आज चौथा दिन भी बीत
गया| मामा तो आये नहीं और नहीं आया उनका कोई आश्वासन| खुशीलाल आयुर्वेद संस्थान,
भोपाल के छात्र-छात्रा पिछले चार दिनों से अनिश्चितकालीन धरना पर बैठे है| 10
अगस्त को मैं अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी वि.वि., भोपाल आने-जाने समय धरना पर बैठे
छात्र-छात्रों को देखा और अनदेखा करके चलते बना| मुझे लगा अक्सर छोटी-छोटी बातों
पर घर की तरह रूठने वाली बीमारी अभी तक पीछा नहीं छोड़ी होगी| वास्तविता को समझे
बिना बात-बात पर आन्दोलन करना, धरना पर बैठना आदत बन गयी है| पढ़ने-लिखने के बजाये
धरनाबाजी कहाँ तक उचित है? इसे भी आम धरना की तरह सोच कर धिसक गए, क्यूकी मुझे
विश्वास था, कल ये सरे लोग फुर्र हो जायेंगे| मैंने अगले दिन भी विवि गया देखा फिर
से धरना, थोडा स्वार्थ में घिरा हुआ
था, इसलिए सोचा कहा इस पचारे में घिसता रहूँगा
आखिर 1400 किलीमीटर दूर बिहार के मुजफ्फरपुर से आया हूँ| बदनामी भी बिहारी वाली
पीछा नहीं छोड़ती है| लेकिन विवि से लौटते समय मुझसे रहा नहीं गया, मैं बस से तुरंत
खुशीलाल बस स्टॉप पर उतर गया| कैम्पस में गया, वहाँ के छात्रों से बात की समस्या की
लिखित पर्ची मांग लिया| जाते- जाते मैंने कहा "क्या कोई मीडिया वाला इस धरना
के बारे में जानकारी नहीं लिया है?" एक छात्र ने निराश होकर कहा "एक दो
छोटे स्तर के मीडिया चैनल और प्रिंट मीडिया से नवसीखिए पत्रकार ने दौरा किया है|
कोई पेपर या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में खास मामला नहीं बन पाया है|" मैं
समझ गया शिवराज के जन-आशीर्वाद में मीडिया भोज का लुप्त उठा रहा| रोज फ्रंट पेज पर
शिवराज और कमलनाथ के आलावे मीडिया को कोई दिखता कहाँ? छात्र चार दिन से परेशान है,
धारना पर बैठे है| क्या कोई मीडियाकर्मी है, जो अपने आप को जन-आवाज मनाता है| मैंने
खुशीलाल के छात्रों से बात की है, सर बच्चे सच में परेशान हैं| इसकी परेशानी का
कारण शुल्क में वृद्धि, आयुर्वेद के डॉक्टरों की बहाली में अनियमितता, इंटर्नशिप
कर रहे छात्रों की मानदेय में आपेक्षाकृत कमी है| इसके साथ ही कई ऐसी समस्या जिससे
कारण इसमें हतासा है, निरासा है, विरोध से स्वर है, दुःख की झलक है, भविष्य की दरकार
है| इनके आवाज राजनीति नहीं, तो क्या आप प्रकाशित करेंगे? इसके कुछ पैसे नहीं
मिलेंगे, हो सके तो उलटे कोई सरकार के तरफ से फोन काँल आ जाए| देश को पत्रकार की
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जितेश सिंह
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