मंगलवार, 11 मई 2021

आप हिन्दू मुस्लिम राजनीति करते है?

जवाब मेरे सलाह से आपको कुरान शरीफ पढ़ना चाहिए क्यों कि हिन्दू-मुस्लिम विवाद BJP के जन्म से पहले से है। और अधिक भयावह भी, वीभत्स भी। 
इस्लाम जबतक अपने मूल ग्रंथ कुरान में परिवर्तन नहीं करता तब तक वह ऐसे ही दुनिया से लड़ता रहेगा, इसलिए इंसानी जिंदगी की कीमत है तो कुरान से वह सब आयतों को हटाया जाये, जो केवल ख़ुदा को मानने वाले को ही जन्नत नशीब होता है यह कहता है और सभी धर्म के भगवान को शैतान मानता है, उनके पुजक को काफ़िर कहता है और इन काफिरों की हत्या से जन्नत नशीब होता है यह मानता है। पहले ऐसे विचार को खत्म करना होगा  हमने धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता मानवता और  विज्ञानवाद के लिए भी। उन आयतों को बदलने की मांग को जोड़ शोर से बोलना होगा जिसे वसीम रिजवी ने कुछ दिन पहले कहा है? 
हम हिन्दूओं की सोच संकीर्ण है या हिन्दू हृदय ऐसा ही रहा अबोध अविवेकी, भविष्यहीन। जो सिर्फ लालच पैसा और मोह में फंसा है, क्या किसी मुस्लिम को देखे है, देश के तरक्की रोजगार शिक्षा के लिए वोट करते? नहीं! वो सिर्फ उनके साथ है, जो उनको अल तकिया जिहाद करने देते है, लव जिहाद करने देते है, लैंड जिहाद करने देते है

और शरिया कानून के नाम पर औरतों को तीन तलाक , चार विवियाँ और चौदह बच्चे पैदा करने देते है। 
हम हिन्दू वास्तविक जानकारी से परे अविवेकी कुतर्क से घेरे है और अपने आप का पीठ थपथपा रहा है कि हम हिन्दू मुस्लिम राजनीति में नहीं पड़ते है बुद्धिजीवी है। हमने देश की तरक्की रोजगार से मतलब है अरे भाई यह देश रहेगा तो मरेगा कौन! और यह देश मिटेगा तो बचेगा कौन! इतनी मामूली सी बात नहीं समझ आती है। आपकी शक्ति क्या है, जिसके बल पर हम वो सब पा सकते है जिसकी हमने जरूरत है, क्या वो केवल शिक्षा है? रोजगार है?  बहुत सारे पैसे है? नहीं! वो हमारा देश है। जब तक यह सुरक्षित है, वो सबकुछ हम अपने बलबूते खड़ा कर सकते है, जिसकी हमने कभी कल्पना की थी। इस देश के प्रत्येक हिन्दू को इस राष्ट्र की सुरक्षा किन हाथो में है ऐसे लोगों का पक्षघर बनाता चाहिए। इतिहास में की भूल से सीखकर वतर्मान और भविष्य ठीक करना चाहिए। 
लेकिन सिर्फ नौकरी और मंहगाई के नाम जब हम निर्णय लेते हैं? और वर्तमान समस्या को केवल हिन्दू मुस्लिम की राजनीति कहकर पल्ले झड़ते है और बडी बडी बाते छोड़ते है तो इस दशा को देखकर गुस्सा कम और उन हिंदुओं पर तरस अधिक आता है। उनकी भी यह मनोदशा तब तक है जब तक उनके यहाँ मुस्लिम 70 प्रतिशत नहीं होते है, होते ही मेरी बाते यथार्थ और परम् सत्य नजर आएगा। किंतु तब आप कश्मीरी हिन्दू की तरह बहन बेटियों को उनके हवाले छोड़कर भागने या बलिदान होने के अलावे कुछ नहीं कर सकते। यही बात पाकिस्तान के प्रथम कानून मंत्री योगेंद्र मंडल तब नहीं समझे थे और लाखों दलितों को पाकिस्तान में छोड़कर बंगाल में शरण लेकर रहे और गुमनाम मौत को स्वीकार किया। जिन्दगी भर नीम-भीम की, के कारण गुमनाम सजा काटी।  किन्तु उनके कारण जो लाखों दलित हिन्दू वहां फंस गए वो आज तक अपनी बहन बेटी को सुरक्षित नहीं कर पा रहे है। उन्ही दलित हिंदुओं में कुछ छिपते छिपाते भारत आये किन्तु यहां भी वह ऐसा ही जीवन व्यतीत कर रहे नागरिकता नहीं होने के कारण कोई सरकारी लाभ नहीं, नौकरी नहीं, उनके बच्चे अशिक्षित है। जब उनकी इस दुर्दशा को दूर करने से लिये किसी राष्ट्रपुरुष का स्वाभिमान जागृत हुआ तो उसने CAA लाया। जिससे किसी को कोई मतबल नहीं है क्यों कि जिसे हम नागरिकता दे रहे है वो पहले है यहां रह रहे है। फिर भी इन दानवी जिहादी प्रवृति के मुस्लिम और कुछ आधुनिकतावादी लोगों को यह बात अपच हो रहा है। ऐसे आधुनिकतावादी हिन्दू पर हमने तरस आता है।  हमें मोदी प्रधानमंत्री नहीं बल्कि एक अवसर मिला है इस अवसर को पहचानिए इतिहास केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं अपितु वर्तमान और भविष्य में वह गलती दोहराई न जाये इसके लिए भी पढ़ना चाहिए। मेरी इच्छा तो यही है और कोई योगेंद्र मंडल न बने...

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

अंधा गांव में कनहा राजा है नीतीश कुमार।

जितेश कुमार
पत्रकारिता छात्र
हमर बिहार में बहुत लोकप्रिय लोकोक्तियां बा अंधा गांव में कनहा राजा। आज से लगभग 15 साल पहले बिहार के राजनीति पर विचार करते है तो यह उपयुक्त लोकोक्तियां सटीक साबित होती है। 
हम बात कर रहें है, भजपा-जदयू गठबंधन 2005 की। जब पहली बार बिहार में भजपा-जदयू गठबंधन की जीत हुई थी और NDA के नेता श्री नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया गया था। राजद गठबंधन की सरकार से जनता का मोह भंग होने के कारण, जनता ने अपना मत राजद के विरुद्ध में दिया था और NDA की जीत हुई और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने। बिहार के लोगों
को अपने भावी मुख्यमंत्री के बहुत आशा थी, बिहार की गणना बीमारू राज्य में होती थी। नीतीश कुमार ने प्रथम कार्यकाल मैं कुछ करणीय कार्य किये जैसे राज्य मार्ग को दुरूस्त किया और बिजली के खंभे गांव-गांव तक पहुंचाये। पक्के स्कूलों तथा आंगनबाड़ी केंद्रों (समुदाय भवनों) का प्रत्येक पंचायत में निर्माण करवाया। किन्तु शिक्षा और रोजगार का कोई कार्य बिहार में इन्होंने नहीं किया। केवल आश्वासन ही बिहार के युवा पीढ़ी के हाथों में लगा। फिर भी जनता ने राजद से बेहतर कार्य करने का पुरस्कार दिया। दूसरे कार्यकाल में भी नीतीश कुमार बहुमत साबित करने में सफल रहें और लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। कहते है ना जब गोकुल को श्री भगवान कृष्ण ने इन्द्र के प्रकोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाया तो कुछ लोग ऐसे थे जो लाठी पर्वत से अड़ा कर खड़ा कर दिये और अपनी महिमा मंडन करने लगे कि यह करिश्मा को वो अपने बलबूते किये है। ठीक ऐसा ही धमण्ड नीतीश बाबू में आया (दूसरा कार्यकाल) वो राजद के विरुद्ध मिलेने वाले वोट को अपनी प्रसंशा और लोकप्रियता समझने लगे और सत्ता के मदहोशी को संभाल नहीं सके। अपने आप को प्रधानमंत्री के भावी उमीदवार समझने लगे। किन्तु उसी समय गुजरात के कदावर और लोकप्रिय मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी प्रधानमंत्री बनने के लिए देशभर में जगह-जगह सभाएँ की और काँग्रेस के विरुद्ध उठ रहे आवाज को व्यापी बनाने में सफल रहें और प्रखर नायक ईमानदार छवि और कट्टर हिन्दू समर्थक राष्ट्रवादी नेता के रूप में अपनी छाप छोड़ने में सफल हुए, मोदी ने नीतीश कुमार के प्रधानमंत्री बनने के सपने पर पानी फेर दिये और मोदी के इसी सफलता को देखते हुए भजपा को अपने कदावर नेता लालकृष्ण आडवाणी को साइड कर उनको प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करना पड़ा। और अंततः 2014 में पूर्ण बहुमत के NDA की जीत हुई और मोदी  प्रधानमंत्री बने। लेकिन नीतीश बाबू खुद को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नहीं बनाये जाने के कारण गठबंधन से अलग हो गये थे और अपना मुख्यमंत्री पद भी इस आन पर त्याग दिया अगर मोदी प्रधानमंत्री बन गये तो वो मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे देंगे और नीतीश कुमार ने ऐसा ही किया जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाये। कुछ ही महीनों में जीतन राम मांझी जब रिमोड कंट्रोल की तरह कार्य करने को तैयार नहीं हुये तो फिर से मुख्यमंत्री पद पर नीतीश कुमार ने कब्ज़ा कर लिया। इस घटना से जदयू में फूट पड़ गई जीतन राम मांझी जदयू से इस्तीफा देकर अलग पार्टी बना लिये यह बात सर्व विदित है। दूसरे कार्यकाल के अंतिम 2 साल को देखे तो इसमें व्यक्तिगत धमण्ड के कारण नीतीश कुमार का इस्तीफा देने का ड्रामा करना और जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाना और फिर अपना नुकसान देखते हुए पुनः षडयंत्र कर मांझी को हटाना, खुद मुख्यमंत्री बनना। यह बात साफ साफ दर्शता है कि जिस मुख्यमंत्री को बिहार के लोगों ने नायक फ़िल्म के हीरो अनिल कपूर के रूप में देखा था। वही अपने अहंकार में 2 साल तक संवैधानिक पद का दुरप्रयोग करता रहा। और फिर 2015 के विधानसभा चुनाव में जिस पार्टी के विरुद्ध जनता  उनको अपना विश्वास मत दिया करती थी और जिस राजद पार्टी के विरुद्ध में नीतीश कुमार दो-दो बार पूर्ण बहुमत से मुख्यमंत्री बने। उसी राजद पार्टी के साथ गठबंधन करके लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बने। किंतु कहते है ना भ्रष्टाचार के महासागर में छोटे छोटे भ्रष्टाचारी का प्रभाव कम होता है तेजस्वी-तेजप्रताप का साथ नीतीश कुमार को नहीं भया। राजद के कार्यकर्ताओं की दादागिरी और गुंडागर्दी से अपना नुकसान देखते हुये। फिर से NDA में शामिल हुये। ऐसे में देखे तो 2013 से 2018 तक केवल अपना कद ऊंचा करने लिए असफल प्रयोग करके बिहार के राजस्व को तहस नहस कर दिया। बिहार में शराब बन्दी हुई, मानव श्रृंखला बना। इसके बावजूद आज बिहार की जनता कहती है, शराब की
दुकान भले नीतीश कुमार ने बंद करवाये किन्तु होम डिलीवरी शुरू करवा दिये।
दूसरा परियोजना नल जल योजना भी फेल साबित हुआ। देखा जाये तो नीतीश कुमार अपने दूसरे और तीसरे कार्यकाल में केवल अपनी छवि चमकने में व्यस्त रहे ऐसे में बिहार की शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार में कोई सुधार नहीं हुई। जो आंगनबाड़ी केंद्र (समुदायिक भवन) इनके प्रथम कार्यकाल में बना था वो भूतिया खण्डर जैसा प्रतीत होता है सच तो यह है कि गांव के बच्चे उधर से गुजरने पर डर जाते है। बिहार में स्कूल की बड़ी-बड़ी दो मंजिला भवन तो बना किन्तु शिक्षा रसातल में पहुंच गई। फिर भी नीतीश कुमार डिंग बड़ी-बड़ी हाकते है। जनता करें भी तो क्या करें एक ओर लालू यादव का जंगलराज याद आता है तो देह सीहर जाता है, शाम होते ही लोग घर के बाहर नहीं निकलते थे, रोज हत्या, लुटपाट, बलात्कार और गुंडागर्दी से जनता को अब तक नीतीश कुमार ही सही लगते थे। कारण साफ है बिहार में  विकल्प नहीं। 
देखा जाये नीतीश कुमार 3.0 भी उसी जंगलराज के पैटर्न पर ही चल रही है। नीतीश कुमार अब हिन्दू-मुस्लिम तुष्टिकरण और जातपात की राजनीति पर उतर गये है। इनके कार्यालय में शिक्षा चिकित्सा बेरोजगारी गुंडागर्दी लुटपाट बढ़ते जा रहा है जैसा की राजद सरकार के समय था। आज भी बिहार में मुख्यमंत्री के लिए कोई  उम्मीदवार नहीं होने कारण नीतीश कुमार ही है, भजपा में गिरिराज सिंह ने थोड़ी हिम्मत दिखाई थी किन्तु वो भी अभी गठबंधन धर्म के कारण मौन और अलग-थलग पड़ गए है। ऐसे में नीतीश कुमार वैसे ही सत्ता का सुख भोग रहे है जैसे कि उपयुक्त लोकोक्तियां में कही गई है अँधे गांव में कनहा राजा

शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

हिंदुत्व ही मेरा पक्ष है

राष्ट्रीय शक्ति का एकत्रितकरण होकर रहेंगा। आने वाले वर्षों में अपना देश, हमारी मातृ भूमि विश्व मानवता का, विश्व शांति का, विश्व समृद्धि का, विकास और प्रकृति संरक्षण का, मनुष्य ही नहीं, बल्की मोमिन और यीशु के बच्चे को भी मानवीय संभ्यता का पाठ पढ़ाने वाला है। वर्तमान का यह वर्ष 2020 एक युग सन्धि का दशक है। भारत समस्त आसुरी शक्तियों को नष्ट करके,
दुनिया में वैदिक धर्म, सनातन धर्म अर्थात हिन्दू धर्म की भगवा पताका लहराएगा। इससे पहले भाइयों कई प्रकार से ये आसुरी शक्तियां हमारे दैवीय कार्य में विध्न बाधा उतपन्न करने का प्रयास करेगी। हम जिन बिंदुओं पर कमजोर है वहां पर इन राक्षसी प्रवृति वाले प्रहार करेंगे। आज हम सब यही संदेश लेकर जाये हमनें जो भूले अब तक कि है। उसे कोसने का वक्त नहीं, उस पर भाषण देने का समय नहीं। यह समय है उन भूलों, उन दोषों का निराकरण करने का, उन पर विजय पाने का। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 1925 से यही कार्य में लगा है हिंदुओं का संगठन। और यही मूल मंत्र को गाते हुए आगे बढ़ रहा है -
                                हिन्दव सोधरा सर्वे, न हिन्दू पतितो भवे।
                               मम दीक्षा हिन्दू रक्षा, मम मंत्र समानता।।
अपने लक्ष्य के लिए सेतु के निर्माण में लगा है। हम सब  जानते है, जब त्रेता में भगवान राम का अवतार हुआ, तो उन्हें रावण जैसे वैश्विक आंतकी से युद्ध करना पड़ा। उससे पहले युद्ध की तैयारी होती है। भगवान राम जिस स्थान पर रुके थे जहां से रावण ने मां जानकी का अपहरण किया था, उससे कुछ दूरी पर ही उनके मामा का राज्य था, किन्तु भगवान ने उनकी सहायता नहीं ली, वो अयोध्या से चतुरंगी सेना मंगवा सकते थे। किंतु श्री राम ने यह भी किया। किया क्या वनवासियों, दलितों और वानरों की सेना का निर्माण किया। उन्हें प्रशिक्षण दिया और रावण जैसे अत्याचारी के वध के लिए तैयार किया। दोस्तों हमें भी ऐसे ही राम सेना का निर्माण करना है वह सेना कहाँ है वह सेना गांव में, तमान अभावग्रस्त पीड़ित वंचित समाज है खेतिहर किसान मजदूर है, जिसके पेट में अन्न नहीं शरीर पर वस्त्र नहीं। यही से भारत जागेगा हमें उनका संगठन करना है। इसलिए एक रणयुद्ध की तैयारी के लिए हमें बाजीराव पेशवा, मिहिर भोज, राणा सांगा, महाराणा प्रताप और शिवजी महाराज की भांति एक दिन में 16-16 घण्टे तक कठोरतम तप कर उनका संगठन  करता है। उनको प्रशिक्षित करना, उनको स्वावलंबी करना है, जिससे कोई यीशु का बच्चा पादरी, या कोई मोमिन मौलाना उसे पैसे, बल या छल किसी रूप में धर्म परिवर्तन न कर सके। आज हमने यह प्रतिज्ञा को दुहराना होगा हम हिन्दू है, सम्पूर्ण हिन्दू समाज तुलसी के पत्ते के भाँति पवित्र है। उसके आकर से उससे गुण नहीं बदलते है। सारा समाज अपना है हम सारे समाज के है। 

गुरुवार, 16 जनवरी 2020

सेवा बस्ती में RSS ने मनाया मकर संक्रांति

मकर संक्रांति के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक 
संघ ने सेवा बस्ती में दलित, पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जनजातिओं और 2008 के भीषण कोशी बाढ़ के बाद अपना घर-बाड़, जमीन संपति को छोड़कर पुनर्वास में निवास कर रहे। उन सभी अभावग्रस्त समाज के बीच समरसता उत्सव के रूप में मकर संक्रांति को मनाया। इस अवसर पर आरएसएस के सुपौल जिले के सहसंचालक मान्यवर संतोष अग्रवाल जी उपस्थित रहे। जिले के कार्यवाह श्रीमान आदित्य झा जी, सेवा प्रमुख राजेन्द्र जी, सहसेवा प्रमुख रामनरेश कौशिकी जी, जिला बौद्धिक प्रमुख बालकृष्ण जी, जिला महाविद्यालयिन प्रमुख संजीव कुमार सोनू, नगर कार्यवाह श्रीमान विकास जी, संपर्क प्रमुख मणिकांत श्रवण जी, व्यवस्था प्रमुख रजनीश जी, बाल प्रमुख विवेक जी और नगर के स्वयंसेवक बन्धु उपस्थित रहें। मकर सक्रांति उत्सव संघ के छः प्रमुख उत्सवों में एक है। संघ इसे समरसता उत्सव के तौर पर अपने स्थापना के बाद से ही मानता आ रहा है। मुख्यरूप से संघ इसे अस्पृश्यता के विरूद्ध सामाजिक क्रंति के रूप में मानता है। ऐसे वंचित समाज जिसे समाज ने वर्षों के अछूत कह के उनका मानभंग किया, उनका तिरस्कार किया हो, संघ ऐसे वंचितों के बीच मकर संक्रांति जैसे कई कार्यक्रम एवम उत्सवों का आयोजन करता है। संघ के सभी स्वयंसेवक चाहे वो किसी भी वर्ग के हो, सहज समर्पित और उत्साहपूर्वक बिना किसी पूर्वाग्रह के इसमें भाग लेते है। अब तो संघ के प्रयास से समाज के सज्जन पुरुष भी ऐसे उत्सवों, कार्यक्रमों के माध्यम से सेवा को स्वीकार करके उनके तरफ हाथ बढ़ाना शुरू किया। इसके पीछे संघ के स्वयंसेवक तपस्या रही है। शाखा के माध्यम से पहले खेल-खेल में संघ के स्वयंसेवक पक्का हिन्दू बने। जिनका ध्येय हिन्दू धर्म, हिन्दू राष्ट्र और हिन्दू समाज का सर्वांगीण विकास रहा है। उन स्वयंसेवकों ने अपने आचरण व्यवहार कृतत्व से समाज में एक विमर्श को जन्म दिया। जिसने आज इस समाज विरोधी अस्पृश्यता को बहुत हद तक समाप्त कर दिया है। इस बार भी संघ के सुपौल नगर के स्वयंसेवकों ने मकर संक्रांति उत्सव के लिए ऐसे ही बस्ती का चयन किया जहां वंचित समाज की बहुलता थी,अमठो ख़रेल पुर्नवास और झकराही। झकराही में यह कार्यक्रम सुबह 8:30 से प्रारंभ हुआ और अमठो में 2:00 बजे से। अमठो में जिले से सेवा प्रमुख राजेन्द्र जी ने कहां कि मकर संक्रांति पर्व हिन्दू समाज की मूर्खता नहीं, दुनिया को अपने महान धर्म की ज्ञान शक्ति, वैज्ञानिकता का एक परिचय है। सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर रहा। यह बात हजारों वर्ष पहले भारतीय मनीषियों ने बताया दिया था, जबकि कुछ वर्ष पहले दुनिया को यह ज्ञान हुआ। उन्होंने ये भी कहा इस पर्व को हिन्दू समाज दुनिया के चाहे किसी भी कोने में निवास करता हो बड़े हर्षोल्लास से मनाता है। तिल और गुड़ हमारे समाज के सामाजिक एकता बंधुत्व का परिचय है। यह परिचय है, सम्पूर्ण हिन्दू एक है। लाख विविधता के बावजूद एकता के सूत में ऐसा बँधा है जिसके बंधन को हजार वर्षों तक विदेशी शक्तियों ने काटने का प्रयास किया, किन्तु असफल रहा। हम सामज से शिक्षित लोग, सज्जन लोग आज ऐसे बस्तियों में जहाँ राम और रोटी एक साथ रहते है, नहीं पहुंचे, उनको गले नहीं लगाए तो वो उदासीन हो जाएंगे फिर समाज बांटने की संभावनाएं बढ़ सकती है। क्यों कि आज विदेशी ताकते ऐसे लोगों के बीच धन बल छल से हिन्दू समाज से अलग करने में लगी है। इसलिए हमनें और शक्ति से इनके बीच अपना विस्तार करना होगा। इससे संपर्क करना होगा। उन्होंने ने ये भी कहा आज के उत्सव से ग्रामीणों में संघ को लेकर एक आशा का स्वरूप का दिखा है हम इसे हर सम्भव पूरा करेंगे। 
भारत माता की जय!

रविवार, 15 दिसंबर 2019

CAB को लेकर साजिश; मीडिया डरी हुई


Jitesh kumar

Image result for CONGRESS पहले जिहादियों, बंगलादेशी और अब कांग्रेसियों का डर| सभी प्रकार के संवैधानिक प्रकिया के बावजूद महामहीम राष्ट्रिपति के हस्ताक्षर होने के उपरांत नागरिकता संशोधन बिल पास हुआ है| राज्यसभा में विधेयक के पक्ष में 125 जबकि विपक्ष में 99 वोट पड़े है| गृहमंत्री अमित साह ने राज्यसभा में विधेयक को पेश किया, जिस पर 6 घंटे बहस के बाद अमित साह ने सदन में विधेयक से संबंधित जवाब दिये| इसके बावजूद राज्यस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार पार्टी के हाईकमान का आदेश मानेंगे| क्या सोनीया गाँधी और राहुल गाँधी का निर्णय देश के संविधान से बड़ा है? इतने बड़े संविधान विरोधी मुद्दे को मीडिया दबा रही है, कारण क्या हो सकता है दलाली या डर? कुछ मीडिया संस्थानों को छोड़कर किसी ने CAB के बारे में सही जानकारी जनता को नहीं दिया है ये मीडिया घराने डिबेट के नाम पर देश को गुमराह कर रहें है| कानून की जानकारी रखने वाले बुद्दिजीवी, प्रोफ़ेसर, वकील, जज से इसके बारे में वास्तविक जानकारी साझा करनी चाहिए जिससे बिल के बारे में जनता को ठीक जानकारी मिले| किन्तु TRP और राजनितिक के चक्कर में डिबेट के नाम पर देश में मतभेद के बीज बोये जा रहे है| किसी ख़ास घटना पर मीडिया का हो-हल्ला और किसी घटना पर चुप्पी?


गुरुवार, 5 दिसंबर 2019

शिवसंहिता योग की पुस्तक

Image result for योग
शिवसंहिता योग से सम्बन्धित संस्कृत ग्रन्थ है। इसके रचनाकार के नाम के बारे में पता नहीं है। इस ग्रन्थ में शिव जी ने  पार्वती को सम्बोधित करते हुए योग की व्याख्या कर रहे हैं। योग से सम्बन्धित वर्तमान समय में उपलब्ध तीन मुख्य ग्रन्थों में से यह एक है। दो अन्य ग्रन्थ हैं - हठयोग प्रदीपिका तथा घेरण्ड संहिता है। शिव संहिता में पांच अध्याय है इसमें ज्ञान का वर्णन है भगवान शिव दूसरे अध्याय में नाड़ी संस्थान का वर्णन करते हैं तीसरे अध्याय में पांच प्राण उप प्राण का वर्णन करते हैं व प्राणयाम का वर्णन करते हैं चौथा अध्याय मुद्रा प्रधान है व साधक की घट परिचय निष्पत्ति आदि अवस्था का वर्णन करते हैं पांचवे में 200 से अधिकश्लोक हैं इसमें साधक प्रकार व सप्त चक्रों विस्तृत वर्णन है। प्रथम अध्याय अद्वैत वेदान्त को सार रूप में प्रस्तुत करता है। दूसरे अध्याय में नाड़ी जाल का वर्णन है उसमें अन्यसे अलग साढ़े तीन लाख नाडीयों का वर्णन है। व 15 अन्य मुख्य नाड़ियां बताई गई हैं तीसरे अध्याय में प्राण अपान व्यान आदि पांच प्राण नाग कूर्म आदि पांच उपप्राण वर्णित हैं फिर कुम्भक सहित अनुलोम विलोम प्राणयाम के 4 प्रहर के अभ्यास के लिये कहा गया है फिर पदम् आसन आदि पांच आसन बताएं हैं में दस मुद्रामहा मुद्रा महाबंध उड्डियान आदि बंध विपरीत करनी खेचरी आदि को विस्तार से वर्णन किया पांचवे अध्याय में साधक के प्रकार अनुसार प्राप्ति में लगने समय विधि बताया है विशेष कर पांचवे में सात चक्रों का वर्णन हैं फिर कुछ साधारण व चमत्कारी विधियां हैं  शिवसंहिता क्रिया योग व श्रद्धा व विश्वास का समन्वय है व योग का महत्वपूर्ण ग्रंथ जो आजकल अध्ययन किया जा रहा है।

शनिवार, 16 नवंबर 2019

साध्वी प्रज्ञा का जीवन

जितेश कुमार
बीते लोकसभा चुनाव, 2019 में मैं भोपाल था। तब मैंने लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया, मीडिया संपर्क तथा कई नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से चुनाव प्रचार को करीब से देखा, उसमें भाग लिया। साध्वी प्रज्ञा दीदी के चुनाव प्रचार में  उनके साथ प्रचार में शामिल रहा। मैं देख रहा था कि वैसे तो भोपाल भारत का भौगोलिक केंद्र पहले से ही था परंतु साध्वी प्रज्ञा के चुनाव में उतरने से भोपाल भारतीय लोकतंत्र के निर्णायक जनादेश का केंद्र बिंदु बन गया है।   
भगवा आतंक तथा हिन्दू आतंकवाद जैसे शब्दों के जनक, आतंकी को अफजल जी, मौलाना जी पुकारने वाले, उसकी हत्या पर आंसू बहाने वाले कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह चुनावी मैदान में जैसे उतरे। साध्वी प्रज्ञा ने राजनीति में उतरने में देर नहीं की। जिस प्रकार वर्ष 2008 में मालेगांव धमाका में उनको फंसाया गया और घोर यातनाएं दी गई।
इन सबके पीछे दिग्विजय सिंह का हाथ रहा था। ऐसे में साध्वी प्रज्ञा लोकसभा क्षेत्र भोपाल से भाजपा की प्रत्याशी के रूप में चुनाव में खड़ी हुई तो देश-दुनियां के मीडिया, नेता, यहां तक की आम जनता ने इसे चुनाव मात्र नहीं समझा, यह तो धर्म युद्ध था। हिंदुओं को आतंकी कहने वाले दिग्गी के सामने सनातनधर्म की सन्याशनी चुनाव लड़ रही थी और यह तय था कि साध्वी प्रज्ञा के राजनीति में उतरने से केवल भोपाल ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारतवर्ष में राजनीति का परिष्करण एवं परिमार्जन होने जा रहा था। 
भिंड जिले की लहार तहसील की रहने वाली प्रज्ञा सिंह ठाकुर का जन्म 2 फरवरी, 1970 को मध्यप्रदेश के दतिया जिले में हुआ था। उनके पिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। यही कारण था कि बाल्यकाल से ही प्रज्ञा का रुझान राष्ट्र और समाज कार्य की ओर रहा। सामाजिक संवेदनशीलता उन्हें अपने सामाजिक दायित्व के प्रति सजग, सचेत और संकल्पित करती रहीं। वह किसी न किसी रूप में समाज को अपना योगदान देती रहीं। अल्पआयु से ही उनकी लेखनी से कविताएं और गीत फूटने लगे। उनकी रचनाओं के केंद्र में राष्ट्र ही रहता था। सनातनी मूल्यों ने उनके व्यक्तित्व का श्रृंगार किया। वे वास्तव में अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति हैं। वर्ष 1987 में जब वह नवमीं कक्षा में थी तब उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की सदस्यता प्राप्त की लगभग 15 वर्षों तक सक्रिय रहीं। प्रारंभिक सदस्यता के बाद साध्वी शीघ्र ही नगर इकाई की प्रमुख बन गई फिर जिला इकाई और उसके पश्चात पूर्णकालिक के रूप में विदिशा और भिंड की विस्तारक रही। बाद में भोपाल और उज्जैन से संगठन मंत्री रही। उनके कार्यों को देखते हुये। कुछ ही वर्षों में उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में स्थान मिला। दुर्गा वाहिनी में भी उनकी सक्रिय भूमिका रहीं। इसी दौरान उन्होंने उज्जैन में वर्ष 1996 में प्रज्ञा उत्क्रांत सामाजिक संस्थान की स्थापना की और इसके माध्यम से परिवारिक विवादों में मध्यस्थता करते हुए समस्याओं का निराकरण किया। भारतीय संस्कृति में दृढ़ आस्था होने के कारण वो समझने और समझाने लगी कि वर्तमान परिवारिक विघटन और विखंडन के मुख्य कारण व कारण क्या है? उनकी सेवा कार्य का शनै: शनै: विस्तार होता गया। उसमें नये आयाम जुड़ते गये। वर्ष 1998 में उन्होंने भिंड जिले में जय वंदेमातरम सामाजिक संस्थान की स्थापना की और उसकी राष्ट्रीय अध्यक्षा रहीं। खेल में उनकी रुचि बचपन से ही प्रगाढ़ रही। कालांतर में वे कबड्डी की स्टेट प्लेयर बनी और आत्मरक्षा के आशय से उन्होंने कराटे की शिक्षा प्राप्त की और ब्लैकबेल्ट बनी। उन्होंने महिला सुरक्षा के लिए भी काम किया। गृहनगर लहार में छात्राओं के लिए अलग से सेंटर कॉलेज और महाविद्यालय बने इसके लिए उन्होंने वर्ष 1990 में सफल जनान्दोलन किया और सरकार से स्वीकृति प्राप्त कर उन्हें खुलवाया। 
राष्ट्रीय सेविका समिति की सदस्यता के रूप में उन्होंने चुनाव संबंधित कार्य में भी अपना कौशल दिखाया। वर्ष 2002 के गुजरात विधानसभा चुनाव में उनकी सक्रिय भूमिका को सराहा गया। उन्होंने संकल्प लिया और अपने समिति संसाधनों से वे सश्रम सेवा कार्य में जुट गई। सेवा से मिलने वाले आनंद की अनुभूति व्यसनादि से अधिक मादक होती है। समय के साथ सेवा ही सेवक का स्वभाव बन जाता है। सेवा की यात्रा में स्वत्: दुर्लभ मनीष संत मिलने लगते हैं और सेवा कार्य के आयाम विकसित होने लगते हैं। वर्ष 2007 में ऐसा ही हुआ अवसर था अर्धकुंभ का और स्नान प्रयागराज। जूनागढ़ अखाड़े के महामंडलेश्वर परमपूज्य स्वामी अवधेशानंदगिरी जी महाराज से उन्होंने संन्यास की दीक्षा ली और पूर्ण रूप से सन्यासी जीवन में प्रवर्त हो गई और साध्वी प्रज्ञा बन गई। 
संघ के प्रभाव तथा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अनुभवों से साध्वी का आत्मविश्वास और दृढ़ होता गया। उन्हें लगने लगा कि राष्ट्रहित में अच्छा कार्य करने की आवश्यकता तो है ही साथ ही  असीम संभावनाएं भी है और वे उस पथ पर बढ़ चली। कभी सामूहिक रक्तदान, कभी गौसेवा के प्रकल्प तो कभी महिला सुरक्षा के उपकरण। वे धीरे-धीरे आयुर्वेद, योग, ध्यान और अध्यात्म के रहस्य व उनसे मिलने वाली चमत्कारिक लाभों से भी समाज को जोड़ने का प्रयास करने लगी। 
साध्वी प्रज्ञा एक प्रखर वक्ता थी जब वह राष्ट्रवाद और समाज की कुरीतियों पर अपना मंतव्य मंच से व्यक्त करती थी। तो वहां बैठे लोगों के हृदय में क्रांति की ज्वाला भड़क उठती थी। धीरे-धीरे साध्वी प्रज्ञा हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के साथ-साथ महिला की भी ब्रांड एमेस्टर बन गई। और यह बात कुछ तथाकथित ढोंगी लोगों को रास नहीं आया। 
यही कारण था कि वर्ष 2008 में एक प्रायोजित षड्यंत्र के तहत मालेगांव मस्जिद में हुये बम विस्फोट में उनका नाम जोड़ा गया। कुछ कुत्सित राजनीतिज्ञों ने अपने आकाओं के निर्देश पर राष्ट्रद्रोह का बिगुल फूंक दिया। उस ह्रदय विदारक कालखंड की यातनाएं एवं प्रताड़नाओं के स्मरण से ही आंसू टपकने लगते हैं। साध्वी प्रज्ञा को तुरंत स्पष्ट हो गया कि देश और सनातन धर्म के शत्रुओं ने उन्हें मोहरा बनाया है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में शांति प्रिय हिंदू समाज पर सबसे बड़ा हमला बोला गया था। गद्दार, हिंदू समाज पर लांछन लगा रहे थे। गद्दारों के सरगना ने तो भगवा आतंक और हिंदू आतंकवाद जैसे अपशब्दों से भारत भूमि और हिंदू धर्म को अपूर्णक्षति पहुंचाने का अक्षम्य अपराध किया था। साध्वी प्रज्ञा को तोड़ने के लिए उन्हें जेल में भयंकर यातनाएं दी गई। ज्ञात भारत के इतिहास में जिस प्रकार से जेल में साध्वी प्रज्ञा को यातनाएँ दी गई, इसका कोई दूसरा इतिहास नहीं। जेल में कई पुलिसकर्मी एकसाथ मिलकर उनको बेल्ट और जूते से तब तक मरते रहते थे जब तक वो बेहोश नहीं हो जाती थी। होश में लाने के लिए उन पर गर्म पानी फेंका जाता था फिर वही बेल्ट, जूतों यहां तक कि सिगरेट से उनके शरीर को जगह-जगह जलाया जाता था, उनको उठाकर जेल के दीवारों पर फेंका जाता था। उन्होंने बताया कि इसी बीच जेल एक दिन उनसे मिलने ढोंगी सन्यासी जिसकी आजकल अत्र-तत्र, सर्वत्र पिटाई होती रहती है, स्वामी अग्निवेश आये। उन्होंने कहा कि आप मालेगांव बम धमाके में अपना जुर्म कबूल करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख के इशारों पर ऐसा किया यह बयान दे। जेल में आपसे कोई मारपीट नहीं होगी। उल्टे आपको सभी प्रकार से सुख-सुविधा दिया जायेगा। जल्द ही आपकी रिहाई हो जायेगी। परंतु बचपन से ही साध्वी प्रज्ञा में राष्ट्रवाद की भावना कूट-कूट कर भरी थी। वो हिंदुत्व को कैसे लांक्षित कर सकती थी। उन्होंने इस प्रस्ताव को अस्वीकार किया और सहज ही अपने लिए कष्ट के दिन मांग लिए। लेकिन समय ने करवट ली। 2014 के चुनाव ने देश के राजनीति को बदल दिया। नरेंद्र मोदी की सरकार आयी। उस समय गृहमंत्री रहे राजनाथ सिंह ने साध्वी प्रज्ञा पर लगे आरोप की जांच के बाद उनको दोषी नहीं साबित होने के स्थिति में उन्हें छोड़ दिया गया। इस अग्नि परीक्षा से साध्वी प्रज्ञा बेदाग बाहर निकल गई। 
जब भोपाल से दिग्विजय सिंह चुनाव में उतरे तो विरुद्ध में साध्वी प्रज्ञा सामने खड़ी थी। उन्हें अपार जनसमर्थन मिला। साध्वी प्रज्ञा के चुनाव में उतरने से भोपाल लोकसभा सीट ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। चुनाव प्रचार के दौरान भोपाल में मैंने जो दृश्य देखे। सच में यह धर्म और पाप की लड़ाई थी। सौभाग्य से साध्वी प्रज्ञा को प्रचंड बहुमत से विजयी मिली।

कांग्रेस की निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में भारी गिरावट के पूर्वानुमान

भविष्य में क्या होंगी, मैं नहीं जनता हूँ |  इस दौर में बहुत लोग अभिव्यक्ति की आजादी का अलाप जप रहे है |  तो मुझे भी संविधान के धारा  19  क...