प्राचीन समय में जिस भारतवर्ष का क्षेत्रफल असीमित रहा।
जिसने संपूर्ण विश्व को अपना परिवार माना, मार्गदर्शन दिया। जिस भारतवर्ष का वेद 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावनाओं से वशीभूत है । जिन्होंने विश्व को 'कृणवंतो विश्वमार्यम्' का पाठ पढ़ाया हो । जो भूतकाल में विश्वगुरु था । आज के अमेरिका की तरह नहीं जो विश्व समाज का अपहरण करता हो ।भारत संस्कृति ने एक ऐसा विश्व सरकार बनाने की कल्पना की थी । जिसमें संसार के अविकसित, विकासशील और विकसित राष्ट्रों के मध्य की दूरियां को समाप्त किया जाए । कहीं भी भूख, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी न हो । विश्व के सभी संसाधनों पर सब का अधिकार हो । उनका बंटवारा समानता के आधार पर सभी में न्यायपूर्ण ढंग से किया जाए । परन्तु खंड-खंड राष्ट्रीयता में विभाजित मानवता कभी भी विश्व शांति ला नहीं सकती। विश्व को एक सूत से बांधने के लिए अध्यात्म की स्थापना आवश्यक हैं । भारतीय संस्कृतिक, वेदों, खगोल शास्त्र, चिकित्सा पद्धियों का मार्गदर्शन कर, आज अमेरिका, रूस, जापान आगे बढ़ गए । आज इसी भारतवर्ष में अध्यात्मवाद के लिए कोई जगह नहीं बची । इतना महान और प्राचीनतम देश की संस्कृतिक कहीं खो गई । वर्तमान में देश की राजनीति अपने मार्ग से भटक चुकी है । राजनीतिक चूंकि सभी धर्मों से सबसे प्रमुख धर्म है । इसलिए राजनीति का अध्यात्मीकरण आज के युगन आवश्यकता है । जब तक राजनीति का अध्यात्मिकरण संभव नहीं होगा । तब तक भारत ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व गरीबी, भ्रष्टाचार, संप्रदायिकता, जातिवाद, लोभ, भय, जाति-मजहब और आतंकवाद से बाहर नहीं निकल पाएगा । हमें विदेशी व्यवस्था नहीं । बल्कि भारतीय सांस्कृतिक व्यवस्था को आधुनिक युग में लाने की आवश्यकता है । भारतीय संस्कृतिक आधारित आज हमारी राजनीति पहचान, लोभ के कुचक्र में फंस कर भ्रमित हो गई है । विनाश के द्वार पर खड़ी है, अतः स्वार्थ की राजनीति का त्याग कर आध्यात्म राजनीति की आवश्यकता है । व्यक्तिगत हित नहीं राष्ट्र हित में मतदान करे, आपना जनप्रतिनीधि योग्य और चरितार्थ खोजे |
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| JITESH RAJPOOT (हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल) |
वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने विश्व को पुनः अध्यात्म, योग से जोड़ने का प्रयास किया । उनके प्रयास को नकारा नहीं जा सकता हैं । परंतु इस क्षेत्र में और कार्य करने की जरूरत है ।
स्वयं समाज को आगे आने की आवश्यकता है । भ्रष्टाचार, घोटाले और लोभ का त्याग कर । भारत को पुनरुत्थान की ओर अग्रसर करने का दायित्व प्रत्येक भारतीय का है । विदेशी नीतियों से भारत को नहीं देखा जा सकता। राजनीति को समर्पण और अध्यात्म की नज़र से देखने की आवश्यकता हैं । तभी यह भारतवर्ष महानता के शीर्ष पर खड़ा होकर, भारतीय संस्कृति का गुणगान पायेगा । समग्र विश्व के कल्याण के लिए, स्वयं भारत के कल्याण हेतु । भारतीय राजनीति को ऊपर उठाना होगा । आज समग्र विश्व आतंकवाद, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता, जैसे कुप्रभावों के चंगुल में फंसा हुआ है । आज दुनिया भारत की ओर टकटकी लगा कर देख रही है । क्योंकि! भारत ही एकमात्र सांस्कृतिक रूप से पूर्ण राष्ट्र है । जिसके वेद-पुराण, गीता, रामायण जैसे महाकाव्य विश्व कल्याण और विश्व बन्धु का ज्ञान देता है । भारत ही एकमात्र राष्ट्र है । जिसके वैदिक परंपरा -
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः I
सर्वेभद्राणि पश्यन्तु मां कश्चिदुःखभागभवेत ||
पर आधारित है । जो संपूर्ण विश्व के सभी धर्मों के मंगल कल्याण हेतु प्रात: प्रार्थनार्थ रहा है । आधुनिक समय के महान धर्म प्रचारक विवेकानन्द । जिनके कृत्यों हमेशा स्मरणीय रहेंगे, अद्भुत है । जिन्होंने भारतीय संस्कृति के विशालतम रूप से दुनिया को परिचय कराया । शिकांगो के धर्म सभा सम्मेलन में आज भी विवेकानंद जी वाणी गूंजती है । भारत की जिजीविषा और जीवंतता को विवेकानंद ने संपूर्ण विश्व के सामने रखा । दुनिया लालायित हो उठी थी । भारतीय सभ्यता को देखने और समझने के लिए । परंतु हमलोगों ने अपने पूर्वजों के प्रति और उनके गौरवमयी कृत्यों के प्रति इतना ज्ञान नहीं हुआ, जितना अपेक्षित था । भारतीय की मानसिकता के इस निराशजनक पक्ष ने, हमें अपने ही विषय में जानने-समझने और विचार करने से निषिद्ध किया है ।
हमने कभी भी इन वाक्यों को ध्यान से पढ़ा ही नहीं -
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ।
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा ।।
आज दुःख तो इस बात है कि उस 'कुछ बात' को स्वयं हमने ही कभी नहीं समझा या समझने का प्रयास किया । समाज में अपने ही प्रति व्याप्त निराशा का यह दुर्बलत्म पक्ष हमारे लिए अभिशाप है । जिसके कारण आज की राजनीति हमें भयंकर विनाश की ओर ले जा रही हैं । आज भारत सांप्रदायिकता, गरीबी, भ्रष्टाचारी, के कुचक्र में फंसा हुआ है । इसे स्वयं और विश्वपरिवार से लिए आगे उठाना होगा । जिसके लिए सर्वप्रथम इसकी राजनीति को शुद्ध होना पड़ेगा । जिसका उपाय आध्यात्मिककरण है ।

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