अन्नदाता पर गोली दागी,
इनको है शासन की पड़ी|
चाहे कर लो विकास की,
तुम कितनी ही बड़ी-बड़ी|
पर किसान की बदहाली पर,
मेरी कलम रो पड़ी।।
शास्त्री जी के नारे को,
राजनीति में झूठला बैठे|
जय जवान! जय किसान!
नारे को मिठुला बैठे।
जवानों से किसानों पर,
तुम गोली चलवा बैठे,
जो नहीं मरे गोली से,
उनको फाँसी पर लटका बैठे।।
किसी किसान की विधवा रोयी,
किसी किसान की माता!
किसानों की बदहाली पर,
आज फिर से भारत माता रोयी।
फसल नष्ट हो जाने पर,
उसने अपनी तकदीर खोयी|
अत्म स्वाभिमान तु ना बचा सका,
तो फाँसी भी गले लगा लिया|
बार बार किसानों पर,
तुम लक्ष्य साधना बंद करो,
किसानों और जवानों पर,
राजनीति करना बंद करो,
गर तुमसे कुछ नहीं होता,
तो तुम न यह परपंच रचो,
वादे निभा ना सको,
तो झूठ बोलना बंद करो|
किसी किसान के घर में,
बैठी जवान बेटी है|
जब किसान की अर्थी,
सूने आंगन में लेटी है|
कौन करेगा कन्या दान?
यह सोच रही बेटी है!
और अर्थी को कंधा देने,
घर पे खड़ी जनता है|
अर्थी को इंसाफ चाहिए!
यूं ढ़ोग करना छोड़ दो|
नहीं तो, किसानों की बदहाली पर,
तुम राजनीति करना छोड़ दो|

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