शुक्रवार, 8 मार्च 2019

आतंकवादियों की बेग़म ये पत्रकार

एक मुहल्ले में कई बरस से सलीम मियां और उनकी बेगम रहती थी. सलीम मियां क्रूर और झगड़ालू थे और अक्सर उनका किसी न किसी से झगड़ा हो जाया करता था। सलीम मियां के मुक़ाबले उनकी बेगम बहुत समझदार थीं। वो हमेशा सलीम को समझाती
रहती थीं और मोहल्ले वालों को भी। उनके नशेड़ी होने की दुहाई देतीं और बतातीं कि किस तरह मियां अपने ही रिश्तेदारों के हाथों ज़मीन-जायदाद का मुक़दमा हार कर नशे की लत लगा बैठे हैं, अतः उन पर तरस किया जाए। जब कभी मियां किसी से मारपीट करते थे. उनकी बेगम दौड़ कर झगड़ा रुकवातीं और सलीम मियां को समझा-बुझा कर घर ले जातीं। अगले दिन मियां फ़िर किसी को मार बैठते। धीरे-धीरे मोहल्ले वालों को एक बात साफ़ हुई कि मियां जब भी किसी से मारपीट करते हैं तो उनकी बेगम बीचबचाव के दौरान हमेशा सामने वाले को पकड़ लेती थीं, उससे लिपट जाया करतीं और समझाने लगतीं। यही इसका फायदा उठा कर सलीम मियां सामने वाले को दो घूंसे और जड़ देते थे. साथ ही मार कर मौके से गायब भी हो जाया करते थे। फ़िर शुरू होता बेगम का रोना-पीटना-समझाने का दौर। अब लोंगो को भी लगने लगा हमेशा सलीम मियां की बेगम दूसरे को पिटवा देती है और जब मियां को कोई हाथ लगता तो बीचबचाओ में कूद पड़ती है. फ़िर क्या था? लोंगो में भी तय कर किया था मियां को अबकी बार सबक सीखा कर रहेंगे. अगले दिन फिर झगड़ा हुआ. और हर बार की तरह मियां की बेगम झगडे के दौरान सामने वाले को समझाने-लिपटने-चिपटने का प्रयास करने लगी. अबकी बार लोंगो ने बेगम को ही ठीक से कूट दिया। अगली बार मियां दूबारा लड़े तो बेगम प्रकट नहीं हुईं। और इस बार मियां भी अच्छे से कूटे गए। उस दिन के बाद मोहल्ले में शांति हो गयी। मियां कितना भी नशे में होते, किसी से उलझते नहीं थे। वर्तमान में कुछ लिबरल देशद्रोही , मीडियाकर्मी और राजनेता उसी बेगम का क़िरदार निभा रहे हैं। आतंक की किसी घटना के होते ही ये पहले तो आतंकवादी की मज़बूरियां और हालात बताने लगते हैं, उसके आतंकवादी बनने में सरकार और समाज का कितना दोष है, समझाने लगते हैं, और फ़िर अपने वाक्जाल से मुल्क को ऐसा बांधते हैं की लोगों को आतंक की जड़ में खुद अपनी गलती समझ में आने लगती है। उधर आतंकवादी अपना अगला निशाना तय कर रहे होते हैं। 
अब बेगम को पीटे बगैर मियां सुधरने वाले नहीं!

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