यों का आपसी तालमेल बढ़ता हैं । समाज के सभी लोगों का सहयोग, आपसी भाईचारा बना रहता हैं, सभी एक दूसरे के सहयोग से नदी तट की सफाई करते हैं । छठ पूजा हेतु आधिकांश साम्रगी गांव से निर्मित या उत्पादित होती हैं, जिसे आपस में सभी बांट लेते हैं । जिससे आर्थिक मदद मिलती हैं। और सामाजिकता बढाती हैं!  छठ पूजा के दौरान पूजा सामग्री और पूजा की विधि आज भी पुरानी रीति रिवाजों को सहजे हुए हैं । उन्हें संरक्षण दे रही । पुरानी व्यवस्था, शुद्धता और उसका महत्व जगजाहिर हैं, कितना संतुलित था,  छठ पूजा हेतु प्रसाद के रूप में जो भी फल-फूल उपयोग में लाए जाते हैं। सभी के सभी अमृत (औषधि) का कार्य करते । जिसे प्रकृति में बदलाव के समय ग्रहण करना अतिआवश्यक है । क्योंकि इस समय में ऋतु में परिवर्तित होती है अतः इन फलों का ग्रहण करना आवश्यक होता है। जल से परावर्तित होकर जब सूर्य की किरणें हमारे शरीर पर पड़ती हैं । जिससे कुष्ठ रोग नहीं होता। जिसे यह रोग हुआ भी हैं । उसका खत्म हो जाता है । छठ से जुड़ी एक पौरााणिक कथा भी इसका उल्लेख करती हैं। पूजा के समय घर में एक देवीय अनुशासन का माहौल बन जाता है । जिसमें परिवार के सभी छोटे बड़े लोगों को इसका पालन करना होता है । उन्हें पूजा संबंधित कार्य उनके क्षमता के अनुसार दी जाती है। यह उत्सव एक ऐसा अनुशासन की विधि का संरक्षण करता है, जिसमें समाज के हर वर्ग को कोई न कोई कार्य अवश्य करना पड़ता है।  उन कार्यों को एक अनुशासन में करना इस पूजा पद्धति को अद्वितीय बनाती है।
छठ महोत्सव को समझने के लिए। इसके महत्व को करीब से जानने के लिए। छठ पूजा में उत्तर प्रदेश या बिहार में जरूर आए। आधुनिकरण के इस दौर में आज भी छठ पूजा की पद्धतियां अपने आप में कई पुरातन प्रक्रियाओं को सहेजें हुई है। इसे जानने और समझने की आवश्यकता है।
                                               - जितेश सिंह
                 

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