रचनात्मक लेखन
रचनात्मक लेखन का
तात्पर्य पहले लोग बनावटी बाते और किस्सा कहानी को लिखना ही मानते रहे है| इसीलिए
इसके सर्वाधिक उपयोग मनोरंजन के क्षेत्र में डायलॉग और स्क्रिप्ट लिखने में होता
रहा है| प्रेमचंद्र की कहानी में एक ऐसा जादू था, कि लोग कहानी पढ़ते नहीं, कहानी
में जीते थे| एक ऐसा लेखन और सम्प्रेषण की प्रकिया जो आपको हंसा सकता है, रुला
सकता है, झकझोर सकता है| और तो और अपनी लेखनी के दम पर आपके विचार और व्यवहार को
परिवर्तित कर दे| वो है रचनात्मक लेखन|
आज व्यापर और सूचना तंत्र
के विकास के साथ मौजूदा दौर में रचनात्मक लेखकों की मांग भी तेजी से बढ़ी है|
प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक, वेब हो या ब्रांडक्रास्ट सभी में ऐसी लेखकों की मांग
है जिसके कलम में भावनात्मक रस भी हो और अग्नि समान तिलमिलाहट भी, जिसे पढ़ कर
लोगों के जोश सातवें आसमान पर हो| वैसे हो रचनात्मक लेखकों की फिल्मों, टेली,
सीरियल, विज्ञापनों में बहुत मांग है|
रचनात्मक लेखन के लिए जरुरी
है भाषा और विषय का ज्ञान| इसके साथ ही जानकारी होने चाहिए लेखक को की, वो किस
वर्ग के लिए लेखन कर रहा है| फिल्मों और सीरियल में कहानी लिखने का तरीका विजुवल
होना चाहिए, वही किसी विज्ञापन के लिए लेखन कुछ सेकंडो में समाप्त होना चाहिए|
रचनात्मक लेखन के लिए
हमेशा अपडेट रहना पड़ता है| कम वाक्यों में मूल बाते समाहित रहे और लोगों को बोरिंग
भी ना लगे, इस तरह से रचनात्मक लेखन संप्रेषित होती है| इस लेखन पद्धति में लेखन
के उद्देश्य और पाठक के मुड का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता है|
आवश्य ही यह लेखन की
रोजगार परख शैली है| जिसका उपयोग व्यापार से मनोरंजन तक किया जाता है|
रचनात्मक लेखन
के सिद्धांत
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यथार्थता (Accuracy)
वस्तुपरकता (Objectivity)
निष्पक्षता (Fairness)
संतुलन (Balance)
स्रोत (Sourcing-Attribution)
जैसी कि पहले चर्चा की गई है कि तथ्यों का चयन ही
निर्धारित करता है कि समाचार यथार्थ का कैसा प्रतिबिंब कर रहे हैं। फिर जब हम इसकी
व्याख्या कर रहे होते हैं तो स्वयं हमारे अपने मूल्य और प्राथमिकताएं भी घटना
के, हमारे समाचारीय मूल्यांकन और प्रस्तुतीकरण को प्रभावित करती हैं। वे तथ्य
हमें अधिक अधिक समाचारीय लगते हैं जो हमारे अपने दृष्टिकोण या परसेप्शन को
झुठलाते हों उन्हें स्वीकार करने में हमें एक मानसिक प्रतिरोध का सामना करना
पड़ता है। यथार्थ से वास्ता पड़ने तथा स्वयं अपने अनुभव के साथ हमारे दृष्टिकोण
भी बदलते हैं। इनका बदलना भी एक गतिशील प्रक्रिया है और एक प्रोफेसनल पत्रकार में
तो यह गतिशीलता आवश्यक होती है। समाज के विभिन्न तबकों में इस गतिशीलता का स्तर
भिन्न होता है। कुछ तबके परिवर्तन को आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। और काफी
रूढि़वादी हो सकते हैं जो अपने दृष्टिकोणको आसानी से परिवर्तित नहीं करते।
यथार्थता
एक आदर्श रूप में मीडिया और पत्रकारिता यथार्थ का
प्रतिबिंब मात्र हैं। इस तरह समाचार यथार्थ की पुनर्रचना करता है। वह अपने आप में
एक जटिल प्रक्रिया है और आज तो यहां तक कहा जाता है कि समाचार संगठनों द्वारा
सृजित यथार्थ की छविया भ्रम पैदा करती हैं। लेकिन सच यही है कि मानव यथार्थ की
नहीं, यथार्थ की छवियों की दुनिया में रहता है। किसी भी यथार्थ के बारे में जो भी
जानकारियां प्राप्त होती हैं उसी के अनुसार हम उस यथार्थ की एक छवि अपने मस्तिष्क
में बना लेते हैं और यही छवि हमारे लिए वास्तविक यथार्थ का काम करती है। एक तरह
से हम सूचना सृजित छवियों की दुनिया में रहते हैं।
संचार के प्रारंभ से ही ऐसा होता आया है। जो कुछ भी
मानव ने देखा नहीं है और जिसके होनेका उसे अहसास है उसके बारे में एक सूचना छवि
उसके पास होती है। दरअसल, यथार्थ को उसकी संपूर्णता में प्रतिबिंबित करने के लिए आवश्यक है कि ऐसे तथ्यों
का चयन किया जाए जो इसकी संपूर्णता का प्रतिनिधित्व करते हैं। समाचार में हम किसी
भी यथार्थ को उसके बारे में अत्यंत सीमित चयनित सूचनाओं और तथ्यों के माध्यम से
ही सृजित करते हैं। इसलिए यह अत्यंत महत्पूर्ण हो जाता है कि किसी भी विषय के
बारे में समाचार लिखते वक्त किन सूचनाओं और तथ्यों का चयन करते हैं। चुनौती यही
है कि ये सूचनाएं और तथ्य केंद्रीय हों और संपूर्ण विषय का प्रतिनिधित्व करते
हों अर्थात तथ्यों का प्रतिनिधित्वपूर्ण होना अत्यंत आवश्यक है।
इस संदर्भ में एक भारतीय लोक कथा तथ्यात्मकता और
सत्यात्मकता को काफी अच्छे ढंग से उजागर करती है। छह अंधे और एक हाथी की कहानी।
छह अंधों में बहस छिड़ गई कि हाथी कैसा होता है और फिर उन्होंने इस बहस को खत्म
करने के लिए स्वयं हाथी को छूकर यह तय करने का निश्चय किया कि हाथी कैसा होता
है। एक अंधे ने हाथी के पेट को छुआ और कहा यह “दीवार की तरह है।“ दूसरे ने उसके दांत को छुआ और कहा “नहीं यह तलवार की तरह है।” तीसरे के हाथ उसकी सूढ़ आई
और उसने कहा “यह तो सांप की तरह है।“ चौथे ने उसका पैर छुआ और चिल्लाया तुम पागल हो “यह पेड़ की तरह है।” पांचवें को हाथी का कान
हाथ आया और उसने कहा, “तुम सब गलत हो यह पंखे की तरह है।” छठे अंधे ने उसकी पूंछ पकड़ी और बोला, “बेवकूफों हाथी दीवार, तलवार, सांप, पेड़, पंखे में से किसी भी तरह
का नहीं होता यह तो एक रस्सी की तरह हैं।” हाथी तो गया और छह अंधे आपस में लड़ते रहे। हरेक अपने
‘तथ्यों’ के आधार पर हाथी की अपनी ‘छवि’ पर अडिग था।
तथ्य या सूचनाएं जो हर अंधे ने छूकर
प्राप्त किए वे अपने आप में सच थे हाथी का कान पंखे जैसा होता है लेकिन हाथी तो
पंखे जैसा नहीं होता। इस तरह हम कह सकते हैं कि तथ्य अपने आप में तो सत्य ही
होते हैं लेकिन अगर किसी संदर्भ में उनका प्रयोग किया जा रहा हो तो उनका पूरे विषय
के संदर्भ में प्रतिनिधित्वपूर्ण होना आवश्यक है। उसी स्थिति में तथ्य यथार्थ
की सही तस्वीर प्रतिबिंबित कर पाएंगे। इसके अलावा समाचार और उनके यथार्थ को लेकर
काफी कुछ कहा और लिखा गया है। कैनेथ ब्रुकने तो १९३५ में कहा था कि किसी एक पहलू
पर केंद्रित होने का मतलब दूसरे पहलू की अनदेखी भी है। समाचार लेखन के संदर्भ में
अपने आप को इन तथ्यों की सत्यता के दायरे में नहीं बांध सकते जो अपने आप में सत्य
ही होते हैं बल्कि हमार सामने चुनौती होती हैं सत्यपूर्ण तथ्यों के माध्यम से
संपूर्ण यथार्थको प्रतिबिंबित करने की।
एक नस्ली, जातीय या धार्मिक हिंसा की घटना का समाचार कई तरह से लिखा
जा सकता है। इसे तथ्यपरक ढंग से इस तरह भी लिखा जा सकता है कि किसी एक पक्ष की
शैतान की छवि सृजित कर दी जाए और दूसरे पक्ष को इसके कारनामों का शिकार। इस घटना
से किसी भी एक पक्ष को अधिक उजागर कर एक अलग ही तरह की छवि का सृजन किया जा सकता
है। फिर इस घटना में आम लोगों के दु:ख-दर्दों को उजागर कर इस तरह की हिंसा के
अमानवीय और जघन्य चेहरे को भी उजागर किया जा सकता है। एक रोती विधवा, विलखते अनाथ बच्चे या तो
मात्र विधवा और अनाथ बच्चे हैं जिनकी यह हालत जातीय या धार्मिक हिंसा ने की या
फिर ये इसलिए विधवा और अनाथ हैं क्योंकि ये किसी खास जाति या धर्म में हैं। इस
तरह समाचार को वास्तव में यथार्थ के करीब रखने के लिए एक पत्रकार को प्रोफेशनल और
बौद्धिक कौशलमें एक स्तर का महारथ हासिल करना जरूरी है। इस तरह की तमाम घटनाओं को
सतह पर नहीं एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर इनका मूल्यांकन करना पड़ेगा। वरना, प्रतिनिधित्वपूर्ण तथ्यों
का चयन करना मुश्किल हो जाएगा।
वस्तुपरकता
वस्तुपरकता को भी इस तरह की तथ्यपरकता से ही आंकना
आवश्यक है। जैसी कि पहले ही चर्चा की गयी है कि हम किस घटना का समाचार के रूप में
चयन करते हैं और दूसरा इस घटना से संबंधित ढेर सारे तथ्यों में से किन तथ्यों को
समाचार गठन की प्रक्रिया में चयनित करते हैं या अस्वीकार करते हैं लेकिन उस
प्रक्रिया में किस आधार पर और क्यों हम चंद तथ्यों को वस्तुपरक मान लेते हैं? वस्तुपरकता और यथार्थता
के बीच काफी समान क्षेत्र भी है लेकिन दोनों विचारों के अंतर को भी समझना जरूरी
है। एक होते हुए भी ये दोनों अलग विचार हैं। यथार्थता का संबंध जहां अधिकाधिक तथ्यों
से है वहीं वस्तुपरकता का संबंध इस बात से है कि कोई व्यक्ति तथ्यों को कैसे
देखता है। किसी विषय के बारे में हमारे मस्तिष्क में पहले से सृजित छवियां हमारे
समाचार मूल्यांकन की क्षमता को प्रभावित करती हैं और हम इस यथार्थ को इन छवियों
के अनुरूप देखने का प्रयास करते हैं।
हमारे मस्तिष्क में अनेक मौकों पर इस तरह की छवियां
वास्तविक भी हो सकती हैं और वास्तविकता से दूर भी हो सकती हैं। यह भी कहा जा
सकता है कि जहां तक यथार्थता के चित्रण का संबंध मूल्यों से अधिक है। हमें ये
मूल्य हमारे सामाजिक महौल से मिलते हैं। बचपन से ही हम स्कूल में, घर में, सड़क चलते हर कदम पल
सूचनाएं प्राप्त करते हैं और दुनिया भर के स्थानों, लोगों, संस्कृतियों और सैकड़ों
विष्यों के बारे में अपनी एक धारणा या छवि बना लेते हैं। वस्तुपरकता का तकाजा
यही है कि किस हद तक हम इस छवि को वास्तविकता के सबसे करीब ले जा पाते हैं। कुछ
सत्य ऐसे हैं जिन पर एक विश्वव्यापी सहमति हो सकती है लेकिन ऐसे तमाम सच तो
हमारे दृष्टिकोण से निर्धारित होते हैं उन पर यह पैमाना लागू नहीं किया जा सकता।
इस दृष्टि से दुनिया हमेशा सतरंगी और विविध रहेगी। इसे देखने के दृष्टिकोण भी अनेक
होंगे। इसलिए कोई भी समाचार सबके लिए एक साथ वस्तुपरक नहीं हो सकता। एक ही समाचार
किसी के लिए वस्तुपरक हो सकता है और किसी के लिए पूर्वाग्रह से प्रभावित हो सकता
है।
हमें समाचार लेखन के हर सिद्धांत और अवधारणा के
संदर्भ में बार-बार इस बात पर केंद्रित होना पड़ेगा कि देश और दुनिया भर की
हजारों-लाखों घटनाओं से चंद घटनाओं को किस आधार पर समाचार योग्य माना जाता है और
फिर समाचार योग्य माने जानी वाली घटनाएं जिस रूप में पाठकों या दर्शकों/श्रोताओं
तक पहुंचती हैं तो इनमें किन तथ्यों का समावेश होता है? घटना के किन पक्षों को
उछाला जाता है और किन पक्षों की अनदेखी की जाती है? ऐसा क्यों होता है और किया जाता है यह भी एक जटिल
सवाल है। तात्कालिक तौर पर तो इसे इस पैमाने पर ही परखा जा सकता है कि किसी खास
घटना के समाचार बनने और इसके किसी खास पक्ष को अहमियत मिलने से किसके हितों की
पूर्ति होती है। हितों की पूर्ति का पैमाने का इस्तेमाल पत्रकारिता में अनेक
रूझानों के मूल्यांकन के लिए किया जा सकता है।
निष्पक्षता
वैसे तो निष्पक्षता सीधे-सीधे अपना अर्थ व्यक्त
करता है। लेकिन निष्पक्षता को तटस्थता के रूप में देखना पत्रकारिता के पेशे में
एक गंभीर भूल होगी। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। इसकी राष्ट्रीय और
सामाजिक जीवन में अहम भूमिका है। इसलिए पत्रकारिता और समाचार सही और गलत, अन्याय और न्याय जैसे
मसलों के बीच तटस्थ नहीं हो सकते बल्कि वे निष्पक्ष होते हुए सही और न्याय के
साथ होते हैं।
जब हम समाचारों में निष्पक्षता की बात करते हैं तो
इसमें न्यायसंगत होने का तत्व अधिक अहम होता है। आज मीडिया एक बहुत बड़ी ताकत
है। एक ही झटके में यह किसी पर बट्टा लगाने की ताकत रखता है। इसलिए किसी के बारे
में समाचार लिखते वक्त इस बात का विशेष ध्यान रखना होता है कि कहीं किसी को
अनजाने में ही बिना सुनवाई के फांसी पर तो नहीं लटकाया जा रहा है। भ्रष्टाचार और
इस तरह के आचारण के मामलों में इस बात का विशेष महत्व है। समाचार की वजह से किसी
व्यक्ति केे साथ अन्याय न हो जाए, इसकी गारंटी करने के लिए निष्पक्षता की अहम भूमिका
है।
इसका एक आयाम यह भी है कि किसी को भी संदर्भ से काटकर
उद्धत न किया जाए। अनेक अवसरों पर यह देखा जाता है कि प्रमुख व्यक्तियों से काल्पनिक
प्रश्न पूछे जाते हैं और उनके उत्तर ही समाचारों की डेडलाइन बन जाते हैं। एक
काल्पनिक उदाहरण लें: किसी राजनीतिक दल में विभाजन के आसार नहीं हैं और इस दल के
अध्यक्ष से पूछा जाता है “आप अपने दल में विभाजन को रोकने के लिए क्या उपाय कर रहे हैं?” स्वाभाविक तोर पर दल का
अध्यक्ष इसका खंडन करेगा और अगले दिन अगर अखबार में सुर्खी हो “दल में विभाजन नहीं” तो पाठकों पर इसका क्या
असर पड़ेगा? कहीं न कहीं उनके मस्तिष्क में यह बात तो आ ही जाएगी कि इस दल में ऐसा कुछ
होने जा रहा था। यानि सब कुछ ठीक नहीं है। यह कहा जा सकता है कि इस तरह का समाचार
लेखन निष्पक्ष नहीं है। यह तो एक बहुत सरल और काल्पनिक उदाहरण था लेकिन समाचारों
की वास्तविक दुनिया में निष्पक्षता का पैमाना लागू करने के लिए अत्यंत पैनी नजर
होना आवश्यक है। फिर, निष्पक्षता को यथार्थता, वस्तुपरकता, सूचना स्रोत और संतुलन से काटकर नहीं देखा जा सकता है।
संतुलन
निष्पक्षता की अगली कड़ी संतुलन है। आमतौर पर मीडिया
पर आरोप लगाया जाता है कि समाचार कवरेज संतुलित नहीं है यानि यह किसी एक पक्ष की
ओर झुका है। हम सामचार में संतुलन के सिद्धांत की बात करते है तो वह इस तरह के व्यापक
संतुलन से थोड़ा हटकर है। आमतौरपर संतुलन की आवश्यकता वहीं पड़ती है जहां किसी
घटना में अनेक पक्ष शामिल हों और उनका आपस में किसी न किसी रूप में टकराव हो। उस
स्थिति में संतुलन का तकाजा यही है कि सभी संबद्ध पक्षों की बात समाचार में
अपने-अपने समाचारीय वजन के अनुसार स्थान पाए।
समाचार में संतुलन का महत्व तब कहीं अधिक हो जाता है
जब किसी पर किसी तरह के आरोप लगाए गए हों या इससे मिलती-जुलती कोई स्थिति हो। उस
स्थिति में हर पक्ष की बात समाचार में अभिव्यक्त होनी चाहिए अन्यथा यह एकतरफा
चरित्र हनन का हथियार बन सकता है। व्यक्तिगत किस्म के आरोपों में आरोपित व्यक्ति
के पक्ष को भी स्थान मिलना चाहिए। लेकिन यह स्थिति तभी हो सकती है जब आरोपित व्यक्ति
सार्वजनिक जीवन में है और आरोपों के पक्ष में पक्के सबूत नहीं हैं या उनका सही
साबित होना काफी संदिग्ध है। अगर कोई “सार्वजनिक व्यक्तित्व” बलात्कार जैसा अपराध कर
दे और मामला साफ-साफ सबके सामने हो तो पत्रकार को भी अपने विवेक से ही संतुलन के
सिद्धांत का पालन करना पड़ेगा। कुख्यात अपराधियों का मामला इससे अलग है। संतुलन
के नाम पर समाचार मीडिया इस तरह के तत्वों का मंच नहीं बन सकता जो कई मौकों पर
देखने को मिलता है। कभी-कभार किसी समाचार से इस तरह के तत्वों को लाभ पहुंचता है।
इसे रोकना भी जरूरी है।
संतुलन का सिद्धांत अनेक सार्वजनिक मसलों पर व्यक्त
किए जाने वाले विचारों और दृष्टिकोणों पर तकनीकी ढंग से लागू नहीं किया जाना
चाहिए। अनेक मसलों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने में राजनीतिक ढंग से लागू नहीं
किया जाना चाहिए। अनेक मसलों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करनेमें राजनीतिक पार्टियां
समय लेती हैं। आशय यह है कि राजनीतिक आलोचना के विषयों पर संतुलन का सिद्धांत उस
तरह लागू नहीं किया जाना चाहिए जैसा व्यक्तिगत आरोपों के मामले में किया जाना
चाहिए। राजनीतिक संतुलन तत्काल या रोजमर्रा की चीज नहीं है बल्कि एक समाचार संगठन
को अपने कवरेज की संपूर्णता में संतुलित होना चाहिए।
संसदीय और राज्य विधायिकाओं की रिपोर्टिंग में भी
संतुलन का ध्यान रखा जाना चाहिए। एक लोकतांत्रिक समाज में समाचार माध्यकों को
सभी तरह की राजीनतिक धाराओं के विचारों और विभिन्न मुद्दों पर उनके स्टैंड को
प्रतिबिंबित करना चाहिए। इसके जरिए ही लोग प्रतियोगी राजनीति और इसमें भाग लेने
वाली शक्तियों के बारे में सही और वैज्ञानिक समझ पैदा कर सकते हैं। संसद और
विधयिकाओं में अनेक तरह के विचार व्यक्त किए जाते हैं और इन सबको संतुलित ढंग से
प्रस्तुत करना आवश्यक है। लेकिन साथ ही यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि देश
के राजनीतिक जीवन में हर दल की अपनी ताकत और हैसियत है। इस तरह के समाचारों में
संतुलन कायम करते समय इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए। इसके अलावा सत्तापक्ष के
नेताओं के कथन निश्चय ही अधिक महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि वे किसी न किसी रूप
में सरकार की नीतियों को प्रतिबिंबित करते हैं जिसका असर सीधे लोगों के जीवन पर
पड़ता है जबकि विपक्ष के नेताओं के कथन उनकी राय, आलोचना या सुझाव भर हैं। वे राज्य की नीति नहीं हैं।
स्रोत
हर समाचार में शामिल की गई सूचना और जानकारी का कोई
स्रोत होना आवश्यक है। यहां स्रोत के संदर्भ में सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना
आवश्यक है कि किसी भी समाचार संगठन के समाचार के स्रोत होते हैं और फिर उस समाचार
संगठन का पत्रकार जब सूचनाएं एकत्रित करता है तो उसके अपने भी स्रोत होते हैं। इस
तरह किसी भी दैनिक समाचारपत्र के लिए पी.टी.आई. (भाषा), यू. एन. आई. (यूनीवार्ता)
जैसी समाचार एजेंसियां और स्वयं अपने ही संवाददाताओं और रिपोर्टरों का तंत्र
समाचारों का स्रोत होता है। लेकिन चाहे समाचार एजेंसी हो या समाचारपत्र इनमें काम
करने वाले पत्रकारों के भी अपने समाचार स्रोत होते हैं। यहां हम एक पत्रकार के
समाचार के स्रोतों की चर्चा करेंगे। आशय यह है कि समाचार के भीतर जो सूचनाएं और
जानकारियां होती हैं उनका स्रोत क्या होता है और समाचार तथा स्रोत के
अंतर्संबंधों का पत्रकारिता पर क्या प्रभाव पड़ता है।
समाचार की साख को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि
इसमें शामिल की गई सूचना या जानकारी का कोई स्रोत हो और वह स्रोत इस तरह की सूचना
या जानकारी देने योग्य समर्थ हो। कुछ बहुत सामान्य जानकारियां होती हैं जिनके
स्रोत का उल्लेख करना आवश्यक नहीं है लेकिन जैसे ही कोई सूचना ‘सामान्य’ होने के दायरे से बाहर
निकलकर ‘विशिष्ट’ होती है उसके स्रोत का उल्लेख आवश्यक है। स्रोत के बिना उसकी साख नही होगी।
उसमें विश्वसनीयता नहीं होगी। एक समाचार में समाहित हर सूचना का स्रोत होना आवश्यक
है और जिस सूचना का कोई स्रोत नहीं है उसका स्रोत या तो पत्रकार स्वयं है या फिर
यह एक सामान्य जानकारी है जिसका स्रोत देने की आवश्यकता नहीं है।
आमतौर पर पत्रकार स्वयं किसी सूचना का प्रारंभिक
स्रोत नहीं होता। वह किसी घटना के घटित होने के समय घटनास्थल पर उपस्थित नही
होता। वह घटना घटने के बाद घटनास्थल पर पहुंचता है इसलिए यह सब कैसे हुआ इसके लिए
उसे दूसरे स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है। अगर एक पत्रकार स्वयं अपनी आंखों से
पुलिस फायरिंग में या अन्य किसी भी तरह की हिंसा में मरने वाले दस लोगों के शव
देखता है तो निश्चय ही वह खुद दस लोगों के मरे का स्रोत हो सकता है। हालांकि इस
बारे में कुछ लोग अलग सोच भी रखते हैं और उनका मानना है कि पत्रकार तो सूचना का
वाहक भर है और हर सूचना का कोई स्रोत अवश्य होना चाहिए।
आज के इलेक्ट्रॉनिक
मीडिया के युग में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से सामान्य तात्पर्य टीवी चैनल ही हो गया
है, लेकिन वास्तव में रेडियो भी इसका अभिन्न प्रकार है। सच तो यह है कि टीवी
चैनलों का युग शुरू होने से पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का मतलब रेडियो ही रहा।
प्रासंगिकता रेडियो की बाद में भी बनी रही और अब भी खत्म नहीं हुई है। ऐसे में
रेडियो समाचार में भी पत्रकारों के लिए अवसर और चुनौतियां लगातार बने हुए हैं।
रेडियो समाचार प्रसारण
में पत्रकारों के लिए मुख्य कार्य रिपोर्टिंग के अलावा, समाचार आलेखन, संपादन और वाचन का है।
वास्तव में रिपोर्टिंग में भी समाचार लेखन का कार्य शामिल होता है क्योंकि रेडियो
के लिए समाचार अधिकतर लिखित रूप में ही भेजे जाते हैं। रेडियो न्यूज़ की प्रक्रिया
समाचार संकलन, रिपोर्ट लेखन, संपादन एवं अनुवाद, बुलेटिन निर्माण, और समाचार वाचन।
समाचार संकलन का कार्य तो
सामान्य रिपोर्टिंग का ही अंग है। फर्क इसमें यह होता है कि इसमें कैमरे या
तस्वीरों की गुंजाइश नहीं होती। इस तरह से रेडियो समाचार टीवी समाचार की तुलना में
ज्यादा तेज गति से श्रोताओं तक पहुँच सकते हैं। समाचार जुटाने में वही सारी
सावधानियाँ बरतनी होती हैं जो आमतौर पर पत्रकारों को पढ़ायी जाती हैं या जो वो
अनुभव से सीखते हैं।
रिपोर्ट तैयार करते समय
समाचार के सभी तथ्यों को ध्यान में रखना ज़रूरी होता है। घटना स्पष्ट रूप से
वर्णित हो। स्थान के नाम इस तरह स्पष्ट दिए हों कि दूरदराज का पाठक भी वहाँ की
भौगोलिक स्थिति का अनुमान लगा सके। प्रयास ये भी करना चाहिए कि व्यक्तियों और
स्थानों के नाम इस तरह से समझाए जाएँ कि उनका समाचार वाचक सही उच्चारण कर सके।
घटना की पृष्ठभूमि भी ज़रूरत के अनुसार दी जानी चाहिए।
समाचार रिपोर्ट आजकल
फैक्स या ईमेल के जरिए (या ऐसे ही आधुनिक तंत्रों के जरिए) तुरंत ही समाचार कक्ष
तक भेजी जाती है। समाचार रिपोर्ट प्राप्त होने पर प्रभारी समाचार संपादक का काम
शुरू होता है। समाचार की गुणवत्ता के आधार पर वह उस समाचार को लेने या न लेने का
निर्णय करता है। समाचार उपयोगी लगने पर वह स्वयं या सहयोगी संपादकों को वह रिपोर्ट
देता है ताकि वो उसका संपादन करें या किसी अन्य भाषा में है तो उसे प्रसारण की
भाषा में अनुवाद करें।
समचार संपादक जो प्रति
तैयार करता है, वही मोटे तौर पर वाचन प्रति होती है, इसलिए समाचार संपादक को बहुत सतर्कता से काम करने की
ज़रूरत होती है। भाषा बहुत ही सरल, और हर हाल में बोली जाने वाली होनी चाहिए। हिंदी के
हिसाब से देखें, तो ‘तथा, एवं, व’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कतई नहीं होना चाहिए क्योंकि बोलचाल में इन सबकी जगह
हम हमेशा ‘और’ शब्द का ही इस्तेमाल करते हैं। समाचार लेखन और संपादन में भी यही करना चाहिए। ‘द्वारा’ शब्द का इस्तेमाल तो
भूलकर भी नहीं करना चाहिए। इसका इस्तेमाल तो अखबारी भाषा तक में वर्जित होता है।
इसके अलावा, संख्याओं को जहाँ तक संभव
हो, राउंड फिगर में व्यक्त करना चाहिए, भले ही इसके लिए करीब या लगभग जैसे शब्दों का
इस्तेमाल साथ में करना पड़े। अंग्रेजी में बड़ी संख्याएं मिलियन, बिलियन, और ट्रिलियन तक के रूप
में व्यक्त की जाती हैं और सहज ही यह समझा जा सकता है कि हिंदी में गिनती के ये
शब्द कतई नहीं चलते। हिंदी में संख्याएं हमेशा सौ, हजार, लाख, करोड़ और अरब आदि के रूप में व्यक्त करने पर ही श्रोता उन्हें समझ सकते हैं।
दशमलव की संख्याओं के इस्तेमाल से भी बचना चाहिए और जहाँ ज़रूरी हो वहाँ दशमलव और
उसके बाद के अंकों को शब्दों में ही लिख देना चाहिए। उदाहरण के लिए 7.65 को 7 दशमलव छह पाँच लिखना
बेहतर होगा अन्यथा वाचक इसे सात दशमलव पैंसठ पढ़ने की गलती कर सकता है।
समाचार संपादन और अनुवाद
करते समय वाक्य भी बहुत लंबे-लंबे नहीं होने चाहिए। भाषा की सरलता इस हद तक होनी
चाहिए कि एक बार सुनते ही श्रोता आशय समझ जाए। अखबार की तरह रेडियो के श्रोता को
कोई लाइन समझ न आने पर दोबारा देख लेने की सुविधा नहीं होती, इसलिए उसे एक बार में ही सारी
बात समझानी होती है।
अखबार के समाचार की तरह
रेडियो में समाचार का इंट्रो अलग से देना आसान नहीं होता। बुलेटिन लंबा हो, तब तो कुछ आसानी होती है
जिसमें पहली लाइन में समाचार की सबसे मुख्य बात को दिया जा सकता है। अगर बुलेटिन बहुत छोटा
(मसलन 5 मिनट का) हो तो समाचार की पंक्तियां इस तरह से चुननी पड़ती हैं कि वो इंट्रो
का भी काम करें और मूल समाचार भी कह डालें।
समय के महत्व को बहुत
ज्यादा ध्यान में रखना चाहिए और कम से कम शब्दों में अपनी बात कहनी चाहिए। रेडियो
के संदर्भ में तो यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर किसी एक ही समाचार
में ज्यादा समय लगा दिया तो निश्चित मानिए कि कोई दूसरा समाचार छूट जाएगा या पूरा
नहीं जा पाएगा।
समाचार संपादन और अनुवाद
पूरा हो जाने के बाद प्रभारी समाचार संपादक उस पर नजर डालकर उसे अंतिम रूप देता
है। इस दौरान वह तथ्यों की जाँच ज़रूर करता है ताकि किसी भी तरह की गलती न जा सके।
इसके बाद काम शुरू होता है, बुलेटिन निर्माता का। बुलेटिन निर्माता के पास ढेर सारे समाचार होते हैं
जिनमें से वह महत्व के आधार पर कुछ समाचार चुनता है। समाचार बुलेटिन अगर बड़ा है
तो चुने गए समाचारों में से ही वह हेडलाइंस या मुख्य समाचार भी चुनेगा। कम समय में
ज्यादा से ज्यादा समाचार देने के क्रम में वह मूल प्रति में से काट-छांट भी कर
सकता है और कुछ वाक्यों का रूप भी परिवर्तित कर सकता है। महत्वपूर्ण तथ्यों को एक
बार फिर से जाँच लेना भी उसका दायित्व होता है। किसी शब्द के उच्चारण में वाचक को
या समझने में श्रोता को दिक्कत तो नहीं होगी, इसका भी उसे ध्यान रखना चाहिए और आवश्यकतानुसार
परिवर्तन कर लेना चाहिए।
बुलेटिन निर्धारित समय
में खत्म हो जाए, इसके लिए समाचारों की लाइनों और उन्हें पढ़ने में लगने वाले समय का हिसाब लगा
लेना चाहिए। बुलेटिन निर्धारित समय से न तो पहले खत्म होना चाहिए और न ही बाद में।
इसके लिए अंत में अक्सर छोटे छोटे समाचार रखने चाहिए ताकि आवश्यकतानुसार कहीं भी
बुलेटिन खत्म करने में आसानी हो। बुलेटिन निर्धारित समय से पहले ही न खत्म हो जाए, इसके लिए बुलेटिन
निर्माता को कुछ अतिरिक्त समाचार भी बुलेटिन के साथ में लगा देने चाहिए ताकि समय
बचने की स्थिति में उनका इस्तेमाल करवा सके।
इस तरह से बुलेटिन पूरी
तरह से तैयार हो जाने के बाद उसे समाचार वाचक के हवाले कर दिया जाता है। समाचार
वाचक का काम प्रसारण योग्य मधुर आवाज़ में आकर्षक तरीके से समाचारों की प्रस्तुति
करना होता है। प्राय: नया पैराग्राफ या नया समाचार बोलते समय थोड़ा ज़ोर से बोलना
श्रोता का ध्यान खींचने में सहायक सिद्ध होता है। इसके अलावा, स्वर में उचित उतार-चढ़ाव
या आरोह-अवरोह का तो अपना महत्व होता ही है। सबसे बड़ी बात यह है कि समाचार तैयार
करने में कितनी भी बड़ी टीम क्यों न शामिल रहती हो, लेकिन श्रोता केवल समाचार वाचक की आवाज को ही पहचानता
है। उसके लिए समाचार अच्छा या बुरा होने का जिम्मेदार केवल समाचार वाचक ही होता
है। ऐसे में समाचार वाचक का कर्तव्य होता है कि वह माइक पर वाचन करने से पहले समय
रहते एक बार रिहर्सल ज़रूर कर ले, ताकि किसी भी तरह की त्रुटि की गुंजाइश न रहे।
टेलीविजन पत्रकारिता
आधुनिक समाज के निर्माण में संचार की अहम भूमिका है । सूचनाओं के आदान प्रदान
की प्रवृत्ति के साथ साथ इसका दायरा बढना भी विकास के आधारभूत तत्वों में से एक है । सामान्य तौर पर एक
व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति का सूचना साझा करना भी संचार है किंतु जब यही प्रवृत्ति
एक व्यापक जनसमुदाय और विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र तक विस्तार पाती है इस जनसंचार कहा
जाता है । संचार के विभिन्न साधनों का विकास मानव सभ्यता के विकास के समानांतर चलता रहा
है । यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यह दोनों बातें एक दूसरे की समानार्थी ही
हैं । संचार के अभाव में सभ्यता के वर्तमान विकसित स्वरूप की कल्पना नहीं की जा सकती
थी ।सूचना के महत्व से मनुष्य समाज भली भांति परिचित है और इन सूचनाओं का
संप्रेषण ही उसे निरंतर नए विचार की ओर अग्रसर करता है । हम यह कह सकते हैं कि
आधुनिक सभ्यता में सूचना से अधिक शक्तिशाली कोई परमाणु हथियार भी नहीं हो सकता । पुरानी व्यवस्थाओं को
बदलने से लेकर नए नए वैज्ञानिक आविष्कारों तक सभी प्रकार के परिवर्तनों में सूचनाओं के आदान
प्रदान का अहम स्थान है । सूचनाओं के आदान प्रदान की इसी प्रक्रिया को संचार कहा गया है । अनेक माध्यमों से जब
सूचनाओं के संचार का क्षेत्र व्यापक हो जाता है तो इसे जनसंचार कहा जाता है ।जनसंचार के इस व्यापक
उद्देश्य को प्राप्त करने में इलैक्ट्रॉनिक माध्यमों का बड़ा योगदान है ।
उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में जब तकनीक का विकास हुआ, नए नए आविष्कार हुए तो
संचार ने भी नए आयामों की तरफ कदम बढाए । अब तक गांव या कबीले तक सीमित संचार व्यापक क्षेत्र और व्यापक जनसमुदाय तक
विस्तार पा गया । छापेखाने के आविष्कार से शुरु हुई संचार क्रांति फोटोग्राफी,टेलीग्राफी,रेडियो और टेलीविज़न के
आविष्कारों से समृद्ध होते हुए इंटरनेट तक पहुंच गई है । इंटरनेट से पहले रेडियो
और टेलीविज़न ने ही वास्तविक संचार क्रांति को जन्म दिया । अनेक प्रकार की आधुनिक
प्रसारण तकनीकों के आविष्कार के कारण रेडियो और टेलीविजन ने सारी दुनिया को एक
इकाई के रूप में तब्दील कर दिया । सूचनाओं और विचारों का आदान प्रदान सबसे सशक्त रूप में द्रुत गति से संभव हुआ । रेडियो ने जहां आवाज़ के
माध्यम से सूचनाओं को पंख लगाए वहीं टेलीविजन ने इस संचार को दृश्यात्मकता से
जोड़कर आंखें प्रदान की ।
समाचार , विचार, शिक्षा और मनोरंजन संचार के क्षेत्र में टेलीविज़न ने अभूतपूर्व कार्य किया है । दरअसल टेलीविजन ने
समाचारों में दृश्यों के माध्यम से विश्वसनीयता को सुनिश्चित किया । कहा जाता है कि आंखों से देखी गई घटनाओं या वस्तुओं पर विश्वास करना चाहिए । टेलीविजन ने घटनाओं का
विवरण प्रस्तुत करते हुए इसी कहावत जैसा विश्वास दर्शकों के मन में पैदा किया कि
दिखाई दे रहा है इसलिए टेलीविज़न पर दिया गया विवरण या जानकारी सत्य है । टेलीविज़न ने मुद्रित
माध्यम की साक्षर होने की शर्त को भी अनावश्यक प्रमाणित कर दिया । टेलीविज़न ने मनोरंजन के
क्षेत्र में जबरदस्त क्रांति की और लगभग एक समय दुनियाभर में सिनेमा उद्योग को
कड़ी चुनौती पेश की । आज भी यदि भारतीय संदर्भ में भी देखा जाए तो सिनेमा उद्योग भी अपनी फिल्मों के
प्रमोशन से लेकर रिएलिटी शोज़ तक टेलीविज़न की तरफ दौड़ता हुआ नजर आता है ।
समाचार माध्यम के रूप में दुनियाभर में टेलीविज़न ने अपनी उपयोगिता सिद्ध की
है । विशेषतौर पर प्रकृतिक आपदाओं, युद्धकाल और मानवाधिकारों के क्षेत्र में टेलीविजन समाचारों ने एक सक्षम
परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में कार्य किया है । वियतनाम और खाड़ी युद्धों के समाचार कवरेज के दौरान दिखाए गए दृश्यों का
दुनिया में युद्ध विरोधी माहौल बनाने में खासा योगदान रहा । भारत में टेलीविज़न
फत्रकारिता का इतिहास बहुत पुराना नहीं है । हालांकि भारत में टेलीविज़न प्रसारण 1959 में शुरु हुआ किंतु इसका विकास काफी धीमी गति से हुआ । सरकारी सहायता से चलने
वाले दूरदर्शन का ही लगभग तीन दशक तक एकाधिकार रहा । बीसवीं सदी के आखिरी दशक में केबल टीवी के विस्तार और प्राइवेट चैनलों के आने
से वास्तव में इसका मौजूदा विकसित रूप में आना संभव हो पाया । देश में प्राइवेट चैनलों पर समाचार की शुरुआत और फिर चौबीस घंटे के समाचार
चैनलों की शुरुआत को अभी (2015) करीब दो दशक ही हुए हैं । अत: भारतीय संदर्भों में टेलीविज़न पत्रकारिता की चर्चा करते समय इस बात को ध्यान
में रखना बेहद आवश्यक है कि इसकी यात्रा करीब बीस साल की ही है ।
टेलीविज़न पत्रकारिता का अध्ययन करने के लिए सबसे
पहले एक समाचार चैनल की कार्यप्रणाली को समझना आवश्यक है ।हमारे देश में टेलीविजन
समाचार चैनलों का इतिहास बहुत पुराना नहीं है किंतु फिर कम समय में चैनलों ने एक
कारगर कार्यप्रणाली विकसित की है । एक समाचार चैनल के विभिन्न विभागों को निम्न प्रकार से बांटा जा सकता है –
समाचार चैनल
संपादकीय विभाग (Editorial Dept.)
तकनीकी विभाग (Technical Dept.)
विपणन विभाग (Marketing Dept.)
वितरण विभाग ( Distribution dept.)
मानव संसाधन एवं प्रशासन ( HR
& Admin )
टेलीविजन पत्रकारिता के अध्ययन में मुख्य रूप से एक
समाचार चैनल के संपादकीय विभाग की जानकारी आवश्यक होगी किंतु शेष विभागों के बारे
में भी जानकारी होना लाभदायक है । संपादकीय विभाग के बारे में विस्तार से बात करने से पहले हम इन तीनों विभागों
के बारे में सामान्य जानकारी साझा करेंगे ।
तकनीकी विभाग – टेलीविज़न चैनल में समाचारों के लिए दृश्य सामग्री जुटाने के कार्य से लेकर
इसके प्रसारण तक के कार्य में तमाम तरह के तकनीकी कार्य तथा इस प्रक्रिया में
उपयोग किए जाने वाले उपकरणों की देखभाल का कार्य यह विभाग करता है ।इसमें कैमरा, वीडियो एडिटिंग, ग्राफिक्स, पीसीआर , एमसीआर , स्टूडियो ऑपरेशन्स , सरवर रूम , ओबी वैन जैसे अंग प्रमुख हैं । इस विभाग से संपादकीय विभाग का सीधा संबंध होता है । यहां तक कि कैमरा, वीडियो एडिटिंग, ग्रफिक्स और पीसीआर जैसे
विभागों को तो अर्धसंपादकीय, अर्धतकनीकी विभाग माना जाता है । उम्मीद की जाती है कि इन विभागों में करने वाले लोगों को संपादकीय और
पत्रकारीय समझ होनी चाहिए ।
विपणन विभाग – इस विभाग के अन्तर्गत चैनल के लिए विज्ञापन जुटाने का
कार्य होता है । इसका संपादकीय विभाग से सीधा सीधा कोई संबंध नहीं होता है । चैनल में चलने वाले
विज्ञापनों की दरें , समय और अवधि तय करने के अतिरिक्त इस विभाग का संपादकीय सामग्री के चयन के
मामले में कोई दखल नहीं होता ।
वितरण विभाग – किसी टेलीविज़न चैनल का यह महत्वपूर्ण विभाग होता है । टीवी चैनल को अधिकांश
दर्शकों के घरों में दिखाने का दायित्व इस विभाग का होता है । इस विभाग के लोग केबल
नेटवर्क और विभिन्न डीटीएच नेटवर्क के माध्यम से टीवी चैनल के प्रदर्शन को
सुनिश्चित करते हैं ।
मानव संसाधन एवं प्रशासन – मानव संसाधन विभाग चैनल में सभी विभागों में काम करने वाले लोगों की
नियुक्तियों , इन्क्रीमेंट्स, छुट्टियों तथा निष्कासन आदि कार्य करता है । इसके अतिरिक्त कर्मचारियों के साथ संवाद, उनकी सुविधाओं और समस्याओं का ध्यान रखना भी मानव
संसाधन विभाग के कामों में शामिल है । इसके अलावा प्रशासन के तहत कार्यालय में मूलभूत सुविधाओं को सुनिश्चित करना
तथा किसी भी प्रकार के आयोजन के प्रबंध की जिम्मेदारी होती है ।
एक टेलीविज़न चैनल को संचालित करने में इन सभी विभागों की महत्वपूर्ण भूमिका
होती है । लेकिन एक समाचार चैनल में सबसे प्राथमिक और महत्वपूर्ण विभाग संपादकीय विभाग
होता है । इसका कारण यह है कि समाचार चैनल की पहचान उस पर प्रसारित समाचारों की गुणवत्ता
और महत्ता से होती है । टेलीविज़न पत्रकारिता की पहचान स्थापित करने का सारा दारोमदार संपादकीय विभाग
पर होता है । दूसरे शब्दों में कहें तो संपादकीय विभाग में होने वाला समस्त कार्य टेलीविजन
पत्रकारिता के अन्तर्गत आता है । इस विभाग का प्रमुख चैनल का मुख्य संपादक या संपादक होता है ।
संपादकीय विभाग को दो प्रमुख विभागों में बांटा जा सकता है –
1. इनपुट 2. आउटपुट
1. इनपुट – जैसा कि नाम से ही जाहिर है एक समाचार चैनल में प्रसारित की जाने वाली सामग्री
का प्राथमिक स्वरूप में संग्रहण या संकलन करना इस विभाग का कार्य है । जैसे किसी चैनल पर भूमि
अधिग्रहण बिल पर आधे घंटे का कार्यक्रम प्रसारित होता है । इस कार्यक्रम में चलने
वाली खबर, इस चर्चा में इस्तेमाल की गई शोधपरक जानकारियां , और कार्यक्रम में चर्चा के लिए अतिथि तक सभी उपलब्ध करवाना इनपुट विभाग
की जिम्मेदारी है । प्रमुख रूप से इस विभाग के चार हिस्से होते हैं –
1. समाचार ब्यूरो या संवाददाता – किसी भी समाचार चैनल की सबसे अहम और प्रथम कड़ी होती है उसका संवाददाता ।संवाददाता या रिपोर्टर
औपचारिक और अनौपचारिक सूत्रों से सूचनाओं का संकलन करता है । इन सूचनाओं को अपनी
संपादकीय समझ से एक समाचार के रूप में विकसित करता है और चैनल तक पहुंचाता है । चैनल के मुख्यालय के
अतिरिक्त जब रिपोर्टर्स किसी राज्य की राजधानी या महत्वपूर्ण स्थान पर रोजाना
रिपोर्ट करते हैं तो चैनल की कार्यप्रणाली में इसे ब्यूरो कहा जाता है ।
2. असाइनमेंट डेस्क – यह किसी भी समाचार चैनल में सबसे अधिक हलचल और भागदौड़ वाला विभाग होता है । आमतौर पर यहां किसी छोटे
शेयर बाज़ार जैसा माहौल होता है । दरअसल यह कई विभागों के बीच समन्वय स्थापित करने वाला विभाग है. मुख्य रूप से यह विभाग
रिपोर्टर्स से आने वाली सूचनाओं एवं समाचारों को आउटपुट विभाग तक पहुंचाता है और
आउटपुट की ओर से मांगी गई सूचनाओं, समाचारों की उपलब्धता को सुनिश्चित करता है । रिपोर्टर्स को फील्ड में
तकनीकी या अन्य सहयोग पहुंचाना और लाइव प्रसारण इत्यादि व्यवस्थाओं की निगरानी
करना भी इसी विभाग का काम होता है ।
3. रिसर्च विभाग – किसी भी विषय पर कार्यक्रम बनाने के लिए प्रोड्यूसर को, किसी कार्यक्रम को
प्रस्तुत करते हुए एंकर को और खबरों को कवर करते हुए रिपोर्टर्स को कई विषयों के
बारे में बहुत सारी जानकारी की जरूरत पड़ती है । यह तमाम शोधपरक जानकारी उपलब्ध कराने का कार्य रिसर्च विभाग करता है ।
4. गेस्ट कॉर्डिनेशन विभाग – एक चौबीस घंटे के समाचार चैनल में कई प्रकार के प्रासंगिक राजनीतिक, मानवीय, सामाजिक, स्वास्थ्य या कई ताज़ा
विवादित विषयों पर कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं । इन कार्यक्रमों में विशेषज्ञ वक्ताओं या विभिन्न पक्षों के प्रवक्ताओं को
शामिल करना आवश्यक होता है । इन अतिथियों को सही कार्यक्रम में सही समय पर लाना इस विभाग का कार्य होता है । इसके अतिरिक्त मेहमानों
के साथ चैनल के रिश्ते सद्भावनापूर्ण रहे इसको सुनिश्चित करना भी इसी विभाग का काम
होता है ।
2. आउटपुट – संपादकीय विभाग का यह दूसरा स्तंभ है । पूरा संपादकीय विभाग इनपुट और आउटपुट नामक स्तंभों पर ही खड़ा होता है । इनपुट विभाग से प्राप्त
होने वाली प्राथमिक सामग्री ( Primary
content) को संपादन के ज़रिए प्रसारण के लिए उपयुक्त स्वरूप
में तैयार करने का कार्य आउटपुट विभाग करता है । इस विभाग के भी विभिन्न अंग हैं –
1. कॉपी लेखन एवं संपादन – रिपोर्टर से प्राप्त सूचना अथवा प्राथमिक स्क्रिप्ट जब असाइनमेंट द्वारा
आउटपुट को दी जाती है तो उसको एक प्रसारण योग्य स्क्रिप्ट में बदलने के लिए कॉपी
डेस्क के हवाले किया जाता है । कॉपी राइटर समाचार के साथ प्राप्त दृश्यों को देखकर और प्राथमिक जानकारी को
लेकर स्टोरी की स्क्रिप्ट लिखता है और फिर कॉपी संपादक उसका संपादन करता है । इसी स्क्रिप्ट पर आधारित
एक टेलीविज़न स्टोरी कई चरणों से गुजर कर प्रसारित होती है ।
2. प्रोडक्शन – कॉपी डेस्क द्वारा तैयार की गई लिखित स्क्रिप्ट को टेलीविज़न प्रसारण के योग्य
बनाने के लिए उसके अनुसार दृश्य संपादन (video editing) की आवश्यकता होती है । इस स्क्रिप्ट में यदि
फॉर्मेट की मांग है तो वॉइस ओवर करवाकर दृश्य संपादन पूरा करने के लिए दिया जाता
है । इस सारी प्रक्रिया को संपन्न करवाने का कार्य प्रोडक्शन विभाग का होता है । प्रोडक्शन से जुड़े
प्रोफेशनल्स पर एक स्टोरी के प्रसारण योग्य अंतिम स्वरूप में पहुंचने तक सारी
प्रक्रिया की देखरेख करनी होती है तथा इसके बाद इसे उचित स्थान पर भेजना होता है ।
3. रनडाउन – यह वह स्थान है जहां एक समाचार बुलेटिन या कार्यक्रम में चलने वाली सभी
स्टोरीज़ तथा सामग्री इकट्ठा होती है और उन्हें प्रसारण की योजना के अनुसार
व्यवस्थित किया जाता है । एक प्रकार से यहा एक कार्यक्रम या बुलेटिन का ढांचा खड़ा होता है जो प्रोडक्शन
कंट्रोल रूम यानि पीसीआर को भेजा जाता है । रनडाउन प्रसारण के लिए तैयार स्टोरीज के उस व्यवस्थित क्रम को कहते हैं जिसमें
विजुअल, ग्राफिक्स इनपुट के साथ साथ लाइव इत्यादि की योजना भी स्पष्ट होती है । इस डेस्क से जुड़े लोग
प्रत्येक बुलेटिन के अंतिम प्रारूप के उत्तरदायी होते हैं ।
4. अपडेट और मॉनीटरिंग डेस्क – ये विभाग चैनल की स्क्रीन पर ग्राफिक्स द्वारा चलने वाले लगातार अपडेट को
संपन्न करता है तथा अलग अलग चैनलों पर चलने वाली खबरों को मॉनीटर भी करता है । कई चैनलों में इन्हे कुछ
दूसरे विभागों के साथ ही जोड़ दिया जाता है । लगातार चलने वाले ग्राफिक अपडेट को टिकर , स्क्रॉल इत्यादि कहा जाता है ।
मुख्य रूप से चैनल इन विभागों के तहत ही संपादकीय
कार्य होता है लेकिन पीसीआर , ग्राफिक्स, और कैमरा विभागों को भी संपादकीय विभाग से जुड़ा माना जाता है । इन विभागों से जुड़े
प्रशासनिक मसले तकनीकी विभाग देखता है किंतु इनकी जवाबदेही संपादकीय विभाग के
प्रति अधिक होती है । इन विभागों में काम करने वाले प्रोफेशनल्स से पत्रकारीय एवं संपादकीय समझ की
अपेक्षा की जाती है । मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि संपादकीय विभाग के विभिन्न अंगों से जुड़े
लोगों के साथ साथ इन प्रोफेशनल्स को भी टेलीविज़न पत्रकारिता का अंग माना जा सकता
है ।
टेलीविज़न पत्रकारिता का अध्ययन करते हुए हम इसे कुछ
प्रश्नों और उनके उत्तर के आधार पर समझ सकते हैं ।
सबसे पहला प्रश्न यह है कि पत्रकारिता को टेलीविज़न या रेडियो या प्रिंट
पत्रकारिता कहने की आवश्यकता क्या है ?
इसप्रश्नकेउत्तरकोहमएकउदाहरणकेरूपमेंसमझसकतेहैंकिजैसेपानीपरचलनेवालेजहाज, सड़क पर चलने वाली कार और
हवा में उड़ने वाले हवाई जहाज को अलग अलग करके देखने तथा अलग अलग नाम देने की
आवश्यकता होती है जबकि तीनों का ही प्रथमिक उद्देश्य परिवहन है । उसी प्रकार अलग अलग
माध्यमों के द्वारा की जा रही पत्रकारिता को उन माध्यमों की पहचान के साथ जोड़कर
समझना बेहद आवश्यक है । पत्रकारिता के प्राथमिक उद्देश्य के अतिरिक्त प्रत्येक माध्यम की अपनी
आवश्यकताएं, सीमाएं तथा शक्तियां हैं ।
टेलीविज़न पत्रकारिता को किस प्रकार परिभाषित करेंगे ?
इनसाइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटेनिका के आधार पर किए गए एक
विश्लेषण के अनुसार पत्रकारिता के लिए अंग्रेज़ी में ‘जर्नलिज्म’शब्द का प्रयोग किया जाता
है जो ‘जर्नल’ से निकला है । इसका शाब्दिक अर्थ है ‘दैनिक’ । दिन प्रतिदिन के क्रियाकलापों सरकारी बैठकों आदि का विवरण जर्नल में रहता था । एक दूसरे संदर्भ के
मुताबिक ‘जर्नलिज्म’ शब्द फ्रैंच भाषा के शब्द ‘जर्नी’ से निकला है जिसका अर्थ रोजमर्रा के कामों या घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करना । एक शब्द के रूप में
पत्रकारिता या जर्नलिज्म शब्द का अर्थ दिन प्रतिदिन की घटनाओं की तथ्यात्मक
सूचनाओं का संकलन और संप्रेषण ही है । लेकिन धीरे धीरे व्यवहार रूप में पत्रकारिता की इस परिभाषा का विस्तार होता चला गया
और सूचनाओं के संकलन से आगे बढकर यह सूचनाओं के अन्वेषण तथा विश्लेषण तक पहुंच गया । जब पत्रकारिता को
टेलीविज़न के साथ जोड़ते हैं तो शाब्दिक अर्थ के अनुसार सूचनाओं अथवा समाचारों का
सदृश्य विवरण तथा विश्लेषण प्रस्तुत करना ही टेलीविज़न पत्रकारिता है ।
दूसरे माध्यमों की तुलना में टेलीविजन पत्रकारिता की ताकत क्या है ?
1. दृश्य – टेलीविजन पत्रकारिता की परिभाषा का जिक्र करते हुए हमने सूचनात्मक विवरण के
साथ दृश्य की अनिवार्यता को समझा है । एक पुरानी कहावत के अनुसार आंखों से देखी गई घटना में सत्य की सर्वाधिक
संभावना होती है इसलिए यह दर्शकों का यही आखों देखा वाला विश्वास टेलीविज़न
पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत है । टेलीविजन पत्रकारिता में दृश्य सहित विवरण के कारण दर्शकों का उसमें ना केवल
विश्वास बढ़ता है बल्कि समाचारों के प्रति उनकी रुचि, उत्साह और रोमांच भी
बढ़ता है ।
2. शीघ्र या तत्काल संप्रेषण – टेलीविज़न पत्रकारिता में सूचनाओं का प्रसारण शीघ्रता से होता है । तकनीक के प्रभाव और इस
माध्यम के स्वभाव के कारण संकलन के साथ ही अथवा संकलन के तत्काल बाद समाचार का
प्रसारण टेलीविज़न पत्रकारिता की प्राथमिकता है । जैसे ही किसी संवाददाता को किसी घटना की जानकारी मिलती है वह उसे सबसे कम समय
में प्रसारित किए जा सकने वाले फॉर्मेट में प्रसारित करवाने की कोशिश करता है । उदाहरण के तौर पर दिल्ली
के समीप गाज़ियाबाद में किसी ट्रेन का एक्सीडेंट हुआ है और संवाददाता घटनास्थल से
दूर है किंतु उसे उसके स्रोत से जानकारी मिली है । इस जानकारी के बाद प्रिंट माध्यम का पत्रकार घटनास्थल के लिए रवाना होगा और
पूरे इत्मिनान के साथ सूचनाएं जुटाएगा तथा रात तक अपनी पूरी खबर प्रकाशन के लिए दे
देगा जो कि अगले दिन समाचार पत्र में प्रकाशित होगी । लेकिन दूसरी ओर टेलीविजन रिपोर्टर को खबर मिलते ही वह घटनास्थल के लिए निकलने
के साथ साथ अपने न्यूज़रूम को जानकारी देगा और सर्वप्रथम फोन के द्वारा ही इस
समाचार को प्रसारित करवाएगा । इसके बाद चैनल से घटना के लाइव कवरेज की व्यवस्था की जाएगी और लगभग घटनास्थल
पर रिपोर्टर के पहुंचने साथ ही दृश्यों सहित खबर का प्रसारण सुनिश्चित हो जाएगा । अत: टेलीविज़न पत्रकारिता में यह तात्कालिकता और लाइव तत्व उसकी बड़ी ताकत हैं ।
3. सरल संप्रेषण – मुद्रित माध्यम की पत्रकारिता में पाठक के लिए पहली शर्त यह होती है कि वह
पढ़ा लिखा होना चाहिए ताकि शब्दों को पढकर समझ सके । टेलीविज़न पत्रकारिता की यह ताकत है कि बिना पढ़ा लिखा व्यक्ति भी दृश्यों और
ध्वनि के इस संगम से देख सुनकर समाचार अथवा सूचना को समझ सकता है । उदाहरण के लिए मौसम विभाग
की ओर से किसी क्षेत्र में समुद्री तूफान की आशंका जताई गई है और मछुआरों को कुछ
दिनों तक समुद्र में ना जाने की चेतावनी दी गई है । समाचार पत्रों में प्रकाशित इस सामग्री को पढ़कर सभी मछुआरों तक कम समय में इस
पूरी जानकारी का पहुंचना मुश्किल होगा । लेकिन यदि टोलीविजन रिपोर्टर इस आशंका पर दृश्यों और मौसम विभाग के बयान (बाइट) सहित खबर दिखाएगा तो इसका
तुरंत असर होगा । अत: टेलीविज़न अत्य़धिक आधुनिक तकनीक वाला माध्यम होते हुए भी जन साधारण के लिए
अधिक सुविधाजनक है ।
4. रुचि जगाने वाला माध्यम –आमतौर पर किसी गांव या कस्बे या शहर में समाचारों के प्रति रुचि रखने वाले और
पूरे समाचार पत्र को गंभीरता से पढ़ने वाले लोग कम होते हैं । खास तौर पर भागमभाग वाली अतिव्यस्त और धन केन्द्रित जीवन शैली में पूरा समय लगाकर समाचारों को
पढना और समझना कठिन हो रहा है । ऐसे में टेलीविज़न पत्रकारिता के द्वारा समाचारों के संपर्क में रहना और अपने
ज़रूरी काम निपटाते हुए भी इस माध्यम से जानकारियां जुटाना सबसे आसान है । आप सुबह का नाश्ता करते
हुए, दफ्तर में कुछ ज़रूरी फाइलें निपटाते हुए, शाम को दोस्तों के साथ चाय पीते हुए कहीं भी चौबीस
घंटे टेलीविजन समाचार देख सकते हैं । अर्थात सूचनाओं और समाचारों के लिए आपका कम से कम समय खर्च करवाने की सुविधा
टेलीविज़न पत्रकारिता की एक और महत्वपूर्ण ताकत है ।
टेलीविज़न पत्रकारिता की सीमाएं क्या हैं ?
1. दृश्यों की अनिवार्यता
टेलीविज़न समाचार की सबसे बड़ी ताकत ही टेलीविजन पत्रकारिता की सबसे बड़ी सीमा
भी बन जाती है । टेलीविज़न समाचार बाकी माध्यमों के मुकाबले दृश्यों की उपलब्धता के कारण सबसे
अधिक प्रभावी है । टेलीविजन पत्रकारिता के लिए यह ताकत कई बार एक चुनौती के रूप में सामने आती है । किसी और माध्यम में
पत्रकार को सूचना या जानकारी मिलने पर वह खबर लिखना शुरु करता है और उसे अपने पाठक
या श्रोता तक पहुंचाता है ।टेलीविजन पत्रकार के लिए महज सूचना या जानकारी मिलने पर काम पूरा नहीं होता । अपितु यह कहना चाहिए कि
सूचना मिलने के बाद उसका काम शुरु होता है । टेलीविजन समाचार की दृश्य की शर्त को पूरा करने के लिए टेलीविज़न पत्रकार को
समय और शक्ति लगानी पड़ती है ।
समाचार की सामग्री के अनुसार दृश्यों को जुटाना कई बार बेहद कठिन कार्य हो
जाता है । साथ ही दृश्यों के साथ साथ संबंधित लोगों के बयान (बाइट) लेना भी आवश्यक होता है । ऐसे में आमतौर पर समाचार
पत्रों के पत्रकारों का फोन पर बात करने से काम चल जाता है लेकिन टेलीविजन पत्रकार
के लिए यह पर्याप्त नहीं है । संबंधित व्यक्ति कहां, किस वक्त उपलब्ध होगा यह तय करने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है । जिस व्यक्ति के लिए
समाचार नकारात्मक होता है वह बयान(बाइट) देने से बचने की कोशिश करता है । जिस व्यक्ति से बयान लेना
समाचार की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक होता है उसको बाइट के लिए तैयार करना तथा उसके
अनुसार तय किए गए समय एवं स्थान पर पहुंचना पड़ता है । इस कवायद के साथ साथ खबर
की विस्तृत जानकारी जुटाना, दृश्यों को शूट करना तथा उपलब्ध जानकारी को न्यूज़ रूम के साथ साझा करना भी
जारी रहता है । इसलिए जानकारियों के साथ साथ दृश्यों और बयानों को जुटाने का कार्य काफी
चुनौतीपूर्ण होता है ।
कई बार कुछ दस्तावेज आधारित या सूत्र आधारित खबरों में यह समस्या और दुष्कर
होती है जब बयान और दृश्य दोनों मिलना असंभव हो जाता है । ऐसे में संवाददाता को
तमाम जानकारी के बावजूद खबर को छोड़ना पड़ता है या फिर कुछ समय के लिए स्थगित करना
पड़ता है । उदाहरण के तौर पर किसी संवेदनशील सरकारी विभाग में कोई घोटाला चल रहा है ।आपका अपना सूत्र इसकी
जानकारी आपको दे रहा है लेकिन वह इतना सक्षम नहीं है कि इसके दृश्य आपको शूट करवा
सके । प्रिंट माध्यम में संवाददाता सूत्र की जानकारी को आधार बनाकर समाचार लिख सकते
हैं और सक्षम अधिकारी से उसका बयान भी फोन पर या मिलकर ले सकते हैं । लेकिन टेलीविजन पत्रकार
के लिए संबंधित दृश्य और दस्तावेज जुटाए बिना समाचार चला पाना कठिन होगा । सक्षम अधिकारी से भी
कैमरे समक्ष बयान लेने के लिए अतिरिक्त प्रयास की जरूरत होगी । अत: टेलीविजन समाचार में जो दृश्य तत्व उसे प्रभावी बनाता
है उसी दृश्य तत्व की अनिवार्यता कई बार टेलीविजन पत्रकारिता की सीमा बन जाती है ।
2. समयबद्धताकीसीमा
किसी अन्य माध्यम की तुलना में टेलीविज़न के लिए
समाचार जुटाने में जहां अधिक मेहनत की आवश्यकता होती है वहीं इस अधिक मेहनत के लिए
समयबद्धता भी एक चुनौती होती है । टेलीविजन पत्रकार के पास समाचार पत्र पत्रिका के संवाददाता की तरह यह सुविधा
नहीं होती कि खबर की जानकारी किसी भी समय मिले लेकिन पत्र पत्रिका के प्रकाशन के
लिए जाने से पहले तक का समय उसके पास हो । टेलीविजन पत्रकार को तो पहली सूचना के साथ ही अलग अलग फॉर्मेट में खबर चलाते
रहना होता है और इसके साथ साथ विस्तृत जानकारी तथा संबंधित दृश्य , बयान भी जुटाने होते हैं । यदि टेलीविज़न पत्रकार समाचार के प्रसारण में समयबद्धता का ध्यान नहीं रखता तो
उस समाचार के निष्प्रभावी हो जाने का खतरा बना रहता है । इसके साथ ही अनेक समाचार
चैनलों के बीच सबसे पहले खबर दिखाने की स्पर्धा का भी टेलीविज़न पत्रकार की खबर के
लिए समय सीमा पर दबाव रहता है । एक टेलीविजन पत्रकार खबर को रोककर उस पर विचार करने का समय नहीं होता क्योंकि
तब तक किसी और चैनल के द्वारा खबर दिखाए जाने का डर हमेशा बना रहता है ।
3. तकनीक और व्यक्तियों के साथ समन्वय की सीमा
एक टेलीविज़न पत्रकार अकेला कुछ नहीं कर सकता । एक समाचार को संपूर्णता
के स्वरूप में लाने के लिए उसकी निर्भरता व्यक्तियों और तकनीक पर रहती है । सामान्य तौर पर एक समाचार
का सारा दारोमदार एक पत्रकार पर ही रहता है । वह औपचारिक अथवा अनौपचारिक सूत्रों के द्वारा सूचनाएं जुटाता है और उनके आधार
पर समाचार बनाता है । लेकिन टेलीविजन में ऐसा नहीं है । सूचनाएं जुटाने, संपूर्ण समाचार की योजना बनाने या लिखने का काम टेलीविज़न पत्रकार को करना ही
होता है परंतु इसके अतिरिक्त उसको अपनी टीम और तकनीक का समन्वय भी करना पड़ता है । एक टेलीविज़न पत्रकार को
कैमरामैन, कैमरा असिस्टेंट, असाइनमेंट के साथी और लाइव प्रसारण करने वाली ओबी वैन के इंजीनियर्स के साथ
लगातार समन्वय स्थापित करना जरूरी होता है । किसी भी समाचार को कवर करते समय रिपोर्टर अपने कैमरामैन के साथ यदि अपना
नजरिया या कहें खबर का एंगल साझा नहीं करता है तो कभी भी एक प्रभावी और प्रासंगिक
दृश्य वाली खबर बनना संभव नहीं होगा । खबर की सामग्री के अलावा उसकी अवधि का ख्याल रखना और अपनी टीम को इसकी जानकारी
देना टेलीविजन पत्रकार के लिए जरूरी हो जाता है । किसी महत्वपूर्ण या आकस्मिक सूचना मिलने पर उसका शीघ्रता से या लाइव कवरेज
करने की योजना बनाने के लिए ओबी वैन के इंजीनियर्स के साथ समन्वय करना होता है । टीम वर्क और टीम
कॉर्डिनेशन के बिना एक टेलीविज़न पत्रकार के लिए अच्छी रिपोर्ट बनाना संभव नहीं है । व्यक्तियों के साथ साथ एक
टेलीविजन पत्रकार को कार्य करते समय अपने तकनीकी उपकरणों की उपलब्धता और
कार्यशीलता सुनिश्चित करनी चाहिए । उदाहरण के तौर पर एक बहुत महत्वपूर्ण समाचार को कवर करते समय यदि कैमरे की बैट्री
खत्म हो जाए तो टेलीविज़न रिपोर्टर की पूरी मेहनत बेकार हो जाएगी । इसलिए खबर कवर करने के
लिए निकलते समय ही सभी उपकरणों की जांच ज़रूरी है । सभी उपकरण ठीक हों और आपके कैमरामैन को आपकी स्टोरी के ज़रूरी दृश्यों की
जानकारी ना हो तो भी पूरी स्टोरी के खराब होने की आशंका बनी रहेगी । अत: टेलीविजन पत्रकार के लिए स्वंय की योग्यता, जानकारी, प्रतिभा के अतिरिक्त दूसरे व्यक्तियों एवं उपकरणों की
सक्षमता भी बेहद जरूरी है ।
टेलीविजन पत्रकारिता को समझने के लिए समाचार चैनल की
कार्यप्रणाली से परिचय कितना जरूरी है और इसे किस प्रकार समझा जा सकता है ?
किसी भी माध्यम के लिए पत्रकारिता करते समय उस माध्यम
की सामान्य जानकारी आवश्यक है । लेकिन टेलीविज़न पत्रकारिता के लिए टेलीविज़न समाचार चैनल की कार्यप्रणाली की अच्छी समझ जरूरी है । जैसे एक समाचार पत्र के
लिए काम करने वाले पत्रकार को यह जानना ज़रूरी नहीं है उस अख़बार की प्रिंटिंग
कहां होती है और कौन करता है लेकिन किसी चैनल में काम करने वाले रिपोर्टर को यह पता होना चाहिए चैनल का
फाइनल आउटपुट कहां से जाता है । उसे चैनल के अलग अलग विभागों और उनमें काम करने वाले लोगों की जानकारी होनी
चाहिए । क्योंकि एक टेलीविज़न पत्रकार को खबर कवर करने के साथ साथ उसके प्रोडक्शन
पार्ट का भी हिस्सा बनना होता है । जैसे रिपोर्टर अपनी खबर के दृश्यों का प्रीव्यू करता है, उसकी वीडियो एडिटिंग और
स्क्रिप्टिंग में सहयोग करता है । खबर कवर करने के बाद भी उसे खबर के प्रसारण के साथ विभिन्न भूमिकाओं में
उपस्थित रहना पड़ता है । खबर के फॉलोअप के लिए उसका लाइव इनपुट लिया जा सकता है । एक टेलीविज़न पत्रकार के
लिए खबर एक बच्चे की तरह होती है , प्रत्येक स्तर पर जिसकी ठीक परवरिश को सुनिश्चित करना उसकी जिम्मेदारी होती है । जैसे बच्चे को स्कूल तो
भेजा जाता है लेकिन सिर्फ टीचर के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता वैसे ही टेलीविजन
रिपोर्टर अपनी स्टोरी को किसी वीडियो एडिटर, स्क्रिप्ट राइटर या फिर अंत में एंकर के भरोसे नहीं
छोड़ सकता । उसे हर विभाग और हर प्रकार के व्यक्ति से समन्वय स्थापित करते हुए स्टोरी के
सफल प्रसारण को संभव बनाना पड़ता है ।
टेलीविजन पत्रकारिता में उपयोग होने वाले महत्वपूर्ण तकनीकी शब्द एवं विभिन्न
जिम्मेदारियों के अनुसार पदनाम क्या हैं ?
टेलीविजन पत्रकारिता में रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाले
शब्द इस प्रकार हैं –
स्टोरी कवरेज, इनजस्ट, शूट , ट्राइपॉड, पोटा किट, लाइव, पीटीसी, वॉक थ्रू, वॉक्सपॉप, पैकेज, बाइट, पीसीआर, एमसीआर, सिमसैट, एंकर रीड, वॉइस ओवर, रिकॉर्डिंग, ब्रेक, क्लोज़िंग, रनऑर्डर, रनडाउन इत्यादि ।
समाचारचैनलमेंविभिन्नजिम्मेदारियोंकेलिएपदनामइसप्रकारहैं –
एडिटर इन चीफ , एक्जीक्यूटिव एडिटर , टेक्नीकल हेड , आउटपुट एडिटर, इनपुट एडिटर , एक्ज़ीक्यूटिव प्रोड्यूसर, सीनियर प्रोड्यूसर, प्रोटरड्यूसर, एसोसिएट प्रोड्यूसर, असिस्टेंट प्रोड्यूसर, प्रोडक्शन एक्ज़िक्यूटिव, वीडियो एडिटर, ग्राफिक आर्टिस्ट, कैमरा मैन, पैनल प्रोड्यूसर या
स्टूडियो डायरेक्टर, ऑनलाइन एडिटर, ऑडियो मैनेजर आदि ।
हम जनसंचार माध्यम के रूप में टेलीविजन की भूमिका की
चर्चा करें इससे पूर्व संचार के इतिहास को विभिन्न परिभाषाओं के माध्यम से
संक्षिप्त में समझने का प्रयास करेंगे ।
संचार का शाब्दिक अर्थ होता है– किसी सूचना या संदेश को
एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाना या सम्प्रेषित करना। एक व्यक्ति दूसरे
व्यक्ति तक अपनी बात या विचार तभी संप्रषित कर सकता है जब वे एक दूसरे के लिए
परिचित संकेतों या भाषा का प्रयोग करें । सामान्य प्रवृत्ति के रूप में संचार प्रक्रियाओं का विकास निरंतर होता रहा
किंतु एक विषय के रूप में इस पर अध्ययन काफी देर से शुरु हुआ । फिर भी अनेक विद्वानों ने
अपने अपने अध्ययन और शोध के आधार पर संचार को परिभाषित करने का प्रयास किया है । संचार का मूल तत्व
विचारों अथवा सूचनाओं का संप्रेषण और उनकी प्राप्ति है इसमें कोई संदेह नहीं है
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया अगल अलग दृष्टि से व्याख्यायित किया जाता रहा है और इस
प्रकार के अध्ययन अब भी लगातार जारी हैं । अत: निम्न लिखित परिभाषाओं को संचार के विषय में हम अपनी समझ को अधिक परिष्कृत
करने में उपयोग कर सकते हैं ।
विचारों, जानकारी वगैरह का विनिमय, किसी और तक पहुंचाना या बांटना, चाहे वह लिखित, मौखिक या सांकेतिक हो, संचार है। – ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी
संचार उन सभी क्रियाओं का योग है जिनके द्वारा एक व्यक्ति दूसरे के साथ
समझदारी स्थापित करना चाहता है। संचार अर्थों का एक पुल है। इसमें कहने, सुनने और समझने की एक
व्यवस्थित तथा नियमित प्रक्रिया शामिल है। – लुईस ए. एलेन
एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को सूचना भेजने तथा
समझने की विधि है। यह आवश्यक तौर पर लोगों में अर्थ का एक पुल है। पुल का प्रयोग
करके एक व्यक्ति आराम से गलत समझने की नदी को पार कर सकता है। – कैथ डैविस
संचार से तात्पर्य उन समस्त तरीकों से है, जिनको एक व्यक्ति अपनी विचारधारा को दूसरे व्यक्ति की
मस्तिष्क में डालने या समझाने के लिए अपनाता है। यह वास्तव में दो व्यक्तियों के
मस्तिष्क के बीच की खाई को पाटने वाला सेतु है। इसके अंतर्गत् कहने, सुनने तथा समझने की एक
वैज्ञानिक प्रक्रिया सदैव चालू रहती है। – ऐलन
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से संचार से तात्पर्य व्यक्तियों के बीच विचारों और
अभिव्यक्तियों के आदान–प्रदान से है। – मैकडेविड और हरारी
आम तौर पर संचार तब होता है, जब एक सिस्टम या स्रोत किसी दूसरे या गंतव्य को विभिन्न प्रकार के संकेतों के
माध्यम से प्रभावित करें ।– चार्ल्स ई. ऑसगुड
उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि संचार प्रक्रिया
में चार अंग प्रमुख हैं –
1.प्रेषक अर्थात संदेश भेजने वाला
2.संदेश
3.माध्यम
4.प्राप्तकर्ता
इनचारोंअंगोंकीभूमिकाकेद्वारासंचारप्रक्रियाकोनिम्नप्रकारसमझाजासकताहै –
प्रेषक—-संदेश—-माध्यम—–प्राप्तकर्ता
इस रूप में संचार प्रक्रिया सम्पन्न होती है लेकिन
इसमें कुछ बातों का विचार और आवश्यक है । सफल संचार वही है जिसमें प्रेषक द्वारा दिए गए संदेश का वही अर्थ प्राप्तकर्ता
प्राप्त कर सके जो प्रेषक प्रषित करना चाहता है । इसके लिए संदेश की कोडिंग और डिकोडिंग को समझना आवश्यक है । इसका अर्थ यह है कि संचार
के लिए प्रेषक और प्राप्तकर्ता के बीच समान अनुभूति या समझ का होना आवश्यक है । यह समान समझ की सबसे अधिक
संभावना भाषा औऱ शब्दों के द्वारा संभव है । उदाहरण के तौर पर प्रेषक किसी वस्तु को “कम्प्यूटर” कहता है तो प्राप्तकर्ता के लिए उसके शब्द का अर्थ
समझने के लिए पहले इस कोड अर्थात भाषा से परिचय जरूरी है । कोडिंग और डिकोडिंग के
आधार पर ही संचार के इतिहास को भी समझा जा सकता है । मनुष्य आदिमानव था तो अनेक प्रकार की समान अनुभूतियों को संकेतों में एक दूसरे
से बांटता था धीरे धीरे भाषाओं और लिपियों का विकास हुआ और संचार एक व्यवस्थित रूप
में संभव हुआ । इससे अधिकांश अन्तरवैयक्तिक संचार ही संभव हुआ । उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में जब तकनीक का विकास हुआ, नए नए आविष्कार हुए तो
संचार ने भी नए आयामों की तरफ कदम बढाए । अब तक गांव या कबीले तक सीमित संचार व्यापक क्षेत्र और व्यापक जनसमुदाय तक
विस्तार पा गया । छापेखाने के आविष्कार से शुरु हुई संचार क्रांति फोटोग्राफी,टेलीग्राफी,रेडियो और टेलीविज़न के
आविष्कारों से समृद्ध होते हुए इंटरनेट तक पहुंच गई है । इंटरनेट से पहले रेडियो
और टेलीविज़न ने ही वास्तविक संचार क्रांति को जन्म दिया । अनेक प्रकार की आधुनिक
प्रसारण तकनीकों के आविष्कार के कारण रेडियो और टेलीविजन ने सारी दुनिया को एक
इकाई के रूप में तब्दील कर दिया । सूचनाओं और विचारों का आदान प्रदान सबसे सशक्त रूप में द्रुत गति से संभव हुआ । रेडियो ने जहां आवाज़ के
माध्यम से सूचनाओं को पंख लगाए वहीं टेलीविजन ने इस संचार को दृश्यात्मकता से
जोड़कर आंखें प्रदान की ।
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