रविवार, 9 दिसंबर 2018

"मैं साहित्य का नन्हा कुकुरमुत्ता हूँ" - कुमारी अर्चना

कुमारी अर्चना कटिहार,बिहार

मैं साहित्य का नन्हा सा 
कुकुरमुत्ता कवयित्री हूँ
मुझे पेड़ बनते देर ना लगेगी
पर शेष बचूँगी तक ना!

चाटुकारता करूँगी कभी कागज पे
फोटो बन चिपकने के लिए
कभी मंच पर मुँह दिखाने के लिए
तो रचनाओं को छपवाने के लिए!

बिक जाऊँगी इन्हें संभालने में
नाम होना तो दूर रहा
नाम सामने लाने के लिए भी
धन खर्च करना होगा
तो कभी तन
मन की यहाँ आवश्यक नहीं
वो केवल साहित्य लेखन के लिए  ...

मैं निराला का कुकुरमुत्ता नहीं हूँ
जो विदेशी सत्ता से 
भारत की आजादी के लिए संधर्ष करें
तो कभी गुलाब से लड़ मरे!
मैं यहाँ खुद के अस्तित्व के लिए
संधर्ष कर रही हूँ!

मैं साहित्य की बिसाद पे
नन्हीं सी प्यादी हूँ
संर्धष कर भी तब तक ना जीतूँगी
जब तब वजीर के इशारे पे ना चलूँगी
पर ये वजीर कौन है
साहित्य सिखाने वाले गुरू
बाजार व्यवस्था
मिडिया नियंत्रक
राजनीति के सर्वेशर्वा या
साहित्य समाज के कर्ताधर्ता !


"हाँ मैं प्रसिद्ध होना चाहती हूँ" - कुमारी अर्चना

कुमारी अर्चना कटिहार,बिहार

क्या करना होगा
अपना चेहरा रोज रोज
गमकऊँआ साबुन से चमकाना होगा
फेरनलवली खूब पोतना होगा
सात धंटे की पूरी नींद लेनी होगा
फिर फेसबुक,इन्ट्राग्राम पर
हॉट,सेक्सी व भड़काऊं 
फोटो अपलॉड करनी होगी!

लाइक पे लाइक 
कौमेंन्ट पे कौमेन्ट से
मेरे पोस्ट पे भरे होगें
मेरी खुबसूरती के 
दिवाने इनबॉक्स में 
लाइन में खड़े होगें!

मुझे अपने छोटे से कारनामों को 
बड़ा चढ़ा कर शोखी बघारनी होगी
अखबार व टी.वी पर प्रचार करना होगा
सखी सहेली को बार बार फोन करके
अपना झूठा कच्चा सब चिट्ठा बतियाना होगा
लोग तारिफ के पुल पे पुल बाँधेगें
मैं प्रसिद्धी के पुलंदे पर चढ़ जाऊंगी!

मैं कभी हिरोइन 
तो कभी मॉडल 
तो कभी अधिकारी
तो कभी नेताईन
तो कभी डॉक्टर
तो कभी इजीनियर बनने का
ख्वाब  बनाऊंगी!

महानगर के सबसे पोश इलाके में प्लेट खरीदूंगी
नोटो के बिस्तर पर सोऊंगी
लाइम लाइट की जगमगाती
दुनिया में जीऊंगी
महँगी गाड़ीयों के लाइने लगी होगी
डिजायनर कपड़ों से अलमारी भरी होगी
घर में समान से ज्यादा नौकर होगें
हीरे जवाहरात से मैं लदी होऊंगी
धीरे धीरे सोचे सोचे उम्र निकल जाएगी
और मैं सिजोफ्रेनिया को मरीज हो जाऊंगी
फिर बढ़ापे में भूलने की बिमारी हो जाएगी
मैं प्रसिद्ध हो जाऊंगी
मैं कौन थी?



"समाज का मेहतर हूँ मैं" - कुमारी अर्चना

कुमारी अर्चना कटिहार,बिहार

ब्राह्मा के पादुका में
समाज के निचले स्तर पर
मेहतर कहलाता हूँ मैं
उतर वैदिक काल से
कलयुग तक का सफर
बहुत से उतार चढ़ाव आए
पर मैं एक सा रहा है!

तुम्हारे अंदर और बाहर की
गंदगी झाड़ता,फूंकता हूँ
मन को साफ नहीं कर पाता
वक्त दर वक्त परते पड़ती गई
और मैं मेहतर का मेहतर रहा!

काश् कोई मुझे भी 
झाड़ फूंक कर साफ कर पाता
जैसे कपड़े,बरतन और कागज
सर्फ,साबुन और वाइटनर से हो जाते 
पर मैं कितना भी साबुन मलूँ 
चाहे तो गंगा ही क्यों ना नहा लूँ
मेहत्तर का मेहतर रहता!

फर्क बत इतना है कि
पहले अपने ही पदचिन्हों
झांडू से मिटाता चलता था
अब दूसरे के परचिन्हों को!

अनुसूची जाति का दर्जा व
आरक्षण का लाभ पाकर भी
समाजिक स्तर पर खूदको
मैं कभी ना उठा पाया
आर्थिक स्थिति में भी
अन्य जातियों से तुलना में
पीछे का पीछे ही हूँ
जैसे पहले मेरी थी!

क्या मैं मेहतर ही रहूँगा
क्या मेरी मुक्ति संभव नहीं
जैसे बुद्घ और जैन की हुई
मेरी गंदगी के सफाई से!

ये काम तो हर इन्सान 
स्वं के लिए करता है
पर समाज की गंदगी ढोना
मेरा ही कर्तव्य और कर्म
क्यों बन कर रह गया
और मेरा सम्मान भी शेष!


बुधवार, 5 दिसंबर 2018

"मेरा घर एक चिड़ियाँखाना" - कुमारी अर्चना

कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार

कुकरू कुकरू कर जगाता मुर्गा
चूँ चूँ बड़बड़ाती तब गौरैया 
पंख फैला कर नाचती तितली 
गुटर गूँ,गुटर गूँ कर बोलता कबूतर
मेय मेय कर चिलाता बकरा
मिठ्ठू मिठ्ठू कर पुकारता तोता
माँ माँ कर बुलाती गईया
जोर जोर से दम लगाती बछिया
भौ भौ कर भौकता कुत्ता
तब भाई बहन की आँख खुलती
हम सब रहते एक ही घर में
मिल जुल कर एक परिवार की तरह
इस चिड़ियाखाना में रहते!

भाई बहन के द्वंद में 
मुर्गे का काम तमाम हुआ
माँ की मन्नत में बकरा(खस्सी)
देवी को बलि चढ़ी
मिठ्ठू बारिश के पानी में 
नहाते नहाते ठंड से मरा
फूल सारे खत्म हूए 
तितली परदेश चली गई
गईया के साथ बछिया 
बधिया(कसाई )के हाथों बिक गई
पेड़ पौधे भी कटने से गौरया रानी
रूठ किसी ओर के घर चली गई
खोप खुले रहने से कबूतरों
बाहर दाना चुनने फुर्र हो गए
भौ भौ करता जाॅनी को
जहर देने से मौत हो गई
घर के सारे बासिंदे बिछड़ गए
हमारा कुनबा टूट कर बिखर गया!

ऊँची ऊँजी जेल जैसी दिवारे थी
खिड़की थी पर खुलती ना थी
बाहर सड़क थी अंदर घर
सुरक्षा कारणों से स्कूल भी नहीं जाते थे
पिता पुलिस में थे थानेदार थे
आए दिन चौर और बदमाशों के
धमकियों भरे खत आते थे
गब्बर आएगा सबको मार देगा
भय के साये में बच्पन बीता
घर पर ही दोनों टाइम ट्यूशन चलता
धीरे धीरे हम सब चिड़ियाखाना के
कैद के बंदी बनकर रह गए
जो दो टांगे रहकर भी भाग नहीं सकते!





:

"पलाश के फूल" - कुमारी अर्चना

कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार

पेड़ की डाली से जब
सारे के सारे पत्ते 
झड़ नीचे आते
पेड़ की एक एक डाली के
ऊपर फूल लद जाते!

बसंत के मौसम में ही 
पलाश फूल खिलते
जंगल में आग लगाते
और तुम मेरे मन में!

वैसे जब ही तुम आते
मुझ पर फागुन का फाग
पलाश के फूलों से बने
लाल रंग को लगाने
कभी खुशब़ू तो ना देते पर
मेरे मन में सदा तेरे
यादों की बगिया को महकाते
जब भी तुम चले जाते!

अद्धचँद्राकार पंखुडियाँ
वैसे चाँद सा तुम्हारा मुँख
छटा लालवर्ण के फूलों की
सूरज के किरणों से
कनक सी आभा आती!

गहरे लाल फूलों को टेसू कहते
वैसे तुम भी  मेरे टेसू हो
जब गुस्से से तुम्हारा
चेहरा लाल लाल हो जाता!

पलाश को तलाश फूलों की रहती
और मुझे तुम्हारी!
वो भी ठूठा पेड़ सा
मुक बना रहता
और मैं पत्थर सी
बेज़ान मुरत!

फूलों से यौवना हरा रहता
गर्मी कहीं उड़न छू हो जाती
वैसे ही तुम्हारे होने से मेरी
प्राणवायु दीर्धायु हो जाती!



ढह जाए न हिन्दू के सीने का त्याग - अभिनेष कटेहादुबे"दीप"

उन्हें तनिक न भय होता है

अभिनेष कटेहादुबे"दीप"

तूफानों के आने का,
हुनर मिला है जिन पेड़ों को
आंधी में झुक जाने का  ।
उन्हें बसंत भरमा न पाया
जड़ में जिसने पैर जमाया
इस जग में वो ही बड़े हुए है
जो जड़ को जकड़े अड़े हुए है
प्रतिमाओं में वो मढ़े हुए है
जो झुक कर फिर से खड़े हुए है,
हर  हिन्दू  के  सीने  का त्याग
 कहीं  ढह जाए न
भरत  भूमि  की  माटी  पर
दाग कहीं रह जाए न
जिसने हमको सत्ता दी है
और दिया सारा शासन
उसी राम को दे न पाए एक
दिव्य ऊँचा आसन .....
                              

मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

“फुटपाथ" - लेखिका कुमारी अर्चना

कुमारी अर्चना

 पूर्णियां, बिहार 

मोर्या होटल का
आलिशान बिलडिंग
राजशी ठाठ बाट

नेता,अभिनेता बड़े लोगों से
यहाँ की महफिल सजती है
कई हजारों के एक कमरे
मंजिलों पे कई मंजिले
आगे पीछे नौकर चाकर
सुरक्षा के लिए तैनात दरवान
जैसे बाॅडर पर जवान!

देख कर तो लगता है
किसी बड़े अधिकारी
या नेता का घर हो
बत्तीयों की सजावट से
नई दुल्हन सी लगती है!

रात के काले अंधेरे में
जब कुकूर केवल भौंकता है
शहर सोता है उजाले में
होटल के आगे नंगी फर्श पर
कई भिखारी सोए रहते है
या यूँ कहे बस एक जिंदा लाश
पड़ी रहती है जब तक कि

होटल का दरबान गेट नहीं खोलता
फिर लाशे चलने लगती है
एक घर से दूसरे घर
एक दुकान से दूसरे दुकान
एक सड़क से दूसरे सड़क पर
हाथ फैलाए कटोरा लिए
दर दर भटकते हुए
संवेदना का लावा जैसे
आँखों से फूट पड़ेगा
और कलेजा मुँह को!

इतने आलिशान होटल में
क्या एक कमरा खाली नहीं
या बरामदे का कोई कोणा
जहाँ पर अपनी गरीबी छूपा सके
तन को किसी वस्त्र से ढक
ठंड़ को मात दे सके!

शायदा नहीं!
ये कैसे हो सकता है,
यहाँ सभ्य और प्रतिष्ठित लोग रहते
भिखारी अस्भय और नंगे लोंगो
के स्पर्श भर से महामारी फैल जाएगी
स्वास्थ पर दुष्प्रभाव पड़ेगा
हजारों की फीस भरनी होगी
कपड़े अलग खराब होंगे
ड्रायक्लीनर को देने पडेंगे!

होटल का प्रतिष्ठता
जाती रहेगी सो अलग
कमरों के रेट कम होंगे
लोग इस होटल के बजाय
दूसरे होटलों में जाएगे
एक भिखारी मरता है तो मरने दो!
ये उसके कर्मों का फल है
कि वो गरीब पैदा हुआ!

हाँ गरीब,भिखारी पैदा होना
मेरे ही कर्मफल है
कोई इसे क्यों बाँटे या कम करें!

फुटपाथ पर पैदा होना और मरना
जन्मसिद्ध अधिकार है
आजादी पाने का सौभाग्य है!
इससे तो अच्छा होता कि हम
गुलाम रहते सब बराबर तो रहते!

कांग्रेस की निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में भारी गिरावट के पूर्वानुमान

भविष्य में क्या होंगी, मैं नहीं जनता हूँ |  इस दौर में बहुत लोग अभिव्यक्ति की आजादी का अलाप जप रहे है |  तो मुझे भी संविधान के धारा  19  क...