सोमवार, 16 अप्रैल 2018

मीडिया का भारतीयकरण होना आज की युगीन आवश्यकता है| - जितेश सिंह

पिछले कुछ दशकों से खबरों का बाजारवाद करना मीडिया संस्थानों की रीत बन गई हैं| समाज की आधुनिकीकरण का मुद्दा हो या संस्कृतिक-परम्परा की सुरक्षा की| मीडिया अपने पक्षपाती न्यूज़ के कारण केवल द्वंद और भ्रम ही उत्पन्न की है| समाधान की ओर मीडिया का ध्यान ही आकर्षित नहीं हुआ या इस मामले से मीडिया पल्ले झाड रही हैं| वैसे भी समाधान की फिक्र करना बाजारवाद के पेशों के खिलाफ हैं| मीडिया आजकल ऐसे ही बाजारवादियों के चंगुल में फसी पड़ी हैं| जहां सिर्फ खबरों के मूल्य तय होने के बाद ही प्रकाशन संभव है| रोजमर्रा की खबरों में डिजिटल मीडिया से लेकर प्रिंट अखबार, मग्जीन, सोशल मीडिया सभी में ऐसे ही

जितेश सिंह (अ.बि.वा.हि.वि.वि.,भोपाल )

बजारवादियों का दबदबा हैं| जहाँ से मानकीकरण बिलकुल गायब है| आफवाहों को तुल देकर नए खाबरों के सृजन करने में मीडिया को आज महारथ हासिल है| ऐसे ही अफावोहों के कारण आज भारतीय समाज में आपसी द्वन्द जैसी स्थिति निर्मित हुई है| देश के राजनीति पार्टियों को जिम्मेदार ठहराने वाली मीडियाकर्मी भी स्व 'फूट डालो और राज करो' की विदेशी मंशा को बढ़ावा दे रही है| खबरों की गुणवक्ता और समाजहित, राष्ट्रीयहित, शिक्षा और शांति के स्थान पर जातीय मजहबी- संधर्ष को बढ़ावा दिया जा रहा है| जिससे समाज में आपसी भाईचारे और अंत:सम्बन्ध को खतरा है| खबरों का तारका, लाल मिर्ची ना जाने कैसे-कैसे शीर्षकों का प्रयोग किया जाता है| जो भय और मानशिकि तनाव के साथ-साथ आपसी संधर्ष को भी उत्पन्न कर रही| किसी अमानववीय खबरों को जाति-मजहब का चोला पहनाया ही नहीं जाता, बल्कि इस तरह से खबरों की बनावट की जाती है| एक वर्ग- दुसरे के खिलाफ खड़ा हो जाता है| राजनीतिक पार्टियों के एजेंडा से मीडिया को शुद्धिकरण और भारतीय कारण की अग्रसर होना समय की मांग है| आखिर कब तक मतभेद और आपसी द्वन्द से मीडिया घराने आक्षुते रह सकते है? एक ही खबर को किसी मीडिया सोसायटी वामपंथी तो कोई दक्षिणपंथ विचार से ग्रषित होकर लिखता रहा है, तो कोई उसकी चुंगली करता है तो कोई इसकी, कोई सरकार के खिलाफ रिपोर्टिंग करता है तो कोई पक्ष में सरकार और सत्ताधारी पार्टी का प्रवक्ता नजर आता है| ऐसे में बेसहारा जनार्धन की परेशानी, सामाजिक समता, सुरक्षा, शिक्षा जैसे मुद्दे गायब रहते है| उसके बावजूद जब राजनीती कारणों से ओत-पोत मीडिया अपनी कलमों को नोटों के स्याही में डुबाकर किसी खबर को लिखता है, तो सच मानों मेरे भी मन में जातिगत भाव और विनाशक विचार का सृजन होता है| कई बार भी ऐसी खबरों को पढ़कर जातिवादी विचारो से ग्रसित खुद को पाया हुआ| ऐसे विनाशकारी दलदल में समाज को डालने का शत प्रतिशत कारक मीडिया ही है| मीडिया को ऐसे मजहबी संधर्ष के बजाए, समाज में समरसता के भाव का प्रचार करना चाहिए| लोकभावना, देशहित और सामाजिक सुरक्षा जैसे उपायों का नवनिर्माण करना चाहिए|

नवनिर्माण का ही पर्याय मीडिया का सामाजिककरण, राष्ट्रीयकरण और भारतीयकरण है-   

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