शनिवार, 21 जुलाई 2018

शिक्षक नहीं शिक्षा की पिटाई हुई थी! - जितेश सिंह

लखीचंद उच्च विद्यालय रेवा से ही मेरी पढाई हुई है| उसी पवित्र स्थल से मैंने प्रेरणा ग्रहण की है| वही शिक्षक मुझे मार्ग और लक्ष्य पर अडिग होना सिखाया था| वही से मैंने उड़ान भरी थी| यह मेरा जन्म और समाज से बंधा उड़ानतल (एयरपोर्ट) है| इसके प्रति मेरा सदैव भावनात्मक संबंध रहा है| मैं अभी भोपाल में हूँ, जैसे ही मुझे इस कुकृत घटना की जानकारी हुई| मेरी संवेदनाएं कुछ समय के लिए मृत हो गई| जैसे वहाँ के लोगों की हो गयी थी, इस अमानवीय घटना को अपने आँखों से देखने के बावजूद वो मौन थे| आज वहां के उक्त समाज, शिक्षा स्थल पर हुये इस अमानवीय चीरहरण पर निशब्द रह कर इसे बढ़ावा दिया है|


     
लखीचंद उच्च विद्यालय रेवा में शिक्षक की पिटाई की खबर ने मुझे अन्दर से झकझोर दिया| आखिर किसका अपमान हुआ और कौन समाज में प्रतिष्ठा पाया? यह शिक्षक नहीं शिक्षा की पिटाई है| गुरुवार के दिन जो कुकृत आरोपी छात्र के परिजन ने किया, एक शैक्षणिक स्थान में बाहुबल का प्रदर्शन निंदनीय के साथ शर्मशार करने वाली घटना थी| आसपास के सामाजिक घटकों का मौन रहना, मृत समाज जैसा प्रतिक हो रहा था| ना कोई जातिगत, परिवारगत, धर्म-मजहबगत, कभी किसी बात की प्रतिशोध भी उधार नहीं था| फिर निर्दोष शिक्षक पर दोषी परिजनों के खिलाफ लगाया आरोप मिथ्या है| शिक्षक के चरित्र पर प्रश्न खड़ा करने वाले परिजनों को क्या इतना भी ज्ञान नहीं था? शिक्षक की गलती भी थी, तो क्या ये जो कुकृत किया गया है, क्या यह आपके न्यायप्रक्रिया का भाग था? स्पष्ट करे, न्याय यही है तो सबसे पहले मैं आपके संस्कार, समाज, पूर्वज और पड़ोसियों को मृत मनाता हूँ| जिन्होंने केवल आपको उच्चकोटि के जानवर बना कर छोड़ दिया, संस्कार, चरित्र, परम्परा, सामाजिक, ज्ञान, दिया ही नहीं था| जिसके आप मनुष्यता और मानवता को ओर बढ़ सके| आपके द्वारा किया गया, यह महापाप जानवार की भांति प्रतीत होता है|

जितेश सिंह पूर्व छात्र, रेवा हाईस्कूल

इस अमानवीय घटना पर हमारा समाज चुपी तोड़ने का नाम भी नहीं ले रहा है| इस निंदनीय घटना के तीन दिन बीत चुके है, किसी प्रकार का गपशप और चौपाल नहीं बैठी है, क्यूकि शिक्षा का मामला है, साईकिल और पोशाक की पैसे की बात होती तो विरोध में समाज निकल पड़ता है, अपने मुंह शिक्षकों को गाली बकता और कुछ लोग मुंह में मुंह मिलकर बोलने लगते, फ़रियाद जिला तक पहुँच गई होती अब तक| एक शिक्षक को डटने और पढ़ने की जो गुरु-दक्षिणा दी गई है| यह कोई आम घटना नहीं जो भुलाया जा सकता, ना ही यह अन्यायपूर्ण घटना समाज को भुलाने देगा| क्या उक्त दोषी गुरु-शिष्य परम्परा को वैश्या की तरह चौराहे पर बेच कर आयी है? यह घटना केवल मुजफ्फरपुर (बिहार) के रेवा हाईस्कूल की नहीं, यह घटना बदलते समाज की, आधुनिकता, नववादी वैचारिक परिवेश की है, जो दिन-प्रतिदिन बार-बार हमारे परम्परा और संस्कृति पर घात कर रहा, उसे लहूलुहान कर रहा है| बुद्धिजीवी और उक्त स्थान का समाज पुरुषार्थ भूलकर और विवेक भूलकर इस कुकृत को देख रहा और स्वमं कर भी रहा| क्या वहां का समाज अपने ऊपर लगे इस कलंक को धो पायेगा? जब समाज ही ऐसे कुकृत पर मृत हो जाते हो, तो मुझे प्रशासनिक कारवाई की उम्मीद भी छोड़ देनी चाहिए|


  • अगर स्वर्थाकता भी बचा है, तो चौपाल लगा कर उक्त दोषी पर कारवाई करो| नहीं तो यही परिस्थिति आपके बच्चे के सामने भी आयेंगे, तब समय बदल गया होगा, वो गाली-गलौज, मार-पिट और रक्तरंजित आपके साथ होगा और आप निर्लज की भांति अपनी निर्बलता पर रोयेंगे| एक दिन सहसा वो दिन भी आ जायेगा जब गुरु पर उठे वही हाथ से सर पे वार होगा, उसी समय आपका शर्म के अंत हो जायेगा| खैर पढ़ा नहीं सकते तो संस्कार ही दे बच्चों को, इसी से उनका आत्मज्ञान बढ़ायेगा| याद रहे एक शिक्षक पर हाथ छोड़ने वाले बच्चे अपने पिता से कितनी दूर?              

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