शनिवार, 21 अप्रैल 2018

बेकार और फेक मीडिया जिसे हम सोशल मीडिया कहते! - जितेश सिंह

नववादी विचार और तकनीकी सामाजिक परम्परा ही नही बल्कि समाज नाम की संस्था को ही नष्ट कर देगी| आजकल आपसी तनाव बढ़ाते जा रहे है| हर व्यक्ति आपने आप को सामाजिककरण के चंगुल से निकलना चाहता हैं| रिश्ते-नाते, भाईचारा से उब चूका है| यह तनावपूर्ण स्थिति भारतीय सामाजिक व्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं| जिस मोबाइल के अधीन हम दिन-प्रतिदिन होते जा रहे हैं| यह तो यही सन्देश दे रहा हैं| सामाजिक रीती-रिवाज,

जितेश कुमार
अ.बि.वा.हि.वि.वि., भोपाल
 

आपसी संबंध, दोस्ती भाईचारे, से कही बढ़कर हमारा एक हमसफ़र है, मेरा पर्सनल मोबाईल! जिससे हम दिन-रात चपके रहते है| मोबाइल से ही सारे दुःख-दर्द और खुशियाँ शेयर करने वाला युवा आपने आस-पास घटित होने वाली घटनाओं से बेफिक्र है| मोबाइल का घंटों प्रयोग करना तो हानिकारक है, इससे कई खतरनाक बीमारियाँ जन्म ले सकती है| मानशिक कमजोरी से लेकर लाखो बीमारियों का वाहक हो सकते है| हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, आदि रोग का भी वाहक है, हमारा हमसफ़र! साथ ही इसके प्रयोग से सोचने की क्षमता, बुद्धि-विवेक में गिरावट आ रही है| हमारा स्मरण शक्ति दिन-प्रतिदिन कमजोर होते जा रहा है| आज इस तकनिकी दौर में प्रत्येक मानव आपहिज बनता जा रहा है| आत्मनिर्भरता से तकनीक के अधीन हो चूका समाज क्या नवचेतना और नव-इतिहास रच पायेगा? आपनी विवेक और सामर्थ्य को स्वमं आज का समाज एक विध्वंश की ओर खपा रहा है| इसका कई बार हमें प्रमाण भी मिला है| सोशल मीडिया जिसे माना जाता है|  इसमे कुछ सोशल नाम की थीम ही नहीं! यह एक बकवास, फर्जी, अनसोशल मीडिया है| जिसका उपयोग समाज को नष्ट करने के लिए किया जा रहा है| आज स्थिति कैसी है? आपका साथी वर्षो बाद भी मिले तो भी कोई ख़ुशी और वो माहौल नहीं बनता है जैसा पहले किसी आने से ख़ुशीयों की लहर दौर जाती थी| अब वो गाँव और शहर के चौपाल ख़त्म हो गए| बच्चो ने मित्र बनाना छोड़ दिया| क्या ऐसे ही भविष्य के मानव निर्मित होंगे, जिसे किसी से कोई मतलब नहीं? आज जिसे हम शिक्षित वर्ग की संज्ञा देते है| उनकी स्थिति क्या?  सबसे ज्यादा सोशल मीडिया और शिक्षा के नाम पर एक विध्वंश तकनीक को ऐसे ही वर्गों ने बढ़ावा दिया है| आपने बच्चों को इतना आजादी इसी उम्र में दे देते हैं| जब उन्हें ठीक से बाते करने तक नहीं आती| पापा को पु और माँ को मु कहने वाले बच्चे अपने  माँ-पिता के साथ वह मामतत्व और आज्ञापालन, भावनात्मक संपर्क ही बना पाते है| माँ-पिता भी इतना व्यस्थ अपने कार्य में रहते है उचित समय पर उचित निर्णय हीं ले पाते है| बच्चों से बाते करने, उनके कार्यों की समीक्षा करने का भी समय नहीं रहता हैं| ऐसे में एक नशायुक्त पदार्थ की तरह मोबाइल थमा देते है| जिससे उस वक्त तो बच्चों को ख़ुशी मिलाती हैं पर क्या वो मोबाइल पर आ रहे गलत और अनुपयोगी फीचर से खुद को उभर पाते है?  अगर आज का समाज ये समझाता है, सोशल माध्यम के कारण एक-दूसर के हमेशा पास रहते हैं तो उसकी सबसे  मुर्खता है| जहाँ भानात्मक संपर्क नहीं हो सकते| शारीर की सभी ज्ञान्द्रियाँ स्पर्श नहीं हो सकती वहाँ कभी कोई संबंध ही नहीं बन सकता है| आज इसी भूल ने वृद्ध आश्रम और प्लायिंग स्कूल का निर्माण किया हैं| सीधी सी बात है, सोशल मीडिया भी ऐसे ही अनसोशल  भूल की सबसे बड़ी एक खोज है| जिसका उपयोग आज जातीय-मजहबी, दंगे, आलागवाद, समाज के विध्वंश के लिए किया जा रहा है|            

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