शनिवार, 16 दिसंबर 2017

संपादक और उसके लेखनी के मनोभाव के क्रम! जितेश सिंह

संपादक औपचारिक रूप से समाज का मार्गदर्शन भले ही नहीं करता हो. परंतु अनौपचारिक यानि मानसिक रूप से समाज का मार्गदर्शन तो करता ही है. लेखन की एक ऐसी कला जो आपके विचार को प्रभावित करता हो. आपके भविष्य के निर्धारित कार्यक्रमों को आपके हाथों ही बदलने की दक्षता रखता हो, संपादक कहलाता है. जब हम कोई लेख या प्रेरक प्रसंग पढ़ते या सुनते हैं. तो उसी कालखंड में अपना मन विचलित करता है. जो उस महान व्यक्तित्व और इतिहास को पुनर्जीवित कर समाज के बीच रख देता है. मन के अंतर्भाव में उसका अनुसरण करने. उनके बताए हुए मार्ग पर चलने का पहला कदम रखा जैसे कि  पृष्ठ पलटना पड़ा. पुनः मेरा मन 16 दिसंबर 2017 में वापस आ गया. ऐसी लेखन शास्त्र की यह जादूगरी, जो आपको वास्तविक तो नहीं बल्कि मानसिक तौर पर इतिहास का दर्शन करने की क्षमता रखता हो, आगे की कार्यक्रम और योजना की भविष्यवाणी करने की दक्षता हो, वही संपादक है. जब हम-आप हजारों वर्ष पुराने श्री कृष्ण-अर्जुन संवाद में खो जाते हैं. यह काला कुछ और नहीं संपादकीय लेखन है. जिसे एक कुशल संपादक की भावना से कलम के द्वारा कोरे कागज पर लिखी जाती है. वर्तमान परिपेक्ष्य में संपादकीय लेखन की कला चुनौतीपूर्ण है. देश,काल, खंड, परिस्थिति के अनुसार संपादन करने के इस कला में परिवर्तन आ गया है. यानी संपादक वर्तमान में विभिन्न वादों और राजनीतिक दलों की भावना के वशीभूत हो गया है. काव्य, लेख, टिप्पणी आदि माध्यम से समाज के कष्टों का निवारण करना संपादन है या अपने विचारों, मनोभाव, दलगत बातों का प्रचार, एक संपादक के लेखनी में दिखते है. खौर जो भी हो. इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि, इस विषय पर लिखना और समझना कठिन है. इसलिए नहीं कि संपादक शब्द में वह तेज नहीं रहा या समाज में उसका महत्व नहीं है. बल्कि जब हम संपादन की बात करते हैं. तो समाचार पत्र, न्यूज़ चैनल, गीतकार, संगीतकार, लेखक, कलाकार, भाषणकर्ता, शिक्षक की पढ़ाने की कला, इन सबो में कूट-कूट कर संपादक के गुण भरे होते हैं. मगर हमें आज पत्र पत्रिका या न्यूज चैनल के संपादक के विषय में जानकारी साझा करनी है. तो इसी विषय को ध्यान में रखकर लिखना होगा. भारत ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व आज विभिन्न प्रकार के वादों से ग्रसित है. इसका वैचारिक प्रभाव समाज के सभी घटकों पर समान रूप से पड़ा. इसके चपेट में लेखक, संपादक और उसकी लेख लेखनी भी आयी. वर्तमान में प्रत्येक लेखक, सूचनादाता और संपादक इन्हीं विचारधारा और वादो से ग्रसित है. यानी समाचार हमें, सामाजिक कुरीतियां, सरकार की योजनाएं, कार्यपद्धती की समीक्षा या कोई सामयिक घटना या कोई वगैरह विषय पर मिले, उसे तरह संपादित किया जाता है कि, बिना सामाजिक हानि यानी भड़काव या टकराव आदि भावना उत्पन्न किये बगैर. एक शराब की हल्के डोज की भाँति धीरे-धीरे  वैचारिक रूप से समाज को अपनी लेखनी और बाद में अपने विचारधारा से जुड़ना होता है. जब हम किसी सामाजिक पुस्तके या कहानी के पुस्तक पढ़ते हैं. तो उसके प्रथम पृष्ठ यानी प्रस्तावना में ही पूरी कहानी की भविष्यवाणी हमें मिल जाती है.
एक संपादक को इतिहास से लेकर वर्तमान में घटित और संभावित सभी योजनाओं को ध्यान में रखकर संपादन करना होता है. चाहे वह विभिन्न वादों से ग्रसित हो या किसी राजनीतिक दलगत, वामपंथी, पूंजीवादी या अन्य कोई वादों से संबंधित हो या किसी विचारधारा से. संपादक किसी भी विचारधारा के गोद में बैठकर कलम खींच रहा हो, वह अपने भावी संभावनाओं को नष्ट नहीं करता. ताकि आगे चलकर उसे परिस्थिति से समझौता ना करना पड़े. संपादक के यही गुण चाहे उसे हम-आप उसे स्वार्थपूर्वक या उज्जवल भविष्य की चिंता के लिए या लेखनी के दायित्व के रूप में देखे. वह अपने लेख को संपादित करने में बस अपने विचारधाराओं की गंध मात्र छोड़ देता है. उस वाद या विचार को अपनी लेखनी में आत्मसात नहीं करता. अगर ऐसा होता तो यह किसी पार्टी विशेष, या विभिन्न वादों का मात्र धोषणा पत्र बन कर रह जाता. परन्तु संपादन कला वाद मुक्त लेखन का वशीभूत है. वतर्मान में समाज को जाने-अनजाने में स्वयं चिंतिन और प्रेरित करने के लिए मजबूर करता है और यही कारण है कि संपादक की लेखनी समाज के लिए, समाज के हित के लिए, एक जीवन दायक प्रेरणा बनी है.

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