मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

मेरा बचपन लौट आया ! ( गणिनाथ साहनी )

मेरा बचपन लौट आया !
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मेरा बचपन लौट आया !
यह कहते हुए उनकी आँखे भर आई,
अनायास एक वाक्य निकला
बड़ी लम्बी जुदाई।

समवयस्को का दीदार
बड़ी मुद्दत पर हुआ है,
कमाया या गमाया इसका ज्ञान
बड़ी शिद्दत से हुआ है।

देखते ही हमउम्रो को
ताजी हो गई भूलि-बिसरी यादें
शायद वक्त कुछ बदल गया है,
तब होते थे हाथ मे गुल्ली-डंडे
अब उसका विस्तार होकर
वही लाठी बन गई है।

बहुत दिनों बाद आएं हैं वो गाँव में
मिडिल तक यहीं पढ़े थे पेंठिया पर के स्कूल में,
खेले थे बालमित्रो के संग दोलापाति,
कबड्डी, गुल्ली-डंडा पुराने बरगद की छाँव में।

थक गई है आँखे
देखकर दुनिया की चातुरी-चकाचौंध।
बीतगए कितने मधुमास
न सुनी कोयल की कूक
न चिड़ियों की चहचह।
सुनता रहा सायरन
गाड़ी की पों पों, पी पी की आवाज।

साथ में आया था उनका बेटा
घुमाने गाँव।
कुछ ही देर में करने लगा
लौटने की तैयारी।
वृद्धइच्छा पर युवाइच्छा पड़ी भारी।

वह बूढ़ा कुछ ही पल में
अपनी पूरी जिन्दगी जी लिया।
मन ही मन सिसकियाँ भरकर
फटे हृदय को सी लिया।

पथराई आँखे और थके पाँव
अब शहर लौटना नही चाहते।
पर ....  .... अलविदा ! अलविदा !
अपने धूल-कण पर
चलना सीखाने वाली धरती माँ।
अब शायद मिलन न हो सकेगा !

          - गणिनाथ सहनी, रेवा ( मुजफ्फरपुर, बिहार )

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