हिंदी
भाषा का उत्थान, हिंदी का विकास! अध्ययनशील छात्रों में राष्ट्रभाषा के प्रति
लगाव, समर्पण की वैचारिक भावना से 'अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय,
भोपाल' का निर्माण हुआ था| भाषागत अध्ययन की सकारात्मक पहल का निर्णय, सच में एक
क्रान्तिकारी नीति और योजना थी|

जितेश कुमार
अ.बि.वा.हि.वि.वि.
लगभग दो सौ पाठ्यक्रम विभिन्न विषयों से संबंधित
पूर्णत: हिंदी में शुरू किये गए| जिसमें अभियांत्रिकी, मेडिकल, विभिन्न विषयों में
आनर्स, योग, पत्रकारिता, जैसे नामचीन अंग्रेजी में मान्यता प्राप्त विषय भी हिंदी
में आरंभ हुई| अंग्रेजी में मान्यता प्राप्त इसलिए कहा "क्युकि इन विषयों की
पढाई हिंदी में लगभग न के बराबर हो रहा था| अगर किसी संस्थान में लागु भी था तो
इन्हें उचित प्लेटफार्म प्राप्त नहीं था|" लेकिन भोपाल स्थित 'अटल बिहारी
वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय' जिसका शुभारंभ पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के
कर-कमलों से हुआ था| हिंदी भाषा में इन सभी पाठ्यक्रमों को पढ़ने के लिए उचित भी और
आशापूर्ण संस्थान के रूप में उभर कर आया| 10वां विश्व हिंदी सम्मलेन और कुम्भ में
विवि की जमकर हिन्दीप्रेमियों ने स्वागत किया| शासन और विवि की खूब तारीफे हुई और
होना भी चाहिए था| माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी विवि के प्रति अपना
मंतव्य बताते हुए कहे कि सकरात्मक पहल है, देश में ऐसे विश्वविद्यालयों की
आवश्यकता थी| उन्होंने तो यहाँ तक कहा था, कि इसे अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय
बनाया जायेगा| प्रधानमंत्री जी की बातों को सुनकर उपस्थित हिंदी से अध्ययनकर्ता और
अध्ययनदाताओं को जिस सुख का अनुभव हुआ होगा| व्यक्त करना बड़ा मुश्किल कार्य हैं|
मैं और मेरे जैसे जितने भी अध्ययनकर्ता हैं| हिंदी प्रेमी तो आवश्य ही हैं| विवि में
नामांकन के समय जो विश्वास और उद्देश्य हमारे अंत:मन में था| जो संवेदनाएं हमारे
मन, मस्तिक और ह्रदय में उत्पन्न हो रहा था| जो आकर्षण हमें अपने विषयों को हिंदी
में पढ़ने को लेकर था पहले कभी किसी विषय को लेकर उत्पन्न नहीं हुआ| एक ध्येय और स्वप्न था| राष्ट्रभाषा
हिंदी से पढ़े! हिंदी से बढ़ें!
आज 7 वर्ष बाद कोई विवि के बारे में विद्यार्थियों
मत जानना चाहे तो उपयुक्त बातों का विपरीत सुझाव देगा| हिंदी से अपने पाठ्यक्रम में अध्ययन करने की ईच्छा आज भी है और रहेगी| मगर अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय से नहीं! इसका बड़ा कारण
यहां कि अव्यवस्था है,
विवि में 7 वर्षो के बाद भी
प्रोफेसरों की नियुक्ति नहीं हुई| संविदा
और अतिथि विद्वानों की संख्या में भी अपेक्षाकृत कमी है| सही मार्गदर्शक का अभाव है तो कुछ ऐसे भी अतिथि
विद्वान विभाग के सेक्रेटरी बन कर बैठे है, जिसका
ताल-मेल विभाग के छात्रों से नगण्य हैं| समय से
ना ही परीक्षायें होती हैं, ना
परिणाम घोषित किये जाते हैं| छात्रों के साथ जातीयता के आधार पर भेदभाव भी उभरकर सामने आया हैं| अंकित
पंचौरी के साथ जिस प्रकार से मौखिक परीक्षा के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी के प्रो.
संजीव गुप्ता ने बरताव किया| उनके
जाति का मजाक उड़ाया, उन्हें अपमानित किया गया| इसके विपरीत विभाग के अतिथि विद्वान
संदीप श्रीवास्तव, अंकित पंचौरी पर ही कार्यवाई और उसे निकालने की बात कर रहे,
क्यूकी अंकित पंचौरी नीची जाति हैं| यह प्रसंग बहुत ही नीचता और दुर्भाग्यपूर्ण
हैं|
व्यवसाय नही जो आय/व्यय के आधार
पर किस विभाग में कितना खर्च हो रहा और उससे कितना फायदा देखा जाये| शैक्षणिक
संस्थान में मूल्यांकन की व्यवसायिक पद्धति 'नव-चैतन्य' भरने वाले अटल बिहारी वाजपेयी
हिंदी विश्वविद्यालय की ख्याती गिरा रही हैं| जिस प्रकार विवि ने वितीय समस्याएं, विद्वानों की कमी, छात्रों की कमी से निपटने का प्रयास किया हैं| अब तक 114 से ज्यादा पाठ्यक्रम बंद किये जा चुके है| कुछ विद्वानों की घर वापसी और
छात्रावास बंदी के साथ ही नामचीन पाठ्यक्रम जिससे विवि को विशेष पहचान मिली थी| सभी एक के बाद एक बंद होते चले
गये| जैसे-आनर्स, अभियांत्रिकी, मेडिकल, योग आदि| छात्रावास जिन परिस्थिति में
बंद करने के आदेश दिये गये, जिस प्रकार इसे बंद किया गया, उसका भी मूल कारण
व्यवसायिक पद्धति ही है| उपयुक्त
समस्याओं से निदान और विवि के विकास की यह आधुनिकत्म प्रक्रिया गुजरात चुनाव में
कांग्रेस की टिप्पणी को पुनः याद दिलाती हैं|
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जितेश कुमार
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लगभग दो सौ पाठ्यक्रम विभिन्न विषयों से संबंधित पूर्णत: हिंदी में शुरू किये गए| जिसमें अभियांत्रिकी, मेडिकल, विभिन्न विषयों में आनर्स, योग, पत्रकारिता, जैसे नामचीन अंग्रेजी में मान्यता प्राप्त विषय भी हिंदी में आरंभ हुई| अंग्रेजी में मान्यता प्राप्त इसलिए कहा "क्युकि इन विषयों की पढाई हिंदी में लगभग न के बराबर हो रहा था| अगर किसी संस्थान में लागु भी था तो इन्हें उचित प्लेटफार्म प्राप्त नहीं था|" लेकिन भोपाल स्थित 'अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय' जिसका शुभारंभ पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के कर-कमलों से हुआ था| हिंदी भाषा में इन सभी पाठ्यक्रमों को पढ़ने के लिए उचित भी और आशापूर्ण संस्थान के रूप में उभर कर आया| 10वां विश्व हिंदी सम्मलेन और कुम्भ में विवि की जमकर हिन्दीप्रेमियों ने स्वागत किया| शासन और विवि की खूब तारीफे हुई और होना भी चाहिए था| माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी विवि के प्रति अपना मंतव्य बताते हुए कहे कि सकरात्मक पहल है, देश में ऐसे विश्वविद्यालयों की आवश्यकता थी| उन्होंने तो यहाँ तक कहा था, कि इसे अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय बनाया जायेगा| प्रधानमंत्री जी की बातों को सुनकर उपस्थित हिंदी से अध्ययनकर्ता और अध्ययनदाताओं को जिस सुख का अनुभव हुआ होगा| व्यक्त करना बड़ा मुश्किल कार्य हैं|
आज 7 वर्ष बाद कोई विवि के बारे में विद्यार्थियों मत जानना चाहे तो उपयुक्त बातों का विपरीत सुझाव देगा| हिंदी से अपने पाठ्यक्रम में अध्ययन करने की ईच्छा आज भी है और रहेगी| मगर अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय से नहीं! इसका बड़ा कारण यहां कि अव्यवस्था है, विवि में 7 वर्षो के बाद भी प्रोफेसरों की नियुक्ति नहीं हुई| संविदा और अतिथि विद्वानों की संख्या में भी अपेक्षाकृत कमी है| सही मार्गदर्शक का अभाव है तो कुछ ऐसे भी अतिथि विद्वान विभाग के सेक्रेटरी बन कर बैठे है, जिसका ताल-मेल विभाग के छात्रों से नगण्य हैं| समय से ना ही परीक्षायें होती हैं, ना परिणाम घोषित किये जाते हैं| छात्रों के साथ जातीयता के आधार पर भेदभाव भी उभरकर सामने आया हैं| अंकित पंचौरी के साथ जिस प्रकार से मौखिक परीक्षा के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी के प्रो. संजीव गुप्ता ने बरताव किया| उनके जाति का मजाक उड़ाया, उन्हें अपमानित किया गया| इसके विपरीत विभाग के अतिथि विद्वान संदीप श्रीवास्तव, अंकित पंचौरी पर ही कार्यवाई और उसे निकालने की बात कर रहे, क्यूकी अंकित पंचौरी नीची जाति हैं| यह प्रसंग बहुत ही नीचता और दुर्भाग्यपूर्ण हैं|
व्यवसाय नही जो आय/व्यय के आधार
पर किस विभाग में कितना खर्च हो रहा और उससे कितना फायदा देखा जाये| शैक्षणिक
संस्थान में मूल्यांकन की व्यवसायिक पद्धति 'नव-चैतन्य' भरने वाले अटल बिहारी वाजपेयी
हिंदी विश्वविद्यालय की ख्याती गिरा रही हैं| जिस प्रकार विवि ने वितीय समस्याएं, विद्वानों की कमी, छात्रों की कमी से निपटने का प्रयास किया हैं| अब तक 114 से ज्यादा पाठ्यक्रम बंद किये जा चुके है| कुछ विद्वानों की घर वापसी और
छात्रावास बंदी के साथ ही नामचीन पाठ्यक्रम जिससे विवि को विशेष पहचान मिली थी| सभी एक के बाद एक बंद होते चले
गये| जैसे-आनर्स, अभियांत्रिकी, मेडिकल, योग आदि| छात्रावास जिन परिस्थिति में
बंद करने के आदेश दिये गये, जिस प्रकार इसे बंद किया गया, उसका भी मूल कारण
व्यवसायिक पद्धति ही है| उपयुक्त
समस्याओं से निदान और विवि के विकास की यह आधुनिकत्म प्रक्रिया गुजरात चुनाव में
कांग्रेस की टिप्पणी को पुनः याद दिलाती हैं|
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