मंगलवार, 4 सितंबर 2018

जब मैं नि:स्वार्थ बनू, तुम धाम बन जाओगे 'रेवा'! - जितेश सिंह

रेवा| प्रचीन शिव मंदिर श्री कामेश्वर नाथ महादेव| विख्यात के साथ ही इसकी भव्यता, निर्माण कला और प्राचीनता भक्तो को सम्मोहित करती है|
गंडक नदी उपाख्य नारायणी तट स्थित शिव मंदिर आस-पास के क्षेत्रों में धर्म की सजीवता और जीवन्तता को प्रकट करती है| लोगों की श्रद्धा और निकटता मंदिर के प्रति सराहनीय रही है| श्रावण मास में भक्तो के भीड़भाड़ इसकी अस्था का ही अनथक कहानी है| नारायणी नदी इसकी भव्यता और महानता का शाश्वत प्रतीक है| सौकड़ो वर्षों का इतिहास है, शिव मंदिर का और नारायणी आदिकालीन| प्राचीनता का मूकवाद करती यहां की जीवन्तता और लोगों का विश्वास आस्था का रहा है| लोलुपता भी होता है मिठास जहां है| कुछ निस्वार्थ तो कुछ स्वार्थ चलता आया है| बहुत दिन बाद सेवा का भाव क्या है? शीघ्रता से आस्था उभर आया निस्वार्थ का तो मन में बवाल उठना केवल भ्रम नहीं!  
रेवा ग्राम अब रेवा धाम बनने के लिए तैयार है विचार बदल कर धाम की ओर अग्रेसित रेवा को बधाई| तुम धाम बन पाओ, जब मैं भक्त बन जाऊं| सुधारवादी हावी है हम बदले| हम जैसे तीसरे पीढ़ी गम्भीरता से तो नहीं, तन्मयता और ताकत से दायित्वहीन होकर नोकझोंक करते रहे है| जब तब उभर कर मामला आया है, हानि या लाभ!
आज इस विषय पर लिखने का भी कोई ना कोई
उद्देश्य है तो शिव मंदिर का जीर्णोध्दार हो| इसी उद्देश्य के इर्द-गिर्द व्यवस्थाकर्त्ता मंदिर की सेवा में  अग्रेसर टोली में रहेंगे| मंदिर की भव्यता और विकास की चर्चा चल पड़ी है| मंदिर के जीर्णोध्दार साथ ही इसकी साजसजा आगे, महानता को बढ़ायेंगी|रेवा से रेवा धाम की ओर चले कदम को सिर झुकाकर अभिनन्दन| 
                     

शनिवार, 1 सितंबर 2018

राहुल गांधी शिव भक्त या चीन भक्त? - जितेश सिंह

कैलाश मानसरोवर यात्रा में उलझते जा रहे राहुल गांधी| भक्ति मार्ग बड़ा कठिन होता है,  राहुल गांधी का राजनीति व भक्ति दोनों हमेशा विवादों से घिरा रहा है| चाहे वो गुजरात चुनाव के दौरान सोमनाथ मंदिर में गैर-हिन्दू डायरी में हस्ताक्षर करने का मामला हो या हाल फिलहाल में कैलाश मानसरोवर का|
वैसे भी बच्चों की तरह बयानबाजी और भाषण देते है, राहुल गांधी| बोलने वाले तो यहां तक बोलते है कि राहुल गांधी अभी राजनीति पाठशाला में पढ़ने वाले विद्यार्थी है और राजनीति विश्वविद्यालय के कुलपति बनने की ईच्छा रखते है| उनको राजनीति सीखने की आवश्यकता है| एक जिद्दी बालक की तरह नहीं, सभ्य बालक की तरह वरिष्ठ, अनुभवी, भारतीय राजनीति की समझायिस रखने वाले पार्टी के अन्य किसी कार्यकर्ता को अवसर देना चाहिए| इससे कांग्रेस पर परिवारवाद और वंशवाद का विरोध भी थम जायेगा| राहुल गांधी जब अपने भाषण में यह बात स्वीकार करते आये है कि उनमें अनुभव की कमी है,  सहनशीलता, सहजता से बात करना, चिंतन और मंथन करना,राष्ट्रभक्ति, समरसता और हिन्दूत्व की विचारधारा की समझ भाजपा, मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सीख रहे है| यह एक बचकाना वाला भाषण था| इसका हस्य जितना सोशल मीडिया पर हुआ, उतना ही कड़ी आलोचना राजनीति विशेषज्ञों ने की| उन्होंने कहा इस प्रकार का भाषण लोकसभा बोलना कांग्रेस नेता की अपरिपक्वता को बतलाता है| राजशाही व्यवस्था में शासक का पुत्र युवराज और राजा बन जाये यह उतना आसान नहीं, सबसे बड़े लोकतांत्रिक राष्ट्र का प्रधानमंत्री बनने की बात है| जिसमें बच्चकाना हरकते नहीं गंभीरता हो| अनुभव की समझ होनी चाहिए, जिसे ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी क्षेत्रों की जानकारी होनी चाहिए| जिसे आम जन जीवन की जानकारी हो| जो राजपथ से राजपथ पर रहने वाला नहीं, जनपथ से राजपथ वाला हो| जो बिना जानकारी के लिखे गये भाषण को पढ़कर समोहन करने वाला नहीं,  गरीबी और बेरोजगारी की परिभाषा याद करने वाला नहीं, उससे साक्षात्कार करने वाला हो| भाषण याद करके समोहित करने का कोई पैतरा काम नहीं आयेगा|
कांग्रेस विवश है, ऐसा लगता है जैसे कूटनीति हो या राजनीति सभी गांधी परिवार को समर्पित कर दिये है|
कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर राहुल गांधी निकल चुके है| सुत्रों की माने तो 12 सितम्बर को वो वापस लौटेंगे| वैसे यह यात्रा भी वाद-विवादो के घिरे में है| जहां भाजपा ने राहुल गांधी के यात्रा पर एक के बाद एक सवाल दागे वही उनके बचाव में भी कई बयान सामने आये| भाजपा ने कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान एयरपोर्ट पर चीनी प्रतिनिधित्व के मिलना गलत बताया तो वही राहुल को चाईनिज गांधी बता दिया| इसके साथ ही पूर्व के कई गांधी परिवार के संबंध पर भी बयानबाजी हुई| डोकलाम विवाद के समय चीनी आधिकारी से राहुल गांधी का मिलना,  2008 में ओलिंपिक के् दौरान चीन के निमंत्रण पर गांधी परिवार का चीन जाना और अंत में नेहरू की 'हिन्दी- चीनी भाई' की नीति को भी केन्द्रबिन्दु बनाकर भाजपा ने

राहुल और कांग्रेस को घेरना चाहा तो जवाब में यही आया शिव और भक्त के बीच जो आया भस्म हो गया| वही यह मुद्दा सोशल मीडिया पर तुल पकड़ा तो कई लोग की पोस्ट "राहुल गांधी शिव भक्त नहीं, चीन के भक्त है|" अब ये तो राहुल गांधी ही बतायेंगे वो किसके भक्त है?  लेकिन धर्म की राजनीति से सत्ता मिल जाए, यह भारत से लिए कोई नयी बात नहीं है|

मंगलवार, 28 अगस्त 2018

तुझमें मैं हूं! - जितेश सिंह

तुझमें मैं हूं! 

जितेश राजपूत 

अ.बि.वा.हि.वि.वि.

,भोपाल 


मेरी सांसो में 

जिन्दा तू आज भी! 

तुझमें मैं हूं

तेरी आँखों में मैं 

जिन्दा आज भी 

लम्हा प्यार वाला

बीत गया, 

फिर भी प्यार का, 

ऐहसास आज भी 

तुझमें मैं हूँ... 

थिरकते ओठो के बीच

मैं आज भी, 

वो गीत और मस्ती 

आज भी 

तेरे साथ मेरी फिल्मी दुनिया

वो आज भी

तुम आज भी 

मेरे सपनो में आती हो 

क्यू आँखे बंद रहती है 

जब तुम पास आती हो

नींद के गहराई में जिन्दा 

तू आज भी 

दिन के ऊजाला में 

एक तू ख्वाब है 

उन ख्वीबों में 

जिन्दा हम दोनों आज भी ...

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

मेरे युगपुरूष अनंत में विलीन हो गये! - जितेश सिंह

चिठ्ठी ना कोइ सन्देश, जाने वो कोन सा देश, कहा तुम चले गये....

15 अगस्त से ही अटल जी की स्वास्थ्य बिगड़ने की खबर आ रही थी| उस दिन देर रात तक न्यूज देखता रहा, मोबाईल से अपडेट लेता रहा| कल 16 अगस्त को



हौसले और सिद्धांत हिमालय जैसे अडिग थे| जिस लोकतंत्र की निष्पक्षरूप उन्होने सेवा की| राष्ट्र सेवा को ईश्वरीय सेवा मानकर उसमें पुरी जिन्दगी झोक डाली हो| वैसे मनुष्य के निर्धन पर राष्ट्र ही नहीं, प्राकृति भी भाव-विभोर हो जाती है| मौसम ऐसी संदेश को प्रचारित कर रही जैसे कोई बड़ा दुःख का पहाड़ टुट पड़ा है| अनजान और अबोध बालक भी अनुभव कर रहा, आज उसकी खुशी और खिलखिलाहट क्यू उसका साथ छोड़ रही है? 


सुबह से न्यूज देख रहा था| पल-पल की खबर पर नजर बनायें हुये था| सुबह से मेरे आंखों को भरोसा था, सब्र की घड़ी में हर पल अटल जी की कविताएं गुंजती रही, उनके भाषण गुंजते रहे| साथ-साथ एक विश्वास भी बना रहा, इतना
विकसित मेडिकल साइंस हो गया है, उन्हें बचा लेगा| भले ही बेड पर ICU में जीवित थे, यही बहुत बड़ी बात थी| 15 अगस्त शाम को अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने लगी| उनके बाद 16 अगस्त सुबह से ही प्रधानमंत्री के अलावे कई अन्य दल के नेताओं का आना-जाना लगा रहा| शाम करीब 5:05 मिनट पर डॉक्टर ने उन्हे मृत घोषित कर दिया| देश पर मानो दुःख का पहाड टूट पड़ा हो| पुरा राष्ट्र स्तब्ध है,  गहरे सदमें में है, क्यकि अटल जी गहरे नींद में चले ग़ये,  जहां से लौट कर कोई नहीं आया| उनसे मेरा कभी किसी उद्धबोधन या कही साक्षात दर्शन नहीं हुआ| टीवी, न्यूज इटरनेट से कही अधिक बड़े-बुजुर्ग,  शिक्षक, समाज से सबसे उस राष्ट्रपुरूष की कहानी सुनते आया हूं| उनकी कविताएं सुनी है|

भारतीय राजनीति में क्षितिज़ के समान विशाल और उदार चरित्र वाले अटल जी एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे| उन्होंने जीवन में जिस पथ को चुना, एक काली कोठरी थी, फिर भी बेदाग निकल गये। अटल जी सिद्धांतों और कर्तव्य की अग्निपरीक्षा को तो पार गये, मगर ज़िन्दगी और नियती से बीच शांत रह गये| आज हम सब को महानायक,  हमारा यूगपुरुष छोड़ कर अनंत में विलीन हो गया| 
यह केवल राजनीति के लिए झटका नहीं, पत्रकारिता,  साहित्यकार, कवि, राष्ट्रभक्त, जन-नायक, मार्गदर्शक, सामाजिक कार्यकर्ता, स्वमंसेवक हर रूप में महानता के शीर्ष पर रहे, एक विराट व्यक्तित्व का निधन है| उनकी रिक्त स्थान की भरपाई करना कई दशकों तक संभंव नहीं है| इस मृत्यु लोक में लोखों जन्मे, लोखों की मृत्यु से आलिंगन हुआ और होता रहेगा, मगर अटल जी जैसा व्यक्तित्व कई दशकों में जन्मते है| 
जिस पथ पर उन्होंने चला, उनके विचार और सिद्धांतों की आवश्यकता है, खासकर आज की राजनीति में| वह परम्परा जिसकी शुरूआत उन्होंने की थी आज उसको गति देने की आवश्यकता है| 
अटल जी की भाषा, शब्दावली ही उनका हथियार और तलवार था,
किन्तु उन्होंने इससे किसी का गला नहीं कटा और ना ही कभी अपना हाथ कटा| अटल जी का मन कोमल जरूर था मगर उनकेआजादी के बाद 16 अगस्त, 2018 की रात सबसे काली रातों में से एक है, जिसने आंधी में दीपक जलाने वाले को अपने अंधकार में समा लिया| अटल यूग का समाप्त हो गये, विचार अमर रहेंगे| जय अटल! जय भारत! जय हिन्दी!

बुधवार, 15 अगस्त 2018

खुशिलाल के छात्र दुखिलाल और मीडिया जन-आशीर्वाद के लोलुप में व्यस्त| जितेश सिंह

आज चौथा दिन भी बीत गया| मामा तो आये नहीं और नहीं आया उनका कोई आश्वासन| खुशीलाल आयुर्वेद संस्थान, भोपाल के छात्र-छात्रा पिछले चार दिनों से अनिश्चितकालीन धरना पर बैठे है| 10 अगस्त को मैं अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी वि.वि., भोपाल आने-जाने समय धरना पर बैठे छात्र-छात्रों को देखा और अनदेखा करके चलते बना| मुझे लगा अक्सर छोटी-छोटी बातों पर घर की तरह रूठने वाली बीमारी अभी तक पीछा नहीं छोड़ी होगी| वास्तविता को समझे बिना बात-बात पर आन्दोलन करना, धरना पर बैठना आदत बन गयी है| पढ़ने-लिखने के बजाये धरनाबाजी कहाँ तक उचित है? इसे भी आम धरना की तरह सोच कर धिसक गए, क्यूकी मुझे विश्वास था, कल ये सरे लोग फुर्र हो जायेंगे| मैंने अगले दिन भी विवि गया देखा फिर से धरना, थोडा स्वार्थ में घिरा हुआ
था, इसलिए सोचा कहा इस पचारे में घिसता रहूँगा आखिर 1400 किलीमीटर दूर बिहार के मुजफ्फरपुर से आया हूँ| बदनामी भी बिहारी वाली पीछा नहीं छोड़ती है| लेकिन विवि से लौटते समय मुझसे रहा नहीं गया, मैं बस से तुरंत खुशीलाल बस स्टॉप पर उतर गया| कैम्पस में गया, वहाँ के छात्रों से बात की समस्या की लिखित पर्ची मांग लिया| जाते- जाते मैंने कहा "क्या कोई मीडिया वाला इस धरना के बारे में जानकारी नहीं लिया है?" एक छात्र ने निराश होकर कहा "एक दो छोटे स्तर के मीडिया चैनल और प्रिंट मीडिया से नवसीखिए पत्रकार ने दौरा किया है| कोई पेपर या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में खास मामला नहीं बन पाया है|" मैं समझ गया शिवराज के जन-आशीर्वाद में मीडिया भोज का लुप्त उठा रहा| रोज फ्रंट पेज पर शिवराज और कमलनाथ के आलावे मीडिया को कोई दिखता कहाँ? छात्र चार दिन से परेशान है, धारना पर बैठे है| क्या कोई मीडियाकर्मी है, जो अपने आप को जन-आवाज मनाता है| मैंने खुशीलाल के छात्रों से बात की है, सर बच्चे सच में परेशान हैं| इसकी परेशानी का कारण शुल्क में वृद्धि, आयुर्वेद के डॉक्टरों की बहाली में अनियमितता, इंटर्नशिप कर रहे छात्रों की मानदेय में आपेक्षाकृत कमी है| इसके साथ ही कई ऐसी समस्या जिससे कारण इसमें हतासा है, निरासा है, विरोध से स्वर है, दुःख की झलक है, भविष्य की दरकार है| इनके आवाज राजनीति नहीं, तो क्या आप प्रकाशित करेंगे? इसके कुछ पैसे नहीं मिलेंगे, हो सके तो उलटे कोई सरकार के तरफ से फोन काँल आ जाए| देश को पत्रकार की

जितेश सिंह
अ.बि.वा.हि.वि.वि.,भोपाल

आज भी तलास है, यहाँ कोई पत्रकार है, जो इस चार दिनों से विद्यार्थियों के संघर्ष का आवाज बन कर शिवराज तक पहुंचा सके| अपील भी है और गुजारिश भी, हमें इनका साथ देना चाहिए| इसका हम विश्वास और आशा का एकमात्र सेतु है| कहते है, विद्यार्थी अवसर है, राष्ट्र का| तो कभी अवसर को भी अवसर दीजिए| इसकी भी समस्या गंभीर हैं, राजनीति नहीं तो क्या हुआ? इसके समस्या को कभी फ्रंट पेज पर प्रकाशित करे| केवल राजनीति करके जनमानस, जनकल्याण, सूचना और जागरुकता की बात बेकार है|
       

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

स्वमं पूर्वाग्रह का शिकार हूँ! जितेश सिंह

जगजाहिर! हमारा अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल| पिछले तीन महीनें में 35 बार प्रिंट मीडिया ने यहाँ की शिक्षा प्रणाली को कटधरे में खड़ा किया है| मुझे भी पहले लगता था कि मीडिया को बिना आतंरिक स्थिति जाने, कुछ भी पक्ष-विपक्ष तय करना जल्दीबाजी होगी| धीरे-धीरे मैं मीडिया के विचारों से सहमत होने लगा और क्यू ना हूँ? आज 1 वर्ष 17 दिन के बाद मैं पूर्णतया मीडिया का पक्षधर हूँ और यह इसलिए नहीं की मैं पत्रकारिता का छात्र हूँ बल्कि इसलिए मैं हिंदी वि.वि. का छात्र हूँ|

जितेश सिंह
अ.बि.वा.हि.वि.वि., भोपाल

मेरे लिए हिंदी में अध्ययन करना गौरव की बात है| ज्यादा ज्ञानी तो नहीं जो पढ़ा, लिखा, सुना हूँ वही बता रहा; हिंदी में ज्ञान का प्रेम गुड़ छुपा है, अदभुत भाषा है| लोग गुस्से में भी बोलते है " मैं आपकी बात से असहमत हूँ|" एक द्वंद्व में भी शिष्टाचार की कड़ी जोड़ती है, हिंदी| हिंदी केवल भाषा नहीं व्यवहार, शिष्टा, सदाबहार और प्रेमी है| अगर विश्व में सभी हिंदी भाषी होते तो कभी झगड़ते ही है| ऐसी सहिष्णुता हमारी हिंदी है| जिसने पूर्व में कई भाषाओँ को अपने में मिला लिया और उफ़ तक नहीं की| विचारणीय है, ऐसी सहिष्णु हिंदी में आराजकता कहाँ से आई? हिंदी में कोई आराजकता नहीं आई है, बस राजनीति के चपेट में आ गयी| भले ही एक कुशल और अद्वितीय माने-जाने वाले लोकप्रिय प्रधानमंत्री अटल जी भाजपा और संघी थे| हमारा वि.वि. कोई राजनैतिक अटल नहीं शिक्षा रूपी अटल है, जब-जब कोई राजनीति की बाते करेगा तब-तब हिंदी आराजक बन जाएगी| शिक्षा का गोलमाल होना, हंगामा बढेगा और मीडिया आलोचना करेगी| वि.वि. विद्वानों की नीतियों से चालना बेहतर होगा, ना की भाजपा की नितियों से| कारण दो ही नजर आते है; पहला शासन के आगे लाचार और बेबसी, दूसरा व्यक्तिगत स्वार्थ दोनों से लड़ना होगा हमें| किसी की योग्यता प्रथम वर्ष और द्वितीय वर्ष नहीं हो सकती, ना किसी में संगठन की आयु की भूमिका होनी चाहिए| एक पक्ष और भी ना ही किसी सांसद और मंत्री के सेवाकारों को रखा जाना चाहिए, हमें हिंदी के लिए शिक्षाकारों की की जरुरत है| ऐसे नहीं किसी को विभाग की बागडोर दीजिए, जो आपका भी स्तर गिरा दे| ऐसा हो रहा है, किसी भी छात्र को आज संतुष्टि नहीं और कैसे हो कोई पढ़ाने वाला भी तो हो? आज अपनी विभाग की बात करता हूँ, पत्रकारिता विभाग| किसकी क्या भूमिका पता नहीं? परीक्षा विभाग हो या शुल्क विभाग किसी से कोई तालमेल ही नहीं| जवाब बहुचर्चित हैं " मेरा काम यह नहीं" सही में आपका काम यह नहीं, आपकी परिभाषा ही दूसरी है| जब कुछ बता नहीं सकते, पढ़ा नहीं सकते, सिलेबस भी नहीं दे सकते, क्लासे नहीं लगती तो फिर क्यू 75 प्रतिशत उपस्थिति की बात कर रहे और रजिस्टर है जिसमें उपस्थिति दर्शाएंगे? मैं भोपाल में हूँ द्वितीय सेमेस्टर के परीक्षा के कुछ दिन बाद होस्टल बंद हुए| उसके बाद एक नये रूम में जैसे-तैसे रहता हूँ, विरोध नहीं करता हूँ| कौन सी नियम का आलाप जपते है, वि.वि. स्व घोषित प्रभारी? जो छात्र के आते ही बोलता है "क्यू आये हो?" मुझे लगता है, जाती-कोम के लोगों की अलग निति और रीती की बात मुद्दा बन ही गई है, विभाग भी गंगा स्नान का लाभ उठाये| पहला निति कोई छात्र किसी परिस्थिति में दुसरे क्लाससाथी की मदद नहीं करेगा, दूसरा निति आते ही बताना पडेगा क्यू आये हो? विभाग में नहीं पुस्तकालय में बैठना है| ऐसी स्थितियों से हमें मुक्ति मिलेगी या मुक्त हो जाऊंगा समय का निर्णय है| मैं व्यक्तिगत आलोचना नहीं करता "स्वमं पूर्वाग्रह का शिकार हूँ|"
          

बुधवार, 1 अगस्त 2018

प्रधानमंत्री से ज्यादा भाजपा के ब्रांडएम्बेसडर मोदी - जितेश सिंह

कुछ महीने बाद चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होने है| ऐसे में जानकारों, विश्लेषकों, टिका-टिप्पणीकारों की माने तो प्रधानमंत्री का अबकी बार लाल किले से भाषण पहले से हट कर होगा| इस बार 15 अगस्त को लाल किले से क्या बोलेंगे मोदी? पांच साल के कार्यकाल का यह लाल किले से आखिरी संबोधन होगा| तो वही पहले से ही भाजपा चारों राज्यों (मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम) में चुनावी बिगुल बजा चुकी है| इन राज्यों में भाजपा के कार्यकर्त्ता की अपेक्षा भी मोदी के भाषण से जुड़ी होगी तो वही जनाता-जनार्धन की भी निगाहें फड़क रही है| मोदी का तोफा क्या होगा लाल किले से?

कुछ राजनीती विश्लेषकों की माने तो यह भाषण 2019 आम चुनाव की पृष्ठ भूमि तय करेगी| इसलिए सबकी नजर आने वाले 15 अगस्त को लाल किले पर होगी कि मोदी क्या बोलेंगे? क्या वे कोई बड़ी घोषणा करेंगे? या अपनी सरकार के कामकाज का ब्योरा ही पेश करेंगे| उनके करीबी कहते है
कि प्रधानमंत्री अपने भाषण के लिए आम लोगों से राय लेते है| वही मुद्दा उठाते है, जो लोगों के द्वारा सुझाए जाते है| तो क्या इस बार भी वही मुद्दे होंगे, जिसका सुझाव लोगों ने दिया होगा? या कोई बड़ी लुभावनी घोषणा कर सकते है? स्थितियों को देखे तो लगता है, इस बार मोदी किसानों, जवानों, नवजवानों और कर्मचारियों के लिए कोई बड़ा ऐलान कर सकते है? सूत्रों की माने तो केंद्र सरकार पहले से ही किसानों को लेकर संवेदनशील है| माना जाए कि अबकी बार लाल किले से अन्नदाता के लिए कोई बड़ी घोषणा की तैयारी में है सरकार? सरकार फसलों के न्यूतम समर्थन मूल्य में रिकार्ड बढ़ोतरी करने जा रही है| या इसके आलावे कोई और बड़ा प्रलोभन का पेटारा लाल किले से खोला जाएगा? किसानों के लिए इनपुट सब्सिडी की घोषणा, किसानों की निश्चित आय सुनिश्चित करने या किसानों के लिए पेंशन की घोषणा संभव है| जैसे यूपीए की सरकार ने रोजगार का अधिकार कानून बनाया था, वैसे ही सरकार न्यूतम कमाई का वादा कर सकती है, जिसका भुकतान सीधा लोगों के खाते में जाए|
कश्मीर को लेकर कोई बड़ी घोषण भी लाल किले से मोदी कर सकते है? शिक्षा के अलग-अलग स्तरों (प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षण संस्थान) में छात्रों के हित में कोई बड़ा फैसला लेकर युवा मन को टटोलने का प्रयास भी कर सकते है| 

जितेश सिंह

अ.बि.वा.हि.वि.वि., भोपाल 

या प्रोफेसरों और नौकरशाहों की रिटायरमेंट की अवधी बढ़ाई जा सकती है? हो सकता बेरोजगारों के लिए लुभावक भाषण ही बोल दे| मोदी के भाषण का मुख्य मुद्दा जो हो, इतना साफ है कि अबकी बार मोदी 15 अगस्त को प्रधानमंत्री से ज्यादा भाजपा के ब्रांडएम्बेसडर के नाते लाल किले से गरजेंगे|               


                                                                 

कांग्रेस की निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में भारी गिरावट के पूर्वानुमान

भविष्य में क्या होंगी, मैं नहीं जनता हूँ |  इस दौर में बहुत लोग अभिव्यक्ति की आजादी का अलाप जप रहे है |  तो मुझे भी संविधान के धारा  19  क...