मंगलवार, 28 अगस्त 2018

तुझमें मैं हूं! - जितेश सिंह

तुझमें मैं हूं! 

जितेश राजपूत 

अ.बि.वा.हि.वि.वि.

,भोपाल 


मेरी सांसो में 

जिन्दा तू आज भी! 

तुझमें मैं हूं

तेरी आँखों में मैं 

जिन्दा आज भी 

लम्हा प्यार वाला

बीत गया, 

फिर भी प्यार का, 

ऐहसास आज भी 

तुझमें मैं हूँ... 

थिरकते ओठो के बीच

मैं आज भी, 

वो गीत और मस्ती 

आज भी 

तेरे साथ मेरी फिल्मी दुनिया

वो आज भी

तुम आज भी 

मेरे सपनो में आती हो 

क्यू आँखे बंद रहती है 

जब तुम पास आती हो

नींद के गहराई में जिन्दा 

तू आज भी 

दिन के ऊजाला में 

एक तू ख्वाब है 

उन ख्वीबों में 

जिन्दा हम दोनों आज भी ...

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

मेरे युगपुरूष अनंत में विलीन हो गये! - जितेश सिंह

चिठ्ठी ना कोइ सन्देश, जाने वो कोन सा देश, कहा तुम चले गये....

15 अगस्त से ही अटल जी की स्वास्थ्य बिगड़ने की खबर आ रही थी| उस दिन देर रात तक न्यूज देखता रहा, मोबाईल से अपडेट लेता रहा| कल 16 अगस्त को



हौसले और सिद्धांत हिमालय जैसे अडिग थे| जिस लोकतंत्र की निष्पक्षरूप उन्होने सेवा की| राष्ट्र सेवा को ईश्वरीय सेवा मानकर उसमें पुरी जिन्दगी झोक डाली हो| वैसे मनुष्य के निर्धन पर राष्ट्र ही नहीं, प्राकृति भी भाव-विभोर हो जाती है| मौसम ऐसी संदेश को प्रचारित कर रही जैसे कोई बड़ा दुःख का पहाड़ टुट पड़ा है| अनजान और अबोध बालक भी अनुभव कर रहा, आज उसकी खुशी और खिलखिलाहट क्यू उसका साथ छोड़ रही है? 


सुबह से न्यूज देख रहा था| पल-पल की खबर पर नजर बनायें हुये था| सुबह से मेरे आंखों को भरोसा था, सब्र की घड़ी में हर पल अटल जी की कविताएं गुंजती रही, उनके भाषण गुंजते रहे| साथ-साथ एक विश्वास भी बना रहा, इतना
विकसित मेडिकल साइंस हो गया है, उन्हें बचा लेगा| भले ही बेड पर ICU में जीवित थे, यही बहुत बड़ी बात थी| 15 अगस्त शाम को अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने लगी| उनके बाद 16 अगस्त सुबह से ही प्रधानमंत्री के अलावे कई अन्य दल के नेताओं का आना-जाना लगा रहा| शाम करीब 5:05 मिनट पर डॉक्टर ने उन्हे मृत घोषित कर दिया| देश पर मानो दुःख का पहाड टूट पड़ा हो| पुरा राष्ट्र स्तब्ध है,  गहरे सदमें में है, क्यकि अटल जी गहरे नींद में चले ग़ये,  जहां से लौट कर कोई नहीं आया| उनसे मेरा कभी किसी उद्धबोधन या कही साक्षात दर्शन नहीं हुआ| टीवी, न्यूज इटरनेट से कही अधिक बड़े-बुजुर्ग,  शिक्षक, समाज से सबसे उस राष्ट्रपुरूष की कहानी सुनते आया हूं| उनकी कविताएं सुनी है|

भारतीय राजनीति में क्षितिज़ के समान विशाल और उदार चरित्र वाले अटल जी एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे| उन्होंने जीवन में जिस पथ को चुना, एक काली कोठरी थी, फिर भी बेदाग निकल गये। अटल जी सिद्धांतों और कर्तव्य की अग्निपरीक्षा को तो पार गये, मगर ज़िन्दगी और नियती से बीच शांत रह गये| आज हम सब को महानायक,  हमारा यूगपुरुष छोड़ कर अनंत में विलीन हो गया| 
यह केवल राजनीति के लिए झटका नहीं, पत्रकारिता,  साहित्यकार, कवि, राष्ट्रभक्त, जन-नायक, मार्गदर्शक, सामाजिक कार्यकर्ता, स्वमंसेवक हर रूप में महानता के शीर्ष पर रहे, एक विराट व्यक्तित्व का निधन है| उनकी रिक्त स्थान की भरपाई करना कई दशकों तक संभंव नहीं है| इस मृत्यु लोक में लोखों जन्मे, लोखों की मृत्यु से आलिंगन हुआ और होता रहेगा, मगर अटल जी जैसा व्यक्तित्व कई दशकों में जन्मते है| 
जिस पथ पर उन्होंने चला, उनके विचार और सिद्धांतों की आवश्यकता है, खासकर आज की राजनीति में| वह परम्परा जिसकी शुरूआत उन्होंने की थी आज उसको गति देने की आवश्यकता है| 
अटल जी की भाषा, शब्दावली ही उनका हथियार और तलवार था,
किन्तु उन्होंने इससे किसी का गला नहीं कटा और ना ही कभी अपना हाथ कटा| अटल जी का मन कोमल जरूर था मगर उनकेआजादी के बाद 16 अगस्त, 2018 की रात सबसे काली रातों में से एक है, जिसने आंधी में दीपक जलाने वाले को अपने अंधकार में समा लिया| अटल यूग का समाप्त हो गये, विचार अमर रहेंगे| जय अटल! जय भारत! जय हिन्दी!

बुधवार, 15 अगस्त 2018

खुशिलाल के छात्र दुखिलाल और मीडिया जन-आशीर्वाद के लोलुप में व्यस्त| जितेश सिंह

आज चौथा दिन भी बीत गया| मामा तो आये नहीं और नहीं आया उनका कोई आश्वासन| खुशीलाल आयुर्वेद संस्थान, भोपाल के छात्र-छात्रा पिछले चार दिनों से अनिश्चितकालीन धरना पर बैठे है| 10 अगस्त को मैं अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी वि.वि., भोपाल आने-जाने समय धरना पर बैठे छात्र-छात्रों को देखा और अनदेखा करके चलते बना| मुझे लगा अक्सर छोटी-छोटी बातों पर घर की तरह रूठने वाली बीमारी अभी तक पीछा नहीं छोड़ी होगी| वास्तविता को समझे बिना बात-बात पर आन्दोलन करना, धरना पर बैठना आदत बन गयी है| पढ़ने-लिखने के बजाये धरनाबाजी कहाँ तक उचित है? इसे भी आम धरना की तरह सोच कर धिसक गए, क्यूकी मुझे विश्वास था, कल ये सरे लोग फुर्र हो जायेंगे| मैंने अगले दिन भी विवि गया देखा फिर से धरना, थोडा स्वार्थ में घिरा हुआ
था, इसलिए सोचा कहा इस पचारे में घिसता रहूँगा आखिर 1400 किलीमीटर दूर बिहार के मुजफ्फरपुर से आया हूँ| बदनामी भी बिहारी वाली पीछा नहीं छोड़ती है| लेकिन विवि से लौटते समय मुझसे रहा नहीं गया, मैं बस से तुरंत खुशीलाल बस स्टॉप पर उतर गया| कैम्पस में गया, वहाँ के छात्रों से बात की समस्या की लिखित पर्ची मांग लिया| जाते- जाते मैंने कहा "क्या कोई मीडिया वाला इस धरना के बारे में जानकारी नहीं लिया है?" एक छात्र ने निराश होकर कहा "एक दो छोटे स्तर के मीडिया चैनल और प्रिंट मीडिया से नवसीखिए पत्रकार ने दौरा किया है| कोई पेपर या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में खास मामला नहीं बन पाया है|" मैं समझ गया शिवराज के जन-आशीर्वाद में मीडिया भोज का लुप्त उठा रहा| रोज फ्रंट पेज पर शिवराज और कमलनाथ के आलावे मीडिया को कोई दिखता कहाँ? छात्र चार दिन से परेशान है, धारना पर बैठे है| क्या कोई मीडियाकर्मी है, जो अपने आप को जन-आवाज मनाता है| मैंने खुशीलाल के छात्रों से बात की है, सर बच्चे सच में परेशान हैं| इसकी परेशानी का कारण शुल्क में वृद्धि, आयुर्वेद के डॉक्टरों की बहाली में अनियमितता, इंटर्नशिप कर रहे छात्रों की मानदेय में आपेक्षाकृत कमी है| इसके साथ ही कई ऐसी समस्या जिससे कारण इसमें हतासा है, निरासा है, विरोध से स्वर है, दुःख की झलक है, भविष्य की दरकार है| इनके आवाज राजनीति नहीं, तो क्या आप प्रकाशित करेंगे? इसके कुछ पैसे नहीं मिलेंगे, हो सके तो उलटे कोई सरकार के तरफ से फोन काँल आ जाए| देश को पत्रकार की

जितेश सिंह
अ.बि.वा.हि.वि.वि.,भोपाल

आज भी तलास है, यहाँ कोई पत्रकार है, जो इस चार दिनों से विद्यार्थियों के संघर्ष का आवाज बन कर शिवराज तक पहुंचा सके| अपील भी है और गुजारिश भी, हमें इनका साथ देना चाहिए| इसका हम विश्वास और आशा का एकमात्र सेतु है| कहते है, विद्यार्थी अवसर है, राष्ट्र का| तो कभी अवसर को भी अवसर दीजिए| इसकी भी समस्या गंभीर हैं, राजनीति नहीं तो क्या हुआ? इसके समस्या को कभी फ्रंट पेज पर प्रकाशित करे| केवल राजनीति करके जनमानस, जनकल्याण, सूचना और जागरुकता की बात बेकार है|
       

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

स्वमं पूर्वाग्रह का शिकार हूँ! जितेश सिंह

जगजाहिर! हमारा अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल| पिछले तीन महीनें में 35 बार प्रिंट मीडिया ने यहाँ की शिक्षा प्रणाली को कटधरे में खड़ा किया है| मुझे भी पहले लगता था कि मीडिया को बिना आतंरिक स्थिति जाने, कुछ भी पक्ष-विपक्ष तय करना जल्दीबाजी होगी| धीरे-धीरे मैं मीडिया के विचारों से सहमत होने लगा और क्यू ना हूँ? आज 1 वर्ष 17 दिन के बाद मैं पूर्णतया मीडिया का पक्षधर हूँ और यह इसलिए नहीं की मैं पत्रकारिता का छात्र हूँ बल्कि इसलिए मैं हिंदी वि.वि. का छात्र हूँ|

जितेश सिंह
अ.बि.वा.हि.वि.वि., भोपाल

मेरे लिए हिंदी में अध्ययन करना गौरव की बात है| ज्यादा ज्ञानी तो नहीं जो पढ़ा, लिखा, सुना हूँ वही बता रहा; हिंदी में ज्ञान का प्रेम गुड़ छुपा है, अदभुत भाषा है| लोग गुस्से में भी बोलते है " मैं आपकी बात से असहमत हूँ|" एक द्वंद्व में भी शिष्टाचार की कड़ी जोड़ती है, हिंदी| हिंदी केवल भाषा नहीं व्यवहार, शिष्टा, सदाबहार और प्रेमी है| अगर विश्व में सभी हिंदी भाषी होते तो कभी झगड़ते ही है| ऐसी सहिष्णुता हमारी हिंदी है| जिसने पूर्व में कई भाषाओँ को अपने में मिला लिया और उफ़ तक नहीं की| विचारणीय है, ऐसी सहिष्णु हिंदी में आराजकता कहाँ से आई? हिंदी में कोई आराजकता नहीं आई है, बस राजनीति के चपेट में आ गयी| भले ही एक कुशल और अद्वितीय माने-जाने वाले लोकप्रिय प्रधानमंत्री अटल जी भाजपा और संघी थे| हमारा वि.वि. कोई राजनैतिक अटल नहीं शिक्षा रूपी अटल है, जब-जब कोई राजनीति की बाते करेगा तब-तब हिंदी आराजक बन जाएगी| शिक्षा का गोलमाल होना, हंगामा बढेगा और मीडिया आलोचना करेगी| वि.वि. विद्वानों की नीतियों से चालना बेहतर होगा, ना की भाजपा की नितियों से| कारण दो ही नजर आते है; पहला शासन के आगे लाचार और बेबसी, दूसरा व्यक्तिगत स्वार्थ दोनों से लड़ना होगा हमें| किसी की योग्यता प्रथम वर्ष और द्वितीय वर्ष नहीं हो सकती, ना किसी में संगठन की आयु की भूमिका होनी चाहिए| एक पक्ष और भी ना ही किसी सांसद और मंत्री के सेवाकारों को रखा जाना चाहिए, हमें हिंदी के लिए शिक्षाकारों की की जरुरत है| ऐसे नहीं किसी को विभाग की बागडोर दीजिए, जो आपका भी स्तर गिरा दे| ऐसा हो रहा है, किसी भी छात्र को आज संतुष्टि नहीं और कैसे हो कोई पढ़ाने वाला भी तो हो? आज अपनी विभाग की बात करता हूँ, पत्रकारिता विभाग| किसकी क्या भूमिका पता नहीं? परीक्षा विभाग हो या शुल्क विभाग किसी से कोई तालमेल ही नहीं| जवाब बहुचर्चित हैं " मेरा काम यह नहीं" सही में आपका काम यह नहीं, आपकी परिभाषा ही दूसरी है| जब कुछ बता नहीं सकते, पढ़ा नहीं सकते, सिलेबस भी नहीं दे सकते, क्लासे नहीं लगती तो फिर क्यू 75 प्रतिशत उपस्थिति की बात कर रहे और रजिस्टर है जिसमें उपस्थिति दर्शाएंगे? मैं भोपाल में हूँ द्वितीय सेमेस्टर के परीक्षा के कुछ दिन बाद होस्टल बंद हुए| उसके बाद एक नये रूम में जैसे-तैसे रहता हूँ, विरोध नहीं करता हूँ| कौन सी नियम का आलाप जपते है, वि.वि. स्व घोषित प्रभारी? जो छात्र के आते ही बोलता है "क्यू आये हो?" मुझे लगता है, जाती-कोम के लोगों की अलग निति और रीती की बात मुद्दा बन ही गई है, विभाग भी गंगा स्नान का लाभ उठाये| पहला निति कोई छात्र किसी परिस्थिति में दुसरे क्लाससाथी की मदद नहीं करेगा, दूसरा निति आते ही बताना पडेगा क्यू आये हो? विभाग में नहीं पुस्तकालय में बैठना है| ऐसी स्थितियों से हमें मुक्ति मिलेगी या मुक्त हो जाऊंगा समय का निर्णय है| मैं व्यक्तिगत आलोचना नहीं करता "स्वमं पूर्वाग्रह का शिकार हूँ|"
          

बुधवार, 1 अगस्त 2018

प्रधानमंत्री से ज्यादा भाजपा के ब्रांडएम्बेसडर मोदी - जितेश सिंह

कुछ महीने बाद चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होने है| ऐसे में जानकारों, विश्लेषकों, टिका-टिप्पणीकारों की माने तो प्रधानमंत्री का अबकी बार लाल किले से भाषण पहले से हट कर होगा| इस बार 15 अगस्त को लाल किले से क्या बोलेंगे मोदी? पांच साल के कार्यकाल का यह लाल किले से आखिरी संबोधन होगा| तो वही पहले से ही भाजपा चारों राज्यों (मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम) में चुनावी बिगुल बजा चुकी है| इन राज्यों में भाजपा के कार्यकर्त्ता की अपेक्षा भी मोदी के भाषण से जुड़ी होगी तो वही जनाता-जनार्धन की भी निगाहें फड़क रही है| मोदी का तोफा क्या होगा लाल किले से?

कुछ राजनीती विश्लेषकों की माने तो यह भाषण 2019 आम चुनाव की पृष्ठ भूमि तय करेगी| इसलिए सबकी नजर आने वाले 15 अगस्त को लाल किले पर होगी कि मोदी क्या बोलेंगे? क्या वे कोई बड़ी घोषणा करेंगे? या अपनी सरकार के कामकाज का ब्योरा ही पेश करेंगे| उनके करीबी कहते है
कि प्रधानमंत्री अपने भाषण के लिए आम लोगों से राय लेते है| वही मुद्दा उठाते है, जो लोगों के द्वारा सुझाए जाते है| तो क्या इस बार भी वही मुद्दे होंगे, जिसका सुझाव लोगों ने दिया होगा? या कोई बड़ी लुभावनी घोषणा कर सकते है? स्थितियों को देखे तो लगता है, इस बार मोदी किसानों, जवानों, नवजवानों और कर्मचारियों के लिए कोई बड़ा ऐलान कर सकते है? सूत्रों की माने तो केंद्र सरकार पहले से ही किसानों को लेकर संवेदनशील है| माना जाए कि अबकी बार लाल किले से अन्नदाता के लिए कोई बड़ी घोषणा की तैयारी में है सरकार? सरकार फसलों के न्यूतम समर्थन मूल्य में रिकार्ड बढ़ोतरी करने जा रही है| या इसके आलावे कोई और बड़ा प्रलोभन का पेटारा लाल किले से खोला जाएगा? किसानों के लिए इनपुट सब्सिडी की घोषणा, किसानों की निश्चित आय सुनिश्चित करने या किसानों के लिए पेंशन की घोषणा संभव है| जैसे यूपीए की सरकार ने रोजगार का अधिकार कानून बनाया था, वैसे ही सरकार न्यूतम कमाई का वादा कर सकती है, जिसका भुकतान सीधा लोगों के खाते में जाए|
कश्मीर को लेकर कोई बड़ी घोषण भी लाल किले से मोदी कर सकते है? शिक्षा के अलग-अलग स्तरों (प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षण संस्थान) में छात्रों के हित में कोई बड़ा फैसला लेकर युवा मन को टटोलने का प्रयास भी कर सकते है| 

जितेश सिंह

अ.बि.वा.हि.वि.वि., भोपाल 

या प्रोफेसरों और नौकरशाहों की रिटायरमेंट की अवधी बढ़ाई जा सकती है? हो सकता बेरोजगारों के लिए लुभावक भाषण ही बोल दे| मोदी के भाषण का मुख्य मुद्दा जो हो, इतना साफ है कि अबकी बार मोदी 15 अगस्त को प्रधानमंत्री से ज्यादा भाजपा के ब्रांडएम्बेसडर के नाते लाल किले से गरजेंगे|               


                                                                 

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

अटल बिहारी के छात्र 'चिंतन नहीं चिंता में है' - जितेश सिंह

१. छात्र और महोदय के बीच संवाद
छात्र- महोदय परीक्षा कब होगी,
महोदय- फिर से परीक्षा एक महीने पहले तो हुई थी|
छात्र- आखिरी सेमेस्टर बचा था| एक विषय में ऐटीकेटी लगी है, उसकी परीक्षा कब होगी?
महोदय- अगले सेमेस्टर में!
छात्र- किन्तु इससे पहले तो बी.ए. षष्टम और एम.ए. चतुर्थ सेमेस्टर की परीक्षा में ऐटीकेटी आने पर परिणाम घोषित होने के ठीक बाद परीक्षा होती थी|
महोदय- उससे आपके 6 महीने बर्बाद होने से बच जायेंगे|
छात्र- महोदय ये तो अच्छी बात हैं!
महोदय- ये छात्रहित में नहीं!
२. अब संवाद दूससे छात्र के साथ
छात्र- बे चल महोदय को मार गोली, पंडित के पास चलते है|
दूसरा छात्र- पागल है तू, एक पंडित हमारा ऐटीकेटी की परीक्षा कैसे करवायेगा?
पहला छात्र- अबे ऐटीकेटी परीक्षा छोड़ मैं तो अपना हस्त रेखा दिखवाने जा रहा, तू भी चल!
दूसरा छात्र- पर क्यू?
पहला छात्र- पता तो चले कब सिर से सनी ग्रह का उतरेगा?
दूसरा छात्र- तब तो विद्यार्थी परिषद् वाले छात्र को पकड़ो| उनके पास सभी छात्र में नम्बर है| कल सभी साथ-साथ चलेंगे.....
विद्यार्थी परिषद् ज़िंदाबाद! छात्र शक्ति जिंदाबाद!
मेरा सन्देश- भईया प्रश्न जिन्दवाब वाले लोगों पर भी उठाने लगे है| समस्या पर शांति शोभा नहीं देती है|

बड़े लोग अक्सर कहते है, समस्या का सामना हंसते हुए करो| दुर्भाग्य है कि विवि अपने ही छात्रों के प्रति, उनके भविष्य के प्रति सचेत नहीं है| तभी तो बार-बार हमारे लिए संकट उन्पन्न कर रहा, जिससे हम परेशान और
हताश हो उठाते है| आखिर हमारी सुनाने वाला ही कौन है? विद्यालय में शिक्षक  के रहते छात्र को खुद, अनाथ बोलना और मानना पाप है| मगर बेसहारा तो वह बोल ही सकता है| अर्थ वही है, शब्द थोड़ी सुनने-सुनाने वालों को कम चुभती है| पिछले महीने सभी पाठ्यक्रम की परीक्षा 25 जून तक विवि में समाप्त हो चुकी थी| आज परिणाम भी आने शुरू हो गये है| परीक्षा में परिणाम सभी छात्रों एक सामान नहीं आते है| कुछ अच्छे नंबरों से पास हो जाते तो कुछ जैसे-तैसे सफल होते है| किन्तु एक शिक्षक दोनों छात्रों में भेदभाव नहीं करता है| पहले से तो यही होता आया है| लेकिन यूजीसी के पागल हो जाने के बाद से नियमों में बदलाव होने लगे या यू कहे यूजीसी के नाम को उछालकर कोई अपने दोषों को छुपा रहा है| अपनी जिम्मेदारी से पल्ले झार रहा है| बी.ए. और एम.ए. के छात्रों की, आखिरी सेमेस्टर की परीक्षा में यदि किसी विषय में ऐटीकेटी लगी हो तो परीक्षा तुरंत हो जाती थी| इससे, उनके भी 6 महीने बच जाते थे| लेकिन इस बार से ऐसा नहीं होगा, क्यू पता नहीं?
शुरूआती दौर में तो अटल बिहारी के विद्यार्थियों को चिंतन करना चाहिए कि कैसे विवि में छात्रों की संख्या बढे? कैसे व्यवस्था में बदलाव हो? शिक्षकों और छात्रों के बीच मधुर संवाद चलता रहे| मगर ऐसा कुछ नहीं; यहाँ तो दुसरे विश्वविद्यालय और कॉलेज से शिक्षक बुलवाकर विद्यार्थियों के जाति और धर्म का मजाक उड़वाया जाता है| प्रतिक्रया देने पर सरकारी कार्यों में व्यवधान उत्पन्न करने का दोषी करार देकर विवि से निकालने की बात होती है| जहाँ चिंतन की आवश्यकता है, वहां हम चिंता में डूबे है| बोलने वाले तो बोलेंगे ही किस बात की चिंता, काहे की चिंता? हमारी चिंता विभाग संबंधित है, हमारी चिंता शिक्षा संबंधित है, हमारी चिंता छात्रावास संबंधित है, हमारी चिंता पाठ्यक्रम कब बंद हो जाये से संबंधित है, हमारी चिंता परीक्षा और परिणाम संबंधित है, हमारी चिंता शिक्षकों को निलंबित करने संबंधित है, हमारी चिंता नये प्रोफेसर की बाहली  में विलंम संबंधित आदि कारणों से है| विवि ने जिन प्रकियाओं को हमारे चिंता के समाधान के लिए, उससे निपटने की लिए अपनाया है| इससे तो यही प्रतीत होता है, यह चिंता के निदान की प्रकिया नहीं, चिन्तक से निदान की प्रकिया है|
कुछ दिन पहले अटल जी की तबियत बिगड़ने की खबर पढ़ी थी| देश भर से बड़े-बड़े नेता उनसे मिलने पहुँचे| तब जाकर मिडिया वालों ने उनकी तबियत में सुधार की खबर दिखायी| एक हमारे अटल बिहारी है, जिनकी व्यथा सुनने-सुनाने वाला कोई नहीं! कुछ ही वर्षों में स्थिति ऐसी निर्मित की गई है कि आज हमें बोलने में कतई संकोच नहीं होगा कि अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय छात्रों के साथ, उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा|  


   

सोमवार, 23 जुलाई 2018

गाँव की शिक्षा से मैं हूँ!

जुलाई का महीना हैं| भोपाल में लगातार तीन दिनों से वर्षा हो रही हैं| मौसम भी थोड़ी ठंडक हो गई हैं, इसलिए धुमना-फिरना दुर्लभ हो गया है| 10 दिन पहले मेरी बी.ए. फर्स्ट ईयर की परीक्षा समाप्त हुई| आप तो जानते ही हैं, कि शहर में रहकर पढ़ने वाले हम जैसे लड़कों को छुट्टियों में घर जाने की कितनी ख़ुशी होती हैं! जब मैं गाँव में पढ़ता था तब परीक्षा के दिन जैसे-जैसे नजदीक आते थे| सामान्य आदते छूटते चले जाते थे| बस स्कूल से घर, घर से स्कूल दिन-रात पढ़ते रहते थे| इतनी भी क्या जल्दी हैं, 1 महीने बाद परीक्षा नहीं हो सकती थे? अभी तो ठीक से तैयारी भी नहीं हुई हैं| आज जब गाँव से इतना दूर हूँ तो सच में परीक्षा से भय नहीं लगता| मैं तो अब चाहता हूँ कि सभी विषय की परीक्षाएं जल्दी हो जाये और एक बार फिर पहुँच जाऊ वही टूटी स्कूल, उखाड़े सडकों, बारिस से टपकता घरों में, बिछड़े दोस्तों के साथ कुछ पल बिताऊ| खासबात यह हैं, कि वो भी इसी पल का इंतजार करते हैं| मेरी तरह मेरे दोस्त भी शहरी जो हो गये है!

जितेश सिंह 

अ.बि.वा.हि.वि.वि., भोपाल

बारिस का तो पहले ही जिर्क किया था तो, आज एकदम से निक्कामों की तरह सोच रहा था! कैसे इतनी दूर पहुँच गया? क्या वो झोपड़पट्टी स्कूल के बुद्धू में इतना हौसला था? फिर पुरानी आपबीती से दिमाग घिर गया और मुझे अपने 'झोपड़पट्टी स्कूल' की यादे आने लगी| कुछ था वहाँ की स्कूल में खास जिसे अब तक भुला नहीं पाया| यह वही पवित्र स्थल था, जहाँ मैंने बोलना सिखा, जहाँ मैंने पढ़ना और लिखना सिखा| यहाँ कुछ तो पागलपन करता था, जिसे भुलना बईमानी होगी| जब तब तन्हाई में दोस्तों की योदों में, हताश, निराश, परेशान माहोल में होता हूँ, तो यही यादे मुझे जीने की शक्ति देती हैं| जो अय्यारी कल तक कमीनापन लगता था| आज मेरे लिए उर्जा स्रोत है और मेरा मार्गदर्शन कर रहा हैं| प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में अपने स्कूल के दिनों की बेकार और बेवजह लगाने वाली धटनाएं जुडी हैं| प्रत्येक स्मरण में एक नई घटना जुडी हैं| एक दशक बाद वही यादे पुनर्जीवित हो जाती हैं| हर पल सहारा देती है, कभी भी तन्हाई, अकेलापन उस यादों में जीने पर महसूस नहीं होता है|
अच्छा ये तो सब को याद होगा ही बचपन के दिन स्कूल से ठीक पहले 9:30 से 11:00 तक पेट दर्द हो जाता था, फिर बिना दवा के आराम कैसे होता था? गाँव के पास एक कान्वेंट स्कूल में मेरा नामांकन हुआ था| मैंने यही गिनती, पहाड़े, बारहखड़ी के साथ ही होमवोर्क के पन्ने फाड़कर कचड़ा फैलाना भी सिखा था| जितनी थप्पर मुझे उस समय दोनों गालों पर पड़ी फिर कभी नहीं| आज जिस 'स्वच्छता आभियान' की मोदी चर्चा करते फिरते हैं| मेरे जीवन में 13 वर्ष पहले ही यह घटना घट चुकी हैं, उसके बाद से, मैंने कॉपी फाड़ना या किसी तरह का कचड़ा फैलना एकदम भूल ही गया| सर क्लास में कुर्सी पर बैठकर बारी-बारी से होमवर्क देख रहे थे| एकदम से उनकी नजर मेरे हरकतों पड़ी या किसी ने गद्दरी की पता नहीं! मैं अपना होमवर्क फाड़कर कागज का टुकड़ा बेंच नीचे फेका ही था, जैसे की जोर से दो बार ताली बजी मैं आवाज सुनकर रोने लगा| अनुमान आप लगाये ताली कहाँ बजी होगी? उसके बाद जो हुआ हास्य लगेगा लेकिन कष्ट इतना ज्यादा था कि पूछिये मत, क्लास रूम में कागज के जितने टुकड़ा गिरे थे, सभी मेरे मुंह में रखकर बिना हाथ की सहायता से कूड़ेदान में फेकना था| कूड़ेदान तक तो मैं पहुँच गया, मेरे मुंह में कागज का टुकड़ा इतना भरा था कि बिना हाथ लगाये कागज से टुकड़ों को मुंह से निकलना नामुमकिन था| करीब आधें घंटे धुप में कूड़ेदान के पास खड़ा रहा होगा| फिर मास्टर साहब का गुस्सा थोडा शांत हुआ तो हाथ लागाकर उन कागज के टुकड़ों को कूड़ेदान में फेक कर वापस आया| फिर से ताली बजी, आगे से होमवर्क नहीं फाड़ना और होमवर्क बनाकर लाना, जाओं बैठों!
नर्सरी में जो सजा मुझे मिली उसके बाद मैंने ना ही होमवर्क का पेज फाड़कर फेका और नहीं कभी किसी तरह की कचडा फैलायी| नर्सरी की यह सजा मुझे आज तक मार्गदर्शन करती रही- "जहाँ रहूंगा, स्वच्छ रखूंगा!"
होमवर्क, कविता और पाठ यादें नहीं रहने पर पिटाना तो रोज दूध पीने जैसे था| इसके साथ ही दोस्तों से झगड़ा, हो हल्ला, पोस्ट ऑफिस वाला खेल, एक दिन तो च्विंगम खाकर आगे वाली बेंच पर लगा दी, जिस पर लड़कियाँ बैठती थी| इन सभी बातों पर भी कुछ कम थप्पड़ या छड़ी नहीं खायी होगी! एक बार तो छुट्टी के समय इतनी पिटाई सभी दोस्तों की हुई, आज भी याद करके हंसी नहीं रूकती| उस समय मैं यु.के.जी. में था| घड़ी मेरे पास नहीं थी और ना ही किसी को टाईम देखने आती थी| अच्छा जरा ये सोचों कोई भी ऐसा लड़का-लड़की होगा, जिसे छुट्टी की बेचैनी ना हो शायद नहीं! सभी तो छुट्टी नाम मात्र से ही ख़ुशी मिलती है| उस वक्त छुट्टी सुनकर जो उत्साह मिलता था भला आज कहाँ? मेरी स्कूल की छुट्टी मुझे आज भी याद हैं, 'प्रियंका बस' के जाने के बाद होती थी| जैसे बस सड़क पर नजर आती सभी अपने बैग पैक करने लगते थे| कुछ लडके हमारी तरह उत्सास में चिल्लाने लगते थे 'छुट्टी'! दिन-प्रतिदिन हमारा चिल्लाने की आवाजों में वृद्धि होती गई| एक दिन मेरे साथ आशीष, बिक्कू, राहुल और सोनू की गणेश सर ने जमकर पिटाई की| जो फुलपैंट पहने थे उन्हें भी और जो हाफपैंट पहने थे उन्हें भी, मगर दोनों की पिटाई अलग थी| उसके बाद हमने 'प्रियंका बस' से रिश्ता ही तोड़ लिया| इसी प्रकार शैने: शैने: पढाई के साथ शरारते भी बढ़ी और पिटाईयों के ग्राफ भी बढ़ता गया| इस तरह से शुरूआत के 5 बरस तक यही मेरी शिक्षा-दीक्षा हुई|
जहाँ मैंने पढ़ना, लिखना, हँसना और सभी नैतिक क्रियाओं को सीखा| इसकी शिक्षा इतनी उच्चकोटि की थी कि दूर-दराज के गांवों में इसकी प्रसिद्धि थी| आर्थिक तौरपर यह स्कूल की मासिक शुल्क बहुत कम था| शिशु ज्ञान मंदिर, रेवाडीह आज भी आवेदन लिखते समय इसका शोर्ट फॉर्म नहीं भूल पाया हूँ| आस-पास बसे गांवों के बड़े-बुजुर्ग इसे यज्ञशाळा कहा करते थे| सच में यह यज्ञशाळा ही था| इसकी तप ने आस-पास के कितने गाँवो को शिक्षित किया| हजारों बच्चों के जीवन में शिक्षा की अलख जगी! इसके संचालक और प्रध्यानाचार्य श्री गणेश प्रसाद सिंह थे| शिक्षा को ग्रामीण स्तर पर जितना इन्होने बढ़ावा दिया हैं| उनके शिक्षारूपी ऋण को आज भी मैं क्या मेरे जैसे हजारों छात्र-छात्रा और उनके परिवार वाले नहीं चुका सकते हैं! मैं तो हमेसा मुफ्त में पढ़ता रहा| खासबात यह थी कि एक ही घर से तीन बच्चे एक साथ पढ़ें तो सबसे छोटे वाला की फ़ीस माफ़ थी| तो मेरा फीस नहीं लगता था| तभी तो मैंने पहले ही कहा "मैं तो मुफ्त में पढ़ने वाला विद्यार्थी था|" 1990 से 2008 तक यह विद्यालय अपनी सेवा से शिक्षा की ज्योति जलाते रहा| मुझे इस स्कूल से आखरी छात्र होने का गौरव प्राप्त है| गणेश सर के साथ ही कई अन्य शिक्षकों का भी सराहनीय योग्यदान था, सभी शिक्षकों तो नाम बताना मुस्किल है, यादे उबाऊ हो जायेगी| हाहाहा! लेकिन दो-चार शिक्षकों को स्मरण करना जिम्मेदारी बनती है, वो शिक्षक जो अंत तक स्कूल से जुड़े रहे, भारती जी थे| इनका भी योगदान महत्वपूर्ण हैं| 2008 में गणेश सर की सरकारी नौकरी हो गई| उसके बाद व्यवस्था और शिक्षकों की कमी से इसे बंद करना पड़ा| लेकिन तब तक कई कान्वेंट स्कूल और कोचिंग सेंटर आस-पास के गांवों में खुल चुके थे| लेकिन यज्ञशाळा तो यज्ञशाळा ही होता था! और मुर्गीफार्म मुर्गिफार्म ही! गांवों में 2008 से बाद नई स्कूल अधिकतर मुर्गीफ़ार्म में ही खुली जो शिक्षा क्रेंद से ज्यादा व्यावसायिक थी| 
मुज़फ्फरपुर से 35 किलोमीटर दूरी पर ही मेरा गाँव 'रेवा' हैं| मुजफ्फरपुर से पश्चिम की ओर छपड़ा-मुजफ्फरपुर जाने वाली NH 102, रेवा रोड के नाम से विख्यात हैं| सड़क के किनारे-किनारे ही बसा यह 22 टोला का गाँव सुप्रसिद्धि के साथ ही कूप्रसिद्धि भी हैं| यहाँ से गंडक नदी बहती हैं| नदीं के किनारे सुखे हुए भूभाग यहाँ के आय का मुख्य स्रोत हैं| वहां लोग तरबूजा, खरबुजा, लालमी, लौकी, खीरा, करेला उगाये हैं और इसी को बेच कर जीवन-यापन करते है| कुछ लोग मछली भी पकड़ते हैं| नदीं के पास ही एक प्राचीन शिवमंदिर भी हैं, जहाँ हमेशा भक्तों की आवा-जाही रहती हैं| मंदिर के आस-पास काफी चहल-पहल रहती हैं| सावन के पूरे महीने शिवमंदिर में रुद्राभिषेक, हवन, पूजा, भंडारा चलता रहता हैं| कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहाँ दूर-दराज से श्रद्धालु गंगा स्नान करने आते हैं| यहाँ पूर्णिमा के 10 पहले से ही मेला लगना शुरू हो जाता हैं| झुला, मिठाइयाँ, तरह-तरह के खिलौनों और समानों से मेला बड़ा ही भव्य लगता है| कार्तिक पूर्णिमा को शुरू होने वाली यह भव्य मेला करीब 1 महीनों तक चलता हैं|     
रेवा की चर्चा पुरानों में भी हैं| भगवान श्री राम जनकपुरी जाते वक्त इसी गाँव में संध्या होने पर विश्राम किये थे| संध्या के ही पर्याय शब्द से इसे 'रेवा' कहा जाने लगा| पूर्व समय में अपने पुरखों के शिक्षा और सूझ-बुझ से गाँव ने खुबी प्रसिद्धि अर्जित की| आज भी हमें दूर-दराज के लोग उन्हीं पूर्वजों के नामों से जानते है| जब शिक्षा के प्रति समाज चेतनाशून्य था तब से हमारे गाँव में माध्यमिक स्कूल और बाद में एक हाईस्कूल भी बना था| मैं भी गाँव के ही माध्यमिक स्कूल से पढ़ाई की थी| मैंने यहाँ चौथा से आठवां तक की पढाई की| 9वीं और 10वीं भी गाँव के ही हाईस्कूल से की| यहाँ की शिक्षा बहुत ही अच्छी थी मगर बाद के दिनों में सरकारी स्कूल के व्यवस्था से सभी परिचित हैं ही| जब मैंने 4वीं में नामांकन लिया तो, शिक्षा प्रणाली बहुत ही बिगड़ चुकी थी| फिर भी इक्का-दूक्का शिक्षकों के मार्गदर्शन में रहे| ज्यादातर मेरा समय शुरुआत के ही दिनों से पेड़ के नीचे, स्कूल के पीछे ही बितता रहा| यहाँ भी काफी अच्छा अनुभव रहा| मैंने राजकीय मध्यविद्यालय, रेवा से तीन कलाबाजी सीखी| खिड़की से बस्ता (स्कूल बैग) लेकर फरार होना| लड़कियों के बेंच पर कलम से घसना, चप्पल पहन कर उनके बेंच को गन्दा करना| खैर बैंच गन्दा करने का तरीका हमने लड़कियों से ही कॉपीपेस्ट किया था| आखिरी किसी के भी मामले में टांग करना (हस्तक्षेप करना)| मेरी अनुमति के बिना कोई लंच के समय फ़रार हो जाये असंभव और मैं लंच के बाद स्कूल में रूक जाऊ असंभव| मेरी आदत थी लंच के समय किसी को भागने नहीं देने की और जैसे ही लंच समाप्त होता खुद भाग जाता था| इसके कारण लड़कों से तो झगडा होती ही थी, लेकिन लड़कियाँ भी जितनी गलियां दी होगी, उसका कोई हिसाब नहीं| मैं बाकी के नियमित छात्रों से पढ़ने थोड़ा तेज था| मेरे कई साथी को तो 8वीं में भी हिंदी पढ़ने नहीं आती थी| मेरे साथ इक्का-दूक्का लडके-लड़कियों ही पढने में ठीक थे| लेकिन सभी किसी दुसरे कान्वेंट स्कूल में पढ़ते थे, नहीं तो घर पर ट्युशन या कोचिंन जाते थे, मगर स्कूल परीक्षा के समय या छात्रवृति के पैसे लेने आते थे| मेरी तरह एक-दो ही थे जो रोज स्कूल आते थे| मेरी एक क्लासमेट थी, वो भी नियमित स्कूल आती थी और पढ़ने में भी काफी तेज थी| कभी कभार बाते भी उससे हो जाती थी| असल में मुझे वो अच्छी लगती थी| हमेसा से मेरे, उसके बीच प्रतिस्पर्धा और झगड़ा ही रहा| गाँव के स्कूल में बातों बतंगर बनने में देर नहीं लगती है| दोस्तों ने भी खूब हवा में मेरी अफवाहें उडाये| किसी के तो बैंच पर कुछ गलत भी लिख दिया था| जिसके हमारी बातें बंद हो गई, कभी कभार जो नोटबुक और होमवर्क शेयर करता था वो भी बंद कर दिया| उसके बाद मेरे साथ 6 साल (10वीं तक) पढ़ी, लेकिन मैंने कभी उससे बात करने की प्रयास नहीं की| 8वीं पास होने में 2 या 3 महीने बचे थे तो मैंने उसी स्कूल में रामजीलाल सर की कोचिंग पढ़ने लगे| वो काफी अनुभवी शिक्षक के साथ अपने जीवन के लगभग आधी उम्र मेरे ही गाँव के स्कूल में बिता दिये थे| स्कूल में पढ़ने के साथ ही वो 9वीं और 10वीं से विद्यार्थियों को कोचिंग भी पढ़ते थे| उनका कोचिंग भी 15-16 वर्षो तक लगातार शिक्षा का केंद्र बना रहा| गणेश सर के कान्वेंट स्कूल की तरह ही मैं रामजीलाल सर के कोचिंन का भी आखरी विद्यार्थी रहा| उन्होंने (रामजीलाल सर) ने गांव की लड़कियों को उच्च शिक्षा से जोड़ने का जो प्रयास किया| अगर वो नहीं पढाते, तो बहुत सारे लडके-लड़कियां मेरे गाँव के 8वीं के बाद नहीं पढ़ पाते|
वर्ष 2012 में 8वीं उत्तीर्ण हुआ और गाँव के ही हाईस्कूल से 9वीं में नामांकन लिया| यहाँ मैं 2 वर्षों तक पढाई की यानि 9वीं और 10वीं| आज स्कूल में शिक्षकों की संख्या अपेक्षाकृत ठीक हैं, लेकिन जब मैं वहां से विद्यार्थी जीवन व्यतीत कर रहा तब शिक्षकों की कमी थी| करीब 1400 विद्यार्थियों संख्या थी और शिक्षक मात्र 2 ही थे| मेरे 10वीं उत्तीर्ण होने से 2 महीने पहले एक शिक्षक की बहाली हुई 'अमित जी' मेरे बड़े भाई जैसे थे| आज भी वहां के छात्रों में काफी प्रिय और नैतिष्ठ हैं| मैं अपने समय का नियमित छात्र था| वहां के सभी शिक्षक और छात्र मुझे अच्छे से पहचानते थे| जब मैंने 9वीं में नामांकन लिया तो मेरे बड़े भाई रितेश उस समय वही से 10वीं की पढाई कर रहे थे| वो मेरे थे, तो बड़े भाई! लेकिन सबसे अच्छे दोस्ती उन्होंने ही निभाई| वो पहले से ही हाईस्कूल में पढ़ते थे| जिसके कारण मुझे वहाँ शुरुआत में कोई परेशानी नहीं हुई| उनके दोस्त लोग भी मुझे अपने छोटे भाई जैसा ही प्यार दिये| खासकर बंटी, नितीश, निशांत, महराणा और विश्वजीत भाई| मुझे नितीश भाई से क्रिकेट खेलने की सूझ-बुझ के साथ डाट भी पड़ती थी| हाईस्कूल में मेरी दोस्तों की भी लिस्ट काफी लम्बी थी| उस समय अंकित, अमरेश, विश्वजीत, चन्दन, उत्तम, मुन्ना, पंकज, आदर्श मेरे दोस्तों की सूची में शीर्ष स्थान पर थे| यहाँ मुझे क्रिकेट की लत लग गयी| खूब क्रिकेट खेली, पहले भी खेलता था मगर हाईस्कूल में आने के बाद क्रिकेट मानों मेरी गर्लफ्रेंड हो| मैं तो क्रिकेट ही खेलने स्कूल आता था| हाईस्कूल में भी मैंने दो और नये उदंडता सीखी| प्रार्थना के समय बातें करना और लड़कियों की साईकिल के हवा निकलना| वैसे हम सभी लड़कियों से नहीं उलछाते थे मगर जो व्यवस्था में नहीं रहती क्लास में ओवर बनती थी| उसी  लड़की की साईकिल की हवा कोई ना कोई निकाल देता था| एक मेरा जिगरी दोस्त था, हवा निकालने का काम उसका ही था| लेकिन मुझे इस बात की ज्यादा ख़ुशी हैं कि हमलोगों में कोई भी लड़का शहरों की तरह दूषित विचार का नहीं था| साईकिल की हवा भी निकलने के पीछे बस छोटी-छोटी खुशियाँ जुडी थी| आज भी ऐसे पल मुझे अपनो के बीच खुद को ले जाता है, एक ऐसी यादो में डुबो देता है; जहाँ से निकालने का मन नही करता है और ऐसी यादे सभी के पास होती है, वैसे भी ये हमारी यादे हैं!
                                                       
                                                 - जितेश कुमार                                  
    

                          

कांग्रेस की निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में भारी गिरावट के पूर्वानुमान

भविष्य में क्या होंगी, मैं नहीं जनता हूँ |  इस दौर में बहुत लोग अभिव्यक्ति की आजादी का अलाप जप रहे है |  तो मुझे भी संविधान के धारा  19  क...