रविवार, 31 दिसंबर 2017

नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं! - रामधारी सिंह दिनकर

रामधारी  सिंह " दिनकर " जी की कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं
धरा ठिठुरती है सर्दी से
आकाश में कोहरा गहरा है
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर
सर्द हवा का पहरा है
सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं
चंद मास अभी इंतज़ार करो
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही
उल्लास मंद है जन -मन का
आयी है अभी बहार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो
फागुन का रंग बिखरने दो
प्रकृति दुल्हन का रूप धार
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य – श्यामला धरती माता
घर -घर खुशहाली लायेगी
तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय गान सुनाया जायेगा
युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिये कोई उधार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं

~~~~~~राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर ~~~~~~~

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

मैं रिपोर्टिंग करता हूं........ जितेश हिन्दू

मैं रिपोर्टर हूं,                                
रिपोर्टिंग करता हूं. .....

पक्ष-विपक्ष के चक्कर में,
खबरों का मोल-भाव करता हूं|
मैं रिपोर्टिंग करता हूं......

मैं समाज का पहरेदार,
खुद ही कलम को बेचता हूं|
मैं रिपोर्टिंग करता हूं......

मैं ही, समाज को पथ दिखलाता,
और खुद लक्ष्यहीन हूं|
मैं रिपोर्टिंग करता हूं......

मैं घुमक्कड़ हूं,
फिर भी मार्ग से भटक जाता हूं|
मैं रिपोर्टिंग करता हूं.......

मैं विज्ञप्ति को,
समाचार बना देता हूं|
मैं रिपोर्टिंग करता हूं.......

मैं इस दौर का सबसे बड़ा मजहबी
कलमों से आतंकवाद फैलाता हूं|
मैं रिपोर्टिंग करता हूं......
                          जितेश हिन्दू








शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

युवा बने! जितेश हिन्दू

युवा अपने आप में बहुत ही आकर्षित शब्दांश है. हमें अक्सर नेताओं के भाषण, संबोधन और रैलियां में सुनने को मिलता है. लेकिन कभी हमने विचार किया, युवा कोन है? वर्तमान में सबसे चर्चित शब्द है 'देश के युवाओं' कौन देश का युवा है? एक विशाल जनसमूह का विचार जब क्रियान्वित होता है तो वही विचार को क्रिया में बदलने की यही प्रक्रिया युवा है. इसका तात्पर्य है कि 'देश का युवा' वही हो सकता है, जो देश के लिए सामर्थ्य और कौशल का परिचय दें. युवा माँ भारती की वाणी की को सुनने वाला देैविय पुरुष है. युवा देश की आवाज नहीं, देश का चारित्र है. अपने आंतरिक और बाह्य प्रत्येक स्थिति में देश के नवनिर्माण और संस्कृतिक उत्थान के लिए संघर्षवान पौरूष ही युवा है नहीं तो वो किशोर है. जिसे ऐतिहासिक और संस्कृतिक मार्गदर्शन की जरुरत हैं.
भारत के किशोरों को युवा बनना है, मातृ भू के निर्माण के लिए सतत मनन चिंतन करना और फिर राष्ट्रकल्याण के लिए उसे क्रियांवित करना है. इसके  लिए हमें शासन, प्रशासन और सरकार पर निर्भर न होकर स्वयं को प्रेरित कर देश के नवनिर्माण की ओर अग्रसर होना है.
विवेकानंद ने भी युवाओं के बारे में कहा "किसी राष्ट्र का भविष्य कैसा होगा,अगर यह जानना हो तो वहां के युवा उस राष्ट्र के बारे क्या विचार करते?"
                                      - जितेश हिन्दू  
                         

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

भारत की राजनीति यात्रा! जितेश हिन्दू

जब शंखनाद हुआ भारत भू पर,    
वीर आंखों की अग्नि से ,
भस्म हो गई अंग्रेजी शासन.
भारत माता गौरवान्वित हुई 
ऐसे वीर पुत्रों को पाकर 
दुर्भाग्य से पवित्र माता के आंचल पर
राजनीति के बीज बोए गए 
गरीबी, भ्रष्टाचार और आतंकवाद 
जैसे- दुष्ट पहिए ने संपूर्ण
भारत को कुचल डाला.
चारों ओर निराशा थी 
भय था तो आक्रोश भी था
संपूर्ण क्रांति का नारा दिया,
जब लोकनायक ने हुंकार भरो 
थर्रा गई सारी भ्रष्ट कुर्सीया 
राजनीति ने दांव पेच खेले
आपातकाल नामक पहिए ने 
जब राष्ट्रवाद को कुचलना शुरू किया
वो कुचल ना सके अटल जी को 
सुशासन का रथ निकला 
वर्षों से प्यासी धरती को
 मानो जैसे अमृत मिला 
विकास पथ पर बढा़ भारत
परमाणु परीक्षण कर
बन गये हम शक्तिमान 
कूटनीतिज्ञ चाल को
समझ ना सकी
भारत की जनता 
10 वर्षों का मौनवास हुआ
भ्रष्टाचार और आतंकवाद ने
बदल डाले सारे आकड़े
दुष्ट शत्रुओं की छाया
भारत पर मडरा रही
लेकिन!
पुनः सूर्योदय हुआ!
सशक्त और संगठित भारत,
विकास पथ अग्रेसित
अब वक्त तय करेगी,
हम परखेंगे,
कितने वादे, कितने सफल..

संचार के प्रभावी सिद्धांत!

संचार विशेषज्ञ और फ्रांसीसी नागरिक बर्जेट ने संचार को प्रभावी बनाने के लिए 7 सी सिद्धांत की अवधारणा पेश की. और कहा कि इसका उपयोग का संचारकर्ता अपनी बात बड़ी आसानी से प्राप्तकर्ता के मस्तक में पहुंचा सकता है. उनके अनुसार एक संचारकर्ता के पास इस प्रकार के गुण होने चाहिए-
 1. स्पष्टता (clasity)
2. संदर्भ (Context)
3. निरंतरता (continuity)
4. विश्वसनीयत (credibility)
5. विषय वस्तु (content) 
6. माध्यम (channel)
7. पूर्णत (completeness) 
1. स्पष्टता- वही संदेश प्राप्तकर्ता को आसानी से समझ आता है. जो स्पष्ट हो, इससिए संदेश को सरल और यथाशक्ति समान्य शब्दों में तैयार करना चाहिए. उलझाने और उलझाव या मुहावरे युक्त संदेशों को प्राप्तकर्ता अनदेखा कर देते हैं.

2. संदर्भ- बिना संदर्भ के कोई भी संदेश अधूरा है. संदर्भ से संदेश की विश्वसनीयता बढ़ जाती है. संदर्भ से संदेश में गलती होने की संभावना कम होती है. क्योंकि आपका संदेश संदर्भ के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है. यही कारण है कि गलती नहीं होती और होती भी है तो पकड़ में आ जाती है. संदर्भ के कारण संबंधित प्राप्तकर्ता की भागीदारी या सहभागिता बढ़ जाती है.

3. निरंतरता- संचार एक अनवरत प्रक्रिया है. संदेश में एक साथ कई तथ्यों के समावेश होने की स्थिति में निरंतरता का होना आवश्यक है. इसका मतलब मुख्य तथ्य के बाद संदर्भ में क्रमश: कम महत्वपूर्ण, उससे कम महत्वपूर्ण ,सबसे कम महत्वपूर्ण, और अंत में बिना महत्व के संदेश से है. आदर्श संदेश वह होता है. जिसमें महत्वपूर्ण तत्व की पूर्णवृत्ति या दोहराव होती है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है अगर पहले बार में प्राप्तकर्ता संदेश के अर्थ को किसी वजह से समझ नहीं पाता. तो निरंतर दोहराव से तीसरी बार में जरूर समझ लेता है.

4. विश्वसनीयता- संचार का मूल आधार विश्वास है. जो संचारकर्ता की नियत पर निर्भर करता है. संदेश में विश्वसनीय होने का प्राप्तकर्ता के मन में संचारकर्ता की अच्छी छवि बनती है. एक समय ऐसा भी आता है. जब संचारकर्ता से प्राप्तकर्ता संदेश को प्राप्त कर, उसे अपने परिचय में फैलाता है. विश्वास पर खरा नहीं उतरने वाले संदेश को प्राप्तकर्ता जल्द ही नजर अंदाज कर देते हैं. 

5. विषय-वस्तु- संदेश किस से भेजा जाए या प्राप्तकर्ता की रूची पर निर्भर करता है. इसी के अनुसार संदेश के विषय वस्तु भी तैयार करनी पड़ती है. संदेश प्राप्त करने वाले की उम्र, शिक्षा, भौगोलिक स्थिति, आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्तर, और रुचि के विषय जैसे कला,संस्कृत, आदि के अनुरूप संदेश को तैयार करना चाहिए. विषय वस्तु अगर रोचक, सूचनापद्र और ज्ञान वर्धन हो तो, प्राप्तकर्ता उसी तरह की और संदेशों की अपेक्षा रखता है.
6. माध्यम की भूमिका इसी लिए महत्व होती है. क्योंकि परिस्थिति, प्राप्तकर्ता और संदर्भ की प्रकृति एवं विषय वस्तु के माध्यम का प्रभावशीलता घटती बढ़ती रहती है. उदाहरण के लिए अगर किसी को ए प्लस ग्रुप का खून तुरंत चाहिए तो, संदेश का माध्यम समाचार और पत्र और टेलीविजन ना होकर सोशल मीडिया या इंटरनेट या इसके उपलब्ध प्लेटफार्म हो   जैसे ह्वाटएेप, फेसबुक इत्यादि और मोबाइल प्लेटफार्म जैसे एस.एम.एस हो तो संदेश को प्रभावशाली तरीके से बहुत व्यापक समूह में पहुंचाया जा सकता है. इसी तरह किसी धार्मिक आयोजन याद हादसे की सूचना तत्काल देने हो तो माध्यम का चुनाव ऐसा होना चाहिए ताकि प्राप्तकर्ता तक तुरंत संदेश पहुंच जाये. सरकारी कार्यक्रम हो या किसी दिलचस्प विषय-वस्तु से जुड़ी सूचना कोई सूचना हमें प्राप्तकर्ता तक बाते जल्द पहुंचाने में प्राप्तकर्ता की पहुंचने के लिए ऐसा माध्यम चुनना चाहिए, जो लोकप्रिय हैं.

7. पूर्णता- प्रभावी संचार के संदेश का पूर्ण होना जरूरी है. संदेश अपूर्ण हो तो प्राप्तकर्ता को संतुष्टि नहीं होगा. परंतु संदेश पूर्ण होने पर प्राप्त करता को आत्मसंतुष्टि होती है. अतः संदेश का पूरा होना आवश्यक है, नहीं तो आपका संचार अधुरा रह जायेगा और आपके संसार को प्राप्तकर्ता अवहेलना करेंगे.

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

यह पाप मैंने किया है..... जितेश सिंह

न्यायपति श्री राम को,
न्यायालय पहुचा कर आया हूं|
यह पाप मैंने किया है....

पवित्र गंगा स्नान कर,
मन का स्वार्थ बढ़ाया है|
यह पाप मैंने किया है....

हिंदू शब्द का प्रयोग कर,
कायरता दिखाया है|
यह पाप मैंने किया है....

दुश्मनों को पनाह दे कर,
उसे घर बैठाया है|
यह पाप मैंने किया है....

श्री राम का उपासक हो कर,
उचित न्याय नहीं कर पाया|
यह पाप मैंने किया है....

कब लहराएगी भागवा ध्वज?
कब उठाएंगे तलवारे?
अब तक तिथि निर्धारित ना कर,
यह पाप मैंने किया है....

                            जितेश हिंदू

संपादक और उसके लेखनी के मनोभाव के क्रम! जितेश सिंह

संपादक औपचारिक रूप से समाज का मार्गदर्शन भले ही नहीं करता हो. परंतु अनौपचारिक यानि मानसिक रूप से समाज का मार्गदर्शन तो करता ही है. लेखन की एक ऐसी कला जो आपके विचार को प्रभावित करता हो. आपके भविष्य के निर्धारित कार्यक्रमों को आपके हाथों ही बदलने की दक्षता रखता हो, संपादक कहलाता है. जब हम कोई लेख या प्रेरक प्रसंग पढ़ते या सुनते हैं. तो उसी कालखंड में अपना मन विचलित करता है. जो उस महान व्यक्तित्व और इतिहास को पुनर्जीवित कर समाज के बीच रख देता है. मन के अंतर्भाव में उसका अनुसरण करने. उनके बताए हुए मार्ग पर चलने का पहला कदम रखा जैसे कि  पृष्ठ पलटना पड़ा. पुनः मेरा मन 16 दिसंबर 2017 में वापस आ गया. ऐसी लेखन शास्त्र की यह जादूगरी, जो आपको वास्तविक तो नहीं बल्कि मानसिक तौर पर इतिहास का दर्शन करने की क्षमता रखता हो, आगे की कार्यक्रम और योजना की भविष्यवाणी करने की दक्षता हो, वही संपादक है. जब हम-आप हजारों वर्ष पुराने श्री कृष्ण-अर्जुन संवाद में खो जाते हैं. यह काला कुछ और नहीं संपादकीय लेखन है. जिसे एक कुशल संपादक की भावना से कलम के द्वारा कोरे कागज पर लिखी जाती है. वर्तमान परिपेक्ष्य में संपादकीय लेखन की कला चुनौतीपूर्ण है. देश,काल, खंड, परिस्थिति के अनुसार संपादन करने के इस कला में परिवर्तन आ गया है. यानी संपादक वर्तमान में विभिन्न वादों और राजनीतिक दलों की भावना के वशीभूत हो गया है. काव्य, लेख, टिप्पणी आदि माध्यम से समाज के कष्टों का निवारण करना संपादन है या अपने विचारों, मनोभाव, दलगत बातों का प्रचार, एक संपादक के लेखनी में दिखते है. खौर जो भी हो. इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि, इस विषय पर लिखना और समझना कठिन है. इसलिए नहीं कि संपादक शब्द में वह तेज नहीं रहा या समाज में उसका महत्व नहीं है. बल्कि जब हम संपादन की बात करते हैं. तो समाचार पत्र, न्यूज़ चैनल, गीतकार, संगीतकार, लेखक, कलाकार, भाषणकर्ता, शिक्षक की पढ़ाने की कला, इन सबो में कूट-कूट कर संपादक के गुण भरे होते हैं. मगर हमें आज पत्र पत्रिका या न्यूज चैनल के संपादक के विषय में जानकारी साझा करनी है. तो इसी विषय को ध्यान में रखकर लिखना होगा. भारत ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व आज विभिन्न प्रकार के वादों से ग्रसित है. इसका वैचारिक प्रभाव समाज के सभी घटकों पर समान रूप से पड़ा. इसके चपेट में लेखक, संपादक और उसकी लेख लेखनी भी आयी. वर्तमान में प्रत्येक लेखक, सूचनादाता और संपादक इन्हीं विचारधारा और वादो से ग्रसित है. यानी समाचार हमें, सामाजिक कुरीतियां, सरकार की योजनाएं, कार्यपद्धती की समीक्षा या कोई सामयिक घटना या कोई वगैरह विषय पर मिले, उसे तरह संपादित किया जाता है कि, बिना सामाजिक हानि यानी भड़काव या टकराव आदि भावना उत्पन्न किये बगैर. एक शराब की हल्के डोज की भाँति धीरे-धीरे  वैचारिक रूप से समाज को अपनी लेखनी और बाद में अपने विचारधारा से जुड़ना होता है. जब हम किसी सामाजिक पुस्तके या कहानी के पुस्तक पढ़ते हैं. तो उसके प्रथम पृष्ठ यानी प्रस्तावना में ही पूरी कहानी की भविष्यवाणी हमें मिल जाती है.
एक संपादक को इतिहास से लेकर वर्तमान में घटित और संभावित सभी योजनाओं को ध्यान में रखकर संपादन करना होता है. चाहे वह विभिन्न वादों से ग्रसित हो या किसी राजनीतिक दलगत, वामपंथी, पूंजीवादी या अन्य कोई वादों से संबंधित हो या किसी विचारधारा से. संपादक किसी भी विचारधारा के गोद में बैठकर कलम खींच रहा हो, वह अपने भावी संभावनाओं को नष्ट नहीं करता. ताकि आगे चलकर उसे परिस्थिति से समझौता ना करना पड़े. संपादक के यही गुण चाहे उसे हम-आप उसे स्वार्थपूर्वक या उज्जवल भविष्य की चिंता के लिए या लेखनी के दायित्व के रूप में देखे. वह अपने लेख को संपादित करने में बस अपने विचारधाराओं की गंध मात्र छोड़ देता है. उस वाद या विचार को अपनी लेखनी में आत्मसात नहीं करता. अगर ऐसा होता तो यह किसी पार्टी विशेष, या विभिन्न वादों का मात्र धोषणा पत्र बन कर रह जाता. परन्तु संपादन कला वाद मुक्त लेखन का वशीभूत है. वतर्मान में समाज को जाने-अनजाने में स्वयं चिंतिन और प्रेरित करने के लिए मजबूर करता है और यही कारण है कि संपादक की लेखनी समाज के लिए, समाज के हित के लिए, एक जीवन दायक प्रेरणा बनी है.

कांग्रेस की निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में भारी गिरावट के पूर्वानुमान

भविष्य में क्या होंगी, मैं नहीं जनता हूँ |  इस दौर में बहुत लोग अभिव्यक्ति की आजादी का अलाप जप रहे है |  तो मुझे भी संविधान के धारा  19  क...