मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

ईमान बचाकर रखता क्या ? -गणिनाथ साहनी



बेईमानों की बस्ती में
ईमान बचाकर रखता क्या ?
जुल्मी दरिन्दो की हस्ती में
हौसला सजाकर रखता क्या ?
हो पथ काँटो से भरा हुआ
तो फूल सजाकर रखता क्या ?
नव जीवन का उल्लास लिए
अस्ताचल में छिपता क्या ?
उफ ! ये बादल है उष्ण लिए
फिर रिमझिम वर्षा करता क्या ?
बिन पतवार की नईया को
साहिल से हटाकर रखता क्या ?
जब भांग पड़ी हो कुँए में
तो नशा से मैं उबरता क्या ?

       - गणिनाथ सहनी (रेवा, मुजफ्फरपुर बिहार )

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