शनिवार, 9 दिसंबर 2017

पत्रकारिता से समाजिक परिवर्तन.

पत्रकारिता से समाजिक परिवर्तन-
स्वतंत्रता प्राप्ति के 70 साल बाद आज पत्रकारिता का स्वरूप बहुत बदल गया है. पत्रकारिता इस समय केवल रोजमर्रा की घटनाओं, सूचनाओं के प्रस्तुतीकरण और आलोचना तक ही सीमित नहीं रह गई है. बल्कि रेडियो, टेलीविज़न, डिजिटल माध्यमों से दिख रही. कड़ी चुनौतियों के चलते पत्रकारिता आब 24 घंटे अपने पाठकों, के बीच हमेशा कुछ नया पेश करने की बाध्यता बन चुकी है. चाहे समाचार पत्र का हो या रेडियो, टेलीविजन, डिजिटल कोई माध्यम हर माध्यम में कोई भी समाचार या विचार के लिए जगह तभी निकाल पाती है, जब वह एक व्यापक समाज के लिए रोचक, ज्ञानवर्धक, सूचनाप्रद, उत्साहपूर्ण और पठनीय हो. इस तरह आप की पत्रकारिता ना सिर्फ समाज के व्यापक बदलाव का माध्यम है. बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को बरकरार रखने के लिए आम लोगों की व्यवहारिक और विचारों में बदलाव का माध्यम भी है . आज की पत्रकारिता में हम सबसे पहले, सबसे तेज, सबसे बेहतर, सबसे अलग, सबसे विश्वसनीय जैसे सूचनाओं से निर्धारित कर करते हैं. पत्रकार की लिखी हुई एक खबर, तंत्र को जहां विकसित भी कर सकती है, वही उसके सामने समस्या के निदान का उपाय सुझाने वाली भी हो सकती है. पिछले 20 वर्षों की पत्रकारिता का इतिहास देखे, तो बोफोर्स कांड से लेकर कोयला घोटाले, देश में बढ़ती सांप्रदायिकता, महिलाओं के साथ यौन हिंसा और विक्षिप्त जैसी घटनाओं से लेकर, अब तक तीन तलाक के मामले तक, भारतीय मीडिया ने अपने रिपोर्टिंग और अन्वेषण कार्य प्रगति के चलते केवल जनता के बीच रखा. अपने सतत् प्रक्रिया यानि लेखनी के माध्यम से समाज को जागृत किया. समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, अनाचार, जातिगत एवं सांप्रदायिक भेदभाव जैसे प्रवृतियों को ही उजागर ना किया बल्कि इस दिशा में सहमति मित्रता बनाए रखने का प्रयास सतत् ही किया है. इसे कोई नाकार नहीं सकता. सरकारी योजनाओं, नीतियों और सोच को बदलने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. हाल में स्वच्छता अभियान 'स्वच्छ भारत मिशन' को उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है. जिसे लेकर भारतीय लोकप्रिय मीडिया ने लगातार सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों ही तरह की रिपोर्टिंग की और स्वच्छता मिशन से जुड़ी खामियां को ही उजागर नहीं किया, बल्कि उन मानवीय पहलुओं को भी बेहद प्रेरक तरीके से प्रस्तुत किया. जिसमे दुल्हन ने सिर्फ इसलिए शादी से इंकार कर दिया. क्योकि ससुराल में शौचालय नहीं था. स्पष्ट है कि मीडिया समाज को बदल सकता है, बशर्ते उसकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष दृष्टिकोण से हो लेखन की प्रवृत्ति विश्लेषणात्मक गुणों से परिपूर्ण हो और लिखा गया समाचार के पीछे पत्रकार की अन्वेषणा व्यापक दृष्टि में शामिल होते रहे.
यह सब जिस समय से सरकार हो रहा है. जब मीडिया प्रबंधन का बड़ा हिस्सा व्यावसायिक घरानों के हाथों में हैं. और मीडिया लगातार जनसरोकारों के मुद्दों पर, पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाने के आरोप लगते रहे हैं. इसके बावजूद दशरथ मांझी जैसे नायकों की भी कहानियां सुर्खियां में होती है. जो अपने गांव के बच्चों को स्कूल जाने के लिए पहाड़ खोदकर रास्ता निकालता है. इस तरफ कूट-खदानों एवं राशन आवंटन, किसानों की समस्या- खाद की उपलब्धता आदि, विषयों पर लगातार समाचार पत्रों में प्रमुखता दी जाती रही है. लगभग सभी अखबारों की पहुंच दूरदराज के आंचलों तक है. और स्थानीय संवाददाता लगातार लोगों की समस्या को उजागर कर अपना दायित्व निर्वाह कर रहे हैं. समाचार एक चराचर व्यवस्था है. जो कभी स्थित नहीं रहेगा. उसे हमेशा कुछ नया चाहिए. उसे हमेशा बदलाव पसंद हैं. और इसी चुनौती को मीडिया में बखूबी निभाया है. इसका परिणाम एक सामाजिक कार्यों में लगातार शिक्षा, स्वास्थ्य, साफ पानी, बिजली और लोक व्यवहार जैसे मुद्दों पर जनता की सोच में आए बदलाव में देखा जा सकता है. फिर भी लिंगभेद, बाल विवाह, मानव तस्करी, लैंगिक अपराध, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही बनाने की दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना जरूरी है. इसलिए मीडिया को इस समय संक्रमण काल से गुजरा हुआ माना जा सकता है.

उपयोगिता के आधार पर हम निम्न प्रश्नों के उत्तर दे सकते हैं-
1.पत्रकारिता सामाजिक परिवर्तन का साधन है कैसे?
2. पत्रकारिता का समाज के प्रति दायित्व का उल्लेख करें.
3. सामाजिक सौहार्द बनाने पत्रकारिता की  भूमिका को स्पष्ट करें.

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

पत्रकारिता के विविध स्वरूप

राजनीतिक पत्रकारिता- राजनीतिक चुनाव पार्टी विशेष के, विभिन्न कार्यक्रमों. सरकार की नीति योजनाओं, कार्यक्रमों के पीछे की राजनीति पर पड़ने वाले प्रभाव. पार्टी पदाधिकारियों की बैठक, सभाओं, रैलियों की कवरेज के साथ जमीनी स्तर पर दलगत, गतिविधियों की निष्पक्ष, रिपोर्टिंग और लेखन राजनीतिक पत्रकारिता कहलाता है. एक राजनीतिक पत्रकार का संपर्क किसी राज्य और केंद्र दोनों सरकारों के सत्ता में बैठे और विकक्ष के नेताओं से होता है. लेकिन वे दल विशेष का पक्ष लिए बगैर, अपनी रिपोर्टिंग करते हैं. विश्लेषणात्मक, शक्ति, धाराप्रवाह और सरल भाषा लेखन में रोचकता और सशक्त तारकीय दृष्टि राजनीतिक पत्रकार के विशेष गुण है. समय समय पर राजनीतिक घटनाक्रम, सुझाव,परिणाम, नेता के बयानों प्रेसवार्ता की पृष्ठभूमि में राजनीतिक पक्ष पर पैनी नजर राजनीतिक संवाददाता के लेखन में नजर आने चाहिए.
क्राइम पत्रकारिता या अपराध- समाचार पत्र माध्यम का सबसे पठनीय और चुनौतीपूर्ण कार्य है. क्राइम पत्रकारिता असल में 24 घंटे सजक चपल और संपर्क में रह कर की जाने वाली पत्रकारिता है और अपराध की खबर मैदानी पड़ताल विभिन्न धाराओं, कानूनों की जानकारी, पुलिस एवं जांच एजेंसियों की जांच एवं विवेचना तौर-तरीके को समझने की है. अपराधिक दंड सहिंता की विस्तृत विस्तृत जानकारी, फॉरेंसिक जांच और संबंधित राज्य के कानूनों की पूरी जानकारी एवं क्राइम पत्रकार को होनी चाहिए. उसे ना केवल घटनास्थल पर जाकर रिपोर्टिंग करनी होती है बल्कि, अपराध और पीड़ित पक्ष के लोगों को भी ध्यान में रखना होता है. क्राइम पत्रकारिता तब तक अपने उद्देश्य को पूरा नहीं करता. जब तक पत्रकार अपराधी घटना के कारणों के अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंच जाता और इसलिए उसे घटनाओं के लगातार फॉलोअर्स की जरूरत पड़ती है.
खेल पत्रकारिता- अपराध पत्रकारिता के बाद सबसे ज्यादा लोकप्रिय और पठ्नीय पत्रकारिता खेल पत्रकारिता है.देश विदेश में होने वाली स्पर्धाओं की जानकारियां और एजेंसी से प्राप्त खेल परिणामों को खबर के रूप में संपादित कर, फोटो और अन्य आंकड़ों के साथ पेश करना, खेल पत्रकारिता का हिस्सा है. उसके लिए पत्रकार की भाषा में गतिशीलता, फ्लेक्सिबिलिटी, रोचकता, प्रवाह में Action जीवंतता होनी चाहिए. वरना पत्रकारिता निरर्थक है. इसलिए खेल पत्रकार को विभिन्न खेलों की तकनीकी और क्रियाशील जानकारी बुनियादी रुप से होनी चाहिए. साथ ही उनके पास खेल और खिलाड़ियों की व्यक्तिगत, खेल से संबंधित तथ्यों का होना जरुरी है. पत्रकार को विश्लेषक भी होना चाहिए. तभी वह परिणामों की समीक्षा और उस पर अपनी टिप्पणी कर सकता है.
फिल्म पत्रकारिता- 1913 में भारत की बनी पहली मूक फिल्म राजा हरिश्चंद्र और 1931 में पहली सवाक फिल्म आलम आरा की समीक्षा से बाद से लेकर आज तक भारतीय सिनेमा में तकनीकी, सिनेमा बनने की विभिन्न विधाओं की बहुत से पड़ाव देखे हैं. श्वेत-श्याम से Colors TV और अब LED,HD, 3D के जमाने में पटकथा विषय संवाद की लय विभिन्न शैली प्रस्तुतीकरण, संपादन, सिनेमाकला की और आधुनिक कंप्यूटर तकनीक के इस्तेमाल के साथ ही बहुत विविधता आ गई है. समानांतर सिनेमा डोकोमेंट्री और छोटी फिल्मों ने दर्शकों के व्यापक समूह तक अपनी पहुंच बनाई है. ऐसे में फिल्म पत्रकारिता की चुनौती पहले से कहीं अधिक है, व्यापक और मुश्किल है. एक फिल्म पत्रकार को फिल्म तकनीक से जुड़ी सभी पहलुओं को समझने. लक्षित पत्रकारिता को संकलित करने,दर्शकों के मनोभाव के अनुसार अपनी समीक्षा पेश करनी होती है. साथ ही वर्तमान समय में नायक, नायिका के निजी एवं सार्वजनिक जीवन के बारे में रोचक जानकारियां पेश करने की चुनौती भी होती है. फिल्म फेयर, पिक्चर प्लस,फिल्मी दूनिया, फिल्मी कालिया, माधुरी जैसी फिल्म पत्रिकाओं के लेखन के लिए एवं व्यवसाय के लिए पैनी दृष्टि अवश्य फिल्मों से जुड़ी जानकारी पर रखनी चाहिए. लोकप्रिय धारावाहिक की समीक्षा और उसमें आने वाले एपिसोड को लेकर आगे की चर्चा को पेश करना भी पड़ता है.

आजादी के पूर्व और आजादी के बाद की पत्रकारिता

भारतेंदु हरिश्चंद्र और राजा राममोहन राय से लेकर मुंशी प्रेमचंद, बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी और माखनलाल चतुर्वेदी तक सभी पत्रकार के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे. उस समय यानी अंग्रेजी राज में रूढ़िओं, अंधविश्वासों, तरह-तरह की कुरीतियों और कर्मकांड में उलछे भारतीय समाज को जगाने और उन्हें एक दिशा दिखाने का काम इन सभी ने किया. इनमें में राजा राममोहन राय प्रमुख है. जिन्होंने सती प्रथा के खिलाफ एवं विधवा विवाह के पक्ष में जनमत खड़ा करने की कोशिश की और निर्भयता से अपने समाचार पत्रों के माध्यम से अपने विचारों को जन समाज तक पहुंचाया. उसी तरह महात्मा गांधी ने अपने समाचार पत्र हरिजन के माध्यम से छुआछूत, जाति प्रथा और अंग्रेजी राज्य के दमन के खिलाफ लेख लिखें. जनसमूह को जागृत करने का प्रयास किया. इन सभी का मकसद समाज और तंत्र के विसंगतियों को दूर कर एक समतामूलक समाज की स्थापना करना और भारत को अंग्रेजी राज के चंगुल से मुक्त कराना रहा.
स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले की पत्रकारिता. भले ही एक व्यापक जनमानस तक, आज की तरह आधुनिक तकनीक के जरिए प्रचार-प्रसार नहीं हो पाती थी. पर उन्होंने अंग्रेजी राज के काले कानून और विसंगतियों को जनता तक पहुंचाएं और उन्हें प्रेरित किया. इनके साथ ही भारतीय पत्रकारों ने यूरोप की औद्योगिक क्रांति, रूस की बोल्शेविक क्रांति, प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध के समय आम लोगों तक सूचनाओं को पहुंचाने में अहम योगदान दिया. इसके अलावे पश्चिमी देशों में लगातार हो रही. तकनीकी क्रांति को भारतीय समाज तक पहुंचाने का कार्य भी इन पत्रकारों ने किया. मूल रूप स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले की पत्रकारिता भारतीय समाज को जगाने, उसे सशक्त करने और अंग्रेजी शासन के विरुद्ध में एकजुट कर आंदोलित करने का एक मिशन रहा.
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय पत्रकारिता ने एक नए रूप में अपने आप को ढ़ालना शुरू कर लिया. समाज पर उसकी पैनी नजर हो गई. पत्रकारिता अन्वेषण का काम भी बन गया और समाजिक अभिव्यक्ति को सामने लाने का मंच बन गया. सामाजिक सरोकारों से जुड़ी खबरे, सरकार की नीतियों, योजनाओं की समीक्षा, कार्य की तथ्यपूर्वक, विवेचना समालोचना की जाने लगी. आजादी के बाद समाचार पत्रों ने देश के विभिन्न हिस्सों, समाज के अलग-अलग वर्गों और ग्रामीण दूरदराज के आंचलों तक, अपनी पहुंच बनाने के प्रयास किए. यही वह समय था, जब समाचार पत्रों ने अपने मिशन मोड को व्यवसायिक पत्रिका से जोड़ना शुरु किया. महिला बच्चे और वंचित वर्गों को अपने से जोड़ने की कोशिश की. मानवीय भावनाओं, सांप्रदायिकता, हिंसा, लैंगिक, उत्पीड़न जैसे विषय समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित होने लगे. आम लोगों की समीक्षाओं उनकी अभिव्यक्ति को आलेखों, पत्रों के माध्यम से सामने लाए जाने लगे.
स्पष्ट है कि पत्रकार और पत्रकारिता दोनों ही समाज में गहराई से जुड़े हुए हैं. समाज में होने वाली घटनाओं को, समाचारों के माध्यम से सामने लाना ही पत्रकार का एकमात्र उद्देश्य नहीं, बल्कि! सरकार की नीतियों योजनाओं कार्यक्रमों के अलावे कार्यपालिका न्यायपालिका और विधायिका के कामकाज की समीक्षा और वहां से जुड़ी जानकारियों को आम लोगों के समक्ष पेश करना. उनके गुण दोषों को परखना और समाज को एक निष्पक्ष निर्भीक तरीके से सच से अवगत कराना. पत्रकारिता का उद्देश्य है. इस तरह हम साफ तौर पर कह सकते हैं कि,पत्रकार हमारे समाज का लोकपहरी है बतौर पत्रकार का उद्देश्य समाज के सहयोग के बिना या समाज से हटकर, कटकर  पूरा नहीं हो सकता. इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी अगर हम कहें, समाज, पत्रकार और पत्रकारिता एक दूसरे के पूरक है.
उपयुक्त बातों के आधार पर निम्न प्रश्नों से संबंधित उत्तर दिए जा सकते हैं-
1. पत्रकारिता और समाज के बीच अंतर संबंधों को दर्शाते हुए पत्रकारिता के प्रारंभिक काल से लेकर आज की चुनौतियों को रेखांकित कीजिए.
2. स्वतंत्रता पूर्व और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पत्रकारिता के उद्देश्य को लिखे.
3. भारतीय पत्रकारिता में बदलाव को समझाएं.



पत्रकारिता और पत्रकार की परिभाषा

पत्रकारिता असल में रोजमर्रा की घटनाओं, सूचनाओं, संदर्भों को इकट्ठा करके. उन्हें समाचार की शैली में लिखने और उन्हें प्रिंट इलेक्ट्रॉनिक डिजिटल एजेंसी या किसी अन्य माध्यम से के जरिए, एक व्यापक जनमानस में प्रस्तुत करने का कार्य है.
हालाकि यह पत्रकारिता की व्यापक परिभाषा नहीं कही जा सकती. क्योंकि स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले और उसके बाद से लेकर आज तक, पत्रकारिता का स्वरूप और उद्देश्य बदलता रहा है. फिर भी समाचार को इकट्ठा करने, उनका लेखन, संपादन, लेख, आलोचना, समालोचना, फीचर्स, रिपोर्ट और यहां तक की गलतियों का संशोधन भी पत्रकारिता का हिस्सा है. पत्रकारिता की व्यापक परिभाषा पर आने से पहले हमें 18 वी शताब्दी से लेकर आज 21वीं सदी तक के विभिन्न विचारों, पत्रकारों और साहित्यकारों की परिभाषा को समझना होगा. जिन्होंने अपने स्तर पर पत्रकारिता को तत्कालीन संदर्भ में परिभाषित किया. इसमें कुछ प्रमुख पत्रकार एवं साहित्यकारों की परिभाषा का उल्लेख करना आवश्यक है. ताकि हम व्यापक संदर्भों में आज की चुनौती को देखते हुए, पत्रकारिता को सर्वमान्य से परिभाषित कर सकें. 
प्रेमचंद्र- पत्रकारिता समाज का दर्पण है, जो आपके जनजीवन के विभिन्न छवियों और रंग-रेखाओं को उभारता है.
???????- पत्रकारिता को हमेशा समाचार पत्रों के कामकाज से जोड़ा जाता है. लेकिन वर्तमान संदर्भ में पत्रकारिता समाचार के साथ फोटोग्राफी, रेडियो के लिए समाचार लिखना, पब्लिसिटी, पत्रिकाओं के कार्य और ऐसे कई बातों से रहा हैै, जिसका समाचार पत्रों से कोई संबंध नहीं है.
पंडित जवाहरलाल नेहरू- पत्रकारिता राष्ट्रीयता के चिंतन और अन्याय के खिलाफ शक्तियों को एकजुट, जागरुक कर एक नए राष्ट्र निर्माण का सशक्त माध्यम है.
महात्मा गांधी- जनता की इच्छाओं और उनकी समस्याओं को समझने, उन्हें आपनी लिखनी के माध्यम से उजागर करना. समाज में व्याप्त बुराईओ, असमानता और विसंगतियों को निडर होकर सामने लाना, पत्रकारिता है
उपयुक्त परिभाषाओं का चिंतन मनन कर. हम पत्रकारिता का सार्वभौमिक और सर्वमान्य परिभाषा को इस प्रकार लिख सकते है- पत्रकारिता सिर्फ एक मिशन ही नहीं व्यवसाय भी है जो समाज को जागरुक करने उसके ज्ञान को बढ़ाने समाज में दायित्वबोध को जगाने अन्याय के खिलाफ जनमत खड़ा करने का ना सिर्फ एक हथियार है बल्कि रोजमर्रा की घटनाओं सूचनाओं जानकारियों के प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम है उपयुक्त संदर्भ में अब हम पत्रकार की परिभाषा पर आए तो हमें यह प्रतीत होता है कि, समाचार लिखने तथ्य सूचनाओं जानकारियों को एकजुट कर उन्हें स्पष्टता, से पंक्तिबद्ध कर समाचार का स्वरूप देने वाले, संपादन करने वाले, लेख लिखने वाले, साक्षात्कार लेने वाले या किसी भी विचार की समीक्षा, आलोचना, समालोचना करने वाले सभी व्यक्ति पत्रकार कहलाते हैं.

उपयुक्त बातें निम्न प्रश्न के उत्तर के रूप में प्रयोग किए जा सकते हैं-
1. पत्रकारिता क्या है? वर्तमान संदर्भ में पत्रकारिता के क्षेत्र में बदलाव को रेखांकित कीजिए.
2. पत्रकारिता की अलग-अलग और सर्वमान्य परिभाषा को देखते हुए पत्रकार के मानवीय नैतिक सामाजिक और व्यवसाय गुणों को बिंदुवाद उल्लेखित कीजिए.
3. पत्रकारिता की भूमिका को समझाइए.

अटल बिहारी वाजपेयी के नक्शे कदम पर मोदी. जितेश सिंह

बात 1996 के लोकसभा चुनाव की है.
वाजपेयी जी लखनऊ के विशाल मैदान में चुनावी भाषण दे रहे थे. अचानक पास की मस्जिद से अजान की आवाज सुनकर, उन्होंने अपना भाषण रोक दिया. लोग चकित
हो उठे . अजान पूरी होने के साथ ही एक
बार फिर उनका वैचारिक प्रभाव अविरल ओजस्विता के साथ गुंजने लगा. तब देश के संप्रदायिक राजनीति से खिलाफत करने वाले, महान राजनेता अटल जी को विरोधियों ने, सांप्रदायिकता के दुष्परिणाम में घसीटने की कोशिश की. उस दौर में जनता जनार्दन ने इसका करारा जवाब दिया. सैकड़ों मुस्लिम महिला सन् 1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के जीत के लिए, अपनी दाहिनी भुजा पर इमान-जमीन अर्थात पवित्र ताबिज बांधकर प्रार्थना की.
मोदी जी के भी गुजरात और बंगाल की चुनावी रैलियों एेसा देखा गया. तो क्या अटल जी का अनुसरण कर रहे हैं मोदी?
गुजरात के नवसारी में एक चुनावी भाषण के दौरान पास के मस्जिद से अजान की आवाज सुनकर, मोदी ने अपने भाषण को रोक दिया. जिससे जनता चकित रह गई. अजान खत्म होने पर पुन: भाषण शुरू किये. 2016 पश्चिम बंगाल खड़गपुर में भी एक चुनावी भाषण के दौरान अजान की आवाज सुनकर, मोदी जी भाषण को रोक दिया. यही नही! इस साल जब वर्मा की यात्रा पर गए, तो भारत के अंतिम बादशाह बहादुर शाह जफर की मजार पर चादर चढ़ाई. इसी वर्ष अहमदाबाद के एक पुराणे मकबरा में, जापान के प्रधानमंत्री के ले गए. मुस्लिमों के लिए कई क्रांतिकारी पहल मोदी सरकार ने की है. तीन तलाक, शिक्षा, रोजगार, मुस्लिम महिलाओं के आत्मसम्मान,आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास, जैसे कई कल्याणकारी कानून बनाये गये. हज यात्रा के लिए सरकारी ने सब्सिडी 4000 से बढ़ाकर 15000 कर दी. 45 वर्ष से अधिक उम्र के मुस्लिम महिलाओं के लिए हज यात्रा के लिए विशेष प्रावधान लागू की. वर्तमान के 3 साल से अधिक के कार्यकाल में पूरे भारत में एक भी सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए. फिर भी कुछ नेता राजनीतिक लाभ के लिए भारत को असहिष्णुता का जामा पहना रहे.        
      जितेश सिंह                                    
                                                 
                                             
                                             





मंगलवार, 28 नवंबर 2017

प्रधानमंत्री आवास योजना की धीमी चाल मोदी जी नाराज ! जितेश सिंह

प्रधानमंत्री आवास योजना से पीएम मोदी नाराज चल रहे हैं.अधिकारियों की गैर-जिम्मेदाराना रवैया को देखते हुए.


पिछले शनिवार को पीएम के मुख्य सचिव ने बैठक बुलाई. इस बैठक में प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़े संबंधित अधिकारी उपस्थित हुए. आवास योजना की धीमी चाल के कारण अधिकारियों को फटकार लगाई गई. उन्हें जल्द ही संबंधित सभी दस्तावेज को पीएमओ में जमा करने की हिदायत दी गई. बैठक में आगे की रणनीति भी तय की गई. आवास योजना के अंतर्गत 2017 से 2019 तक 51 लाख से अधिक आवास बनाने की बात कही जा रही है. इसके अंतर्गत 2017 से 2018 में 30 लाख 76 हजार आवास के लिए मंजूरी दे दी गई .सरकार का लक्ष्य 2022 तक 1 करोड़ 50 लाख  से भी अधिक आवास की बनवाने की.
जून 2015 में प्रधानमंत्री आवास योजना का शुभारंभ किया गया था. इसका उद्देश्य 2022 तक सभी को पक्के की घर की व्यवस्था हो. पिछले 2 साल योजनाओं की समीक्षा की जाए. तो अब तक 4 लाख 13 हजार आवास बन चुकी है,जबकि 15 लाख 65 हजार आवास विभिन्न चरणों में निर्माणाधीन है.
यह आंकड़ा 2011 की जनगणना के अनुसार बनाई गई है. 2011 से अब तक जनसंख्या वृद्धि में हुई. इसके बारे में जब प्रश्न पूछें गए तो, ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधिकारी ने कहा वर्तमान आंकड़े के आधार पर प्रधानमंत्री आवास योजना की बजट तैयार की गई. आवश्यकता पड़ने पर इस में परिवर्तन किये जाएंगे. संबंधित अधिकारी को क्षेत्रों में सतत् नजर रखने की बात कही गई. योजना में किसी तरह की कोताही नहीं बरतने की सलाह दी गई है उन्होंने कहा कि, 2022 तक हम  योजना को साकार कर लेंगे.
                                  जितेश सिंह

सोमवार, 27 नवंबर 2017

राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री लालजी सिंह बड़े भाई को पत्र. जितेश राजपूत

                                                       भोपाल (म. प्र.)                                                         तिथि-26 नवम्बर                                                                 2017.                                          

आदरणीय लालजी सिंह बड़े भाई
राष्ट्रीय अध्यक्ष अखंड राष्ट्रवादी पार्टी

आपके कुशल मंगल कामना के साथ| अखंड राष्ट्रवादी पार्टी का प्रचार प्रसार अग्रसर हो| ऐसी इच्छा मेरी हमेशा रही है| देखा जाए तो शायद! हम इस मामले में बहुत पीछे छूट चुके थे| राष्ट्ररक्षा,राष्ट्रगौरव से जिस वंश का सूर्योदय होता था| आज स्वयं अपने कृत्य को धुलित करने में लगा है| हमें स्वयं को संयोजना हैं, राष्ट्र के लिए|              
पार्टी का प्रचार-प्रसार लोकभावना के आधार पर हो| वास्तविकता तो यह है कि, हमने अपने संगठन की ओर ध्यान ही नहीं दिया| आज देश के सभी पंथ- जाति के राजनीतिक पार्टियां कई दशकों से चली आ रही है| हमारे लोग उनके तलवे चाट रहे| अब ऐसा नहीं हो? आपके आत्मचिंतन और कुशलता ने, हमें पुनः राष्ट्रीय मंच से जुड़ने का प्रयास किया है| अभिनंदन! स्मरणीय कार्य है| आपसे मिलने के इच्छा के साथ नमस्कार!
           
जितेश राजपूत
मुलत: मुजफ्फरपुर,बिहार
8340582571,8292919977

कांग्रेस की निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में भारी गिरावट के पूर्वानुमान

भविष्य में क्या होंगी, मैं नहीं जनता हूँ |  इस दौर में बहुत लोग अभिव्यक्ति की आजादी का अलाप जप रहे है |  तो मुझे भी संविधान के धारा  19  क...