रविवार, 15 दिसंबर 2019

CAB को लेकर साजिश; मीडिया डरी हुई


Jitesh kumar

Image result for CONGRESS पहले जिहादियों, बंगलादेशी और अब कांग्रेसियों का डर| सभी प्रकार के संवैधानिक प्रकिया के बावजूद महामहीम राष्ट्रिपति के हस्ताक्षर होने के उपरांत नागरिकता संशोधन बिल पास हुआ है| राज्यसभा में विधेयक के पक्ष में 125 जबकि विपक्ष में 99 वोट पड़े है| गृहमंत्री अमित साह ने राज्यसभा में विधेयक को पेश किया, जिस पर 6 घंटे बहस के बाद अमित साह ने सदन में विधेयक से संबंधित जवाब दिये| इसके बावजूद राज्यस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार पार्टी के हाईकमान का आदेश मानेंगे| क्या सोनीया गाँधी और राहुल गाँधी का निर्णय देश के संविधान से बड़ा है? इतने बड़े संविधान विरोधी मुद्दे को मीडिया दबा रही है, कारण क्या हो सकता है दलाली या डर? कुछ मीडिया संस्थानों को छोड़कर किसी ने CAB के बारे में सही जानकारी जनता को नहीं दिया है ये मीडिया घराने डिबेट के नाम पर देश को गुमराह कर रहें है| कानून की जानकारी रखने वाले बुद्दिजीवी, प्रोफ़ेसर, वकील, जज से इसके बारे में वास्तविक जानकारी साझा करनी चाहिए जिससे बिल के बारे में जनता को ठीक जानकारी मिले| किन्तु TRP और राजनितिक के चक्कर में डिबेट के नाम पर देश में मतभेद के बीज बोये जा रहे है| किसी ख़ास घटना पर मीडिया का हो-हल्ला और किसी घटना पर चुप्पी?


गुरुवार, 5 दिसंबर 2019

शिवसंहिता योग की पुस्तक

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शिवसंहिता योग से सम्बन्धित संस्कृत ग्रन्थ है। इसके रचनाकार के नाम के बारे में पता नहीं है। इस ग्रन्थ में शिव जी ने  पार्वती को सम्बोधित करते हुए योग की व्याख्या कर रहे हैं। योग से सम्बन्धित वर्तमान समय में उपलब्ध तीन मुख्य ग्रन्थों में से यह एक है। दो अन्य ग्रन्थ हैं - हठयोग प्रदीपिका तथा घेरण्ड संहिता है। शिव संहिता में पांच अध्याय है इसमें ज्ञान का वर्णन है भगवान शिव दूसरे अध्याय में नाड़ी संस्थान का वर्णन करते हैं तीसरे अध्याय में पांच प्राण उप प्राण का वर्णन करते हैं व प्राणयाम का वर्णन करते हैं चौथा अध्याय मुद्रा प्रधान है व साधक की घट परिचय निष्पत्ति आदि अवस्था का वर्णन करते हैं पांचवे में 200 से अधिकश्लोक हैं इसमें साधक प्रकार व सप्त चक्रों विस्तृत वर्णन है। प्रथम अध्याय अद्वैत वेदान्त को सार रूप में प्रस्तुत करता है। दूसरे अध्याय में नाड़ी जाल का वर्णन है उसमें अन्यसे अलग साढ़े तीन लाख नाडीयों का वर्णन है। व 15 अन्य मुख्य नाड़ियां बताई गई हैं तीसरे अध्याय में प्राण अपान व्यान आदि पांच प्राण नाग कूर्म आदि पांच उपप्राण वर्णित हैं फिर कुम्भक सहित अनुलोम विलोम प्राणयाम के 4 प्रहर के अभ्यास के लिये कहा गया है फिर पदम् आसन आदि पांच आसन बताएं हैं में दस मुद्रामहा मुद्रा महाबंध उड्डियान आदि बंध विपरीत करनी खेचरी आदि को विस्तार से वर्णन किया पांचवे अध्याय में साधक के प्रकार अनुसार प्राप्ति में लगने समय विधि बताया है विशेष कर पांचवे में सात चक्रों का वर्णन हैं फिर कुछ साधारण व चमत्कारी विधियां हैं  शिवसंहिता क्रिया योग व श्रद्धा व विश्वास का समन्वय है व योग का महत्वपूर्ण ग्रंथ जो आजकल अध्ययन किया जा रहा है।

शनिवार, 16 नवंबर 2019

साध्वी प्रज्ञा का जीवन

जितेश कुमार
बीते लोकसभा चुनाव, 2019 में मैं भोपाल था। तब मैंने लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया, मीडिया संपर्क तथा कई नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से चुनाव प्रचार को करीब से देखा, उसमें भाग लिया। साध्वी प्रज्ञा दीदी के चुनाव प्रचार में  उनके साथ प्रचार में शामिल रहा। मैं देख रहा था कि वैसे तो भोपाल भारत का भौगोलिक केंद्र पहले से ही था परंतु साध्वी प्रज्ञा के चुनाव में उतरने से भोपाल भारतीय लोकतंत्र के निर्णायक जनादेश का केंद्र बिंदु बन गया है।   
भगवा आतंक तथा हिन्दू आतंकवाद जैसे शब्दों के जनक, आतंकी को अफजल जी, मौलाना जी पुकारने वाले, उसकी हत्या पर आंसू बहाने वाले कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह चुनावी मैदान में जैसे उतरे। साध्वी प्रज्ञा ने राजनीति में उतरने में देर नहीं की। जिस प्रकार वर्ष 2008 में मालेगांव धमाका में उनको फंसाया गया और घोर यातनाएं दी गई।
इन सबके पीछे दिग्विजय सिंह का हाथ रहा था। ऐसे में साध्वी प्रज्ञा लोकसभा क्षेत्र भोपाल से भाजपा की प्रत्याशी के रूप में चुनाव में खड़ी हुई तो देश-दुनियां के मीडिया, नेता, यहां तक की आम जनता ने इसे चुनाव मात्र नहीं समझा, यह तो धर्म युद्ध था। हिंदुओं को आतंकी कहने वाले दिग्गी के सामने सनातनधर्म की सन्याशनी चुनाव लड़ रही थी और यह तय था कि साध्वी प्रज्ञा के राजनीति में उतरने से केवल भोपाल ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारतवर्ष में राजनीति का परिष्करण एवं परिमार्जन होने जा रहा था। 
भिंड जिले की लहार तहसील की रहने वाली प्रज्ञा सिंह ठाकुर का जन्म 2 फरवरी, 1970 को मध्यप्रदेश के दतिया जिले में हुआ था। उनके पिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। यही कारण था कि बाल्यकाल से ही प्रज्ञा का रुझान राष्ट्र और समाज कार्य की ओर रहा। सामाजिक संवेदनशीलता उन्हें अपने सामाजिक दायित्व के प्रति सजग, सचेत और संकल्पित करती रहीं। वह किसी न किसी रूप में समाज को अपना योगदान देती रहीं। अल्पआयु से ही उनकी लेखनी से कविताएं और गीत फूटने लगे। उनकी रचनाओं के केंद्र में राष्ट्र ही रहता था। सनातनी मूल्यों ने उनके व्यक्तित्व का श्रृंगार किया। वे वास्तव में अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति हैं। वर्ष 1987 में जब वह नवमीं कक्षा में थी तब उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की सदस्यता प्राप्त की लगभग 15 वर्षों तक सक्रिय रहीं। प्रारंभिक सदस्यता के बाद साध्वी शीघ्र ही नगर इकाई की प्रमुख बन गई फिर जिला इकाई और उसके पश्चात पूर्णकालिक के रूप में विदिशा और भिंड की विस्तारक रही। बाद में भोपाल और उज्जैन से संगठन मंत्री रही। उनके कार्यों को देखते हुये। कुछ ही वर्षों में उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में स्थान मिला। दुर्गा वाहिनी में भी उनकी सक्रिय भूमिका रहीं। इसी दौरान उन्होंने उज्जैन में वर्ष 1996 में प्रज्ञा उत्क्रांत सामाजिक संस्थान की स्थापना की और इसके माध्यम से परिवारिक विवादों में मध्यस्थता करते हुए समस्याओं का निराकरण किया। भारतीय संस्कृति में दृढ़ आस्था होने के कारण वो समझने और समझाने लगी कि वर्तमान परिवारिक विघटन और विखंडन के मुख्य कारण व कारण क्या है? उनकी सेवा कार्य का शनै: शनै: विस्तार होता गया। उसमें नये आयाम जुड़ते गये। वर्ष 1998 में उन्होंने भिंड जिले में जय वंदेमातरम सामाजिक संस्थान की स्थापना की और उसकी राष्ट्रीय अध्यक्षा रहीं। खेल में उनकी रुचि बचपन से ही प्रगाढ़ रही। कालांतर में वे कबड्डी की स्टेट प्लेयर बनी और आत्मरक्षा के आशय से उन्होंने कराटे की शिक्षा प्राप्त की और ब्लैकबेल्ट बनी। उन्होंने महिला सुरक्षा के लिए भी काम किया। गृहनगर लहार में छात्राओं के लिए अलग से सेंटर कॉलेज और महाविद्यालय बने इसके लिए उन्होंने वर्ष 1990 में सफल जनान्दोलन किया और सरकार से स्वीकृति प्राप्त कर उन्हें खुलवाया। 
राष्ट्रीय सेविका समिति की सदस्यता के रूप में उन्होंने चुनाव संबंधित कार्य में भी अपना कौशल दिखाया। वर्ष 2002 के गुजरात विधानसभा चुनाव में उनकी सक्रिय भूमिका को सराहा गया। उन्होंने संकल्प लिया और अपने समिति संसाधनों से वे सश्रम सेवा कार्य में जुट गई। सेवा से मिलने वाले आनंद की अनुभूति व्यसनादि से अधिक मादक होती है। समय के साथ सेवा ही सेवक का स्वभाव बन जाता है। सेवा की यात्रा में स्वत्: दुर्लभ मनीष संत मिलने लगते हैं और सेवा कार्य के आयाम विकसित होने लगते हैं। वर्ष 2007 में ऐसा ही हुआ अवसर था अर्धकुंभ का और स्नान प्रयागराज। जूनागढ़ अखाड़े के महामंडलेश्वर परमपूज्य स्वामी अवधेशानंदगिरी जी महाराज से उन्होंने संन्यास की दीक्षा ली और पूर्ण रूप से सन्यासी जीवन में प्रवर्त हो गई और साध्वी प्रज्ञा बन गई। 
संघ के प्रभाव तथा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अनुभवों से साध्वी का आत्मविश्वास और दृढ़ होता गया। उन्हें लगने लगा कि राष्ट्रहित में अच्छा कार्य करने की आवश्यकता तो है ही साथ ही  असीम संभावनाएं भी है और वे उस पथ पर बढ़ चली। कभी सामूहिक रक्तदान, कभी गौसेवा के प्रकल्प तो कभी महिला सुरक्षा के उपकरण। वे धीरे-धीरे आयुर्वेद, योग, ध्यान और अध्यात्म के रहस्य व उनसे मिलने वाली चमत्कारिक लाभों से भी समाज को जोड़ने का प्रयास करने लगी। 
साध्वी प्रज्ञा एक प्रखर वक्ता थी जब वह राष्ट्रवाद और समाज की कुरीतियों पर अपना मंतव्य मंच से व्यक्त करती थी। तो वहां बैठे लोगों के हृदय में क्रांति की ज्वाला भड़क उठती थी। धीरे-धीरे साध्वी प्रज्ञा हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के साथ-साथ महिला की भी ब्रांड एमेस्टर बन गई। और यह बात कुछ तथाकथित ढोंगी लोगों को रास नहीं आया। 
यही कारण था कि वर्ष 2008 में एक प्रायोजित षड्यंत्र के तहत मालेगांव मस्जिद में हुये बम विस्फोट में उनका नाम जोड़ा गया। कुछ कुत्सित राजनीतिज्ञों ने अपने आकाओं के निर्देश पर राष्ट्रद्रोह का बिगुल फूंक दिया। उस ह्रदय विदारक कालखंड की यातनाएं एवं प्रताड़नाओं के स्मरण से ही आंसू टपकने लगते हैं। साध्वी प्रज्ञा को तुरंत स्पष्ट हो गया कि देश और सनातन धर्म के शत्रुओं ने उन्हें मोहरा बनाया है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में शांति प्रिय हिंदू समाज पर सबसे बड़ा हमला बोला गया था। गद्दार, हिंदू समाज पर लांछन लगा रहे थे। गद्दारों के सरगना ने तो भगवा आतंक और हिंदू आतंकवाद जैसे अपशब्दों से भारत भूमि और हिंदू धर्म को अपूर्णक्षति पहुंचाने का अक्षम्य अपराध किया था। साध्वी प्रज्ञा को तोड़ने के लिए उन्हें जेल में भयंकर यातनाएं दी गई। ज्ञात भारत के इतिहास में जिस प्रकार से जेल में साध्वी प्रज्ञा को यातनाएँ दी गई, इसका कोई दूसरा इतिहास नहीं। जेल में कई पुलिसकर्मी एकसाथ मिलकर उनको बेल्ट और जूते से तब तक मरते रहते थे जब तक वो बेहोश नहीं हो जाती थी। होश में लाने के लिए उन पर गर्म पानी फेंका जाता था फिर वही बेल्ट, जूतों यहां तक कि सिगरेट से उनके शरीर को जगह-जगह जलाया जाता था, उनको उठाकर जेल के दीवारों पर फेंका जाता था। उन्होंने बताया कि इसी बीच जेल एक दिन उनसे मिलने ढोंगी सन्यासी जिसकी आजकल अत्र-तत्र, सर्वत्र पिटाई होती रहती है, स्वामी अग्निवेश आये। उन्होंने कहा कि आप मालेगांव बम धमाके में अपना जुर्म कबूल करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख के इशारों पर ऐसा किया यह बयान दे। जेल में आपसे कोई मारपीट नहीं होगी। उल्टे आपको सभी प्रकार से सुख-सुविधा दिया जायेगा। जल्द ही आपकी रिहाई हो जायेगी। परंतु बचपन से ही साध्वी प्रज्ञा में राष्ट्रवाद की भावना कूट-कूट कर भरी थी। वो हिंदुत्व को कैसे लांक्षित कर सकती थी। उन्होंने इस प्रस्ताव को अस्वीकार किया और सहज ही अपने लिए कष्ट के दिन मांग लिए। लेकिन समय ने करवट ली। 2014 के चुनाव ने देश के राजनीति को बदल दिया। नरेंद्र मोदी की सरकार आयी। उस समय गृहमंत्री रहे राजनाथ सिंह ने साध्वी प्रज्ञा पर लगे आरोप की जांच के बाद उनको दोषी नहीं साबित होने के स्थिति में उन्हें छोड़ दिया गया। इस अग्नि परीक्षा से साध्वी प्रज्ञा बेदाग बाहर निकल गई। 
जब भोपाल से दिग्विजय सिंह चुनाव में उतरे तो विरुद्ध में साध्वी प्रज्ञा सामने खड़ी थी। उन्हें अपार जनसमर्थन मिला। साध्वी प्रज्ञा के चुनाव में उतरने से भोपाल लोकसभा सीट ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। चुनाव प्रचार के दौरान भोपाल में मैंने जो दृश्य देखे। सच में यह धर्म और पाप की लड़ाई थी। सौभाग्य से साध्वी प्रज्ञा को प्रचंड बहुमत से विजयी मिली।

शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

ये भाजपा के कार्यकर्ता है, शाह के बंधुआ मजदूर नहीं जितेश कुमार

अमित शाह के बयान से बिहार भाजपा के कार्यकर्ता नाखुश है। नाराजगी, गुस्सा और कानाफूसी तो होना ही था। आज कार्यकर्ता अपने आप को छला हुआ महसूस कर रहे हैं। जिन वैचारिक अधिष्ठान पर वो भाजपा के कार्यकर्ता बने और तन मन धन से भाजपा
को सींचने में लगे हैं। जब उसी विचार पर कुठाराघात किया जा रहा है। सत्ता और कुर्सी के मोह जाल में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के द्वारा अपने ही पार्टी की रीती-नीति और विचार को ताक पर रखा जाता हो, यह भला किसे स्वीकार है? भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं गृह मंत्री अमित शाह ने एनडीए के नेता के रूप में नितीश कुमार का पक्ष लिया तो भाजपा के सामान्य कार्यकर्ता इस फैसले से नाखुश दिखे। कारण शाह का बयान बीजेपी के संविधान में फिट नहीं बैठता है। भाजपा के कद्दावर नेता अटल बिहारी वाजपेयी को लोगों ने अभी तक भूलाया नहीं है। अटल जी कहते थे जोड़-तोड़ कर सरकार बनती हो तो ऐसे सरकार को हम चिमटे से नहीं छूएंगे। अटल जी के सामने जब सत्ता और पार्टी के आदर्श विचार में किसी एक को चुनने की बाड़ी आयी तो उन्होंने ने पार्टी के विचार ,सिंद्धांत और रीति-नीति को चुना और प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया। किंतु आज उन्हीं के पार्टी के दूसरी पीढ़ी में यह वैचारिक गुण नहीं दिखता है। लगता है यह अपने ही सिद्धांतों से विमुख हो गए हैं। किसी तरह सत्ता की प्राप्ति ही भाजपा की अंतिम मंजिल मालूम पड़ती है। हाल में ही देखा जाए तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रत्येक मुद्दे पर भाजपा को घेरने का प्रयास किया और विरोध किया है चाहे वह तीन तलाक का मामला हो, धारा 370 का मामला हो या राम मंदिर का मामला। जेडीयू बीजेपी के साथ नहीं दिखता है। फिर किस आधार पर शाह एनडीए के लिए नितीश कुमार की प्रशंसा करते हैं। इधर हाल फिलहाल में सरकार के क्रियाकलापों पर नजर डाला जाए। माननीय नितेश बाबू ने केवल धार्मिक तुष्टीकरण का ही कार्य किया है। इनके कार्यकाल में हजारों एकड़ सरकारी जमीन को अवैध रूप से मस्जिद मदरसा और कब्रिस्तान बनाने के लिए छोड़ दिया गया। उल्टे मस्जिद, मदरसा और कब्रिस्तान के चारदीवारी के लिए सरकारी पैसे खूब का खर्च हुए है। इनके अधिकारियों के द्वारा हिंदू संगठनों के विरुद्ध मुहिम चलाया जा रहा है, और अल्पसंख्यक समुदाय खास करके मुस्लिम समुदाय को अपराध करने की खुली छूट है। जगह-जगह पर इनके नेता और प्रशासन के नापाक गठबंधन के कारण मुस्लिमों द्वारा उत्पाद की घटना बढ़ी है। चर्चित सामूहिक बलात्कार कांड, सुपौल के प्रतापगंज के हुसैनाबाद की है। विजयादशमी के रात मेला देख कर लौटते हुए दो महिला और एक छोटी बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार होता है। उसके बाद उसमें से एक महिला को गोली मार कर हत्या कर दी जाती है। यह कोई सामान्य घटना नहीं थी इसके बावजूद शासन की तरफ से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया नहीं किसी भ्रष्ट अधिकारियों को निलंबित और दंडित किया गया। क्योंकि अधिकतर आरोपी मुस्लिम समुदाय से थे, सुपौल में हारून रशीद उपसभापति और यहां के डीएम, एसडीओ उसी समुदाय से आते हैं। सुपौल में मोहर्रम में जगह-जगह तलवारबाजी हुई। मैं स्वयं सहरसा से आने समय ऑटो से उतरकर 5 किलोमीटर पैदल चलकर सुपौल पहुंचा क्योंकि मुस्लिम समुदाय गाड़ियों को घेर कर तलवारबाजी कर रहा था। इसके बावजूद कोई प्रतिक्रिया प्रशासन के द्वारा नहीं किया गया। बात जब दुर्गा पूजा की होती है प्रशासन आरती के समय और साउंड बॉक्स की संख्या गिनने लगता है। दुर्गा पूजा समिति, बरेल के सदस्यों पर धारा 107, 116 (ग) लगाया जाता है। किन्तु रात्रि में मुख्य मार्ग पर मोहर्रम में मुस्लिमों के द्वारा तलवारबाजी करने पर प्रशासन को कोई दिक्कत नहीं है। इस प्रकार के पक्षपाती निर्णय के पीछे क्या शासन का हाथ नहीं है? बिल्कुल है नीतीश कुमार के द्वारा हिंदुओं को प्रताड़ित व मुस्लिमों को खुलीछुट दिया जा रहा है मुस्लिम बलात्कारियों को बचाया जा रहा है और शांति पूर्वक धार्मिक आयोजन करने वाले लोगों पर प्रशासन कार्यवाही कर रहा हैं। और यह सब तब हो रहा है जब नीतीश कुमार के साथ भाजपा शासन में है। इसके बावजूद भी अगर एनडीए के नेता श्री नितीश बाबू है तो भाजपा किस मुंह से समाज के बीच वोट मांगने जाएगी? दुर्गा पूजा में हिन्दू समाज को झूठे और बेबुनियाद आरोप में कार्यवाही हो रही है इस आधार पर, या सुपौल में मुस्लिम समुदाय के बलात्कारियों को बचाया जा रहा है इस आधार पर। नीतीश कुमार के द्वारा  चलाया जा रहा कथित तौर पर मुस्लिम तुष्टीकरण से बिहार पुनः अराजकता के चपेट में है। शाह को अपने बयान पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। नीतीश सरकार और प्रशासन का कार्य मुस्लिम तुष्टीकरण और टोपा-टोपी के खेल में उलझा है। इसका बिहार के विकास से कोई मतलब नहीं है। ऐसे में अगर एनडीए से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार नीतीश कुमार बनते है तो भाजपा के कार्यकर्ता विद्रोह कर देंगे। क्यों कि वो शाह के बंधुआ मजदूर नहीं, पार्टी के वैचारिक समर्थक है। अधिकतर हिन्दू है।

सोमवार, 14 अक्टूबर 2019

गांधी मैदान में आरएसएस ने शरद पूर्णिमा उत्सव मनाया

जितेश कुमार 


संघ का कोई अपना उत्सव नहीं, हिंदू समाज का जो उत्सव है वही संघ का उत्सव है। संघ के स्वयंसेवक समाज के सज्जन व्यक्तियों के साथ सामाजिक, सांस्कृतिक उत्सव मनाते रहते हैं।  इसी निमित्त कल शरद पूर्णिमा के अवसर पर सुपौल के गांधी मैदान
  रात्रि 7:00 से 8:00 बजे तक आरएसएस के स्वयंसेवकों ने शरद पूर्णिमा का उत्सव मनाया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से आरएसएस के जिला सहसंचालक श्रीमान संतोष अग्रवाल और अन्य स्वयंसेवक उपस्थित रहे। 1 घंटे की शाखा में कबड्डी, गणेश छू, महापुरुषों की माला, रामायण और महाभारत के पात्र, राज्य-राजधानी, सांस्कृतिक स्थल के नाम आदि प्रकार के खेल हुए। तत्पश्चात नगर विस्तारक जितेश कुमार ने शरद पूर्णिमा के सांस्कृतिक और वैज्ञानिक महत्व के कुछ बिंदु सबों के बीच रखा। संघ का उद्देश्य भारत के सर्वांगीण विकास करके विश्व गुरु बनाना है। अतः सभी स्वयंसेवकों को अपने मूल्यवान समय का कुछ हिस्सा संघ कार्य के लिए लगाना चाहिए। इस आग्रह के साथ बैद्धिक समाप्त की। उसके बाद शाखा  विकिर और प्रसाद के रूप में खीर भोज के बाद सभी स्वयंसेवक अपने घर लौट गये। कार्यक्रम में जिला सहकार्यवाह रंजन, जिला व्यवस्था प्रमुख  विकास,जिला महाविद्यालयिन प्रमुख संजीव सोनू, नगर कार्यवाह श्रवण, नगर सहकार्यवाह सुमित, नगर शारीरिक प्रमुख मणिकांत श्रवण,अन्य स्वयंसेवक उपस्थित थे।

बुधवार, 9 अक्टूबर 2019

सुपौल में बत्ती गुल की समस्या से परेशान आम जनता, मौन राजनेता

जितेश कुमार

सुपौल में घंटों बिजली गायब रहने से नगरवासी परेशान है। बीते कुछ महीनों से सुपौल शहरी क्षेत्र में अचानक कई घंटों तक बिजली गुल रहती है। सुबह जब बिजली की लोगों को अधिक आवश्यकता पड़ती है, भोजन बनाने, पानी भरने, कपड़ा साफ करने में ऐसे समय में बिजली आचानक गुल हो जाती है। और पूरे दिन दर्शन नहीं देती है। शाम में जब बच्चे को पढ़ना होता है, घंटों तक बिजली नहीं आती है। शहरी क्षेत्र की हम बात करें
तो गर्मी से राहत के लिए हो या प्रकाश के लिए लोगों के पास एक ही व्यवस्था होती है बिजली।  इनवर्टर भी होता है लेकिन बड़े लोगों के घर में शहरी झुग्गी झोपड़ी से लिए तो बिजली ही सब कुछ है। इसको  छोड़कर कोई दूसरा विकल्प नहीं है। अब तो बिजली विभाग के इस रवैये से इन्वर्टर भी ठप हो गई है। ऐसे में विभाग के प्रति लोगों में आक्रोश है, व्यवस्था को लेकर लोगों में निराशा है, असंतोष है। साथ ही कभी- कभी बिना पूर्व सूचना के पूरा पूरा दिन बिजली गायब रहता है ऐसे में भोजन, पानी, नहाना, स्कूल, दफ्तर सभी कामों में देरी होने स्वाभाविक ही है। बच्चे समय से तैयार होकर स्कूल नहीं पहुंचते तो कर्मचारी दफ्तर नहीं पहुंचते है। लोगों का कहना है कि बिजली ही काटनी है तो उसकी पूर्व सूचना उनको होनी चाहिए। साथ ही सुबह-सुबह बिजली नहीं गुल होनी चाहिए। किसी हेतु बिजली भी काटना है तो दस बजे के बाद कटनी चाहिए। ताकि उनका प्रमुख और दैनिक कार्य अवरोध नहीं हो। विभाग के बड़े-बड़े अधिकारियों की मनमानी के कारण लोगों को परेशानी उठानी पड़ती है।  यहां के स्थानीय विधायक व सांसद महोदय भी इस गंभीर विषय पर अब तक तो मौन ही है। और होंगे भी उनको तो किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होती है, जरनैटर होता है बिजली जाते ही जरनेटर स्टार्ट हो जाता है। ए.सी. में रहते हैं। ऐसे में गरीबों के मसीहा बनने वाले नेताओं को भी सोचना चाहिए कि पिछले कई महीनों से सुपौल में बिजली की समस्या से लोग जूझ रहे हैं। जनता के प्रतिनिधि होने के कारण उनको भी इस विषय पर आवाज उठाने का अधिकार है किंतु अब तक उनके तरफ से ऐसा कुछ भी प्रतिक्रिया नहीं आया है क्योंकि शायद अभी चुनाव का टाइम नहीं आया है।

सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

अश्वमेघ यज्ञ ने योद्धाओं के अहंकार को नष्ट किया

जितेश कुमार

रावण जैसे वैश्विक आतंकी के वध के पश्चात, राम की सेना सर्वशक्तिमान हो गई थी। इसके साथ ही लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव जैसे योद्धा अपने आप को सर्वशक्तिमान मान बैठे थे। इन्हें अपनी शक्ति पर अहंकार होते देख, राम ने अश्वमेध यज्ञ किया। एक दिव्य अश्व स्वतंत्र पूरे विश्व में भ्रमण के लिए छोड़ दिया 

गया। इसके वापस लौटते ही अश्वमेध यज्ञ पूर्ण होती है। किन्तु वाल्मीकि आश्रम के समीप दो बालकों ने यज्ञ के घोड़ा को पकड़ लिया। वो बालक कोई और नहीं माता जानकी और राम के पुत्र लव और कुश थे। लव-कुश ने अयोध्या की चतुरंगी सेना सहित सेनापति, शत्रुघ्न, लक्ष्मण, भरत, सुग्रीव और हनुमान जैसे योद्धाओं को पराजित किया। लव-कुश के बाण के आगे सभी योद्धाओं के अस्त्र-शस्त्र निष्फल हो गए। लव-कुश के बाण से आहत होकर सेना सहित सारे योद्धा मूर्छित पड़े थे। उसके बाद स्वयं भगवान राम युद्ध करने पहुंचे। उन्होंने देखा चतुरंगी सेना सहित सभी योद्धा जमीन पर मूर्छित पड़े हैं। वो मुस्काए और कहे "हे मुनि कुमार लव-कुश! आप किस प्रयोजन से यज्ञ का अश्व पकड़े है।" लव-कुश बड़े-बड़े योद्धाओं को पराजित करके। अब स्वयं को सर्वशक्तिमान मानने लगे थे। उसे लगा अब मुझे कोई परास्त नहीं कर सकता है। इसी अहंकार में दोनों भाई अपने ही पिता से बोले "हे अयोध्यापति राम हम दोनों भाइयों ने घोड़े के मस्तक पर लगे  स्वर्णपट पर लिखी चुनौती को स्वीकार किया है। हे राजन आपको यदि अश्व चाहिए तो हम से युद्ध करें, हमें पराजित करें फिर अश्व ले जाये" राम, लव-कुश के अहंकार भरे चुनौती को कैसे स्वीकार करते? पिता-पुत्र में युद्ध कैसे संभव था? भगवान राम ने देखा अयोध्या की सेना सहित महाबली योद्धाओं का अहंकार भी टूटना जरूरी था, वैसे ही लव-कुश का भी अहंकार टूटना जरूरी है। फिर उन्होंने युद्ध भूमि से एक तिनका उठाकर लव-कुश की ओर फेंका। उस तिनके को रोकने में लव-कुश के सारे अस्त्र-शस्त्र निष्फल हो गए। वो तिनका जाकर लव-कुश को लगा और दोनों भाई मूर्छित हो गये। इस प्रकार भगवान राम ने अपने ही सेना, सभी भाई, मित्र और पुत्र के अहंकार को पराजित किया। इसके साथ ही मानव रूप में प्रकट स्वयं नारायण ने भी अपने मनुष्यता के कारण उत्पन्न अहंकार का नाश किया।

कांग्रेस की निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में भारी गिरावट के पूर्वानुमान

भविष्य में क्या होंगी, मैं नहीं जनता हूँ |  इस दौर में बहुत लोग अभिव्यक्ति की आजादी का अलाप जप रहे है |  तो मुझे भी संविधान के धारा  19  क...