मंगलवार, 14 अगस्त 2018

स्वमं पूर्वाग्रह का शिकार हूँ! जितेश सिंह

जगजाहिर! हमारा अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल| पिछले तीन महीनें में 35 बार प्रिंट मीडिया ने यहाँ की शिक्षा प्रणाली को कटधरे में खड़ा किया है| मुझे भी पहले लगता था कि मीडिया को बिना आतंरिक स्थिति जाने, कुछ भी पक्ष-विपक्ष तय करना जल्दीबाजी होगी| धीरे-धीरे मैं मीडिया के विचारों से सहमत होने लगा और क्यू ना हूँ? आज 1 वर्ष 17 दिन के बाद मैं पूर्णतया मीडिया का पक्षधर हूँ और यह इसलिए नहीं की मैं पत्रकारिता का छात्र हूँ बल्कि इसलिए मैं हिंदी वि.वि. का छात्र हूँ|

जितेश सिंह
अ.बि.वा.हि.वि.वि., भोपाल

मेरे लिए हिंदी में अध्ययन करना गौरव की बात है| ज्यादा ज्ञानी तो नहीं जो पढ़ा, लिखा, सुना हूँ वही बता रहा; हिंदी में ज्ञान का प्रेम गुड़ छुपा है, अदभुत भाषा है| लोग गुस्से में भी बोलते है " मैं आपकी बात से असहमत हूँ|" एक द्वंद्व में भी शिष्टाचार की कड़ी जोड़ती है, हिंदी| हिंदी केवल भाषा नहीं व्यवहार, शिष्टा, सदाबहार और प्रेमी है| अगर विश्व में सभी हिंदी भाषी होते तो कभी झगड़ते ही है| ऐसी सहिष्णुता हमारी हिंदी है| जिसने पूर्व में कई भाषाओँ को अपने में मिला लिया और उफ़ तक नहीं की| विचारणीय है, ऐसी सहिष्णु हिंदी में आराजकता कहाँ से आई? हिंदी में कोई आराजकता नहीं आई है, बस राजनीति के चपेट में आ गयी| भले ही एक कुशल और अद्वितीय माने-जाने वाले लोकप्रिय प्रधानमंत्री अटल जी भाजपा और संघी थे| हमारा वि.वि. कोई राजनैतिक अटल नहीं शिक्षा रूपी अटल है, जब-जब कोई राजनीति की बाते करेगा तब-तब हिंदी आराजक बन जाएगी| शिक्षा का गोलमाल होना, हंगामा बढेगा और मीडिया आलोचना करेगी| वि.वि. विद्वानों की नीतियों से चालना बेहतर होगा, ना की भाजपा की नितियों से| कारण दो ही नजर आते है; पहला शासन के आगे लाचार और बेबसी, दूसरा व्यक्तिगत स्वार्थ दोनों से लड़ना होगा हमें| किसी की योग्यता प्रथम वर्ष और द्वितीय वर्ष नहीं हो सकती, ना किसी में संगठन की आयु की भूमिका होनी चाहिए| एक पक्ष और भी ना ही किसी सांसद और मंत्री के सेवाकारों को रखा जाना चाहिए, हमें हिंदी के लिए शिक्षाकारों की की जरुरत है| ऐसे नहीं किसी को विभाग की बागडोर दीजिए, जो आपका भी स्तर गिरा दे| ऐसा हो रहा है, किसी भी छात्र को आज संतुष्टि नहीं और कैसे हो कोई पढ़ाने वाला भी तो हो? आज अपनी विभाग की बात करता हूँ, पत्रकारिता विभाग| किसकी क्या भूमिका पता नहीं? परीक्षा विभाग हो या शुल्क विभाग किसी से कोई तालमेल ही नहीं| जवाब बहुचर्चित हैं " मेरा काम यह नहीं" सही में आपका काम यह नहीं, आपकी परिभाषा ही दूसरी है| जब कुछ बता नहीं सकते, पढ़ा नहीं सकते, सिलेबस भी नहीं दे सकते, क्लासे नहीं लगती तो फिर क्यू 75 प्रतिशत उपस्थिति की बात कर रहे और रजिस्टर है जिसमें उपस्थिति दर्शाएंगे? मैं भोपाल में हूँ द्वितीय सेमेस्टर के परीक्षा के कुछ दिन बाद होस्टल बंद हुए| उसके बाद एक नये रूम में जैसे-तैसे रहता हूँ, विरोध नहीं करता हूँ| कौन सी नियम का आलाप जपते है, वि.वि. स्व घोषित प्रभारी? जो छात्र के आते ही बोलता है "क्यू आये हो?" मुझे लगता है, जाती-कोम के लोगों की अलग निति और रीती की बात मुद्दा बन ही गई है, विभाग भी गंगा स्नान का लाभ उठाये| पहला निति कोई छात्र किसी परिस्थिति में दुसरे क्लाससाथी की मदद नहीं करेगा, दूसरा निति आते ही बताना पडेगा क्यू आये हो? विभाग में नहीं पुस्तकालय में बैठना है| ऐसी स्थितियों से हमें मुक्ति मिलेगी या मुक्त हो जाऊंगा समय का निर्णय है| मैं व्यक्तिगत आलोचना नहीं करता "स्वमं पूर्वाग्रह का शिकार हूँ|"
          

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