शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

अटल बिहारी के छात्र 'चिंतन नहीं चिंता में है' - जितेश सिंह

१. छात्र और महोदय के बीच संवाद
छात्र- महोदय परीक्षा कब होगी,
महोदय- फिर से परीक्षा एक महीने पहले तो हुई थी|
छात्र- आखिरी सेमेस्टर बचा था| एक विषय में ऐटीकेटी लगी है, उसकी परीक्षा कब होगी?
महोदय- अगले सेमेस्टर में!
छात्र- किन्तु इससे पहले तो बी.ए. षष्टम और एम.ए. चतुर्थ सेमेस्टर की परीक्षा में ऐटीकेटी आने पर परिणाम घोषित होने के ठीक बाद परीक्षा होती थी|
महोदय- उससे आपके 6 महीने बर्बाद होने से बच जायेंगे|
छात्र- महोदय ये तो अच्छी बात हैं!
महोदय- ये छात्रहित में नहीं!
२. अब संवाद दूससे छात्र के साथ
छात्र- बे चल महोदय को मार गोली, पंडित के पास चलते है|
दूसरा छात्र- पागल है तू, एक पंडित हमारा ऐटीकेटी की परीक्षा कैसे करवायेगा?
पहला छात्र- अबे ऐटीकेटी परीक्षा छोड़ मैं तो अपना हस्त रेखा दिखवाने जा रहा, तू भी चल!
दूसरा छात्र- पर क्यू?
पहला छात्र- पता तो चले कब सिर से सनी ग्रह का उतरेगा?
दूसरा छात्र- तब तो विद्यार्थी परिषद् वाले छात्र को पकड़ो| उनके पास सभी छात्र में नम्बर है| कल सभी साथ-साथ चलेंगे.....
विद्यार्थी परिषद् ज़िंदाबाद! छात्र शक्ति जिंदाबाद!
मेरा सन्देश- भईया प्रश्न जिन्दवाब वाले लोगों पर भी उठाने लगे है| समस्या पर शांति शोभा नहीं देती है|

बड़े लोग अक्सर कहते है, समस्या का सामना हंसते हुए करो| दुर्भाग्य है कि विवि अपने ही छात्रों के प्रति, उनके भविष्य के प्रति सचेत नहीं है| तभी तो बार-बार हमारे लिए संकट उन्पन्न कर रहा, जिससे हम परेशान और
हताश हो उठाते है| आखिर हमारी सुनाने वाला ही कौन है? विद्यालय में शिक्षक  के रहते छात्र को खुद, अनाथ बोलना और मानना पाप है| मगर बेसहारा तो वह बोल ही सकता है| अर्थ वही है, शब्द थोड़ी सुनने-सुनाने वालों को कम चुभती है| पिछले महीने सभी पाठ्यक्रम की परीक्षा 25 जून तक विवि में समाप्त हो चुकी थी| आज परिणाम भी आने शुरू हो गये है| परीक्षा में परिणाम सभी छात्रों एक सामान नहीं आते है| कुछ अच्छे नंबरों से पास हो जाते तो कुछ जैसे-तैसे सफल होते है| किन्तु एक शिक्षक दोनों छात्रों में भेदभाव नहीं करता है| पहले से तो यही होता आया है| लेकिन यूजीसी के पागल हो जाने के बाद से नियमों में बदलाव होने लगे या यू कहे यूजीसी के नाम को उछालकर कोई अपने दोषों को छुपा रहा है| अपनी जिम्मेदारी से पल्ले झार रहा है| बी.ए. और एम.ए. के छात्रों की, आखिरी सेमेस्टर की परीक्षा में यदि किसी विषय में ऐटीकेटी लगी हो तो परीक्षा तुरंत हो जाती थी| इससे, उनके भी 6 महीने बच जाते थे| लेकिन इस बार से ऐसा नहीं होगा, क्यू पता नहीं?
शुरूआती दौर में तो अटल बिहारी के विद्यार्थियों को चिंतन करना चाहिए कि कैसे विवि में छात्रों की संख्या बढे? कैसे व्यवस्था में बदलाव हो? शिक्षकों और छात्रों के बीच मधुर संवाद चलता रहे| मगर ऐसा कुछ नहीं; यहाँ तो दुसरे विश्वविद्यालय और कॉलेज से शिक्षक बुलवाकर विद्यार्थियों के जाति और धर्म का मजाक उड़वाया जाता है| प्रतिक्रया देने पर सरकारी कार्यों में व्यवधान उत्पन्न करने का दोषी करार देकर विवि से निकालने की बात होती है| जहाँ चिंतन की आवश्यकता है, वहां हम चिंता में डूबे है| बोलने वाले तो बोलेंगे ही किस बात की चिंता, काहे की चिंता? हमारी चिंता विभाग संबंधित है, हमारी चिंता शिक्षा संबंधित है, हमारी चिंता छात्रावास संबंधित है, हमारी चिंता पाठ्यक्रम कब बंद हो जाये से संबंधित है, हमारी चिंता परीक्षा और परिणाम संबंधित है, हमारी चिंता शिक्षकों को निलंबित करने संबंधित है, हमारी चिंता नये प्रोफेसर की बाहली  में विलंम संबंधित आदि कारणों से है| विवि ने जिन प्रकियाओं को हमारे चिंता के समाधान के लिए, उससे निपटने की लिए अपनाया है| इससे तो यही प्रतीत होता है, यह चिंता के निदान की प्रकिया नहीं, चिन्तक से निदान की प्रकिया है|
कुछ दिन पहले अटल जी की तबियत बिगड़ने की खबर पढ़ी थी| देश भर से बड़े-बड़े नेता उनसे मिलने पहुँचे| तब जाकर मिडिया वालों ने उनकी तबियत में सुधार की खबर दिखायी| एक हमारे अटल बिहारी है, जिनकी व्यथा सुनने-सुनाने वाला कोई नहीं! कुछ ही वर्षों में स्थिति ऐसी निर्मित की गई है कि आज हमें बोलने में कतई संकोच नहीं होगा कि अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय छात्रों के साथ, उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा|  


   

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